





सृष्टि-ज्ञान प्राप्त हो जाने से शून्य से कोई भी पदार्थ प्राप्त कर सकता है। ब्रह्म दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। आत्मा, मन व शरीर पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित होता है। सम्मोहन के सूक्ष्म तथ्यों के ज्ञान से युक्त हो जाता है और किसी को भी स्वतः आकर्षित कर लेता है। शास्त्रें ने कहा है, कि जिसने विशुद्ध चक्र को जाग्रत कर लिया वह अपने-आप में परमहंस अवस्था में पहुँच गया।
परमहंस अवस्था में पहुँचने का तात्पर्य है, जीवन और जीवन से भी परे हट कर उन रहस्यों को भी प्राप्त कर लेना जो अगम है, अगोचर है। जहाँ विज्ञान की पहुँच नहीं है या जहाँ विज्ञान समाप्त हो जाता है। वहीं से ज्ञान प्रारम्भ हो जाता है। ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुँचने की क्रिया को हमने विशुद्ध चक्र का जागरण कहा है। विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने पर आत्मा का पूरे ब्रह्माण्ड से संयोग स्थापित होता है। इस चक्र के जाग्रत होने पर शरीर में दैवी शक्तियों का त्वरित प्रभाव होता है।
इस चक्र का स्थान कंठ में होता है। व्यक्ति को कंठ पर अपना ध्यान एकत्रित कर ‘‘हं’’ जो इस चक्र का मूल मंत्र है, का उच्चारण करना चाहिये। विशुद्ध चक्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण चक्र होता है, यह जाग्रत होते ही व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होने लगती है, आयु वृद्धि होती है, संगीत विद्या की सिद्धि प्राप्त होती है, शब्दों का ज्ञान होता है, व्यक्ति विद्वान बनता है। इस चक्र का रंग नीला है, विशुद्ध चक्र 16 दलों से युक्त पीले रंग वाले कमल के समान होता है, यहाँ 16 नाडि़याँ आपस में मिलती हैं तथा इनके मिलने से ही कमल की आकृति बनती है। इस चक्र में अ से अः तक 16 ध्वनियाँ निकलती हैं।
इसके सोलह दलों के बीज मंत्र हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लृ, ल, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। इन दलों के जाग्रत होने पर निम्न उपलब्धियां साधक को प्राप्त होती है- वाक् सिद्धि, अर्थात् उसके द्वारा कहे गये शब्द सत्य होते ही हैं, कंठ में सरस्वती की स्थापना, श्राप-वरदान देने की क्षमता, सम्पूर्ण शास्त्रें का ज्ञान, धारा-प्रवाह बोलने की क्षमता, शरीर को इच्छा अनुसार छोटे से छोटा एवं बड़े से बड़ा बना देने की क्षमता, ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म रहस्यों का ज्ञान, पदार्थ परिवर्तन का ज्ञान, किसी भी प्राणी का रूप धारण करने की क्षमता, पूर्ण ध्यान प्राप्ति, इच्छा मृत्यु की उपलब्धि, पूर्ण सांसारिक संसाधनों के उपभोग की क्षमता और सम्मोहन की उपलब्धि होती है। जब साधक अपनी साधना के बल पर इस चक्र में प्रवेश करता है। तब वह दिव्य श्रुत सा बन जाता है, मन स्थिर हो जाता है, भूख-प्यास समाप्त हो जाती है।
