





वर्तमान समय में यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य होता है कि होलिका दहन और होली पर्व को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना कि दूसरे दिन रंग से, होली को खेलने, अश्लील वचन बोलने, सड़कों पर शराब पीकर गिरने और थोड़े पढ़े लिखे लोगों द्वारा शराब पार्टियों का आयोजन करके। यह होली का बड़ा ही विकृत स्वरूप है, जो कि वास्तविक रूप का बिल्कुल उल्टा और सत्य से परे है। होली पर्व को उतनी ही मान्यता प्राप्त है जितनी दीपावली पर्व को है और वास्तव में दीपावली का, नववर्ष के रूप में, लक्ष्मी पूजा साधना के रूप में जितना महत्व है, उतना ही तांत्रोक्त दृष्टि से होली का महत्व है।
होली पर्व का वास्तविक रूप से प्रारम्भ होलाष्टक से हो जाता है। इस वर्ष यह फाल्गुन शुक्ल अष्टमी रविवार दिनांक 9 मार्च से प्रारम्भ हो रहा है और होली पर्व की पूर्णता फाल्गुन पूर्णिमा रविवार दिनांक 16 मार्च को हो जाती है। साधनात्मक दृष्टि से उपरोक्त दिन 9 मार्च से 16 मार्च तक महत्वपूर्ण हैं।
होलाष्टक 9 मार्च से प्रारम्भ होकर 16 मार्च पूर्णिमा तक है। अर्थात् फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तक है। इस वर्ष ज्योतिष की दृष्टि से विशेष योग बन रहा है। प्रथम तो सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है जो तांत्रोक्त दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन्हीं कारणों से ये आठ दिवस तांत्रिक-मांत्रिक कार्यों के लिए पूर्ण सफलताकारक योग बना रहे हैं। अर्थात् साधक अपनी देह को पूर्णतः स्वः विचारों के अनुरूप निर्माण करने की क्रिया कर सके और साथ ही शुद्ध निर्मल भाव से जो भी मंत्र का उच्चारण करे वह उसकी अन्तसः देह को अपने भावों के अनुरूप क्रियाशील कर सके अर्थात् बाहरी और भीतरी रूप में पूर्णतः देह मन विचार भाव क्रियायें सब कुछ साधक के नियंत्रण रह सके।
आपने शहरों में और गांवों में होली के अवसर पर किये जाने वाले कुछ कार्यों को ध्यान से देखा होगा। अब तक तो दोपहर को प्रहलाद के रूप में होली का डंडा खड़ा करते हैं और उसके चारों और घास-फूस, पुराना कचरा, कुछ कांटे इत्यादि डालकर एक होलिका बना देते हैं और शाम को दहन कर देते हैं, जो शास्त्रोक्त रीति से बिल्कुल गलत बात है। जिस दिन होलाष्टक प्रारम्भ होता है वह दिन अष्टमी होली है और उस दिन गांवों में एक प्रमुख स्थान पर एक बड़ा डंडा जमीन में रोपा जाता है, फिर सब गांव वाले अपने-अपने हिसाब से होली में दहन के लिए गोबर की बनी सामग्री, उपले इत्यादि उसके चारों ओर डालते हैं, धीरे-धीरे एक बड़ा ढेर बन जाता है, तब तक इसे कोई छेड़ नहीं सकता।
हमारे यहां ऐसी मान्यता है कि होलाष्टक से होली तक का समय एक विशेष तांत्रिक समय है। उस समय किसी बड़ी नवीन वस्तु का क्रय करना, नया वाहन लेना, नये मकान की पूजा, गृह प्रवेश, विवाह आदि वर्जित है। होलिका दहन से पहले स्त्रियां पूरी श्रद्धा से पूजा करती हैं और पूजन सामग्री का कुछ अंश होलिका को अर्पण करती हैं। उसी समय नवजात शिशुओं, जो कि पिछली होली के बाद से अब तक जन्म लेते हैं, उन्हें तिलक किया जाता है और होलिका दहन के पश्चात् उसके चारों ओर सात परिक्रमा की जाती है, जिससे नवजात शिशुओं के रोग समाप्त हो जाते हैं और विशेष काल के प्रभाव के कारण बालक भूत-प्रेत बाधा से मुक्त हो जाता है, उस पर किसी की नजर नहीं लगती, यह सिद्ध तथ्य है।
