





शिव अतुलनीय और असाधारण देवता हैं महादेव का व्यक्तित्व असीमित हैं। शुद्ध चेतना का ही नाम शिव है तथा सर्वोच्चता सत्ता को ही शंकर कहा गया है। विशुद्ध प्रज्ञा का दूसरा नाम ही शिव हैं, जो एक होते हुए भी त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) हैं।
ईश्वर शिव ही नित्य, स्थायी, सत्ता व सर्वव्यापी है तथा शिव स्वयं शक्तिमयक हैं, अतः शिव-शक्ति के द्वारा ही कार्य करते हैं, वहीं शक्ति शिव रूपी विशुद्ध चेतना जड़ तथा प्रकृति के बीच का एक माध्यम हैं, जिनको उमा, ईश्वरी, पार्वती आदि नामों से पुकारा जाता है। शक्ति महोदव की अनुरूप परिणति ही है, न कोई स्वतंत्र सत्ता। प्रकृति के सृष्टि कर्त्ता, विकास कर्त्ता व संहार कर्त्ता आदि सम्पूर्ण नियमों की कार्य प्रणाली उसी सत्ता के आधार पर अनुप्राणित है। जब मन शिव सत्ता से सत्तावान हो जाता है, तो प्रकृति के सम्पूर्ण नियम उसके सहयोगी बनकर कार्य करते हैं। भक्त का योग क्षेम स्वयं महादेव वहन करते हैं तथा उस जीवधारी का जीवन उस समष्टि प्रकृति से पोषित होता चला जाता है।
शिव-गौरी चरण पादुका पूजन का महत्व भगवान शिव ब्रह्माण्ड स्वरूप हैं, अतः दार्शनिकों की उक्ति में यः पिण्डे स ब्रह्माण्डे सही चरितार्थ होती है। अतः सीमित साधन व सीमित ज्ञान शक्तिधारी मनाव ब्रह्माण्ड स्वरूप की तो पूजा अर्चना नहीं कर सकता, किन्तु शिव-शक्ति के चरणों की पूजा एक ही दिन में अनेक बार भी करना चाहे, तो कर सकता है। शिव-शक्ति सृजानात्मक शक्ति के द्योतक हैं। यद्यपि शंकर निर्गुण व निराकार हैं, तथा सृजन का स्त्रोत होते हुए भी सम्पूर्ण चराचर, चल व अचल पदार्थों के अंत और नाश का परिचायक भी हैं। शिव-शक्ति चरण पादुका अव्यत्तफ़, अदृश्य, सृजन शक्ति का अन्तर्भाव है तथा यही आध्यात्मिकता का भी स्वरूप है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवान शिव ने समुद्र मंथन से उत्पन्न महाविष का पान देव तथा दानवों की प्रार्थना से किया तथा विष से उन सभी की रक्षा की व नीलकण्ठ कहलाये। आज भी उस विष का नीला निशान शिव की मूर्तियों व चित्रों पर दिखाई देता है। शिव की परोपकारिता, दीन दयालुता, औघढ़दानी स्वरूप आदि की जनश्रुतियां प्रसिद्ध है।
भक्ति करने से अन्य देवता इतने शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, जितने शीघ्र भगवान शंकर प्रसन्न होते है, इसीलिए उन्हें भोले- भंडारी कहा जाता है।
भगवान शिव की भगवान राम व कृष्ण ने भी पूजा की है तथा वरदान प्राप्त किये हैं, अतः समय-समय पर प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव मानव का ही नहीं देवताओं तथा दानवों का भी उपकार करते रहते हैं।
शिव की तो महिमा ही निराली है, प्रसन्न हुए तो कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष बना दिया, रावण की नगरी को सोने की बना दिया, अश्विनी कुमारों को सारी आयुर्वेद विद्या सौंप दी, महामृत्युजंय स्वरूप होकर भीषण से भीषण रोग की समाप्ति शिव कृपा साधना से ही प्राप्त होती है। जीवन में श्रेष्ठता शिवतत्व के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है, महाशिवरात्रि में सम्पन्न किया जाने वाला हर प्रयोग सौभाग्यदायक ही रहता है।
माता पार्वती, शक्ति स्वरूप जगदम्बा है जो कि शिव का ही स्वरूप है, माता गौरी स्वयं अन्नपूर्णा, लक्ष्मी स्वरूप हैं शिव की पूजा साधना करने से लक्ष्मी साधना का ही फल प्राप्त होता है, और सभी देवताओं में अग्र पूज्य गणपति तो साक्षात शिव पुत्र हैं जो सभी प्रकार के विघ्नों, अड़चनों, बाधाओं को समाप्त करने वाले देव हैं। शिवरात्रि की साधना से गणपति साधना का ही साक्षात् फल प्राप्त होता है और जिसने शिवत्व प्राप्त कर लिया, उसने जीवन में पूर्णत्व प्राप्त कर लिया, उसके लिए कठिन से कठिन कार्य भी सरल बन जाता है।