इस चक्र का ध्यान करने से दिव्य दृष्टि, दिव्य ज्ञान तथा समाज के लिये कल्याणकारी भावना पैदा होती है। इस चक्र पर ध्यान करने से व्यक्ति रोग, दोष, भय, चिंता, शोक आदि से दूर होकर लम्बी आयु को प्राप्त करता है। यह चक्र शरीर निर्माण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, यह चक्र आकाश तत्व प्रधान है और शरीर जिन पाँच तत्वों से मिलकर बनता है, उसमें एक तत्व आकाश भी होता है। आकाश तत्व शून्य है तथा इसमें अणु का कोई समावेश नहीं है। मानव जीवन में प्राण शक्ति बढ़ाने के लिये आकाश तत्व का अधिक महत्त्व रखता है। यह तत्व मस्तिष्क के लिये आवश्यक है और इस चक्र का नाम विशुद्ध रखने का कारण यह है कि इस तत्व पर मन को एकाग्र करने से मन आकाश के समान शून्य होकर शांत हो जाता है।
महाभारत में इस चक्र को युधिष्ठिर का चक्र भी कहते हैं। श्री युधिष्ठिर का शंख अनंत विजय का सूचक है, ध्यान कर रहे साधक को दिव्य शांति प्राप्त कराते हैं श्री युधिष्ठिर! विशुद्ध चक्र पर ध्यान करने से साधक को इष्ट देवता के दर्शन भी संभव है। भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार समुन्द्र मंथन के दौरान समुन्द्र से अमृत व विष दोनों ही मिला था। इनमें से अमृत देवों को प्राप्त हुआ, परन्तु विष को कोई भी ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं था, तब सभी देवता भगवान शिव जी के पास गये, भगवान शिव ने इस समस्या को दूर करने के लिये वह विष स्वयं ही ग्रहण कर लिया और उसे अपने कंठ में सुरक्षित धारण किया। इसीलिए उन्हें नीलकण्ठ भी कहते हैं। इस पौराणिक कथा से भावार्थ है कि भगवान शिव जो सम्पूर्ण सृष्टि के रचनाकार परम योगी हैं, उनकी भांति जब विशुद्ध चक्र एवं इससे उच्चत्तर चक्रों पर ध्यान कर उन पर सम्पूर्ण सिद्धि कर जाग्रत किया जाता है। तब समस्त ब्रह्माण्ड के जहरीले पदार्थ भी हमारे सामने शक्ति विहीन हो जाते हैं, वे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।
विशुद्ध चक्र एक पुल की भाँति मन व शरीर को जोड़ता है। विशुद्ध चक्र के संतुलित होने से हम स्वयं को खुल कर व्यक्त करते हैं व दूसरों को भी शांति पूर्वक सुनते हैं। हमारे अंदर भी शांति रहेगी तथा बाहरी रूप से भी शांत महसूस होगा। परन्तु यदि विशुद्ध चक्र सुप्त अवस्था (असक्रिय) या फिर असंतुलित है, तो व्यक्ति अर्थ पूर्ण वचन नहीं करते, हर बात में झूठ का सहारा लेते हैं, सत्यवादिता कम हो जाती है। यदि विशुद्ध चक्र अति सक्रिय होता है तो वह व्यक्ति को वाचल बनाता है। निष्क्रिय विशुद्ध चक्र मनुष्य को चिंतित, जिद्दी, शर्मिला बनाता है, व्यक्ति अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करने में असमर्थ हो जाता है, रचनात्मकता में कमी आती है, व्यक्ति डरपोक व अंर्तमुखी हो जाता है, असुरक्षा के भाव हमेशा उसे घेरे रहते हैं, इन सभी कारणों से व्यक्ति का निजी जीवन व व्यवसायिक जीवन बाधित रहता है और इसलिये उसका पूर्ण जीवन संतोष रहित व उदासीन व्यतीत होता है। वहीं अति सक्रिय विशुद्ध चक्र व्यक्ति में छल-कपट की भावना उत्पन्न करता है, वह हर बात को जोड़-तोड़ कर सोचने लगता है, उसकी कथनी व करनी में हमेशा अंतर होता है, ऐसे व्यक्ति न तो स्वयं भरोसे के लायक रहते हैं और न ही किसी और पर भरोसा करते हैं।
