





तंत्र शास्त्र में दस देवियों को दस महाविद्या कहा गया है। देवी के मंत्र का नाम भी विद्या है। जीवन का आधार ज्ञान ही है और ज्ञान की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती है जो पुस्तक धारण किये हुये है, जो वीणा धारण किये हुये है, जो आशीर्वाद मुद्रा से युक्त है, जो व्यक्ति में पूर्ण अभय का संचार करती है, वह कहीं भी अकेला नहीं होता, ज्ञान रूपी आभूषण से सदैव युक्त रहता है, उसे अपने मित्र और शत्रु की पहचान होती है और यही तो साधक की पहचान है क्योंकि ज्ञान साधना कुण्डलिनी शक्ति का आधार है।
सरस्वती-साधना प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिये। जीवन में परीक्षायें तो पग-पग पर चलती ही रहती है, हर माता-पिता चाहते है कि उनका बालक परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करे, हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी स्मरण शक्ति तीव्र हो, इन्टरव्यू में, नौकरी में सफलता प्राप्त हो, जो बात कहे, वह दूसरों पर प्रभाव डाले, नेतृत्व की क्षमता का विकास हो, तो उसे सरस्वती साधना अवश्य करनी चाहिये। इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है और जब एक बार सरस्वती सिद्ध हो जाती है तो वह अपनी कृपा जीवन भर बनाये रखती है क्योंकि मां सरस्वती लक्ष्मी की तरह चंचला नहीं है, उसका तो स्थायी निवास रहता है।
यह साधना सरस्वती जयंती के दिन प्रातः अथवा किसी भी पुष्य नक्षत्र में भी प्रातः प्रारंभ की जा सकती है। साधक श्वेत धोती पहन कर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठे, जनेऊ धारण करें यदि अपने बालकों को भी साधना कराना चाहते है तो उन्हें भी श्वेत धोती पहना कर अपने साथ बैठाएं, चन्दन का तिलक करें, सामने सरस्वती देवी का चित्र अथवा तस्वीर लगाएं, शुद्ध घी का दीपक तथा अगरबती जलाएं। अपने सामने एक ताम्र पात्र में एक पुष्प रख कर उस पर मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त दिव्य चेतना ‘सरस्वती यंत्र’ स्थापित करें, उस पर केसर तथा चन्दन चढ़ायें, अपने हाथ में सरस्वती बीज मंत्र ‘ऐं’ लिखकर तथा यंत्र के नीचे अपना नाम लिख कर सरस्वती की वन्दना करें।
दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
वन्द्यां परागमविद्यां सिद्धिचण्डी संगिताम। महा सप्तषती मंत्र स्वरूपां सर्वसिद्धिदाम। ऊँ अस्य सर्व विधान महाराज्ञी मंत्रः रहस्याति-रहस्यमयी पराषक्तिः। श्री मदाद्या भगवती सिद्धि चण्डिका सहस्त्राक्षरी महाविद्यां श्री मार्कण्डेय सुमेधा ऋषिर्गायत्र्यादि नानाविधानि छन्दांसि नवकोटि शक्तियुक्ता श्री मदाद्या भगवती सिद्धिचण्डी देवता श्री मदाद्या भगवती सिद्धि चण्डी प्रसादखिलेष्टार्थे जय विनियोगः।
जल को जमीन पर छोड़ दें।
निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये विभिन्न अंगों को दाये हाथ से स्पर्श करें।
भगवती महासरस्वती की साधना पूर्ण रूप से एक सात्विक साधना है तथा इसमें आचार-विचार में जितनी अधिक निष्कपटता होगी, साधना में सफलता भी उतनी ही अधिक सन्निकट होगी। महासरस्वती की साधना किसी भी माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को सम्पन्न की जा सकती है तथा इन समस्त पंचमियों में से भी माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को विशेष फलदायक माना गया है, जो इस वर्ष दिनांक 14 फरवरी को है।
