





जीवन का आधार ही शक्ति है, शक्ति के बिना जीवन शव हो जाता है, गतिमान पदार्थ और स्थिर पदार्थ दोनों ही शक्ति तत्व से युक्त अवश्य है। शक्ति और शक्ति तत्व को विभक्त नहीं किया जा सकता। भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन एक दूसरे से विपरीत न होकर एक साथ ही संयुक्त है जिस प्रकार शक्ति अनन्त है वैसे शक्ति तत्व भी अनन्त है। शक्ति को जाने अथवा बिना जाने भी प्रत्येक व्यक्ति शक्ति का उपासक अवश्य है।
जीवन में कोई भी कार्य शक्ति के द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य ही अपने आप को शक्तिमान बनाना है, जीवन का उद्धर्व गति और नित्य प्रति की क्रियाएं शक्ति तत्व से ही संभव है।
आधुनिक भौतिक विज्ञान भौतिक शक्ति को ही जगत का प्रमुख कारण मानता है। ऐनर्जी की विभिन्न मात्र में फ़ैली हुई तंरगे कही रंग वही स्थूलता इत्यादि रूप में परिणित होकर विचित्रता से युक्त विश्व को जन्म देती है प्रकृतिवादी दाशर्निक भी इसी सिद्धान्त को मानते हैं। आइन्स्टीन का सिद्धांत मंत्र अर्थात शक्ति व पिंड का द्रव्यमान और प्रकाश की गति के वगर्फल का गुणनफ़ल होता है। अर्थात पिंड प्रकाश की गति से युक्त होकर उसी मात्र में शक्ति उत्पन्न करता है। जो भी पिंड गति से युक्त होगा वह अधिक ऊर्जा उत्पन्न करेगा लेकिन इन सब में शक्ति केवल भौतिक और अचेतन है।
शक्ति की चेतना के सम्बन्ध में विज्ञान भी कोई निरुपण नहीं कर सका है। वस्तु चाहे गतिशून्य हो अथवा गतिशील हो शक्ति विद्यमान अवश्य रहती है। अग्नि की जवलन्ता और प्रकाश अग्नि से भिन्न नहीं हो सकते अचल वस्तु काष्ट लकड़ी को प्रज्ज्वलित करने पर उसमें अग्नि और प्रकाश दोनों ही प्रकट हो जाते हैं। उसी प्रकार अचेतन शक्ति की चेतन्य शक्ति में सारा संसार शक्ति और शक्तिमान से परिपूर्ण हैं और इसी से उत्पत्ति स्थिति और संहार होता है। शक्ति सदैव शाश्वत होती है, जब तक चेतन्यता नहीं है तब तक शक्ति निष्प्रभावी है।
भारतीय सिद्धान्त के अनुसार शक्ति आद्यरूप में स्थित है और इस सृष्टि में जो कुछ है विद्या, अविद्या, माया वह शक्ति का ही स्वरूप है। बुद्धि, श्री, कीर्ति, गति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, स्पर्हा सभी शक्ति के ही रूप हैं। संसार में जो व्यक्ति शक्ति से रहित है उसे शक्तिहीन कहा जाता है, रुद्र की शक्ति, विष्णु की शक्ति और ब्रह्मा की शक्ति के रूप में ही शक्ति ही विद्यमान है, इनके रहित होने पर कोई व्यक्ति रुद्रहीन विष्णुहीन अथवा ब्रह्महीन नहीं कहलाता अपितु शक्तिहीन कहलाता है।
मनुष्य का कार्य ही निरन्तर आगे बढ़ना है और उसे आगे वृद्धि करने हेतु निरन्तर शक्ति की आवश्यकता रहती है, जीवन में किसी भी वस्तु को ग्रहण करना और उस वस्तु को अपने उपयोग में लाना शक्ति के माध्यम से ही संभव है।
भारतीय शास्त्रों में शक्ति को स्त्री तत्व कहा गया है और त्रिशक्ति के रूप में महाशक्ति की आराधना की विशेष मीमांषा की गई है चराचर जगत में जो कुछ भी है वह ब्रह्म, विष्णु और रुद्र के साथ महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली से संयुक्त होकर त्रिमूर्ति है। ब्रह्म की शक्ति जिससे सृजन होती है वह महासरस्वती है, विष्णु की शक्ति या विष्णु शक्ति पालन करती है वह महालक्ष्मी है, रुद्र शक्ति जिससे संहार होता है वह महाकाली है।
