





इस विशेष अलौकिक साधना में मुख्य स्थान साधक की आंतरिकता का है। वह जितनी भावनापूर्वक और जितनी एकाग्रता से इस साधना को सम्पन्न करेगा, उतनी ही जल्दी इसमें सफलता भी प्राप्त कर लेगा। एकाग्रता के अतिरिक्त आंतरिक व बाह्य पवित्रता का भी विशेष महत्त्व है।
साधक इन सात दिनों में यथा संभव कम वार्तालाप करें, ब्रह्मचर्य का पालन हो तथा भोजन आदि के विषय में पर्याप्त संयम की स्थिति रहे।
साधना सामग्री के रूप में, इस साधना विशेष के रूप में केवल ‘पारद गुरू यंत्र’ का ही प्रयोग किया जाता है, अन्य किसी भी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती।
साधक उचित दिवस पर श्वेत वस्त्र धारण कर श्वेत आसन पर पूर्व मुख होकर बैठें। इस दुर्लभ यंत्र को अपने समक्ष किसी श्वेत वस्त्र पर चावलों की ढ़ेरी बनाकर स्थापित करें। यदि साधक को आम की लकड़ी का बाजोट मिल सके तो वह उस पर ही वस्त्र बिछा कर चावलों की ढ़ेरी पर इसे स्थापित करें एवं घी का दीपक प्रज्वलित कर लें। उसके पास पूज्यपाद गुरूदेव का चित्र होना आवश्यक है, जिसे वह यंत्र के पीछे स्थापित कर दें।
यह प्रातः काल ब्रह्म मुहुर्त की साधना है और शांत भाव से यंत्र पर त्राटक करते हुये अनुमान से आधा घंटा निम्न मंत्र का जप करना होता है-
मंत्र जप को अत्यन्त मधुरता के साथ एवं गुंजरण के रूप में करें। प्रत्येक मंत्र दूसरी बार के उच्चारण के साथ एक प्रकार से जुड़ा ही रहे। अटक-अटक कर, हिल-डुल कर, जोर-जोर से बोल कर अथवा आलस्य के साथ मंत्र जप करने का कोई अर्थ नहीं होता।
साधना की समाप्ति पर यंत्र को किसी स्वच्छ कपड़े से ढंक दें एवं अगले सात दिनों तक यही क्रम बनाएं रखें। ध्यान रखें, प्रथम दिन जिस समय पर साधना प्रारम्भ की है, अन्य सभी दिनों में भी उसी समय पर साधना प्रारम्भ करें। यदि इसमें चूक हो जाये, तो साधना को खण्डित मान कर पुनः नये ढंग से प्रारम्भ करें।
साधना का प्रारम्भ एवं अंत में श्वेताभ माला से गुरू मंत्र का जप करके उसी माला को गले में धारण करने से फल द्विगुणित हो जाता है। पारद गुरू यंत्र को संभाल कर रख लें, यह विसर्जित नहीं किया जाता।
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