





भगवान सदाशिव का पूजन गृहस्थ लोग अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में इसीलिये करते हैं क्योंकि यह उनका सर्वोत्तम गृहस्थ स्वरूप है, जहां वे एक ही स्वरूप में, अर्द्धभाग में पुरूष स्वरूप और अर्द्धभाग में नारी स्वरूप हैं। इसी स्वरूप के लिये उन्हें त्र्यम्बक कहा जाता है अर्थात् वे शिव, जो सदैव अम्बा रूपी शक्ति के साथ संयुक्त हैं और सृष्टि का निरन्तर संचालन करते रहते हैं।
सृष्टि और जीवन का पूरा स्वरूप दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम स्वरूप पुरूष स्वरूप और दूसरा स्वरूप स्त्री स्वरूप है, जिसे सामान्य भाषा में नर तथा मादा स्वरूप कहा जाता है। इन्हीं दो तत्वों के मिलन से जीवन की रचना होती है। जहां भी एक पक्ष अधूरा रहता है वहां निर्माण नहीं हो सकता, इसीलिये स्त्री और पुरूष को एक दूसरे का पूरक कहा गया है। जीवन का आधार धर्म, धर्म का आधार काम, काम का आधार स्त्री-पुरूष का मिलन ही है।
भगवान शिव के स्वरूप शिवलिंग में भी लिंग और योनि का मिलन है, जो कि सृष्टि के पूरे स्वरूप को दर्शाता है। पुरूष स्वरूप में, जहां मानव-व्यवहार में शौर्य, बल, क्रोध, तेज, साहस इत्यादि तत्व हैं। भगवान शिव को ही सृष्टि का प्रथम पुरूष माना गया है, जिन्होंने अपने साथ हर समय शक्ति को संयुक्त रखा। शिव के बिना शक्ति अधूरी है और शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं, और जहां शिव शक्ति का मिलन है, वहां जीवन है। जिस प्रकार वृक्ष में तना पुरूष स्वरूप है, पत्ते और उसमें स्थित जल तत्व स्त्री स्वरूप है, उसी प्रकार मनुष्य में ऊपर दिये गये गुण पुरूष और स्त्री स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
शिव और शक्ति मिल कर ही पूर्ण बनते हैं। शक्ति ‘इकार’ की द्योतक है, इसलिये शिव में से ‘इकार’ अर्थात् शक्ति हटा दी जाय तो पीछे ‘शव’ ही रहता है, अतः शक्ति की सायुज्यता से ही ‘शव’ पूर्ण रूपेण शिव कहलाते है, और यही इनका अर्धनारीश्वर रूप है।
शैव दर्शन के अनुसार यह रूप ब्रह्म और आत्मा का समन्वित रूप है, जो द्वैतवाद का सूचक है। इस अर्धनारीश्वर रूप में शिव का आधा दायां भाग पुरूष का, एवं आधा बांया भाग पार्वती का है। शिव वाले भाग में सिर पर जटाजूट, सर्पमाला, सर्पयज्ञोपवीत सर्पकुण्डल, बाघाम्बर, त्रिषूल आदि हैं जबकि पार्वती वाले भाग में सिर पर मुकुट, कुण्डल, सुन्दर वस्त्र, रम्य आभूषण, केयूर-मेखला, कंकण आदि हैं, इस प्रकार का रूप ही रम्य तथा शिव शक्ति का समन्वित स्वरूप है।
इसीलिये त्र्यम्बक साधना प्रत्येक गृहस्थ एवं युवक-युवती को करनी चाहिये, जिससे उनके जीवन में पूर्ण सरसता और दृढ़ता आ सके। कन्याओं द्वारा त्र्यम्बक साधना करने से उन्हें श्रेष्ठ वर की प्राप्ति होती है, वहीं युवकों को भी मनोवांछित, अनुकूल कन्या की प्राप्ति होती है, गृहस्थ व्यक्तियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने से उन्हें अपने जीवन में निरन्तर उमंग, आनन्द, जोश, बल, बुद्धि प्राप्त होते रहते है, जिससे जीवन भार नहीं लग कर एक आनन्द यात्रा लगती है, जिसमें पति-पत्नी समान रूप से शिव पार्वती की तरह सहयोगी हैं।
