





जीवन में पूर्ण पौरूषता का तात्पर्य है प्रबल व बिजली की तरह कड़कता हुआ व्यक्तित्व, जिसकी आंखें देखकर ही सामने वाले की आंखें झुक जायं। पूर्ण पौरूषता का तात्पर्य है, जोश और उमंग, एक ऐसा व्यक्तित्व जो सभी खतरों से जूझने का हौसला रखता हो। जिसमें चुनौती देने व चुनौती लेने का भाव हो। ऐसे प्रबल पौरूष से भरे सौन्दर्य का स्वामी हजारों-हजारों की भीड़ में भी अलग खड़ा दिखाई देता है जिसके ऊपर मस्ती से हवा की कोई लहर आ कर उसके चौड़े मस्तक पर घुंघराले बालों को बिखेर रही हो, और जिसकी गठी मांस पेशियों पर उभर कर जाती हुई नसें गर्व से घोषणा कर रही हों, कि इसकी रंगों में रक्त नहीं, पिघला सीसा ही बह रहा है। अब तो पौरूषता के नाम पर पुरूषोचित सौंदर्य दुर्लभ हो गया है। पान, गुटका, सिगरेट से होंठ व दांत काले कर चेहरे पर अनियमित जीवनचर्या के कारण पीलापन युक्त उदास व निस्तेज सा हो गया है। असमय बाल पक जाना, आंखों के नीचे गड्ढ़े पड़ जाना, चेहरे से मुस्कराहट चली जाना, यह सब सामान्य लक्षण ही बनते जा रहे हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है कि क्या ये वही लोग हैं जो अपने गोत्र का उच्चारण करते समय किसी ऋषि का नाम लेते हैं ? क्या बचा है इन लोगों में उन महानतम ऋषियों का ? कहाँ है उनका वह ओज, कहाँ है उनकी वह उदारता, और कहाँ है उनके जैसा शरीर सौष्ठव ? इस युग में 6 फीट की लम्बाई होना ही दुर्लभ हो गया है, इसका कारण है,
आज का दूषित वातावरण, समय से अत्यधिक पूर्व मिल जाने वाला यौन ज्ञान, चाहे वह सड़क पर लगे पोस्टरों से मिले या फुटपाथ पर फैली किताबों से या टी-वी- से। असमय ही कुप्रवृत्तियों में लगकर लोग जीवन के उस तत्व को खो देते हैं जिसे ‘वीर्य’ कहते हैं जो कि जीवन का सारभूत तत्व है। जिसके अभाव में व्यक्ति के अन्दर शून्यता ही बचती है, इसी के फलस्वरूप व्यक्ति विवाह के उपरान्त अनेक दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर अपनी पत्नी को सम्भोग में संतुष्ट नहीं कर पाता। पत्नी की अतृप्ति ही गृहकलह और तनाव का वातावरण देकर जीवन विषाक्त कर देती है। सही रूप में यदि आप अपनी पत्नी को कामक्रीड़ा में संतुष्ट नहीं कर पायेंगे तो आपके जीवन के साथ ही आपकी पत्नी का जीवन भी भार स्वरूप हो उठेगा।
सौन्दर्य, बल, क्षमता तो ऐसी होनी चाहिए कि आपके चेहरे पर झलकती जवानी की गुलाबी आभा को देखकर स्त्री स्वयं दीवानी बन जाये और आपके आगे पीछे घूमने को बाध्य हो जाय। दम-खम, पौरूषता से भरे लबालब शरीर में, जिसकी चौड़ी कलाईयां कुछ भी उमेठ कर रख देने की सगर्व घोषणा सी करने लगें। अनेकानेक साधना पद्धतियों में से जो ‘रस’ की साधना है उसका नाम है ‘‘अनंग साधना’’ जिसे सफलता पूर्वक संपन्न कर व्यक्ति ऊर्जा और शक्ति से युक्त नव यौवनता को प्राप्त कर सकता है अपनी खोई हुई ताकत और जवानी की सनसनी से भरा शरीर भी पा सकता है। साथ ही यदि वह नियमित रूप से साधना में प्रवृत्त रहे तो इस शरीर के आंतरिक व बाह्य रूप का कायाकल्प भी कर सकता है।
व्यक्ति के लिये आवश्यक नहीं कि वह अपने ढ़ीले पड़ गये शरीर को पुनः वही जोश व ताजगी देने के लिए आयुर्वेद की जटिल और उबाऊ पद्धतियों में खपाये या बाजारू औषधियों के चक्कर में पड़ें या नीम हकीमों के घर के चक्कर लगायें। यद्यपि आयुर्वेद के उपाय भी प्रामाणिक होते हैं किन्तु उन्हें अब पूर्णता समझ कर जीवन में उतारने का धैर्य व्यक्ति में नहीं बचा है। आयुर्वेदिक उपायों में व्यक्ति के शरीर की संरचना के अनुकूल औषधी प्रदान करना भी योग्य वैद्य द्वारा ही संभव है, और कोई आवश्यक ही नहीं कि आपको अपने स्थान के आस-पास अनुभवी वैद्य मिल ही जाय। इसके विपरीत साधना प्रयोगों में ऐसे कोई बाध्यता नहीं होती, इसमें किसी भी प्रकार का कोई बन्धन नहीं होता और सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति भी सफलता पूर्वक इन प्रयोगों को अपना कर अपने जीवन में सुखद व मनोनुकूल परिवर्तन ला सकता है।