होलिका अग्नि पर्व है क्योंकि हम उस अग्नि की पूजा करते हैं, जिसकी साधना के बल पर होलिका देवी भक्त प्रहलाद को अपने गोद में लेकर बैठी, लेकिन अग्नि ने उन्हें अपने प्रभाव से मुक्त रखा। यह साधना, तपस्या और प्रभु कृपा का फल है। हमारी देह के भीतर भी निरन्तर अग्नि भाव प्रज्ज्वलित रहे जिससे देह क्रियाशील बनी रहे। होलिका दहन के समय जो चारों ओर खड़े होकर उसकी पूजा करते हैं, उन्हें उस विशिष्ट अग्नि के ताप से शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन के दोष शांत होते हैं, आवश्यकता है मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास की। जब होलिका दहन प्रचंड रूप में होती है तो उसकी हवा का रूख, धुएं का स्वरूप देखकर आज भी बड़े-बुजुर्ग बता देते हैं कि आने वाला वर्ष कैसा रहेगा, क्या अकाल की स्थिति पड़ेगी, अथवा महामारी फैलेगी, अथवा फसल बहुत अच्छी होगी। इनका ज्ञान उसी समय हो जाता है। होलिका दहन के समय जिस ओर धुआं जाता है उस ओर खड़े नहीं रहना चाहिए। वह एक विषाक्त वायु होती है, जो विशेष प्रभावित करती है। मन की अवस्थाएं अनन्त हैं, जो मनुष्य को अन्य विषय लोकों में ले जाती है, लाती है। इसकी तेज रफ्तार एक सैकण्ड में 32 लाख विचारों को जन्म देती है, जिससे विस्तारित होती है ‘भावना शक्ति’, जो अनेकों आकांक्षाओं का मूर्तरूप ही है।
चलना फिरना, उठना-बैठना, हंसना-रोना सब कुछ मन से संचालित होता है। जैसी इच्छा मन में जागती है, मनुष्य वैसे ही कदम भरता है जीवन में। अतः मनुष्य को संचालित करने की शक्ति मन के पास है, जिसने मनुष्य को अपना गुलाम बना रखा है। मन ही जीवन को रेगिस्तान बना देता है और वही उसे हरा-भरा भी कर देता है, यही सुख-दुख है, जो पूरे जीवन पर व्याप्त है। यदि मनुष्य है, तो मन भी होगा, मन है, तो विचार भी उठेंगे और विचार है, तो उनको क्रियान्वित करने की भावना भी जागेगी ही। भावना अच्छी भी हो जाती है और बुरी भी, एक अदना-सा व्यक्ति मन की तीव्रगामी धारा को रोक भी कैसे सकता है और यह न रोक पाने की क्षमता उसके जीवन की न्यूनताओं की परिलक्षित कर देती है, फिर जीवन का तात्पर्य, जीवन का प्रयोजन सब कुछ धरा का धरा ही रह जाता है। ज्यादा चिन्तनशील होने की आवश्यकता नहीं है, अपितु कुछ ऐसा क्रियान्वित हो, जो मन के अनुकूल हो, तभी जीवन का प्रयोजन सफल हो सकेगा, मनुष्य अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगा।
‘‘होलिका पर्व पर की जाने वाली साधना होली के विविध रंगों की भांति जीवन को साधनात्मक रंगों में रंग कर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही लक्ष्यों को प्राप्त कराने का एक विशेष साधनात्मक पर्व भी है, जब साधक अपने समस्त पापों को होलिकाग्नि में तिरोहित कर पूर्ण चैतन्यता युक्त जीवन प्राप्त करने में सफल हो सकता है।’’
