





हमारे ऊपर पूर्वजों का ऋण है हमारे शास्त्रों में पितृ वर्ग को सम्मान देने के लिये, उनसे ही सम्बन्धित पूजन उपासना करने के लिए पूरे वर्ष में जिस पक्ष विशेष को निर्धारित किया गया है, हमारा पूर्वजों के प्रति कर्तव्य है
सृष्टि में अठारह ऋषियों के नाम प्रमुख रूप से आये हैं और उनमें भी सप्त ऋषियों को विशेष सम्मान दिया गया है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति उन्हीं ऋषियों की संताने हैं और उस ऋषि के नाम पर ही गोत्र कहा जाता है। पितृ पक्ष चैतन्य पक्ष है, जिस समय ब्रह्माण्ड में आकाश गंगा का निर्माण होता है, उस समय हमारे पूर्वज हमारे द्वारा अर्पण की हुई श्रद्धा का भाव ग्रहण करते हैं। उस समय यह साधना आपके लिए अत्यन्त आवश्यक है।
यह तो पूर्ण सत्य सिद्ध हो चुका है कि मृत्यु ही जीवन का अन्त नहीं है। उसके पश्चात भी एक ऐसा जीवन है, जो कि इस भौतिक जीवन से अधिक शक्तिशाली, प्रभावकारी एवं सामान्य नियंत्रण से परे है। भौतिक जीवन में जो रुकावटें तथा गतिविधियों पर नियन्त्रण रहता है, वह मृत्यु पर दूर हो जाता है एवं प्रत्येक प्राणी शक्ति-पुंज बन जाता है।
हमारा सम्पूर्ण जीवन शक्तियों द्वारा ही चलायमान है, लेकिन इन शक्तियों पर नियंत्रण नहीं है, जिसके कारण जिस प्रकार का जीवन साधारण व्यक्ति जीना चाहता है, वैसा जीवन जीना उसके लिए संभव नहीं हो पाता है। बहुत अधिक धन होने पर भी व्यक्ति सुखी नहीं कहा जा सकता है, उसे कई दृष्टियों से समस्याओं का सामना करना पड़ता है, चाहे वह मानसिक पीड़ा हो, भय संबन्धी पीड़ा हो, अथवा कोई और। क्या यह संभव नहीं है कि जिस प्रकार हम वाहन चलाते हैं, उसी प्रकार हमारे जीवन का नियंत्रण भी हमारे वश में हो, हम जिस प्रकार चाहें उस प्रकार उसे मोड़ सकें। इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है, कि हम यह पहिचान लें, कि कौन हमें सहयोग प्रदान कर सकता है, किसकी शक्ति हमें प्राप्त हो सकती है, यदि कोई शत्रु बाधा पहुंचाने का प्रयास कर रहा है, तो उस पर रोक कैसे लगाई जाए।
जहां तक सहयोग एवं दिशा प्रदायक का सम्बन्ध है, सभी शास्त्रों में सबसे बड़ा सहयोगी मार्गदर्शक गुरु को ही कहा गया है। गुरु द्वारा शिष्य को सदैव उसकी उन्नति का ही मार्ग प्राप्त होता है। गुरु के शरण में आकर तथा शुद्ध मन से की गई कोई भी गुरु-भक्ति निष्फल नहीं हो सकती। गुरु के पश्चात् सबसे बड़ा सहयोगी परिवार है और परिवार में भी जो पूर्वज हैं, उनका स्थान उच्च है, जीवित रहते हुए आपस में कई बार मत-भेद, मनमुटाव एवं विरोधाभास हो सकता है, लेकिन मृत्यु के पश्चात यह सब सांसारिक स्थितियां समाप्त हो जाती हैं। जिस प्रकार एक पिता सदैव यही चाहता है कि उसका पुत्र उससे अधिक योग्य बने, उसी प्रकार हमारे पूर्वज यही चाहते हैं कि उनकी संतान अपने जीवन में सम्पूर्ण रूप से सुखी हो।
