





राधा ने कृष्ण को अपनी अदाओं से नहीं अपितु साधनाओं के माध्यम से कृष्ण की सभी कलाओं को अपने भीतर समावेश कर कृष्ण को प्रेम पाश में बांध दिया और संसार में अमर हो गईं। साधना का ज्ञान देवर्षि नारद ने श्रीराधा को प्रदान किया था। ये साधनाएं हर युग में अमर साधनाए हैं। अगर कहीं, किसी जगह प्रेम का जिक्र होता है, तो राधा का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है— क्यों ? क्योंकि वह एक दृढ़ निश्चयी कन्या थी, एक निर्भीक प्रेमिका थी, एक संवेदनशील स्त्री थी— एक बार कृष्ण को चाहा, तो फिर जीवन भर उसकी ही मूर्ति को अपने हृदय में बसाये रखा, फिर कभी भी किसी अन्य पुरुष को देखा तो दूर, ऐसा ख्याल भी उसके मन में नहीं आया। यह बात अलग है, कि उसके पिता ने जबरन उसका विवाह पास के गांव के एक युवक से कर दिया था, पर फिर भी जीवन भर वह अपने कृष्ण की रही, अपने कान्हा की ही रही— और उसने इस प्रकार यह सिद्ध कर दिया, कि स्त्री को रोका तो जा सकता है, परन्तु उसके मन को विवश नहीं किया जा सकता—- वह तो एक बार जिस पर आ गया— तो आ ही गया।
वृषभानु की वह भोली-भाली कन्या, जिसने अपना समस्त जीवन कृष्ण सानिध्य में यमुना के तट पर बिता दिया था, वह बाद में विवश हो एक छोटे से घर में कैद तो हो कर रह गई, पर उसकी समस्त देह, उनका मन, उसका रोम-रोम मानो कृष्ण ही रट लगाता रहा— कृष्ण भी राधा के बिना एक क्षण भी नहीं रह पाते थे।—-एक दिन भी उससे मिले बगैर निकल जाता था, तो उनको बेचैनी होने लग जाती थी— और वे तुरन्त यमुना किनारे अपनी मुरली की तान छेड़ कर अपनी प्रियतमा को आने का निमंत्रण देने लगते—- कृष्ण जैसे निर्मोही को भी राधा ने वश में कर लिया था— परन्तु यह संभव कैसे हुआ ? उनके इर्द-गिर्द तो सैकड़ों गोपियां और ग्वाल-बालाएं विचरती रहती थी, जो अत्यन्त आकर्षक और सम्मोहक थी, परन्तु कृष्ण तो उनकी ओर देखते भी न थे— तो इस चंचला ने, इस ग्वाल – कन्या ने कान्हा पर ऐसा क्या जादू कर दिया कि वे उसके वशीभूत हो गए ?
जब समस्त गोपियां कृष्ण को रिझाने की चेष्टा करती और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करती, तो राधा मन ही मन सोचती, कि एक न एक दिन कान्हा को अपना बनाना ही है, फिर चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। इसके साथ ही साथ—राधा को इस बात का आभास भी था, कि कृष्ण सामान्य पुरुष नहीं हैं, पुरुषोत्तम हैं, सोलह कलाओं से युक्त हैं, अतः वह परेशान रहती, कि किस प्रकार इस पूर्ण पुरुष को अपना बनाऊं ? इस सोच-विचार में वह खाना-पीना भी भूल गइंर् और वह दिन-प्रतिदिन कमजोर एवं विक्षिप्त सी हो गई। एक दिन जब वह कृष्ण के ही ख्यालों में डूबी हुई यमुना के तट पर विचरण कर रही थीं, कि अचानक देवर्षि नारद उसके समक्ष प्रस्तुत हुए।
