





शिव ने त्रिशूल, कृष्ण ने चक्र, वरूण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, मारूत ने धनुष-बाण, इन्द्र ने वज्र तथा घण्टा, यमराज ने काल-दण्ड, प्रजापति ने रुद्राक्ष माला एवं कमण्डल भेंट किया। साथ ही सूर्य ने किरणें, काल ने ढाल तथा तलवार, समुद्र ने वस्त्र तथा अलंकार, विश्वकर्मा ने फरसा, कुबेर ने सुरापूर्ण पात्र, शेषनाग ने नागहार तथा हिमालय ने सवारी के लिए सिंह और अनेक प्रकार के रत्न और अलंकार भेंट किए, इस प्रकार दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और रत्नों से सुसज्जित वैष्णवमयी जगदम्बा को देखकर सारे देवताओं ने बार-बार प्रणाम किया और राक्षसी वृत्ति रूपी महिषासुर से रक्षा की प्रार्थना की।
जगदम्बा ने देवताओं को अभय का वचन दिया और फिर लीला करने के विचार से अपनी कुछ सेविकाओ सहित शतश्रृंग पर्वत पर आ गई। कुछ समय तक माता वैष्णों आदिकुमारी स्थान पर रही और फिर महिषासुर के संहार के बाद वर्तमान गुफा को अपनी तपोभूमि बनाया। अपने तीनों प्रमुख स्वरूपों के प्रतीकों के रूप में तीन पिण्डियों की स्थापना कर दी।
उस समय ब्रह्मा ने देवी से कहा- ‘हे देवी! तुम्हारा नाम त्रिकला होगा। तुम संसार की सदा रक्षा करोगी। गुणों के अनुसार तुम्हारे अन्य बहुत से नाम और रूप होंगे। तुममें जो तीन वर्ण दिखाई पड़ते है उन्हीं से तीन पिण्ड निर्मित हुए, ब्रह्मा के अंश से महासरस्वती, विष्णु के अंश से महालक्ष्मी तथा शिव के अंश से महाकाली का प्रार्दुभाव हुआ गुफा में तीनों पिण्डियाँ देवी के इन महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूपों का स्वरूप हैं और इन तीन स्वरूपों का समवेत् नाम वैष्णवी हैं।
जिस प्रकार परब्रह्मा परमात्मा एक होने पर भी प्रयोजनवश ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन तीन रूपों में स्थित हैं, ठीक उसी प्रकार आदिशक्ति भी प्रयोजनवश तीन रूपों वाली है। वे तीनों ही एकाकार स्वरूप में स्थित है। जो महाकाली है, वही महालक्ष्मी है और जो महालक्ष्मी हैं वही महासरस्वती है, हाँ कार्यभेद से नाम और रूप में अन्तर है, संसार में इच्छा ज्ञान और दिव्य चेतना जिसे शारीरिक देह कहा गया है इन तीनो ही स्वरूपों के पूर्ण मिलन से ही सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक स्वरूप में संसार में सुखी जीवन के लिए बुद्धि, धन और स्वस्थ शरीर की रक्षा तथा निरोगता के लिए महाशक्ति के तीनों रूपों की उपासना करने का विधान बताया गया हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, रामकृष्ण परमहंस आदि सभी शक्ति के परम उपासक थे। दशमगुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने, शक्ति-उपासना से ही मुगल शासकों को परास्त किया।
वामन पुराण के जिस प्रसंग में देवी का महिषासुर के साथ हुए युद्ध का वर्णन हुआ हैं, उस एक ही प्रसंग में देवी को दुर्गा, कात्यायनी, सरस्वती, अम्बिका, भवानी, परमेश्वरी, कौशिकी, विन्ध्यवासिनी, महेश्वरी आदि संज्ञाओं से सम्बोधित किया है। वही उमा, गौरी, सती, चण्डी, काली और पार्वती भी है। मार्कण्डेय पुराण और वाराह पुराण में इसी को वैष्णवी की संज्ञा दी गई हैं।
जिस तरह भगवान शिव के प्रताप से काशी भारत का प्रमुख तीर्थ बना। ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्रादि देवताओं की तपोभूमि तथा श्रीकृष्ण के गीता उपदेश से कुरुक्षेत्र तीर्थमय स्थान को प्राप्त हुआ। ठीक उसी तरह दस महाविद्याओं के पूर्ण स्वरूप में सांसारिक व्यक्ति को अभय और शक्ति प्रदान करने में माता वैष्णों देवी प्रमुख तीर्थ रूप में अवस्थित हैं।