गीता में लिखा गया है कि व्यक्ति की मृत्यु होने पर ही वह समाप्त नहीं हो जाता है, वह तो नये वस्त्र धारण करने की प्रक्रिया सम्पन्न कर लेता है। स्थूल शरीर को त्याग कर सूक्ष्म शरीर से सबको देख सकता है, लेकिन उसे कोई देख नहीं सकता, यदि उसे उचित भावना एवं पूजा, आवाहन प्राप्त नहीं होता है, तो अत्यन्त निराशा होता है। यदि पितरों की श्रद्धा पूर्वक पूजा, ध्यान एवं आह्वान किया जाय तो वे उसके प्रत्येक कार्य में ऐसे सहयोगी बनते हैं कि चिंतायें एवं समस्यायें उनके जीवन से दूर ही हो जाती है। इसीलिए जो विधि पूर्वक पूजा, यज्ञ करते हैं, वे पूजन कार्य से पहले अपने पितेश्वरों का ध्यान करते हैं, उनका आह्वान करते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है, कि पितरों का आह्वान करते समय उन्हें पूर्ण निमंत्रण दें, अपने जीवन के सभी कार्यों में भागी बनायें, तथा अपने आयु, यश, उन्नति में वृद्धि हेतु कामना करें। पितरेश्वरों की शक्ति से सफ़लता पितरो की शक्ति सूक्ष्म शरीर होने के कारण अत्यन्त विशाल बन जाती है। वे शक्ति एवं सिद्धि के निश्चित स्वरूप बन जाते हैं। उत्तम होने के कारण स्वास्थ्य, वायु, गर्भ आदि कार्यों के नियंत्रक बन जाते हैं। वे अपनी शक्ति से आने वाली घटनाओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, यदि उनकी पूर्ण कृपा रहती है, तो वे अपनी संतानों को ऐसा मार्ग दिखा सकते हैं, जिसमें कम से कम बाधाएं हो, ऐसा कार्य करने को प्रवृत्त कर सकते हैं जिससे सम्पूर्ण उन्नति हो, व्यक्तित्व में तेज उत्पन्न कर सकते हैं, जीवन में रस, माधुर्य एवं सौन्दर्य घोल सकते हैं। उनके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता है, आवश्यकता केवल इस बात कि है, कि वे पूर्ण रूप से प्रसन्न हों और उनकी पूजा, साधना, ध्यान नियमित रूप से की जाये।
धर्म, साधना एवं शास्त्रों में रुचि रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कोई भी श्रेष्ठ शुभ कार्य प्रारम्भ करने से पहले अपने पूर्वज-पितरेश्वरों का ध्यान अवश्य करते हैं, लेकिन यह स्थिति ही पूर्ण नहीं है। उन्हें पूर्ण रूप से अपने अनुकूल बना कर प्रत्येक कार्य में पितरों का सहयोग प्राप्त करने हेतु विशेष साधना की आवश्यकता रहती है। श्राद्ध दिवसों के समय वायु की गति एक विशेष प्रकार की रहती है, आकाश में तारा-मण्डलों का एक विशेष समूह बनता है और यह सिद्ध हो चुका है, कि इस समय पूर्णतः पितरेश्वर सूक्ष्म शरीर से इस पृथ्वी लोक पर अपनी पूर्ण गति से विचरण करते हैं। यदि इस समय कोई साधक पूर्ण विधि-विधान सहित पितेश्वर साधना करे, तो उसे अन्य समय की अपेक्षा अधिक सरलता से पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है। ये 16 दिन इस विशेष साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं।
इस विशेष साधना में सबसे बड़ा माध्यम भावना है, अपनी समस्त इच्छाओं, कर्तव्यों को, भावना के रूप में प्रकट कर देने से पितेश्वर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं। उनके प्रति पूर्ण रूप से सम्मान देते हुए, सहयोग की कामना ही इस साधना का विशेष लक्ष्य है। जहां व्यक्ति नहीं पहुंच सकता है, वहां भावना पहुंच सकती है और जहां भावना होती है, उसके पीछे शुद्ध हृदय से किया कर्म होता है। वही सफलता एवं सिद्धि है, शुद्ध भावना के कारण ही अधिक से अधिक सहयोगी बन पाते हैं।
यह सत्य है कि पूर्वजों के कारण ही वर्तमान शरीर अस्तित्व में आया है, पालन-पोषण और विकास हुआ है, जीवन को बनाने में उनका पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है, उनके प्रति भक्ति नहीं प्रकट करने का यही अभिप्राय होगा कि व्यक्ति अपने अस्तित्व को ही नकार रहा है। उनकी साधना करना हर दृष्टि से आवश्यक है और यही तर्पण कहा जाता है।
