





लाभ प्राप्त करने के क्षण जीवन में बहुत कम बार आते हैं, और जब आयें और व्यक्ति इन महत्वपूर्ण क्षणों को पकड़ ले तो अपने जीवन की दिशा को ही बदल सकता है, क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप दुर्भाग्य है, और जब तक यह दुर्भाग्य रहता है, व्यक्ति का जीवन बड़ा ही कष्टकारक हो जाता है। यह दुर्भाग्य मूल रूप से इन पांच कारणों से बनता है-
अपने इस जन्म के कर्मों की वजह से जीवन में दुर्भाग्य व दुर्गति के फलस्वरूप-
यही दुर्भाग्य स्त्रियों के लिये भी दुःखदायक होता है। दुर्भाग्य की वजह से स्त्री को अपने पीहर में या ससुराल में सुख नहीं मिलता, उसे पति का सुख नहीं मिलता, स्वास्थ्य बराबर कमजोर बना रहता है और उसे नित्य नई व्याधियां और तनाव प्राप्त होते रहते हैं।
इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रख कर हमारे ऋषियों ने सौभाग्य जाग्रत करने का विधान ढूंढ़ निकाला, जिसकी वजह से दुर्भाग्य की काली छाया पुरूष या स्त्री के जीवन पर न पड़े, उसके सभी पाप और दोष साधना से समाप्त हो सकें व जीवन में पूर्ण अनुकूलता प्राप्त कर सके। जो व्यक्ति वर्ष में एक बार सौभाग्य जागरण की क्रिया भली प्रकार से सम्पन्न कर लेता है, उसका पूरा वर्ष अपने आपमें ही सुखदायक और सौभाग्यशाली बना रहता है, उसके सारे ऋण समाप्त हो जाते हैं, आश्चर्यजनक रूप से आर्थिक उन्नति होने लगती है, और वह पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त कर जीवन में निरन्तर उन्नति करता रहता है।
शास्त्रों में लिखा है, कि अशुभ लेखन को शुभता में परिवर्तित किया जा सकता है, यदि भाग्य में दरिद्रता लिखी है, तब उसे साधना से परिवर्तित कर श्री-सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है।
इस साधना को इस विशिष्ट अवसर पर सम्पन्न करने से जीवन में अभिवृद्धि की चेतना का संचार होता है। यदि किसी कारणवश इस दिन नहीं कर सके तो किसी मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को भी यह साधना सम्पन्न कर सकते हैं।
जो भी अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की इच्छा रखता है व जीवन में पूर्ण उन्नति चाहता है, साथ ही पूर्ण सुख और सौभाग्य की इच्छा रखता है, उसे यह साधना अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये। विद्यार्थियों के लिये यह साधना अत्यन्त महत्वपूर्ण, सफलतादायक और सौभाग्यवर्धक है।
अतिश्रवा उपनिषद् में बताया गया है, कि इस साधना से सभी प्रकार की पूर्ण अनुकूलता व सुख-शान्ति प्राप्त होती है और मानसिक तनाव समाप्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के सभी रोग दूर हो जाते हैं, धन, कीर्ति और आयु की वृद्धि होती है, तथा उसके महापाप भी पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं, उसकी सारी आशाओं की पूर्ति होती है, चाहे उस पर कितना ही भीषण तांत्रिक प्रयोग किया हुआ हो, तो वह इस साधना से निश्चय ही समाप्त हो जाता है। यही नहीं, उसके सारे मनोरथ और सारे उद्देश्य सिद्ध हो जाते हैं, उसे तीर्थों में जाने का पूर्ण फल मिल जाता है, भूत-प्रेत डाकिनियों का भय नष्ट हो जाता है तथा तेज एवं बल की वृद्धि होती है।
वास्तव में ही यह साधना अपने आप में महत्वपूर्ण है। यह भले ही सामान्य दिखाई दे, परन्तु इसका फल अपने आप में अचूक होता है। जिस प्रकार से छोटा सा अंकुश विशाल डील-डौल वाले हाथी को नियंत्रण में कर लेता है, उसी प्रकार यह साधना सभी प्रकार के दुर्भाग्य को समाप्त कर, सौभाग्य में परिवर्तित करने की क्षमता रखती है।
साधक इस दिन प्रातः काल उठ कर स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर लें। यदि स्त्री इस साधना को सम्पन्न करना चाहती है, तो वह प्रातः काल उठकर अपना सिर धो ले और बाल खुले रखे, साधक अथवा साधिका कोई भी स्वच्छ वस्त्र धारण कर सकते हैं, वस्त्रों का बंधन नहीं है।
इसके बाद साधक आसन पर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जाये, इसके बाद साधक सामने लकड़ी का बाजोट रख कर उस पर रेशमी वस्त्र बिछा दें और उसके मध्य चावलों की ढे़री बना दें, फिर चावल की ढे़री पर तांबे का कलश स्थापन करें और इस कलश पर केसर से त्रिकोण बनावें, फिर इस कलश में जल डालें। यदि घर में गंगाजल हो तो थोड़ा सा गंगाजल भी डालें, इसके बाद कलश में अक्षत, सुपारी और थोड़े से पुष्प डाल दें तथा कलश के मुंह पर पांच पीपल या आम के पत्ते रख दें, उसके ऊपर नारियल रख दें।
इसके बाद कलश पर अबीर गुलाल चढ़ा कर निम्न मंत्र उच्चारण करें- मंत्र
इसके बाद सद्गुरुदेव का पूजन करें।
अब साधक सामने घी का दीपक लगावें और अगरबत्ती जलावें तथा सामने तांबे की प्लेट (पात्र) में चावल की ढे़री बनायें उस पर पुष्प रखें और पुष्प के ऊपर सौभाग्य शक्ति लॉकेट को स्थापित कर दें और कार्य वृद्धि माला को कलश के सामने रख कर उसका संक्षिप्त पूजन कुंकुम, चावल, पुष्प इत्यादि से करें।
इसके बाद साधक माला से इस कलश के सामने निम्न तीनों मंत्रें की 5-5 माला मंत्र जप करें, इस प्रकार मंत्र जप में ज्यादा से ज्यादा 1 घण्टे का समय लगता है।
मंत्र सम्पन्न कर साधक स्वस्तिक चिन्ह कलश पर केसर से अंकित करें, यह अंकन किसी तिनके से किया जा सकता है।
साधक, जो सामने पात्र में सौभाग्य शक्ति लॉकेट रखा है, उस यंत्र पर ह्रीं अक्षर केसर से अंकित करें, और उसकी संक्षिप्त पूजा करें, संक्षिप्त से तात्पर्य यंत्र पर चावल चढ़ावें, पुष्प समर्पित करें और भोग लगावें, इससे संक्षिप्त पूजा सम्पन्न हो जाती है।
ऐसा करने पर यह साधना सम्पन्न हो जाती है, तब साधक उस लॉकेट को अपने गले में धारण कर लें, गले में पहनने के लिये साधक इस लॉकेट को लाल धागे में पिरो कर गले में धारण करें।
शास्त्रों में वर्णित है कि साधक 108 दिवस तक इस लॉकेट को अपने गले में पहने रहें। वास्तव में ही वे साधक और साधिकायें धन्य हैं, जो इस प्रकार के अवसर का लाभ उठा कर यह साधना सम्पन्न करते हैं, और अपने जीवन में सभी समस्याओं को समाप्त कर पूर्णता प्राप्त करते हैं।
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