





अर्थात् पवित्र तीर्थ, श्रेष्ठ लग्न और चैतन्य अवसर पर एक लाख मंत्र जप करने से जो पुण्य लाभ होता है, वह सूर्य ग्रहण काल में केवल ग्यारह माला मंत्र जप करने से ही प्राप्त होता है, और निश्चित रूप साधना सफल होती है।
पूरे ब्रह्माण्ड में सूर्य का सर्वोपरि स्थान है। क्योंकि सूर्य के प्रकाश से ही सारा जगत् आलोकित है, सूर्य से ही मानव, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और पूरी प्रकृति विकसित एवं गतिशील है। सूर्य के तेजस्वी प्रकाश में व्यक्ति के जीवन से अंधकार को समाप्त कर उसे तेजस्वी चेतना, नवीन ऊर्जा से सराबोर कर देने की क्षमता है।
सूर्य समस्त ग्रहों का स्वामी और परम तेजस्वी माना जाता है, यह पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। सूर्य सम्मोहन शक्ति ग्रह है, सारे ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति से ही इसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। इस कारण से सूर्य ग्रहण के चैतन्य अवसर पर साधना सम्पन्न करने से सूर्य सहित सभी नवग्रहों से अनुकूलता प्राप्ति होती है।
ग्रहण के समय 11 माला मंत्र जप, सवा लाख मंत्र जप अनुष्ठान के बराबर होता है, जो फल सवा लाख मंत्र जप करने से मिलता है, वह ग्रहण काल में 11 माला मंत्र जप करने से ही प्राप्त कर सकते हैं। व्यापार वृद्धि और सफलता के लिये सूर्य को प्रमुख देव माना गया है। सूर्य ग्रहण में व्यापार वृद्धि अथवा धन प्राप्ति की साधना सम्पन्न करने से श्रेष्ठता सफलता मिलती है।
जो उच्चकोटि के योगी, संन्यासी, ज्ञानी, साधक साधिकायें, गृहस्थ होते हैं, वे ऐसे क्षणों को चूकते नहीं, वरन् ऐसे क्षणों का लाभ प्राप्त करने के लिये योजनाबद्ध तरीके से तैयार होते हैं। जिससे वे ऐसे चैतन्य अवसर का अक्षुण्ण लाभ प्राप्त कर सकें और अल्पकाल में ही अपने मनोरथ, लक्ष्य, इच्छाओं को पूर्णता प्रदान करने में समर्थ हो सकें। बड़े से बड़ा तांत्रिक भी इन क्षणों का उपयोग करने से नहीं चूकता, क्योंकि यही क्षण होता है, विशिष्ट साधनाओं में सफलता एवं सिद्धि प्राप्त कर अभाव, न्यूनता, तांत्रिक बाधा, धनहीनता, असफलता से मुक्ति प्राप्त करने का।
ग्रहण काल ऐसा स्वर्णिम अवसर होता है, जब पूर्णता स्वयं प्राप्त होने के लिये साधक का द्वार खटखटा रही होती है, क्योंकि यह क्षण ही भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों में पूर्णता प्राप्त कर लेने का है, साथ ही महाशिवरात्रि 7 मार्च से 22 मार्च होली तक तंत्र सिद्ध कल्प होता है। और इस वर्ष सूर्य ग्रहण तंत्र सिद्धि कल्प की चैतन्यता में पड़ रहा है। इसीलिये श्रेष्ठ साधक, शिष्य इस क्षण का लाभ उठाने के लिये पूर्व में ही तैयारी कर लेते हैं। जिससे कि वे निश्चित समय पर दीक्षा, साधना, मंत्र-जप सम्पन्न कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि सफलता एवं सम्पन्नता प्राप्त कर श्रेष्ठ जीवन प्राप्त कर सकें।
हम सब के प्रिय सम्पादक परम पूज्य सद्गुरूदेव जी का सदा से यह प्रयास रहा है, कि साधकों एंव शिष्यों को ऐसी साधनायें श्रेष्ठतम् चैतन्य अवसर में सम्पन्न करायी जायें, जो उनके जीवन को पूर्ण रूप से परिवर्तित करने में समर्थ हो, जीवन की सभी दुर्गतियों का नाश कर सके। इसी धारणा से इस बार सूर्य ग्रहण पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ तंत्र लामा साधनायें प्रस्तुत की जा रहीं हैं, सारा विश्व एकमत होकर स्वीकार करता है, कि जीवन का कोई भी पक्ष क्यों न हो लामा पद्धति से सटीक और अचूक सफलता मिलती ही है। जो जीवन की सर्वागीण उन्नति के लिये सम्पन्न की जाती हैं।