शंकराचार्य ने लिखा है कि –
शिवः शक्त्यां युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्।।
अर्थात् भगवान शिव भी अपनी शक्ति से युक्त होकर अपना कार्य करने में समर्थ्य होते है अतः स्पष्ट है कि इस त्रिगुण शक्ति से युक्त होकर ही जगत सृष्टा, जगत पालक और जगत संहार कर्ता बनते है जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु महेश कहा जाता है।
शक्ति को माया कहा जाए अथवा अमाया, इसे कुण्डलिनी शक्ति कहा जाए अथवा चैतन्यता कहा जाए, मूल रूप से शक्ति प्रकृति है जिसमें सब उत्पन होकर सब विलीन हो जाता है। सगुण-निर्गुण, किसी भी सफ़लता, किसी भी उपासना, का आधार शक्ति ही है।
शंकराचार्य केवल निर्गुण निराकार अद्वैत परब्रह्म थे, उपासक थे। एक बार काशी पधारे तो वहां उन्हें अतिसार हो गया जिससे वे अत्यन्त कृशकाय हो गये। उस समय भगवती अन्नपूर्णा ने उन पर कृपा करने के लिए एक गोपिका का रूप बनाकर वहीं एक बड़ा घड़ा लेकर वह बैठ गई और कुछ देर बाद कहा कि स्वामी जी, मेरे इस घड़े को उठवा दीजिए। शंकराचार्य ने कहा कि मां मुझ में शक्ति नहीं है, मैं उठवाने में असमर्थ हूं। मां ने कहा कि तुमने शक्ति की उपासाना की होती तब शक्ति आती, शक्ति की उपासना के बिना भला शक्ति कैसे आ सकती है।
यह सुनकर शंकरचार्य की आंखे खुल गई उन्होंने शक्ति की स्तुति में स्त्रोतों की रचना की। शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों में चार शक्तिपीठ ही हैं। भगवती दक्षिणामूर्ति की स्तुति में उन्होंने सुन्दर श्लोक लिखे और कहा जो ब्रह्म है वह शक्ति ही है जो शक्ति और वह ब्रह्म है।
त्रिशक्ति परस्पर संबंध:- त्रिशक्ति महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती का रूप और कार्य भी एक दूसरे से ही जुड़ा है, इन तीनों पर विचार कर इनकी व्याख्या का प्रयत्न किया जा रहा है।
सबसे पहले रुद्र जो कि संहार रूपी कार्य करते हैं और उसे सम्पन्न कराने वाली महाकाली रूपी रुद्र शक्ति अपने भंयकर कार्य के अनुरूप श्यामवर्ण की होती है परन्तु यह संहारक, संहार का कार्य संहार के लिए नहीं अपितु सारे संसार के रक्षण और कल्याण के लिए होता है। अतः वह अधर्म अन्याय इत्यादि का संहार कर श्रेष्ठ वस्तु अपने भ्राता विष्णु के हाथों सौंप कर कहती है कि मैंने अपने पुरुष महादेव रुद्र की शक्ति की हैसियत से बुराई का संहार कर दिया है अब हमारा कार्य पूरा हो गया है अब इस जगत को पालन करने का आपका कार्य है उसे सम्पन्न करें।
महालक्ष्मी और विष्णु का कार्य:- विष्णु जो पालनकारी रूप में कार्य करते हैं, उसे सम्पन्न कराने वाली विष्णु शक्ति महालक्ष्मी स्वर्ण वर्ण की होती है। परन्तु यह पालन का कार्य केवल पालन के लिए नहीं, जगत के पोषण और वर्धन करने के उद्देश्य से होता है और इस कार्य को पूर्ण कर इस जगत को अपने भ्राता ब्रह्मा को सौंपते हुए कहती हैं कि मैंने अपने पति महाविष्णु की शक्ति की हैसियत से इस जगत को पाला है और हमारा कार्य पूरा हुआ अब इस जगत को लेकर अपना कार्य जो नवीन वस्तुओं को उत्पन्न करना है इसे सम्पन्न करें।