यह साधना श्राद्ध दिवसों में की जाने वाली साधना है। इसमें प्रथम दिवस का विशेष महत्व है। प्रथम दिवस से पितरेश्वरों का आवाहन कर उन्हें स्थापित किया जाता है और प्रतिदिन निश्चित संख्या में मंत्र जप एवं पूजन कर सात्विक भोजन रूप में प्रसाद अर्पित कर उनकी दिव्य शक्ति को प्राप्त किया जाता है, जिससे कि वे साधक के वशीभूत होकर उसे अपने संरक्षण में ले लेते हैं।
इस साधना में कुछ विशेष प्रकार की सामग्री की आवश्यकता रहती है जिनके बिना यह साधना पूर्ण नहीं हो सकती है। यह सामग्री ‘पांच पितरेश्वर बाहु’, ‘11 लघु नारियल’, ताम्रपात्र, चांदी का बना सर्प, तुलसी के पत्ते आवश्यक हैं।
श्राद्ध के प्रथम दिन स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें, यह साधना सूर्योदय के साथ ही प्रारम्भ कर देनी चाहिए। इस हेतु आवश्यक है कि प्रातः अत्यन्त जल्दी उठ कर सभी सामग्री की व्यवस्था एवं स्नान इत्यादि कर अपने पूजा स्थान को शुद्ध कर साधना क्रम के अनुसार सामग्री रख दें। अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर श्वेत वस्त्र बिछाकर पांच पितरेश्वर बाहु के चारों ओर एक घेरा बना दें, उसके पश्चात इन पांचों बाहु के आगे क्रमवार चावलों की ढेरी पर ‘ग्यारह लघु नारियल’ स्थापित करें। एक और घी का दीपक अवश्य जला दें, अपने आसन के नीचे छोटा चांदी का सर्प स्थापित कर दें जिससे कि किसी भी प्रकार के भूत-पिशाच आदि आपको हानि नहीं पहुचा सकें। अपने सामने जहां आपने पांच त्रिदिशा वाले ‘पितरेश्वर बाहु’ स्थापित किये हैं, उन्हें सिन्दूर अवश्य चढ़ायें, तथा ये बाहु काले तिलों की ढेरी पर स्थापित करने चाहिए।
अब पूजा स्थान से बाहर आकर तांबे के पात्र में जल लेकर, पूर्व दिशा की ओर मुंह कर जल की अंजली दें, तथा पितरों के आवगमन हेतु प्रार्थना करें। इसके साथ ही प्रत्येक अंजली के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करें –
ऊँ लं नमः, ऊँ वं नमः, ऊँ रं नमः, ऊँ यं नमः
इसके पश्चात् बिना किसी ओर देखे, सीधे पूजा स्थान में अपना आसन ग्रहण करें, तथा निम्न ध्यान मंत्र का पांच बार जप करें। प्रथम बार जप करते हुए, पहले पितरेश्वर बाहु को घी मिला कर तिल अर्पित करें तथा यह क्रिया क्रम रूप में पांच बार दोहराऐं –
ध्यान मंत्र
स्वशरीरं तेजोमयं पुण्यात्मकं पुरुषार्थसाधानं
पितरेश्वराराधानयोग्यं ध्यात्वा तस्मिन् शरीरः
सर्वात्मकं सर्वज्ञ सर्वशक्तिसमन्वितं
पितरेश्वरामयं आनन्द स्वरूपं भावयेत्।
इस प्रकार शुद्ध मन से किये गये इस ध्यान से पितरेश्वर अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं। अपनी भावनाओं को पूर्णरूप से प्रकट करते हुए उनसे हर दृष्टि से सहयोग प्राप्ति की इच्छा प्रकट करें। इसमें किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये पितरेश्वर आपके अपने हैं। इसके पश्चात सामने रखे हुए लघु नारियलों का चारों ओर अर्द्ध चन्द्राकार घेरा बना दें और प्रत्येक लघु नारियल पर केसर, पुष्प, घी, तुलसी का पत्ता अर्पित करें। यह लघु नारियल प्रयोग इस साधना में अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि यह अर्द्ध चन्द्राकार स्थिति लक्ष्मण रेखा है, जो कि पितरेश्वरों को स्थायी रूप से आपके यहां स्थापित कर देती है।