सर्वविधा अज्रस धन प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ और सफल जीवन हो सके इसके लिये प्रथम और अनिवार्य स्थिति धन की होती है। धन के अभाव में व्यक्ति की सारी योग्यता, बुद्धि, कौशल एक ओर धरे रह जाते हैं। व्यक्ति के पास निरन्तर धन का सहज प्रवाह हो, आवश्यकता अनुसार उसके धन में वृद्धि होती रहे, धन आगमन के नये स्त्रोत बनते रहें। इसके लिये अनिवार्य रूप से धनागमन की साधनायें सम्पन्न करने रहना चाहिये।
लामा तांत्रोक्त मंत्रों से सिद्ध त्रिपिटक को प्राप्त कर उसे सूर्य ग्रहण के समय, महाशिवरात्रि अथवा होलिका दहन की रात्रि को चावल की एक ढेरी बनाकर उस पर स्थापित कर दें। श्वेत वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। घी का दीपक जलाकर त्रिपिटक के सामने 11 माला अटूट धनदा माला से जप करें।
यदि रात्रि का समय हो तो विश्राम साधना स्थल पर ही करें और रात्रि में जो स्वप्न आयें उन पर गम्भीरता से चिन्तन करें। चावलों पर जो त्रिपिटक स्थापित है, उसे अन्न भण्डार में मिला दें तथा एक माह पश्चात त्रिपिटक और माला को नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।
यह शरीर योग का भी साधन है और भोग का भी। अस्वस्थ व्यक्ति न जीवन का भोग कर पाता है और न योग ही, उसके भाग्य में केवल कुण्ठा ही शेष रह जाती है। वास्तव में धन सम्पत्ति ऐश्वर्य का भी तभी कोई अर्थ है जब शरीर स्वस्थ हो, पुष्ट हो और सारे व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय गुण हो। कायाकल्प अर्थात उसे रोग मुक्ति मिल सके, पुष्टता आ सके, शरीर आंतरिक एवं बाह्य रूप से संतुलन में आ सके, लामा मंत्रों से चैतन्य ‘विशुद्धिनी’ प्राप्त कर गुरू चित्र के सम्मुख स्थापित करें, फिर निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप आरोग्य माला से करें।
मंत्र जप के दूसरे दिन विशुद्धिनी को स्नान करने के बाद सम्पूर्ण शरीर पर फेर कर उत्तर दिशा की ओर फेंक दें। किसी गंभीर व्यक्ति के लिये संकल्प लेकर यह साधना सम्पन्न करने पर दीर्घकाल की बीमारी में अचूक लाभ प्राप्त होता है।
लामा साधकों एवं उनके साधनात्मक ग्रंथों के अनुसार जीवन के सहज प्रवाह में जो कुछ भी बाधायें हैं, वह विपदा होती है। मुकदमेबाजी, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शत्रु बाधा, राज्य बाधा या युवा पुत्री के विवाह में आ रही अड़चन, परिवार में कलह, पति-पत्नी में तनाव, पुत्र का कुमार्ग पर बढ़ जाना अर्थात् गृहस्थ जीवन से जुड़ी सभी अड़चनों के निवारण के लिये यह साधना स्वयं में अचूक और तीव्रतम है।
यहां जिस साधना की प्रस्तुति की जा रही है, कई साधकों ने उसका प्रभाव हाथों-हाथ अनुभव किया है। यहां तक कि शत्रु संकट अथवा प्राण भय की स्थिति में तो मंत्र जप समाप्त होते-होते ही अनुकूल समाचार तक मिले हैं। इस तीव्र विपदा निवारक साधना को सम्पन्न करने के लिये ‘सर्वाह’ होना आवश्यक है। लाल वस्त्र पहनकर एकांत में दक्षिण की ओर मुख कर बैठें तथा अपने सामने किसी ताम्रपात्र में सर्वाह को स्थापित कर दें।
जिस विपदा में मुक्ति चाहते हैं, उसका संकल्प करें, यह ध्यान रहे कि एक सर्वाह पर केवल एक समस्या से सम्बन्धित साधना की जा सकती है। सर्वाह को पूजा स्थान में स्थापित करने के पश्चात एक तेल का बड़ा दीपक जलाकर मंत्र का जप लामा सिद्धहस्त माला से 5 माला जप करें।
फिर सर्वाह को जल में विसर्जित कर दें।
चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, सहज स्वभाव होता है और उसके मन में कामनाओं का उदय होता है। कामनाओं की पूर्ति से ही मनुष्य के हृदय के कोमल पक्षों की पूर्ति होती है, कामनाओं का उदय होना तो इस बात का संकेत होता है कि अभी जीवन ठूंठ नहीं हुआ है और समस्त कामनाओं में जो सर्वोपरि कामना होती है वह किसी स्त्री या पुरूष की यही होती है कि उसे मनोनुकूल जीवन साथी मिल सकें।
कभी-कभी ऐसा होता है कि विभिन्न कारणों से, ग्रहदोषादि से ऐसा संयोग नहीं बन पाता, तब मन को एक हताशा घेर लेती है।