कालखण्ड जीवन का महत्वपूर्ण भाग है, यदि समय के अनुकूल किसी कार्य को किया जाये, तो उसका प्रभाव भी अनुकूल ही मिलता है, यह सर्वविदित है। होलिका दहन का पर्व अपने समस्त विकारों को तिलांजलि देने का महत्वपूर्ण अवसर है। जिसकी प्रतीक्षा में बड़े-बड़े संन्यासी, योगी भी खड़े रहते हैं, कि कब वह दिन आयेगा, जब हम इस होलिका तंत्र साधना को सम्पन्न कर अपने मनोवांछित कार्यों को पूर्ण कर सकेंगे और अपने प्रयोजनों को सार्थक कर सकेंगे।
यह होलिका साधना अपनी कामना को पूरा करने का महत्वपूर्ण अवसर है, जो पूरे वर्ष में एक बार ही आता है और इन क्षणों को चूकना अपने जीवन के दुर्भाग्यों में वृद्धि करना ही है। यह क्षण प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करने का अनमोल क्षण है। आवश्यकता है इसे सही अर्थों में समझा जाये और इसका लाभ उठाया जाये। होली का पर्व धीरे-धीरे अपनी मादकता, मस्ती को बिखेरता हुआ मन्थर गति से चलता हुआ आ रहा है, यह पर्व हमारी परम्पराओं में एक सुवासित पुष्प की भांति है, जिसकी सुगन्ध से मस्त होकर व्यक्ति आह्लाद, उल्लास और आनन्द की अनुभूति करता है। परन्तु हम अपनी परम्पराओं को भूल कर मात्र उछल-कूद को ही होली मान चुके हैं, जबकि वास्तविक होली का उत्सव तो वही है, जिसमें हमारा अन्तर्मन झंकृत हो उठे, हृदय की धड़कन एहसास करे, कि वह धड़क रही है, वह किसी मुर्दा देह में नहीं वरन जीवित जाग्रत देह में उपस्थित है—-और जीवित होने का एहसास तो गुरु ही करवा सकते हैं, कि हम भी एक सुगन्धित पुष्प की भांति ही हैं।
इसीलिए तो पूज्य गुरुदेव होली को साधनात्मक रूप में साधक के जीवन में क्रियाशील कर रहे हैं, ताकि हम अपनी परम्पराओं से अवगत हो सकें और अन्तर्निहित कर सकें अपने आपमें पुष्प की सुगन्ध हो और यह सुगन्ध होती है ‘प्रेम’ की। होली ऐसा पर्व है जिसका स्मरण करते ही रंगों से भरी हुई प्रकृति की अठखेलियां नृत्य करती हुई, उल्लास और मस्ती को प्रत्यक्ष कर देती है। प्रत्येक व्यक्ति अपना सारा तनाव भूल कर इस पर्व को मनाता है। पर शिष्यों के लिए तो यह होली अपने गुरु का साथ पाकर अन्यतम पर्व बन जाता है, क्योंकि जब से वह शिष्य बनता है, तब से उसकी सांसों के तार गुरुदेव के साथ जुड़ जाते हैं और तब कोई उन्हें अपने परिवार के मुखिया के रूप में, तो कोई अपने इष्ट के रूप में, तो कोई विभिन्न सम्बन्धों को जोड़ कर उनके साथ इस पर्व को आनन्द के साथ मनाते हैं।
गुरु तो शिष्य के हृदय की धड़कन है, तभी तो शिष्य बिना गुरु के होली कैसे मना सकता है, शिष्य के जीवन की हर क्रिया विधि उसके गुरु से सम्बन्धित रहती है, फिर होली जैसे पर्व पर तो गुरु रंगों में रंगने के माध्यम से अप्रत्यक्षतः प्रेम और साधनाओं के रंग को अपने ही हाथों से पिचकारियों में भर कर अपने शिष्यों को विविध रंगों से रंग देते हैं। गुरुदेव के बिना आप पर्व तो मना सकते हैं, पर वह शुष्क होगा, क्योंकि आप बाह्यः क्रिया को पूर्णता तो दे ही देते हैं, पर यदि आपसे पूछा जाये- क्या वास्तव में अपने पर्व अन्तः स्वरूप में अपने आप को प्रेम से भीगोया है तो आपका उत्तर होगा-नहीं! कुछ न कुछ कमी रह गई और यह कमी, यह रिक्तता मन के भाव की होती है, अन्तस की होती है, जो सिर्फ गुरुदेव की उपस्थिति से ही पूर्ण हो सकती है।