इसके पश्चात ‘काली हकीक माला’ से पितरेश्वर बीज मंत्र का जप करें। इस साधना में जो माला प्रयोग में लाई जाए, वह किसी दूसरी साधना में प्रयोग नहीं की जा सकती है, इस बात का ध्यान रखना विशेष आवश्यक है।
यह प्रभावकारी बीज मंत्र परम विस्फोटक शक्ति लिए हुए है और इसकी पांच मालाएं उसी स्थान पर बैठे-बैठे जप करें।
यह एक दिवसीय साधना है। परन्तु अगले पन्द्रह दिन तक साधना सामग्री काले वस्त्र में बांध कर पूजा स्थान में रख दें। जब श्राद्ध दिवस पूर्ण हो जाएं, अर्थात् नवरात्रि से पूर्व ये सभी सामग्री काले वस्त्र में बांध कर किसी जल में, या तालाब में अर्पित कर दें।
यह प्रयोग अत्यन्त सिद्ध प्रयोग है और इसके द्वारा आपको जीवन में अपने पूर्वजों का ऐसा मार्गदर्शन, सहयोग एवं शक्ति प्राप्ति हो जाती है, जिससे आपका जीवन एवं व्यक्तित्व शक्तिमान हो जाता है। श्राद्ध दिवसों में अपने पितरेश्वरों के प्रति श्रद्धा भक्ति प्रकट करने हेतु प्रत्येक साधक को यह साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिए।
हमारा कोई प्रिय आत्मीय, जो कालचक्र में विवश होकर हमसे बिछुड़ गया हो, उसके स्मरण, उसके प्रति भावना और श्रद्धा के अतिरिक्त हम कर भी क्या सकते हैं ? इन सब को व्यक्त भी किया जाता है अनेक उपायों से, लेकिन भावनात्मक पक्षों की स्थिति अपने स्थान पर निर्विवाद रूप से श्रेष्ठतम होने के साथ-साथ व्यावहारिक पक्षों का भी पर्याप्त ध्यान रखना उचित होता है और यही बात अपने मृत आत्मीय के प्रति भी इतनी ही सघनता से व्यवहारित होती है। मृत्यु के पश्चात हमारा और उसका सम्बन्ध विच्छेद केवल दैहिक स्तर पर होता है, आत्मिक स्तर पर नहीं और तब हमारा दायित्व पहले से अधिक बढ़ चुका होता है, क्योंकि तब तो वह इस भौतिक देह के अभाव में अनेक ऐसे कार्य और कर्तव्य करने में असमर्थ हो जाता है, जो कि अन्यथा कर सकता है।
हमारे पास ईश्वर प्रदत्त यह स्थूल देह है, जिसका हम न केवल अपने लिये अपितु अपने आत्मीय के लिये भी उपयोग कर सकते हैं। यह उपयोग में लेना इस प्रकार से संभव है कि उसकी आत्मा की शांति के लिये निर्धारित विधि विधानों को पूर्ण कर, तर्पण दान देकर उसे भी निम्न कोटि की योनियों से निकाल कर पितृ वर्ग में ले जायें, जहां वे उच्चता और श्रेष्ठता से आसीन हो, स्वयं भी तृप्त हों एवं हमारे लिये भी सहायक बने, उनका आशीर्वाद और कृपा हमें प्राप्त हो।
जिन पुण्य कार्यों को वे स्थूल देह के अभाव में नही कर पायें उन्हें उनके वंशज करें, बदले में वे अपनी असीम शक्तियों का उपयोग कर अपने वंशजों को आशीर्वाद व कृपा-फल देते हैं। पितृ पूजन का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। सभी धर्मों-सम्प्रदायों में पितृ पूजा के विभिन्न उपाय मिलते हैं। यहां तक कि जंगली कबीलो व आदिवासी जन जातियों के मध्य भी पितृ पूजा का विस्तृत विधान मिलता है।