महासरस्वती और ब्रह्मा का कार्य:- ब्रह्मा जो नवीन वस्तुओ का निर्माण और सृष्टि रूपी कार्य करना है उसे सम्पन्न कराने वाले महासरस्वती रूपी ब्रह्मा शक्ति अपने कार्य के अनुरूप श्वेत वर्ण की होती हैं। निरन्तर सृष्टि में सृजन निर्माण होता ही रहता है और जगत का कार्य आगे बड़ता रहता है। निश्चय ही निर्माण, पोषण, वर्धन के कार्य के समय कुछ अनिष्ट पदार्थ भी सम्मलित हो जाते हैं, अतः अपना कार्य करने के पश्चात भगवती सरस्वती जगत को रुद्र के हाथ में सौंपते हुए कहती है कि मैंने अपने पति हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की शक्ति की हैसियत से निर्माण कार्य किया है इसके निमार्ण पोषण वर्धन के समय जो त्रुटियां आ गई हैं उनका संहार करना आपका कार्य है।
इस प्रकार रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा जगत माता भगवती महामाया के अन्तर्गत त्रिशक्ति सृष्टि शक्ति, पालन शक्ति और संहार शक्ति की क्रिया अनवरत रूप से चलती ही रहती है।
शक्ति तत्व:- जिसके जीवन में सृष्टि तत्व, पालन तत्व और संहार तत्व नहीं है वह जीवन ही नहीं है वह तो मृतक जीवन है और जहां इन तीन शक्तियों की साधना से व्यक्ति जीवन में इन तत्वों को निरन्तर उत्पन्न करता रहता है, वृद्धि करता रहता है वही मनुष्य है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मूल प्रकृति शक्ति का स्तवन करते हुए कहा है –
त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
त्वमेवआद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका।।
कार्यार्थ सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्।
पर ब्रह्मस्वरूपां त्वं सत्या नित्या सनातनी।।
तेजः स्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा।
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्परा।।
सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया।
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगलमंगला।
तुम्ही विश्वजननी मूलप्रकृति ईश्वरी हो, तुम ही सृष्टि की उत्पति के समय आद्या शक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो। यद्यपि वस्तुतः तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो। तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो। परम तेज स्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने के हेतु शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो। तुम सर्वबीज स्वयं, सर्वपूज्या एवं आश्रयरहित हो। तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करने वाली एवं सर्वमंगलों की भी मंगल हो।
शक्ति साधनाएं किसी भी रूप में की जाएं, उसके लिए दक्षिण मार्ग और वाम मार्ग प्रमुख है। लौकिक सुखों की प्राप्ति, अभिष्ट सिद्धि और दुःख निवृति के लिए 64 कौल तंत्रों का विधान किया गया है और इसी मार्ग की उपासना व्यक्ति के लिए श्रेष्ठ है। सौन्दर्य लहरी में शंकराचार्य ने इसे सुगम मार्ग बताते हुए कहा है –
चतुष्षष्टचातन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं
स्थितस्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना
स्वतन्त्रं ते तंत्र क्षितितलमवातीतरदिद्म।।
भगवान पाशुपति शंकर ने सभी कामनाओं को प्रदान करने वाले चौसठ तंत्रों के माध्यम से समस्त संसार को व्यवस्थित करके स्वतंत्र रूप से एक अन्य ऊर्वरता युक्त पैंसठवे तंत्र की रचना की जो अलौकिक और परिपूर्ण है, जिसे श्री विद्या कहते हैं, शक्ति तत्व कहते हैं, जो सभी साधकों के आभयुद और निःश्रेयस का एक मात्र साधन बना।
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