जीवन में ‘काम’ कोई अश्लील स्थिति नहीं है और पूर्ण स्वस्थ पुरूष व स्त्री के मिलन में जिस सुख की उत्पत्ति होती है वह अपने आप में जीवन के मधुरतम क्षण होते हैं। जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण किन्तु प्रायः उपेक्षणीय और अछूते पक्ष को जहां यह साधना पूर्णता से स्पर्श करती है ओर व्यक्ति को न केवल शारीरिक रूप से सौन्दर्यवान, सबल और दर्शनीय बनाती है, अपितु वहीं उसके मन में कामकला के अनेक भेद भी स्वतः स्पष्ट होने लगते हैं। ‘अनंग’ अर्थात् कामदेव ही जब पुरूष में आकर समाहित हो जाय तो उसके जीवन में न्यूनता ही क्या रह सकती है? कामदेव की यदि विशिष्ट साधना जिस साधक को सिद्ध हो जाती है, उसे अप्सरा साधना, किन्नरी साधना अथवा यक्षिणी सिद्ध करने में कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, क्योंकि यह वर्ग ही आतुर हो उठते हैं ऐसे सिद्ध साधक के शरीर में समाहित होने को।
जीवन में मधुरता घोलने की इस विशेष साधना में कोई भी जटिलता नहीं है। इस साधना में जो आवश्यक तत्व है वह यह है कि आपके मन में विश्वास और आनन्द हो कि अब आपको अपने जीवन में नवयौवन घोलने का एक अवसर मिल रहा है, होता यह है कि जिस क्षण हम आनन्द युक्त होकर साधना करते हैं उन क्षणों में हमारे शरीर के तन्तु इस प्रकार जुडे होते हैं कि सम्बन्धित मंत्र जप का सीधा प्रवाह ग्रहण कर लेते हैं। यह सीधा प्रवाह ग्रहण करना ही जीवन में अनुकूल परिवर्तन व साधना में सफलता का आधार होता है।
यह साधना केवल शुक्रवार को ही की जा सकती है। रात्रि के 10 बजे के पश्चात् शान्त व एकान्त कक्ष में वातावरण को सुसज्जित एवं सुगन्धित करें। श्रेष्ठ वस्त्र पहिन कर, स्वयं भी इत्र लगायें और यदि संभव हो तो गुलाब के फूलों की माला पहिनें। सामने स्थापित ‘अनंग यंत्र’ पर पुष्प, गुलाल, अक्षत, केसर व इत्र चढ़ाकर आप अपनी जिस प्रकार की भी दुर्बलता से मुक्ति पाना चाहें, उसकी स्पष्ट शब्दों में प्रार्थना करें व निम्न मंत्र का जप अनंग माला से करें। यह माला ही अपने आप में पूर्ण रूप से एक सिद्धि है जिसे व्यक्ति धारण कर निरन्तर अपने अन्दर यौवन की ऊष्मा का प्रभाव बनाये रख सकता है। इस साधना में प्रयुक्त किया जाने वाला मंत्र है-
इस साधना में चार लघु नारियलों की भी आवश्यकता रहती है, जो जीवन में चार पुरूषार्थें के प्रतीक हैं। मंत्र जप के उपरांत पुष्प की पंखुडि़यों से इनका पूजन कर इन्हें पीले वस्त्र में बांध कर अपने शयन कक्ष में स्थापित कर देना चाहिए। इस साधना में उपरोक्त मंत्र की केवल 11 माला मंत्र जप करना पर्याप्त होता है। यदि यह मंत्र जप व्यक्ति निरन्तर कर सके तो उत्तम रहता है। अन्यथा चार शुक्रवारों तक इस साधना क्रम को दोहराते रहें। अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद चारों लघु नारियल, यंत्र व माला पीपल के वृक्ष के नीचे रख दें।
अनंग साधना का ही पूरक है काम चेतना साधना।
व्यक्ति नित्य प्रति प्रातः स्नान के पश्चात् उपरोक्त मंत्र की एक माला अवश्य जप करें। इस मंत्र जप से साधना का फल द्विगुणित हो जाता है। साथ ही शरीर की क्रियाशीलता और बालों में सघनता, बालों का काला हो जाना, आंखों में चमक बढ़ जाना, झुर्रियों का मिट जाना जैसे परिवर्तन संभव हो जाते हैं, वरन कद-काठी का भी आकार बदलने लग जाते हैं और व्यक्ति जीवन में पूर्ण वैवाहिक सुख भोगने के साथ साथ समाज में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में सक्षम होता है।
पौरूषवान शक्ति से ओत-प्रोत करने के साथ ही पति-पत्नी में शारीरिक मानसिक आत्मिक रूप से प्रगाढ़ संबंध बना रह सके इसीलिए कामरूपी शक्ति को आत्मसात करना आवश्यक है क्योंकि देह की प्रसन्नता के बाद ही मन का आत्मिक आनन्द प्रारम्भ होता है। इसीलिए मनुष्य को संसार में देह से बलशाली सौष्ठव और पौरूषयुक्त रहना आवश्यक है। पांच पत्रिका सदस्यता बनाने पर जीवन को रस-आनन्द से युक्त कामदेव शक्ति अनंग रति दीक्षा प्रदान की जा सकेगी जिससे अपनी देह को पूर्णरूपा पौरूषवान बना सके।
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