हमारे प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में पितृवर्ग का उल्लेख सम्मानपूर्वक करते हुए उन्हें देवताओं के समकक्ष व उन्हीं के समान सोमपान करने वाला बताया गया है। ‘ऋग्वेद’ में ही पितृ वर्ग के तीन भेद मिलते हैं यथा, अवर और मध्यम पर वे केवल पूज्यनीय ही नहीं माने गये वरन मांगलिक अवसरों पर उनका आवाहन् और उनसे आशीर्वाद प्रदान करने की प्रार्थना का उल्लेख भी वेदों में मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि पितृ वर्ग वास्तव में मनुष्य के लिये ऐसा वर्ग होता है, जो उसकी सभी मनोकामना पूर्ति में देववर्ग के समान ही होता है। प्रायः देववर्ग से भी अधिक प्रभावशाली, क्योंकि वह व्यक्ति विशेष से सीधे एवं रक्त द्वारा सम्बन्धित जो होता हैं।
आपको क्या करना है ? – हमारे मृत आत्मीय, मृत्यु के उपरान्त भटके नहीं, उनको कोई निकृष्ट योनि न मिले, इसके लिये कुछ विधान शास्त्रों में बताये गये हैं। एक बात जो मृत्यु के उपरान्त अलग-अलग धर्मों में सामान्य रूप से मिलती है, वह यह कि मृत्यु के उपरान्त कुछ दिन निर्धारित किये गये, जिनमें शोक मनाये जाने की प्रथा रखी गयी है। इससे पीछे मूल भावना यही है कि इन दिनों में मृत आत्मा सर्वाधिक सक्रिय रहती है, एवं अपने परिवार के सदस्यों से सम्पर्क साधने की इच्छुक रहती है। ऐसी दशा में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना में हुई हो एवं मृत व्यक्ति प्रेत-योनि अथवा ऐसी ही किसी विकृत योनि में जा गिरा हो, तब यह उपाय लाभदायक पाया गया है कि पितृ पक्ष के दिनों में गया के निकट फल्गू नदी में तर्पण और पिण्ड देने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है।
पितृ पक्ष प्रारम्भ होने से एक दिन बाद तक एक विशिष्ट तर्पण को चार भागों में बांट कर किया जाता है – देवतर्पण, ऋषितर्पण, यमतर्पण एवं पितृतर्पण।
आकस्मिक दुर्घटना में मृत्यु होने के अतिरिक्त भी कुछ दुखद दशायें मानव जीवन एवं परिवार में घट जाती हैं, जैसे मृतक व्यक्ति का पता न चला हो, वह नदी या समुद्र में डूब गया हो और उसका शव न मिला हो, या ऐसी कोई अन्य दुखद दशा जिसमें व्यक्ति का अंतिम संस्कार या तो हो ही न पाया हो अथवा आधे अधूरे ढंग से हुआ हो, बिना शास्त्रोक्त नियमों का पालन किये सम्पन्न किया गया हो तो इस स्थिति के भी व्यक्ति मृत्यु के पश्चात दुखी और संतृप्त भटकता रहता है। ऐसी समस्त अप्रिय स्थितियों में निवारण के लिये ‘गारुडेय तंत्र’ नामक ग्रथ में एक विधि प्राप्त हुई है, जिसे केवल पितृ पक्ष के दिनों में ही सम्पन्न कर मृतक आत्मा को मुक्ति प्रदान की जा सकती है। पितृपक्ष केवल सामान्य रूप से ब्राह्मण भोजन कराकर, श्राद्ध क्रिया सम्पन्न कर देने के दिन ही नहीं हैं, वरन इन्हीं दिनों में समस्त पितृवर्ग एवं जिनकी अप्राकृत मृत्यु हुई हो उनके लिये भी इस प्रयोग को सम्पन्न करना अति आवश्यक है, क्योंकि इस प्रकार से व्यक्ति अपने पूर्वजों की कृपा और पारिवारिक स्थितियों में श्रेष्ठता प्राप्त करने की स्थितियाँ निर्मित कर लेता है। वास्तव में किसी भी मृतक पूर्वज के लिए सबसे उपयुक्त श्राद्ध का अर्थ तो यही है कि उसे निन्मतम योनियों से प्रथमतः मुक्ति दिलायी जाये, उसके प्रति सम्मान प्रदान किया जाये, उसको भावनात्मक रूप से तृप्ति दी जाये तथा इस भांति पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त की जाये।