जब हमारा विशुद्ध चक्र असक्रिय या असंतुलित होता है। तब हमारे शरीर में शक्ति का संचार बाधित होता है। जिससे हमारे मस्तिष्क, मुख, गले व गर्दन के हिस्से व्याधि ग्रस्त रहते हैं। हमेशा सर दर्द रहना, गर्दन की अकड़न Cervical Problem, बार-बार गले में खराश होना, गला बैठना, मुँह में छाले, दाँतों की समस्या रहना, थायराइड की समस्या, जबड़े में सूजन, कंधों में दर्द रहना व शरीर के ऊपरी हिस्से में परेशानी आदि सभी समस्यायें असंतुलित विशुद्ध चक्र से उत्पन्न होती है।
प्रकृति द्वारा चिकित्सा- विशुद्ध चक्र आकाश तत्व प्रधान चक्र है, इसीलिये हमें अपनी दिनचर्या में से थोड़ा समय निकाल कर कुछ देर खुले आसमान के नीचे व्यतीत करना चाहिये, हम चाहे तो खुले में योग, प्राणायाम आदि का अभ्यास कर सकते हैं।
योगाभ्यास द्वारा- सर्वांगासन, मतस्यआसन, भुजगासन, ऊष्ट्रासन, सेतुबंध आसन आदि आसन का नियमित अभ्यास विशुद्ध चक्र को जाग्रत करने में पूर्णतया सहायक है। इसी के साथ-साथ शीर्षासन, विपरीतकर्णी मुद्रा, हलासन, शशांक आसन आदि आसन का अभ्यास विशुद्ध चक्र को संतुलित व सुदृढ़ बनाने का कार्य करते हैं। सभी आसन का अभ्यास नियमित एवं ध्यानपूर्वक करें।
ध्यान द्वारा- शांत चित्त से एकाग्र होकर नीले रंग के 16 पंखुडि़यों वाले कमल को कण्ठ प्रदेश में महसूस करते हुये, उस पर ध्यान लगा हं शब्द का सोलह बार उच्चारण करना चाहिये। नियमित अभ्यास से विशुद्ध चक्र को सम्पूर्णतया जाग्रत किया जा सकता है।
संतुलित आहार द्वारा- अपने जीवन में सात्विक भोजन को अपनाकर स्वस्थ रहा जा सकता है, भरपूर मात्रा में पानी पीकर विशुद्ध चक्र को शुद्ध व सात्त्विक बनाया जा सकता है।
साधना द्वारा- साधक द्वारा विशुद्ध चक्र जागृत हेतु अनुक्रम अनुसार तीन चरणों में दीक्षा प्राप्त करना, चक्र को जाग्रत करने में पूर्णतया सहायक है। प्रथम चरण में सरस्वती साधना, द्वित्तीय चरण साधना दीक्षा, तृतीय चरण विशुद्ध चक्र जाग्रति दीक्षा।
भगवती सरस्वती मनुष्य के शरीर में जिह्ना व कण्ठ (विशुद्ध चक्र) में निवास करती हैं। मनुष्य के जीवन में सरस्वती विद्यमान रहती हैं। वह अपनी अधिष्ठात्री बनाकर अपने जीवन की अज्ञानता को समाप्त कर सकता है। जब सरस्वती सिद्ध होती है। तब साधक अपने ज्ञान-बल से जीवन में निरन्तर विजय प्राप्त करता है। उसमें नेतृत्व के गुण आते हैं, कला के क्षेत्र में वह निपुण हो जाता है। उसके व्यक्तित्व में सम्मोहन व आकर्षण आ जाता है।
प्रातः काल साधक जल्दी उठ जायें और स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें, फिर पूजा स्थान में बैठ जायें। अपने सामने मां सरस्वती का चित्र स्थापित कर दें। उसके बाद निम्न ध्यान मंत्र का उच्चारण करें-
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमाद्यां जगदव्यापिनीं
वीणा पुस्तक धारिणीभमय दां जाड़यापन्धकारापहां।
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पदमासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदाम्।।
इसके बाद एक थाली में तांबे की श्लाका से सरस्वती यंत्र का अंकन त्रिभुज बना लें। पश्चात् विशुद्ध चक्र मंत्र 108 बार जप करें।
विनीत श्रीमाली
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