इस साल यह महारस पर्व 15-16 मार्च को कैलाश सिद्धाश्रम, जोधपुर में सम्पन्न हो रहा है। पूज्य गुरुदेव की योजना से आपको अवगत करा रहा हूं और साथ ही आपको आपके प्रेम की सौगन्ध भी दे रहा हूं, कि आप सभी को आना ही है – वह भी अकेले नहीं, अपने पूरे परिवार के साथ! जिससे हम आनन्दमय चेतनामय बन सके। होली महापर्व पर प्रत्येक साधक को ‘मृत्युसंहारक बाहु’ प्रदान किया जायेगा। जिससे साधक अपने जीवन के पाप-ताप-सन्ताप, रोग-शोक, कष्ट-बाधा, दुखों को पूर्णरूपेण भष्मीभूत कर पूर्ण बाहरी और अन्तस देह को चैतन्यता प्रदान कर सके। उसके बाद साधक के जीवन की नूतनता और श्रेष्ठता के निर्माण के लिए बगलामुखी-धूमावती सायुज्य नृसिंह दीक्षा और ललिताम्बा धन प्रदायनी दीक्षा प्रदान की जायेगी। जिसे गुरु सांदीपन के पश्चात् पुनः कोई अन्य गुरु नहीं प्रदान कर सके।
चलते-चलते मैं आपके दिल की भी बात जान ही गया हूं, कि आपने निश्चय कर ही लिया है मुस्कुराते, खिलखिलाते हुए ढोल, चंग और मृदंग की ताल पर थिरकते हुए होली के रास-रंगमय क्षणों को जीवन में पूर्णतः आत्मसात करने के भाव चिंतन हेतु पूज्य गुरुदेव और माता जी के संग जोधपुर में व्यतीत करने का।
अपने जीवन को अन्तंसः रूप में आनन्दमय और हर्षोल्लास युक्त बनाने की क्रिया के लिए आवश्यक है कि हम भी जीवन में नृसिंहमय बन सके। जीवन में ऐसे दिव्यतम साधनात्मक कार्यक्रम सद्गुरुदेव के आशीर्वाद से सम्पन्न हो रहे हैं, इसीलिए वे ही साधक-साधिकाएं शिविर में आये जो कि अपने जीवन की मलिनता को समाप्त कर, न्यून से उच्चतम बनना चाहते हैं।
प्रत्येक साधक-साधिका का पंजीकरण आवश्यक है।
14 मार्च शुक्रवार को सायं काल तक कैलाश सिद्धाश्रम, जोधपुर पहुँचना अनिवार्य है।
बहिन, बेटियां, माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आयें।
सात्विक प्रसाद, भोजन और विश्राम की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा आश्रम में ही प्रदान की जायेगी।
15 मार्च की प्रातः काल में गुरुदेव के सानिध्य में योगा, प्राणायाम, मंत्र जप, साधना की क्रिया प्रारम्भ होगी। जिससे इस साधनात्मक शिविर का पूरा लाभ आपके जीवन में अक्षुण्ण बना रहे। इधर-उधर न भटक कर, पूरा ध्यान, चिंतन अपनी स्व उन्नति और गुरु आज्ञा पालन में लगायें।
वे ही पंजीकरण करवायें जो अपनी स्वयं की बुद्धि-ज्ञान और विवेक से जीवन में कर्मशील रहते हैं, अपने आपको पूर्ण शक्तियों से युक्त करना चाहते हैं। पूर्व में ही पंजीकरण अनिवार्य है ताकि पंजीकरण राशि में आप ही से सम्बन्धित मृत्युसंहारक बाहु, ललिताम्बा धन प्रदायिनी साधना सामग्री और बगलामुखी-धूमावती सायुज्य नृसिंह दीक्षा की क्रिया आपके नाम से प्रारम्भ की जा सके और रस राज होली महोत्सव पूर्णिमा दिवस 16 मार्च को साधना और दीक्षा प्रदान कर आपके जीवन को पूर्णमय बनाने की क्रिया सम्पन्न हो सके जिससे आपका आने वाला नववर्ष हर दृष्टि से आरोग्यमय धन लक्ष्मी और सभी सुखों से श्रेष्ठमय बने।
इस पंजीकरण राशि में ठहरने की व्यवस्था, सात्विक भोजन-प्रसाद, साधना सामग्री का शुल्क सम्मिलित है।
(पंजीकरण शुल्क: 2400/-)
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