इस विधि की विशेषता यह है कि इसे साधक घर पर ही सम्पन्न कर अपने मृत आत्मीय को निश्चय पूर्वक मुक्ति प्रदान कर सकता है। पितृ पक्ष के प्रथम दिवस से प्रारंभ होने वाली साधना को परिवार का कोई भी सदस्य जो वयस्क हो, सम्पन्न कर सकता है। फिर भी पुरुष वर्ग ही इस साधना को सम्पन्न करें तो अधिक उचित होगा, यथासम्भव परिवार की स्त्री या अल्प वयस्क बालक इसे सम्पन्न न करें। रात्रिकालीन इस साधना में साधक काले रंग के वस्त्र धारण कर, काले रंग के वस्त्र को बाजोट पर बिछा कर लोहे के पात्र में ‘भूतभृर्त यंत्र’ को स्थापित करें। उस पर सम्मानपूर्वक तेल में सिन्दूर घोल कर अर्पित करें, काले तिल, अक्षत, जौ व लाल रंग के पुष्प चढ़ायें तथा यंत्र के चारों और चार ‘मधुरुपेण रुद्राक्ष’ स्थापित कर उनका सामान्य पूजन करें। इस सम्पूर्ण पूजन सामग्री के चारों ओर काजल से एक घेरा भी बना लें तथा एक ओर तेल का बड़ा सा दीपक जला कर, सम्मानपूर्वक ‘समस्त पूर्वजो, पितृवर्ग, एवं मातृवर्ग में जो भी पूर्वज अतृप्त रह गये हों, उनकी मुक्ति के लिए मैं उनका वंशज यह साधना सम्पन्न कर रहा हूं’ कह कर संकल्प लें। पन्द्रह दिनों की इस साधना में जिसका समापन अमावस्या को होना है, यथा संभव प्रतिदिन एक निश्चित समय पर ही साधना सम्पन्न करें। इस साधना में केवल ‘पितृरेश्वर माला’ का ही प्रयोग मंत्र जप में किया जाता है।
इस महत्वपूर्ण साधना में जिस दुर्लभ मंत्र का उल्लेख मुझे गारुडे़य तंत्र की प्राचीन व हस्तलिखित प्रति में मिला, उनको मैंने ऊपर स्पष्ट किया है। इस मंत्र का प्रतिदिन केवल तीन माला ही मंत्र जप करना पर्याप्त है। साधना समाप्ति के बाद अर्थात अमावस्या की साध्यं बेला में ही समस्त माला यंत्र आदि को काले कपड़े में बांध कर श्मशान में रख दें। पन्द्रह दिवसीय इस साधना को करने के उपरांत साधक स्वयं अनुभव करता है कि उसके मन मस्तिष्क पर छाया हुआ दबाव हट गया है तथा वह पहले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न रहने लगा है।
इस साधना के उपरान्त भी साधक अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान भाव बनाये रखें तथा जब भी कोई आकस्मिक संकट की स्थिति उसके जीवन में आये तो उपरोक्त मंत्र का केवल 11 बार जाप करें। उनका सूक्ष्म रूप में आवाहन कर, उनसे संकट मुक्ति की प्रार्थना करें। आपके पूर्वज तो आपके ही होते हैं, वे यकीनन आपके सहायक और सहयोगी होंगे। जरुरत यह है कि आप उनका स्मरण और चिंतन सदैव सम्मान पूर्वक एवं आत्मीय ढंग से करते रहेंगे।
यदि पन्द्रह दिन साधना सम्पन्न न हो तो श्राद्ध पक्ष में प्रथम दिवस, नवम दिवस और अन्तिम दिवस अर्थात् पूर्णिमा, नवमी और अमावस्या को ऊपर लिखी साधना अवश्य करनी चाहिए और इन तीन दिवस में जो कि ‘समस्त पूर्वजो, पितृवर्ग, एवं मातृवर्ग के दिवस है। इन तीन दिवसों में प्रत्येक दिन 11-11 माला करने से भी पूर्ण अनुकूलता की प्राप्ति होती है।
भाद्रपद्र मास देवत्व मास कहलाता है। इस मास में अधिक से अधिक साधना करने पर जीवन में अनुकूलता आती है। हम सभी पूर्वजों की अनुकम्पा से ही इस संसार में आये हैं। अपने जीवन को और अधिक मंगलमय, आनन्दायक बनाने हेतु, पूर्वजों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु, आने वाले पितृ पक्ष में कोई दो साधना अवश्य सम्पन्न करें जिससे पिता के पक्ष की ओर से और माता के पक्ष की ओर से दोनों ही रूपों में आशीर्वाद प्राप्त होने से जीवन में सुस्थितियां बननी प्रारम्भ हो जाती हैं।
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