नारद के पूछने पर राधा ने अपनी आप बीती कह सुनाई और अंत में यह जोड़ दिया – ‘यदि मैं कान्हा को न पा सकी, तो यमुना में कूद कर अपने प्राणों को विसर्जित कर दूंगी।’ नारद को तो हमेशा अठेखेलियां ही सूझती है, कुछ देर तो वे सोचते रहे, कि भगवान को किस तरह बांधा जाये। मैं तो बांध नहीं पाया, शायद यह बांध ले। मन ही मन मुस्कुरा कर उन्होंने कहा – ‘एक विधि तो है, परन्तु—।’ ‘परन्तु क्या ? बताइये न ! चुप क्यों हो गए ?’ ‘परन्तु वह अत्यधिक जटिल है, तुम कर पाओगी ?’ ‘क्यों नहीं, आप बोलिये तो सही— अपने प्राणों की आस तो मैं पहले ही छोड़ बैठी हूं।’
‘यद्यपि कृष्ण पूर्ण सोलह कला दिव्य व्यक्तित्व हैं, अतः किसी सामान्य विधि से उन्हें प्राप्त कर पाना मुश्किल है। इसके लिए तो उनकी एक-एक कला को ही वशीभूत करना पड़ेगा, तभी वे पूर्ण रूपेण तुम्हारे आकर्षण-पाश में बंध पायेंगे।’ ‘पर वह विधि क्या है ?’ — राधा ने व्यग्र हो कर पूछा। ‘हर कला के लिए एक विशेष साधना है, जिसको सम्पन्न करने से वह कला वशीभूत हो जायेगी। इसमें सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि जहां इन साधनाओं के माध्यम से तुम अपने प्रियतम को वशीभूत कर सकोगी, वहीं तुम स्वयं में भी ऐसा अनुभव करोगी, कि वे कलाएं आंशिक रूप से तुम्हारे अन्दर प्रवेश कर गई हैं।’
‘अतः एक तरह से फिर तुम स्वयं भी षोडश कला पूर्ण हो सकोगी और अपने चितचोर को रिझा सकोगी, क्योंकि तुम स्वयं उस स्तर पर पहुंच कर ही उस पूर्ण पुरुषत्व युक्त व्यक्तित्व को प्राप्त कर सकोगी। ऐसा कहने के उपरान्त नारद ने राधा को दीक्षा दी और राधा ने उन्हें गुरु स्वीकार किया। फिर उन्होंने राधा को उन सोलह अद्वितीय प्रयोगों की साधना विधि समझाई, जिन्हें सम्पन्न कर वह कृष्ण के हृदय की धड़कन बन सकी, उनके आंखों की ज्योत्सना बन सकी। इन प्रयोगों को स्त्री या पुरुष कोई भी सम्पन्न कर सकता है और लाभ उठा सकता है। जो वर्तमान युग में प्रेम, वशीकरण, सौन्दर्य और कामरति सुख के लिए श्रेष्ठ एवं उपयोगी साधनाएं है।
यह अत्यन तीव्र साधना है एवं इसका प्रभाव अचूक और निश्चित होता है। यदि किसी व्यक्ति को वशीभूत करना हो, किसी को आकर्षण पाश में बांधना हो, तो इस प्रयोग की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसी प्रयोग के बल पर विष्णु ने स्वयं भस्मासुर को मोहित कर स्वयं उसके हाथों से उसका विध्वंस कराया था। इस प्रयोग को सम्पन्न करने के बाद व्यक्ति स्वयं अत्यन्न सम्मोहन-आकर्षण युक्त हो जाता है और जो भी उसके सम्पर्क में आता है, उसकी ओर स्वतः ही आकर्षित होने लगता है।
किसी भी बुधवार अथवा रोहिणी नक्षत्र की सांध्य बेला के उपरान्त साधक या साधिका सुन्दर वस्त्र धारण कर पूर्वाभिमुख होकर बैठे और अपने सामने सफेद वस्त्र पर सर्वआकर्षण युक्त ’सम्मोहन वशीकरण यंत्र’ स्थापित कर उसके चारों और ‘मोहिनी माला’ रखे और उन दोनों का संक्षिप्त पूजन करें। उसके बाद मोहिनी माला से निम्न मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें –
यदि किसी व्यक्ति विशेष को सम्मोहित करना हो, तो ‘सर्वजन’ की जगह उस व्यक्ति के नाम का उच्चारण करें। ऐसा करने से वह व्यक्ति वशीभूत हो जाता है और स्वयं ही साधक के सामने आकर उपस्थित हो जाता है। यह साधना तीन दिवसीय है। तीन दिनों के उपरान्त इस यंत्र एवं माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।
