





साधना की प्रक्रिया उतनी कठिन नहीं होती, महत्व तो उस क्षण विशेष का होता है, भारतीय ऋषियों ने काल ज्ञान और ज्योतिष पर इतने अधिक ग्रंथ लिखे हैं तो उसके पीछे मंतव्य यही है कि काल बहुत बलवान होता है।
अवतारों के जीवन में भी ग्रहण की महत्ता के प्रसंग देखने को मिलते हैं। भगवान राम ने अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण के समय ही प्राप्त की थी, इसी प्रकार भगवान कृष्ण ने भी सान्दीपन से दीक्षा जब प्राप्त की थी, तो समय ग्रहण काल चल रहा था क्योंकि ग्रहण के समय ही तपस्यांश को, दीक्षा या साधनात्मक प्रवाह को पूरी तरह ग्रहण किया जा सकता है।
महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने जा रहा था। उधर कौरवों की सेना सुसज्जित हो चुकी थी, भीष्म, द्रोणाचार्य, कौरव सभी अपने-अपने रथों पर आरूढ़ थे। इस ओर पाण्डवों की सेना तैयार खड़ी थी कि कब युद्ध का बिगुल बजे और युद्ध प्रारम्भ हो। पाण्डवों नें श्रीकृष्ण से युद्ध को प्रारम्भ करने की स्वीकृति मांगी परन्तु कृष्ण ने उन्हें रोक दिया। कृष्ण ने कहा यदि अभी युद्ध आरम्भ हो गया तो विजय किसकी हो निश्चित नहीं कहा जा सकता है, परन्तु अभी कुछ देर में ही सूर्य ग्रहण लगने वाला है, यदि तब युद्ध का शंखनाद किया जाए, तो विजय निश्चित ही पाण्डवों के हाथ लगेगी। कृष्ण ग्रहण के इन सिद्ध क्षणों को समझ रहे थे और निश्चित समय पर जब पाण्डवों ने युद्ध प्रारम्भ किया तो इतिहास साक्षी है, कि एक-एक कर सारे कौरव काल के गर्त में समाते चले गए और पाण्डवों को कुछ भी नहीं हुआ, विजयश्री पाण्डवों के हाथ लगी।
चन्द्रमा, मन, भावना, कल्पना शक्ति, ऐश्वर्य, संगीत, कला, सौन्दर्य, माधुर्य, चरित्र, यश, कीर्ति का ग्रह है, ऐसे ग्रह की साधना को तो चन्द्र ग्रहण पर अवश्य ही करनी चाहिए है। चन्द्र ग्रहण साधनात्मक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि चन्द्रग्रहण के समय वायुमंडल में एक विशेष प्रकार की शक्ति व्याप्त होती है, जो साधनात्मक दृष्टि से सफलतादायक होती है।
चन्द्रमा अपनी शीतलता, कोमलता और सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए चन्द्रमा व्यक्ति को सौन्दर्य, समस्त भौतिक-सुखों और गृहस्थ सुखों को देने वाला है, अतः चन्द्र ग्रहण के दिन का विशेष समय साधक के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि उन क्षणों में साधना सम्पन्न करने पर साधक की अन्तः स्थिति विशेष तरंगों द्वारा ग्रहों से जुड़ जाती है और जिस व्यक्ति का भी इन तरंगो से सामंजस्य हो जाता है, वह जीवन में सफल होता ही है।
चन्द्रग्रहण के समय साधना सम्पन्न करने पर व्यक्ति अपनी बाधाओं और परेशानियों से हमेशा के लिए छुटकारा पा सकता है, क्योंकि समय का अपने-आप में विशेष महत्व होता है, ग्रहणकाल का भलीभांति उपयोग कर अपने लिये सफलता के द्वार खोल लेता है।
प्रत्येक व्यक्ति को इस समय का दुरूपयोग न करते हुए पूजा पाठ, मंत्र जप, अनुष्ठान आदि सम्पन्न कर समय का सदुपयोग करना चाहिये, क्योंकि किसी भी प्रकार की समस्या से मुक्ति पाने हेतु इससे अच्छा समय कोई नहीं होता।
इसका कारण यह है कि इस विशिष्ट क्षणों में की गयी पूजा विधान, मंत्र जप आदि का साधक को सौ गुना फल प्राप्त होता है, क्योंकि ग्रहण काल में की गई एक माला मंत्र जप अन्य समय में की गई सौ माला मंत्र जप के बराबर होती है।
हर व्यक्ति की मूलभूत निम्न इच्छाएं होती हैं।
साधक सफेद वस्त्र धारण करें, ऊनी आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें और अपने सामने सफेद वस्त्र से ढ़के बाजोट पर सम्मोहन शक्ति युक्त सौन्दर्य यंत्र स्थापित करें। यंत्र का पंचोपचार पूजन करें तथा सम्मोहन वशीकरण माला से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें-
साधना की पूर्णता के बाद यंत्र व माला को गुरु चरणों में अर्पित कर दें। इस साधना से जन्म कुण्डली में जनित दोष समाप्त हो जाते हैं और बालारिष्ट योग का प्रभाव न्यून होकर दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
यदि मनुष्य जीवन पर विचार किया जाये तो जीवन की मूल शक्ति ही आकर्षण, सम्मोहन और वशीकरण है। जिसमें इस शक्ति का अभाव होता है, वह अपना जीवन सही रूप से गतिशील नहीं कर पाता है और जिसमें यह शक्ति विशेष रूप से होती है, वे अपने जीवन को श्रेष्ठ रूप से जीते हैं, पशु, मनुष्य और देवता में भी अन्तर सम्मोहन का ही है।
मनुष्यों में कुछ व्यक्ति जीवन में उच्च पद, उच्च स्थिति प्राप्त करते हैं और कुछ सामान्य रूप से जीवन जीते रहते हैं, कुछ की स्थिति इससे भी भयावह होती है, अर्थात् सामान्य से भी निचले स्तर का जीवन यापन करने को विवश होते हैं। इसके मूल में आकर्षण, सम्मोहन क्रिया ही है।
प्रथम क्रिया मनः शक्ति को उच्च स्तर पर ले जाने वाली स्वः सम्मोहन है, दूसरी आकर्षण है। जब इन दोनों शक्तियों का सहयोग होता है तो जीवन परिवर्तित होने लगता है। उसे प्रत्येक कार्य में सिद्धि प्राप्त होने लगती है, समाज, परिवार, पत्नी, संतान के मधय वह समानित व पूजित होता है। सौन्दर्य, आकर्षण उसके ही पूरक बन जाते हैं। उसे किसी भी क्षेत्र में पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता। सम्मोहन शक्ति तो प्रत्येक स्त्री, पुरूष, बालक, वृद्ध के लिये उपयोगी है। जिससे वह अपना सुखद जीवन व्यतीत कर सके। क्योंकि इसी सम्मोहन शक्ति के मोह-पाश में समाज, परिवार, कर्मचारी व सभी जन बंधे होते हैं।
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