सांसारिक जीवन में भी विपरीत परिस्थितियाँ आने पर समय-समय पर महाशक्ति की आराधना कर उसके भिन्न-भिन्न स्वरूपों धारण कर , दुष्टों का नाश करने और भक्तों की रक्षा करने में यह आद्या-शक्ति ही समर्थ होती है और साधक को शक्ति से संचारित भी करती हैं। अपने जीवन की मलिनता और जीवन की विविध चिंताओं और जीवन की प्रगति में आने वाले अवरोधों को समाप्त करने के लिए किसी विशिष्ट शक्ति की आराधना वंदना संकल्प शक्ति के साथ परिक्रमा और पूजा अर्चना सम्पन्न की जाती हैं। वही वास्तव में तीर्थ यात्रा कहलाती हैं। तीर्थ के माध्यम से ही जीवन की इन विविध चिंताओं से मुक्त होना और मुक्त होकर नागपाश रूपी व्यथाओ से अपने आप को तार सकें।
इससे पूर्व भी आपने अपने जीवन काल में कई बार माता वैष्णों देवी की यात्रा अपने परिवार के सदस्यों के साथ और अन्य परिजनों के साथ अवश्य ही सम्पन्न की होगी परन्तु आपने उस यात्रा के उपरान्त स्वयं महसूस किया होगा कि जो मैंने अपने बंधु-बान्धवों और मित्रें के साथ यात्रा तो सम्पन्न की हैं पर वह यात्रा केवल घूमने-फिरने, समय व्यतीत करने और साथ ही केवल औपचारिकता वश ही हो पायी है क्योंकि माता के दर्शन के बाद भी जीवन में रत्ती भर भी परिर्वतन नहीं आया। सही अर्थों में आपके साथ सही भाव चिंतन प्रदान करने और मार्गदर्शक के रूप में गुरु नहीं था इसीलिए जीवन जस का तस ही व्यतीत हो रहा हैं। अनेक-अनेक साधकों का भी भाव चिंतन यही हैं कि हम अपने साथ परिवार के सदस्यों और बच्चों तथा परिजनों के साथ इस ग्रीष्म अवकाश में गुरुदेव के साथ जत्थै के रूप में चल पडे़गे और माता के दर्शन भी जिस तरह से पूर्व में किये थे वैसे ही कर लेगें और गुरुदेव का चरण स्पर्श भी कर लेगें और हमारे जीवन में अनुकूलता आनी प्रारम्भ हो जाएगी। परन्तु इस तरह की क्रिया करने से ना तो सद्गुरुदेव सच्चिदानन्द स्वरूप निखिलेश्वरानन्द जी का आर्शिवाद प्राप्त हो सकेगा और ना ही दिव्यतम मंजुल महोत्सव का जीवन में पूर्णरूपेण लाभ प्राप्त हो सकेगा क्योंकि सद्गुरुदेव स्वयं मंजुल महोत्सव के अवसर पर गुरु के माध्यम से जो दिव्यतम चेतना साधक को प्रदान करना चाहते है। उसे साधक पूर्णरूपेण आत्मसात नहीं करेगा तो सांसारिक जीवन की समस्याऐं यथावत बनी रहेगी। जीवन वैसा का वैसा ही और सही अर्थों में जीवन जस का तस ही रहेगा।
जत्थै के रूप में यात्रा ही करनी हैं तो जीवन में कभी भी कर सकते है लाखों-लाखों व्यक्ति इसी तरह की यात्रा और दर्शन करते है परन्तु सभी को वैष्णों माता का और गुरुरूपी शक्ति का आर्शीवाद प्राप्त नहीं होता है। पुराणों और उपनिषदों और देवताओं की स्तुति में- ‘गुरुब्रह्मा, गुरुविष्णु, गुरुदेवो महेश्वराय’ ऐसे ही नहीं कहा गया है। गुरु के सानिध्य मैं तीर्थ यात्रा करने पर ही उसका सही लाभ मिल पाता हैं।
समुद्रतल से लगभग 2500 फीट की ऊँचाई पर, त्रिकूट पर्वत की चेतनामय भूमि पर बसा यह दिव्यत्म माता श्री वैष्णो देवी का आधार स्वरूप है। जो कि जीवन को वास्तविक आधार रूप में शक्ति और चेतना प्रदान करती है इसीलिए कटरा से माता के दरबार तक की यात्रा पैदल ही तय करना श्रेयष्कर रहता हैं। पैदल यात्रा के दौरान देह के भीतर आद्या-शक्ति का भाव चिंतन संचारित होता रहता हैं जब पूज्य गुरुदेव की छत्रछाया में पवित्र और दिव्य भूमि पर गुरुदेव की ओजस्वी वाणी मे प्रवचन, दीक्षा, साधनाओं को ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हो तो कोई अभागा ही होगा जो जीवन को सुनहरे अक्षरों में लिखने का ये अवसर छोड़ सकेगा। ऐसा दिव्यतम संयोग मंजुल महोत्सव का पर्व हो और सद्गुरुदेव रूपी शक्ति के रूप में गुरु हमारे साथ हो तथा सही भाव चिंतन से युक्त अपने जीवन को प्रकाशवान करने के इच्छुक साधक और भक्त हो ऐसा शुभ अवसर जीवन में बार-बार नहीं मिलता और सही रूप में जीवन की दरिद्रता और अंधकारता को समाप्त करने के मौके भी बार-बार नहीं मिलते और वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है जो श्रेष्ठ मौको को पूर्णता से आत्मसात कर लेता है।