ग्रहण काल में स्नान कर सुरूचिपूर्ण वस्त्र पहन कर, सुगन्धित अगरबत्ती जलाकर फूलों की पंखुडि़यों पर तिर्यक चक्र को स्थापित करें तथा स्पष्ट रूप से अपनी मनोकामना को कहें। यदि मानस में किसी स्त्री या पुरूष का नाम है, तो उसका भी उच्चारण करें तथा घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथ जोड़कर तिर्यक चक्र पर ध्यान एकाग्र करते हुये 5 माला मंत्र जप मनोकामना सिद्ध माला से करें।
मंत्र जप के पश्चात तिर्यक चक्र को फूल की पंखडि़यों सहित उठा कर किसी स्वच्छ रूमाल में बांध कर अपने सन्दूक में रख दें तथा एक माह बाद विसर्जित कर दें।
यह वशीकरण साधना अत्यधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण है। तंत्र और मंत्र के ग्रन्थों में वशीकरण से सम्बन्धित सैकड़ों प्रयोग हैं और उन्हें समय-समय पर आजमाया जाता भी है, पर पूरा संसार इस बात को स्वीकार करता है, कि तिब्बती लामाओं के पास जो वशीकरण प्रयोग हैं, उनसे बन्दूक की गोली से भी तीव्र परिणाम प्राप्त किया जा सकता है, कठोर से कठोर हृदय को भी अपने वश में किया जा सकता है।
तिब्बत के प्रसिद्ध तांत्रिक ‘यागू’ ने स्वीकार किया है, कि इस साधना द्वारा नरभक्षी शेर को भी बिल्ली की तरह पालतू बनाया जा सकता है।
यह दुर्लभ साधना जीवन के अनेक समस्याओं के निदान हेतु प्रस्तुत की जा रही है, इसके माध्यम से छः प्रकार के परिणाम तुरन्त प्राप्त किए जा सकते हैं।
ग्रहण काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर बैठ जायें और सामने ‘लामा वशीकरण विग्रह’ रख दें तथा जिस स्त्री या पुरूष का वशीकरण करना हो उसका नाम किसी कागज में लिखकर यंत्र के नीचे रख दें, साथ ही यदि उसकी तस्वीर हो तो उस पर ध्यान एकाग्रचित करते हुये मंत्र का तिब्बती माला से 3 माला जप करें।
जब मंत्र जप पूरा हो जाये, तब उस लामा वशीकरण विग्रह को किसी काले कपड़े में बांध कर पूजा स्थान में रखें और नाम की पर्ची को दीपक से जला दें। इस साधना का प्रभाव जीवन भर बना रहता है।
इस साधना को पुरूष या स्त्री कोई भी सम्पन्न कर सकता है। साधना करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये, कि आप जिस पर मंत्र साधना कर रहें हैं, उसे इस बात का पता नहीं चले, कि उस पर साधना की जा रही है। साधना पूर्ण करने के पश्चात् माला और विग्रह 21 दिन बाद नदी में प्रवाहित कर दें।
बौद्ध धर्म, जिससे लामा तंत्र उदय हुआ उसका आधार है ध्यान और ध्यान का तात्पर्य है चित्त को विविध वासनाओं से पृथक करते हुये असीम शान्ति में खो जाना। यह कोई आवश्यक नहीं कि जीवन में कोई शत्रु हो तभी तनाव हो, कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां भी बन जाती हैं, जो मनुष्य के साथ शत्रुवत व्यवहार करके उसे अव्यवस्थित कर देती हैं। इस युग की जटिल संरचना, व्यवसाय की जद्दोजहद भावनात्मक ठेस ऐसी होती है, जहां व्यक्ति अपने चित्त की सहज एकाग्रता को खोकर उद्विग्न बना रहता है।
इच्छुक साधक को चाहिये कि वह एक ‘कोटानम’ प्राप्त कर उसे श्वेत वस्त्र पर स्थापित कर, स्वयं भी श्वेत वस्त्र पहन कर उत्तर दिशा की ओर मुख कर निम्न मंत्र का 16 माला मंत्र जप ब्रह्माण्ड चैतन्य माला से करें।
मंत्र जप के बाद कोटानम को किसी सफेद वस्त्र में लपेट कर अपनी दाहिनी भुजा में बांध लें तथा एक माह बाद विसर्जित कर दें। साधना सफलता, कुण्डलिनी जागरण से सम्बन्धित साधनाओं में रूचि रखने वाले शिष्यों-साधकों के लिये यह साधना परमपूज्य सद्गुरूदेव की ओर से एक उपहार है। जीवन में मानसिक शान्ति ही और ध्यान सिद्धि ही समस्त आध्यात्मिक पूर्णता का सार है, अतः योग्य शिष्य को चाहिये कि वह सौ कार्य छोड़कर भी इस ग्रहण काल में इस साधना को अवश्य सम्पन्न करें।
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