





ईश्वर द्वारा निर्मित सभी जीवों में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ जीव है। क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य को अनेक अलंकारों से विभूषित कर सभी तरह के कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान की है। अन्य किसी जीव में यह गुण नहीं है। इसलिये मनुष्य सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
लेकिन मनुष्य के लिये स्वतंत्रता वरदान के साथ- साथ अभिशाप भी है। यदि वह मनुष्य जीवन प्राप्त करके भी सद्कर्मों की ओर अग्रसर ना हो पाये। मनुष्य की स्वतंत्र प्रणाली ही वर्तमान में अभिशप्त प्रतीत होती है। जिस प्रकार मनुष्य सद्कर्मों से विरक्त और अनर्गल कार्यों की ओर आकृष्ट हो रहा है, यह संकेत मनुष्य के लिये घातक व पीड़ादायक सिद्ध हो सकते हैं।
क्योंकि ईश्वर ने सभी जीवों में मनुष्य का निर्माण सद्कर्मों में प्रविष्ट होकर जीवात्मा को उर्ध्वगति प्राप्त करने के उद्देश्य से किया है। जिसका सर्वथा अभाव दिखता है। मनुष्य को सदा यह विचार करना चाहिये कि किस युक्ति से उसका परमार्थ सिद्ध हो सकता है। उसके जीवन का लक्ष्य किस प्रकार प्राप्त हो सकता है। इसके लिये ईश्वर ने अनेक कर्म की व्यवस्था प्रदान की है। जिसके द्वारा मनुष्य मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त ही नहीं बल्कि देवतुल्य बन सकता है। साधना, मंत्र-जप, पूजन, ईश्वर स्तुति, योग, ध्यान, यज्ञ आदि के माध्यम से मनुष्य एक आनन्दमय जीवन व्यतीत कर सभी पुरूषार्थों को प्राप्त करते हुये, जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
इन सत्कर्मों में यज्ञ को सर्वोत्तम माना जाता है। वैदिक धर्म में यज्ञ को वेद का प्राण और आत्मा कहा गया है। हिन्दू धर्म में यज्ञ का सर्वाधिक महत्व बताया गया है। सनातन धर्म में वेदों का जो महत्व है, वही महत्व यज्ञ को भी प्राप्त है। इसका कारण यह है कि वेदों का प्रधान विषय यज्ञ ही है। इस सृष्टि को संचालित करने वाली अनेक देव शक्तियां सम्पूर्ण संसार की विभिन्न समस्याओं और मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन की सुख-समृद्धि, उन्नति-अवनति, लाभ- हानि, रोग-शोक आदि से घनिष्ट सम्बन्ध रखती हैं।
इन देव शक्तियों को आत्मसात कर ही व्यक्ति अनुकूलता व अत्यधिक सरलता से उन्नति प्राप्त कर सकता है। देव शक्तियों को अनुकूल बनाने के लिये जितने भी साधना, क्रियायें बतायी गयी हैं, इनमें यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ व शीघ्र फलदायक है। क्योंकि यज्ञ द्वारा देवता शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और साधक के अभीष्ट को पूर्ण करते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि-
अर्थात् संसार की उत्पत्ति का स्थान यही यज्ञ है। क्योंकि यज्ञ को ईश्वर और धर्म का साक्षात् प्रतीक कहा गया है।
गीता में कहा गया है-
हे अर्जुन यज्ञ न करने वाले को यह मृत्युलोक भी प्राप्त नहीं हो सकता फिर अन्य सुन्दर लोक की तो बात ही क्या है? प्रत्येक युग में यज्ञ को सर्वाधिक महत्ता दी गयी है। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम ने स्वयं अश्वमेध यज्ञ किये तथा धर्मराज युधिष्ठर ने स्वयं राजसूय यज्ञ सम्पन्न किये।
जिस प्रकार से यज्ञ हिन्दू धर्म का अति प्राचीन वैदिक कर्म है। उसी प्रकार मनुष्य जाति भी अत्यन्त प्राचीन है। प्रत्येक युग में लोगों ने यज्ञ के द्वारा ही अपने मनोरथों को पूर्ण किया है। उनके जीवन में यज्ञ एक उद्देश्य पूर्ण भाग बन चुका था। इस सम्बन्ध में अनेक-अनेक प्रमाण रामायण, महाभारत, गीता तथा वेद आदि में आज उपलब्ध हैं। यही कारण है कि आज के इस कलियुग में भी यज्ञ की महत्ता कम नहीं हुयी है। जबकि आज यज्ञ महत्ता पूर्व के युगों से अधिक है।