पंजीकरण से श्रद्धेय परमहंस स्वामी श्री निखिलेश्वरानन्द जी को यह ज्ञात हो सकेगा कि सही अर्थों में कौन साधक ऐसे दिव्यतम और पूर्णता प्रदान युक्त मंजुल महोत्सव को आत्मसात करना चाहता हैं। मंजुल महोत्सव के दिव्यत्म चैतन्य दिवसों पर पंजीकृत साधकों को ही महाकाली, महासरस्वती महालक्ष्मी से युक्त त्रि-शक्ति दीक्षा माता वैष्णों देवी के मंदिर प्रागण में और भैरवनाथ मंदिर में शत्रुसंहारक काल पर विजय श्री प्राप्ति हेतु काल भैरव शक्ति दीक्षा प्रदान की जाएगी साथ ही विश्वामित्र प्रणीत स्वर्ण खपर युक्त महालक्ष्मी माला जो साधक के स्वयं के नाम से मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त कर गुरुदेव द्वारा धारण कराई जाएगी।
अपने साथ परिवार के अन्य सदस्यों को केवल यात्रा कराने, दर्शन कराने के लिए लाने पर सही अर्थों में आपको दिव्यतम दीक्षाओं का कोई लाभ प्राप्त नहीं हो पाएगा। ऐसे श्रेष्ठ अवसर का पूर्ण लाभ और चेतना प्राप्त करने के लिए सद्गुरुदेव की आज्ञा और आर्शीवाद के फलस्वरूप यही श्रेष्ठ रहेगा कि अपने साथ जो भी व्यक्ति बालक, बालिका, माता-पिता आए उनका पंजीकरण अवश्य कराए जिससे कि आप सभी का जीवन शक्ति और लक्ष्मी से ओत-प्रोत हो सके। क्योंकि लक्ष्मी विष्णु के बिना अधूरी हैं जैसे शक्ति के बिना शिव पूर्ण नहीं हैं इसीलिए शिव-शक्ति और विष्णु-लक्ष्मी रूप में पति-पत्नी को साथ-साथ दीक्षा लेने पर ही उसका फल मिलना प्रारम्भ होता हैं। अपने साथ आने वाले परिवार के सभी सदस्यों और मित्रों का पंजीकरण आवश्यक है। कटरा से माता वैष्णो देवी और भैरव मंदिर तक की यात्रा केवल पैदल ही होगी। कटरा और माता वैष्णों देवी के दरबार में केवल पंजीकृत साधकों के लिए ही ठहरने और भोजन की व्यवस्था गुरूदेव द्वारा हॉल (Hall) में ही संभव हो सकेगी।
बहिन, बेटियां माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आऐं। बीमार, असक्त, क्लीष्ट रोगी इस शिविर में भाग नहीं लें।
8 जून 2013 शनिवार को कटरा पहुँचना अनिवार्य है। रात्रि में विश्राम की व्यवस्था की गई है।
9 जून 2013 को प्रातः अमृत बेला में माता वैष्णो देवी की पद यात्रा प्रारंभ होगी।
वट सावित्री सौभाग्य दिवस पर महाआरती के बाद सायं काल 4:16 से 8:36 बजे के बीच त्रिशक्ति लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी।
भैरव मन्दिर प्रांगण में मध्य रात्रि के बाद पूजा-अर्चना ध्यान के साथ शत्रु संहारक काल भैरव दीक्षा प्रदान की जायेगी।
दर्शन, पूजा और दीक्षा प्राप्त करने के साथ ही अपनी स्वयं की व्यवस्था से सीधे घर को प्रस्थान करेंगे जिससे की जो दिव्यता आपने प्राप्त की है उसका पूरे जीवन भर श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होता रहे। शुल्क राशि कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर अथवा गुरूधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा कराऐं अथवा ड्राफ्रट/सीधे खाता में जमा कर पंजीकरण (Registration) कराना होगा।
(पंजीकरण शुल्क: 4300/-)
न्यौछावर राशि भेजने के लिए आप ‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’, “Pracheen Mantra Yantra Vigyan” Jodhpur के नाम का ड्रॉफ्रट अथवा आप चाहे तो उक्त राशि स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यूआई- टी-, जोधपुर ‘‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’’ खाता क्रमांक 31763681638 अथवा स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यू-आई-टी-, जोधपुर ‘‘कैलाशचन्द्र श्रीमाली’’ खाता क्रमांक 31706102525 में भेज कर भी लाभ प्राप्त कर सकते है। उक्त नाम से अपने वहां की बैंक शाखा में जमा करवा कर PAY IN SLIP की कॉपी भिजवा सकते हैं। पंजीकरण शुल्क आप सीधे अपने वहां के बैंक में जमा करा सकते हैं। बैंक ट्रांसफर का चालान नं- sms अथवा फैक्स करने पर पंजीकरण स्वीकार कर लिया जाएगा।
आप प्राचीन मंत्र-यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन न- 0291-2517025 अथवा मोबाइल नं- 07568939648, 08769442398 पर सम्पर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,