शिव त्र्यम्बक अनुष्ठान
भगवान शिव का एक नाम त्र्यम्बक है, उनके इस स्वरूप की साधना करने से साधक अपने जीवन में पापों से तो मुक्त होता ही है, साथ ही साथ रक्षा, श्री, कीर्ति, कान्ति हेतु इसे श्रेष्ठतम प्रयोग माना जाता है। राज्योन्नति अर्थात् राज्यलक्ष्मी एवं यश प्राप्ति का भी यही श्रेष्ठतम उपाय है।
यह साधना साधक किसी भी सोमवार को प्रातः प्रारम्भ कर सकता है, लेकिन शिव साधना के कुछ विशेष नियम है, जिनकी पालना आवश्यक है। उन्हें साधक ध्यान से पढ़ें और भगवान शिव का कोई भी प्रयोग करते समय इन बातों को ध्यान में रखें-
शिव पूजा स्नान करके ही सम्पन्न की जाती है, शिव पूजन से पहले गणपति पूजन अनिवार्य है।
शिव पूजन में साधक उत्तर की ओर मुह करें और अपने सामने ही शिवलिंग इत्यादि यंत्र, मूर्ति स्थापित करें, इसके अलावा अन्य सभी दिशाएं वर्जित हैं
साधक गले में रूद्राक्ष माला पहनें और अपने सिर पर त्रिपुण्ड अवश्य लगावें।
बिल्व-पत्र शुद्ध एवं ताजे, परन्तु कटे-फटे न हों, पुष्प सुगन्धित हों, बिना सुगन्ध के पुष्प का प्रयोग न करें।
गणशे जी को तुलसीदल और मां पार्वती को दूर्वा नहीं चढ़ावें।
पत्र, पुष्प, फल आदि का मुंह नीचे करके नहीं चढ़ावें, बिल्वपत्र डंठल तोड़ कर उल्टे करके चढ़ावें। भगवान शंकर को कमल, गुलाब, कनेर, सफेद आक (मदार) तथा धतूरा सबसे अधिक प्रिय है।
शिव की परिक्रमा आधी की जाती है, भूल कर भी शिव की पूरी परिक्रमा न करें।
शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं करना चाहिये, अपितु उनके सामने चढ़ाया हुआ फल, प्रसाद जो भी हो वही ग्रहण करें, अतः साधक शिवलिंग पर केवल दुग्ध धारा, बिल्वपत्र के अतिरिक्त कोई भी पदार्थ न चढ़ावें अपितु शिवलिंग के सामने रखें।
त्र्यम्बक साधना में साधक स्वयं ही बैठें और यदि सम्भव हो तो अपनी पत्नी को पूजा में साथ बिठाएं।
इस साधना में 3 वस्तुएं- 1 त्र्यम्बक शिव सिद्धि महायंत्र, 2. शिवलिंग (पारदेश्वर अथवा नर्मदेश्वर), 3. रूद्र शक्ति बीज आवश्यक है। इसके अतिरिक्त मंत्र जप केवल रूद्राक्ष माला से ही सम्पन्न करें।
सर्वप्रथम श्वेत वस्त्र बिछा कर मध्य में एक तांबे का पात्र रखें और उसमें गणपति मूर्ति स्थापित कर उसका पूजन करें, तत्पश्चात् इसे अपने बांये हाथ की तरफ एक कोने में रख दें और आगे दीपक जला दें। इसके बाद एक कलश लेकर उस पर नारियल स्थापित करें तथा कलश पूजन सम्पन्न करें। इस कलश को अपने दाहिनी ओर स्थापित करें। अब दो पात्र लें।
सबसे आगे एक पात्र में शिवलिंग (यदि आपके पास पहले से पारदेश्वर अथवा नर्मदेश्वर शिवलिंग है तो आप उसे ही स्थापित कर पूजन कर सकते है) स्थापित करें, दूसरे पात्र में ‘शिवत्र्यम्बक यंत्र’ को चावल की ढेरी पर स्थापित करें।