शक्ति और शक्तिमान की उपासना बहुत से सज्जन इसको भगवान की ह्लादिनी शक्ति मानते हैं। महेश्वरी, जगदीश्वरी, परमेश्वरी भी इसी को कहते हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, सीता आदि सभी इस शक्ति के दो रूप हैं। माया, महामाया, मूल प्रकृति, विद्या, अविद्या आदि भी इसी के रूप हैं। परमेश्वर शक्तिमान् हैं और भगवती परमेश्वरी वही शक्ति हैं। शक्तिमान से शक्ति अलग होने पर भी अलग नहीं समझी जाती। जैसे अग्रिकी दाहिका शक्ति अग्रि से भिन्न नहीं है। यह सारा संसार शक्ति और शक्तिमान से परिपूर्ण है। तथा उसी से इसकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। इस प्रकार समझकर साधक शक्तिमान् और शक्ति युगल की उपासना करते हैं। प्रेम स्वरूप भगवती ही भगवान् को सुगमता से मिला सकती है। इस प्रकार समझकर कोई- कोई केवल भगवती की ही उपासना करते हैं। इतिहास- पुराणादि में सब प्रकार के उपासकों के लिये प्रमाण भी मिलते हैं।
इस महाशक्तिरूपा जगत् जननी की उपासना लोग विविध प्रकार से करते हैं। कोई तो इस महेश्वरी को ईश्वर से भिन्न समझते हैं और कोई अभिन्न मानते हैं। वास्तव में तत्त्व को समझ लेना चाहिये फिर चाहे जिस प्रकार उपासना करे कोई हानि नहीं है तत्त्व को समझकर श्रद्धा भक्तिपूर्वक उपासना करने से सभी उस एक प्रेमास्पद परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।
भगवान शिव-शक्ति अपनी भक्तवत्सलता के कारण ही सभी के प्रिय देव हैं, तभी तो उन्हें अर्द्धनारीश्वर महोदव कहा गया है। भगवान शिव की उपासना करना विश्व का सर्वाधिक प्राचीनतम कृत्य है।
गृहस्थ जीवन का आदर्श स्वरूप भगवान सदाशिव और माता पार्वती ही हैं। इसीलिये प्रत्येक गृहस्थ शिव गौरी को अपना आराध्य मानता है। जिस प्रकार भगवान शिव का गृहस्थ जीवन सभी कामनाओं से पूर्ण है। पुत्र के रूप में भगवान गणपति और कार्तिकेय हैं और सदैव साथ में गौरी रूपा पार्वती हैं। स्थान भी पूर्ण शांति युक्त हिमालय है, जहां पूर्ण आनन्द से विराजित होते हैं। गृहस्थ व्यक्तियों के लिये शिव और गौरी आदर्श स्वरूप हैं क्योंकि शिव को रसेश्वर कहा गया है और गौरी को रसेश्वरी कहा गया है। यह शिव ओर शक्ति का संयुक्त रूप है।
जहां जीवन में गृहस्थ है तो उसके साथ बाधायें तो आयेंगी ही लेकिन शिव-गौरी चरण पादुका साधना कर जीवन को रस से युक्त बनाया जा सकता है। जीवन में नित्य प्रति आनन्द रस की वर्षा होती रहे, ऐसा अनुभव हो कि हर सुबह एक नई प्रसन्नता लेकर जीवन में आयी है, तो वह जीवन अनूठा ही जीवन होता है, उसमें प्रसन्नता का रस ही रस भरा रहता है।
यह साधना 24 फरवरी अथवा किसी भी शुक्रवार को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में आरम्भ करनी चाहिये। इस दिन स्नान करके पीली धोती पहन कर, पीले आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने चौकी पर गणपति विग्रह स्थापित करके ऊँ गणेशाय नमः इस मंत्र का उच्चारण करते हुये पीले चावल 108 बार चढ़ायें और दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें- हे! भगवान गणपति मेरे जीवन के सभी विघ्नों का नाश करें।
इसके बाद गुरु चित्र का भी पंचोपचार पूजन करके एक प्लेट पर कुंकुम से या केशर से स्वस्तिक चिन्ह बनाकर शिव-गौरी चरण पादुका स्थापित करें। इसके बाद नीलकंठेश्वर जीवट पादुका के ऊपर रखकर यह प्रार्थना करें, कि मेरे जीवन के जो भी विष हैं, वो सभी भगवान नीलकंठ समाप्त कर मुझे सौभाग्य, समृद्धि, सम्पन्नता प्रदान करें। इसके बाद धूप, दीप, पुष्प आदि से पादुका का पूजन करके निम्न मंत्र का नीली हकीक माला से पांच माला मंत्र जप करें।
यह एक दिवसीय साधना है, उसके बाद प्रत्येक सोमवार को पादुका पूजन कर एक माला निम्न मंत्र की जप करते रहें।
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