यदि आपके प्रिय या प्रेमिका से अनबन हो गई हो अथवा वह ध्यान नहीं दे रहा हो, तो यह प्रयोग अत्यधिक अनुकूल परिणाम देता है। चाहे वह हजारों मील दूर बैठा हो, परन्तु इस प्रयोग को सम्पन्न करते ही वह कुछ समय के भीतर ही साधक या साधिका के समक्ष उपस्थित हो कर उसका प्रभाव स्वीकार कर लेता है। स्वयं पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए इस प्रयोग को अपनाया था और उनका साहचर्य प्राप्त करने में सफल हो सकी थीं। इस प्रयोग के लिए यह आवश्यक है, कि साधक का उद्देश्य नैतिकता और मानवीय मूल्यों के विपरीत न हो, अन्यथा प्रथमतः तो इस प्रयोग का प्रभाव नहीं होगा और यदि हुआ भी, तो इसका विपरीत परिणाम उस व्यक्ति को स्वयं भी झेलना पड़ता है।
साधक को किसी बुधवार अथवा शुक्रवार से इस प्रयोग को प्रारम्भ करना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सुन्दर वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात अपने सामने एक बाजोट पर पीत वस्त्र बिछाकर उस पर ‘प्रियतमा आकर्षण यंत्र’ एवं ‘प्रियाकर्षण बाहु’ स्थापित कर उत्तर की ओर मुंह करके बैठे। यंत्र एवं बाहु का पंचोपचार पूजन (कुंकुंम, अक्षत, पुष्प, दीप, नैवेद्य के द्वारा) कर ‘प्रियंकु माला’ से निम्न मंत्र का 7 माला मंत्र जप करें –
ऐसा सात दिनों तक नित्य करें। सात दिन के उपरान्त यंत्र और माला को किसी नदी में विसर्जित कर दें। प्रियाकर्षण बाहु को 21 दिनों तक गले अथवा बाहँ में धारण किये रखें। 21 दिन पश्चात बाहु को पीपल अथवा वटवृक्ष पर अर्पित कर दें। ऐसा करने से यह प्रयोग सफल होता है और व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है।
यह साधना अत्यन्त विशिष्ट एवं दिव्य है, जिसके द्वारा कामदेव को प्रसन्न कर अपना अभीष्ट प्राप्त किया जाता है। यदि प्रिय व्यक्ति किसी बात पर नाराज हो गया हो अथवा किसी अन्य पर आसक्त हो गया हो, तो ऐसे में इस प्रयोग का प्रभाव अचूक होता है और पुनः वापस लौट कर आता ही है। यह प्रयोग कई बार आजमाया गया है और हर बार कसौटी पर खरा उतरा है। यदि किसी के हृदय को जीतना हो, तो इस प्रयोग से बढ़ कर अन्य कोई उपाय नहीं है।
किसी भी शुक्रवार की रात्रि को दस बजे के उपरान्त साधक सुन्दर वस्त्र धारण कर उत्तराभिमुख होकर बैठे और अपने सामने लाल वस्त्र पर ‘दिव्य अनंग महायंत्र’ स्थापित कर उसका सामान्य पूजन करें और उस पर एक ‘शुक्र फल’ अर्पित करें। उसके बाद ‘प्रणय माला’ से निम्न मंत्र का ग्यारह माला मंत्र जप करें –
यदि किसी व्यक्ति विशेष के लिए यह साधना सम्पन्न कर रहे हों, तो साधना के प्रारम्भ में ही संकल्प कर लें, कि ‘मैं अमुक व्यक्ति के सम्बन्ध में यह साधना सम्पन्न कर रहा हूं। यह छः दिवसीय साधना है, जिसके उपरान्त यंत्र, फल और माला को नदी या तालाब में विसर्जित कर देना चाहिए। ऐसा करने से प्रयोग में सफलता प्राप्त होती है और उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,