यज्ञ ही समस्त मनोवांछित इच्छाओं तथा कार्यों का पूरक रहा है। यज्ञ से ही देवताओं ने असुरों को समाप्त कर अमरत्व और स्वर्ग प्राप्त किया था। यज्ञ से शत्रुवत् भाव रखने वाले भी मित्र हो जाते हैं। यज्ञ सभी कष्टों का नाश करता है। यज्ञ की महानता का यह ज्वलन्त प्रमाण है कि 88 हजार ऋषियों ने स्वर्ग प्राप्ति हेतु एक साथ नैमिषारण्य के पवित्र पावन भूमि पर दस हजार वर्ष तक लगातार हवन किया था। भगवान कृष्ण के दैनिक संध्या उपासना में अग्नि हवन अनिवार्य रूप से सम्मलित था।
जन संख्या वृद्धि, विभिन्न उद्योगो, कारखानों, मोटर वाहन से निकलते धुआं, वन क्षेत्र में अतिक्रमण आदि के कारण वातावरण अत्यधिक दूषित हो गया है। जिसके कारण विगत कुछ वर्षों में बहुत तेजी से जलवायु परिवर्तन हुआ। जिसके कारण वायु मण्डल में स्थित ओजोन परत जो सूर्य की प्रतिकूल किरणों से होने वाली हानि से बचाता है, जो कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गया है।
यज्ञ की अग्नि से निकला हुआ धुआं ओजोन परत के लिये आक्सीजन स्वरूप है, जो उसे पुनः पूर्व की स्थिति में लाने के लिये सहायक सिद्ध हो रहा है। साथ ही आज के दूषित वातावरण में व्याप्त कीटाणु यज्ञ धुयें से समाप्त होते हैं, जिससे वातावरण में शुद्धता आती है। यज्ञ द्वारा वातावरण शुद्ध व स्वास्थ्य वर्धक हो सकता है।
यज्ञ में प्रज्वलित अग्नि साधकों को यह ज्ञान देती है कि व्यक्ति को सदैव उर्ध्वगति की ओर गतिशील होना चाहिये। अग्नि का स्वभाव ही उर्ध्वमुखी है, जिन साधकों में अग्नि तत्व अधिक होता है, वे अग्नि के समान ही उर्ध्वता को प्राप्त कर पाते हैं। साथ ही यज्ञ करने से अग्नि तत्व में जागृति और तेजस्विता आती है।
अग्नि तत्व में एक विशेष और महत्वपूर्ण गुण होता है कि अग्नि के सम्पर्क में जो भी आता है, उसका वह रूपांतरण कर अपने समान ही निर्मित कर देती है अर्थात् अग्नि तत्व के सम्पर्क में आने वाला साधक का व्यक्तित्व ऊर्जावान, तेजस्वी तथा प्रकाशित होता है।
यज्ञ का सीधा सम्बन्ध वेदोक्त मंत्रों से होता है। इसे कोई भी सम्पन्न कर सकता है, आवश्यकता सिर्फ इतना ही है कि हम यज्ञ की महत्ता और उसके लाभ से परिचित हों, साथ ही उस प्रक्रिया को समझ सकें, जिससे हमें यज्ञ का पूर्ण लाभ प्राप्त हो।
दैनिक जीवन में आने वाली नित्य बाधाओं, कठिनाईयो, समस्याओं के निराकरण हेतु महाविद्या अथवा गुरु मंत्र या किसी भी ईष्ट देव के मंत्रों से यज्ञ सम्पन्न कर सकते हैं। भौतिक सुख-सुविधा, प्रसन्नता, धन वृद्धि, सौभाग्य आदि हेतु विशिष्ट रूप से यज्ञ विधान पूर्ण करना चाहिये। यज्ञ द्वारा पितरों को शांति मिलती है, घर की नकारात्मक, मलिन शक्तियों का शमन होता है। जिससे घर-परिवार में प्रेममय वातावरण का निर्माण होता है।
किसी विशेष लक्ष्य की पूर्ति हेतु अनुष्ठान रूप में यज्ञ सम्पन्न करना चाहिये। साधक को यह प्रयास करना चाहिये कि सप्ताह में एक दिन गुरु मंत्र, चेतना और गायत्री मंत्र की आहूति अवश्य दें। शुद्ध विचार, चिंतन, स्वस्थ शरीर और आन्तरिक ऊर्जा की प्राप्ति हेतु माह में एक बार अमावस्या या पूर्णिमा को आवश्यक रूप से यज्ञ सम्पन्न करें।
शास्त्र अनुसार किसी भी साधना को सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के पश्चात् उसका दशांश हवन किया जाता है। साधक को अपने जीवन में यज्ञ को विशेष स्थान देना चाहिये। जिससे साधक के भीतर अग्नि तत्व विकसित हो सके। क्योंकि इसी अग्नि तत्व से ही साधक के देह में दैवीय शक्ति और ऊर्जा का संचार होता है। एक ऊर्जावान साधक ही अपने भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में सफलता अर्जित कर जीवन के परमार्थ को प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। आपके मंगलमय जीवन की शुभकामना के साथ———–!
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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