ऊँ श्रीं नमः सहस्त्रादि। ऊँ ऐं नमः भाले।
ऊँ क्लीं नमो नेत्र-युगले। ऊँ ऐं नमः कर्णद्वये।
ऊँ सौं नमः नासापुटद्वये। ऊँ नमो सुखे।
हृौं ऊँ नमः कंठे। ऊँ श्रीं नमो हृदय।
ऊँ सौं नमः कटयां। ऊँ क्लें नमः उदरे।
ऊँ क्लीं नमो जंघायुगे। ऊँ ऐं नमो गुह्ये।
ऊँ श्री नमः पादादि सर्वांगे।
मां सरस्वती का ध्यान करें। फिर इस मंत्र का 21 बार जप करें-
ऊँ या माया मधुकैटभ् प्रमधिनी या महिषोन्मूलिनी या धूमे क्षणचण्ड-मुण्डदलनी, या रक्त महिषोन्मूलिनी या धूमे क्षणचण्ड-मुण्डदलनी, या रक्त बीजासनी शक्तिः शुम्भनिषुम्भदैत्य मथनी, या सिद्वलक्ष्मीपरा या देवी नवकोटि-मूर्ति सहिता मां पातु विष्वेश्वरी ।
ऊँ ऐं हृौं श्रीं हृीं श्रीं हृौ क्लों ऐ सौं ऊँ हृों श्रीं ऐ क्लां सौं ऐ क्लां हृों श्री जय जय महासरस्वती जगदायैं बीज सुरासुर त्रिभुवन निदानेदयांकुरे सर्वतेजोरूपिणि महा-स्वरूपिणी महामहिमें महामहारूपिणि महामहामाये महामायाविरं चि संस्तुते। विधि वरदे सच्चिदानन्दे विष्णु देहव्रते महामोहिनी मधुकैटभ जिव्हासिनी नित्य वरदान तत्परे। महास्वाध्यायवासिनी महामहो तेजधारिणी।
सर्वाधारे सर्वकारण करणे अचिन्त्य रूपे। इन्द्रादि निखिलनिर्जरसेविते सामगान गायन्तिपूर्णोदय कारिणि। विजय जयन्ति अपराजिते सर्वसुन्दरि रक्तांषुके सूर्यकोटि संकाषेन्द्रकोटि सुषीतले अग्निकोटि दहनषीले यम कोटि क्रू रे वायु कोटि बहन सुषीतले।
संकट हो अथवा कष्ट, इस मंत्र का जप करने से संकट शांत हो जाता है। जीवन के परीक्षाकाल में प्रतिदिन पांच बार इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिये। यह अपने आप में सिद्धि विजयप्रद मंत्र है। मंत्रों में जो शक्ति है, वह शक्ति साधक स्वयं साधना कर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है, वास्तव में यह अनुष्ठान ही शीघ्र प्रभावकारक है।
साधको के लिये पूर्ण मंत्र का नियमित जप करना संभव नहीं होता है। निश्चय ही मंत्र बड़ा है। अतः नित्य प्रति के साधना क्रम के लिये सरस्वती के कुछ विषिष्ट मंत्र दिये जा रहे है, जो साधक के आत्म ज्ञान, वाकसिद्धि, कार्य में सफलता एवं भौतिक सुखों की की प्राप्ति के विशिष्ट मंत्र है। दैनिक जीवन में, साधक इन मंत्रों का नित्य स्फटिक माला से मंत्र जप करें, तो उसे अवश्य ही लाभ प्राप्त होता है।
सरस्वती साधना में किसी विशेष आरती इत्यादि का विधान नहीं है। साधना समाप्त होने पर अपने हाथ पुष्प लेकर भगवती सरस्वती के चित्र पर पुष्पांजली अर्पित करें और यही प्रार्थना करें कि भगवती सरस्वती ज्ञान रूप में, बुद्धि रूप में, चेतना रूप में सदैव हमारे साथ रहे। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त सरस्वती यंत्र को लाल डोरे में पिरोकर अपनी दांई भुजा में बांध दें। जब भी सरस्वती-साधना करें तो इस यंत्र को सरस्वती चित्र के साथ अपने दोनों हाथों में रख कर ऊपर लिखे तीन मंत्रों में से अपने कार्य के अनुसार मंत्र जप सम्पन्न करें। वास्तव में सरस्वती साधना जीवन की दिव्यतम साधना है जो अन्य सभी साधनाओं के द्वार खोल देती है।
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