शिवलिंग का पूजन तो आधार पूजन है। साधक शिवलिंग की पूजा दुग्ध मिश्रित जलधारा प्रवाहित करते हुए बिल्वपत्र चढ़ाएं और 108 बार ‘ऊँ नमः शिवाय’ का पाठ करें। जल को, पूजन के पश्चात् परिवार के सभी सदस्य नेत्रों, मस्तक तथा कंठ के स्पर्श करावें।
इसके पश्चात् साधक हाथ में जल लेकर विनियोग सम्पन्न करें।
विनियोग
ऊँ अस्य त्र्यम्बकमंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः त्र्यम्बकपार्वती देवता, त्र्यं बीजम्, वं शक्तिः, कं कीलकम्, सर्वेष्टसिद्धर्थे जपे विनियोगः।
अब दूसरे पात्र में स्थापित शिव त्र्यम्बक यंत्र का पूजन प्रारम्भ करें। ऊपर जो दिये गये नियम हैं, उन्हीं के अनुसार पुष्प, फल इत्यादि से पूजन करें। इस शक्ति पूजन में शिव त्र्यम्बक यंत्र के चारों ओर चावल की ढेरी बनाकर उस पर रूद्र बीज मंत्र पढ़ते हुऐ रखें।
शक्ति पूजन में एक-एक पुष्प पंखूड़ी तथा एक एक सुपारी, ‘रूद्र बीज’ स्थापित कर रखनी है, प्रत्येक पर चन्दन का तिलक करना है।
अब साधक ‘शिव त्र्यम्बक यंत्र’ की पूजा सम्पन्न करें। इस पूजा में भी चन्दन, घी, दूध, दही, शक्कर, शहद मिश्री, पंचामृत, बिल्व पत्र पुष्प दूग्ध के नैवेद्य से करना है। शुद्ध घी का दीपक अवश्य ही पूजन के प्रारम्भ में जला दें। अब अपने गले में धारण रूद्राक्ष माला से निम्न मूल मंत्र का पाठ प्रारम्भ करें-
शिव त्र्यम्बक मंत्र
ऊँ ह्रां जूं सः त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव बन्धान्मृत्योर्मुक्षीय मामृताय सः जूं ह्रों ऊँ।।
इस मंत्र का जप 5 माला तो करना ही है, साधना में सिद्धि के लिये पुरश्चरण में एक लाख मंत्र का विधान है, अतः साधक हर सोमवार को यह विशेष पूजन विधान सम्पन्न कर सकता है। जब एक लाख मंत्र जप हो जाये तो साधक यज्ञ सम्पन्न करें। यज्ञ में अलग-अलग इच्छाओं की पूर्ति हेतु अलग-अलग सामग्री का विधान है। मूल रूप से दस वस्तुएं- बेल, फल, तिल, खीर, घी, दूध, दही, दूर्वा, वटवृक्ष की लकड़ी, तथा खैर की लकड़ी घी में डुबो कर होम करना चाहिये। ब्रह्मसिद्धि तेज हेतु प्लास की समिधाओं (लकड़ी) से होम, कांति एवं पुष्टि के लिये खैर की समिधाओं से होम, तिल की आहुति से पाप मुक्ति तथा अकाल मृत्यु और शत्रु पर विजय हेतु पीली सरसों से आहुति, दूर्वा के होम से समस्त व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होती है। यहां तक लिखा गया है कि जो साधक प्रति दिन प्रातः स्नान कर सूर्य के समक्ष इस त्र्यंबक मंत्र का एक सौ आठ जप कर लेता है और यह कार्य प्रतिदिन सम्पन्न करता है तो वह शारीरिक एवं मानसिक रोगों से विमुक्त होकर इस मंत्र के प्रभाव से अपनी समस्त कामनाओं में सिद्धि प्राप्त करता है।
शिव साधना में एक से एक अनोखे प्रयोग हैं, क्योंकि शिव ही तो मंत्र दाता और तन्त्र रचयिता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,