





हर व्यक्ति यही स्वप्न देखता है कि वह बिना परिश्रम किये एक दिन में ही करोड़पति बन जाये, परन्तु यह सम्भव नहीं है, अधिक नहीं, किन्तु कुछ परिश्रम तो उसे अवश्य ही करना पड़ेगा, उस अर्थ साधना को सम्पन्न करने के लिये, जिसके माध्यम से उसके स्वप्न को सम्भव व साकार रूप दिया जा सकता है, और वह सम्भव है ‘‘नागेश साधना’’ के माध्यम से।
देव, किन्नर आदि की तरह नाग अर्थात् सर्पों का भी एक अलग लोक है, जिसे हम ‘पाताल लोक’ कहते हैं। साधारण दृष्टि से सर्प एक जन्तु मात्र है, किन्तु ऐसा सोचना ठीक नहीं है, इनकी भी अनन्त जातियां हैं तथा ये अपने आप में विभिन्न विशेषताएं लिये हुये होते हैं।
सर्पों को हम दन्तक कथाओं के माध्यम से विषैले और व्यर्थ ही काट कर मनुष्यों या अन्य पशुओं को मार डालने वाले जीव मात्र ही समझ बैठे हैं, पर ऐसी बात नहीं है, अपितु ये तो साधना के माध्यम से अनन्त ऐश्वर्य तथा निधि प्रदान करने वाले होते हैं, क्योंकि ये पृथ्वी के नीचे दबे-गड़े हुये स्वर्णादि निधियों के स्वामी होते हैं, और उनकी सुरक्षा के लिये सदैव तत्पर रहते हैं।
साधना के द्वारा इनके प्रसन्न होने पर पृथ्वी में छिपी हुई सम्पत्ति को आसानी से हस्तगत किया जा सकता है या आकस्मिक धन-प्राप्ति के अनेक साधन उपलब्ध किये जा सकते हैं। अनेक ऐसे दिव्य शरीरधारी सर्प होते हैं, जिनकी आयु भी लम्बी होती है, तथा जिनके दर्शन मात्र सौभाग्यदायी होते हैं, इसीलिये इनकी पूजा भी अनेक स्थानों पर होती है। जहां मन्दिर आदि स्थल बने होते हैं, वहां देवता की तरह ये भी यथासमय दर्शन देते रहते हैं।
हमारे भारतीय शास्त्रों के अनुसार ये देवकोटि में ही गिने जाते हैं, जो अनेक अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होते हैं, इनकी साधना सौभाग्य तथा वैभवप्रद मानी जाती है। जिसके माध्यम से शीघ्र धन-लाभ की अवस्था बनती है।
नागेश साधना का वास्तविक ज्ञान हमें ‘‘स्वामी भूतेश्वरानन्द जी’’ से हुआ। उन्होंने ही यह बताया, कि अगर मनुष्य चाहे तो नागेश साधना सम्पन्न कर शीघ्र से शीघ्र धन प्राप्त कर सकता है, क्योंकि इस साधना से आकस्मिक धन प्राप्त कर वह कुछ ही दिनों में सम्पन्न और धनाढ्य लोगों की श्रेणी में गिना जा सकता है।
किन्तु आज लोग नाग के नाम से ही भयभीत और आशंकित हो उठते हैं, नाग साधना करने से पूर्व उन्हें हर क्षण यह डर बना रहता है कि कहीं सांप आकर कुछ अनर्थ न कर दे, इसी भ्रामक धारणा से भयभीत हो कर वे नाग साधना करने से हिचकिचाते हुये प्रतीत होते हैं, परन्तु यह बात सर्वथा गलत है, नाग साधना सम्पन्न करने से व्यक्ति को सदैव लाभ ही होता है, हानि नहीं।
इस प्रकार नाग चर्चा के दौरान ही उन्होंने हमें नागेश साधना के बारे में सविस्तार पूर्वक बताया, जिसे सम्पन्न कर व्यक्ति गड़े हुए धन, लॉटरी, जुए आदि में अचानक प्राप्त हुए धन का स्वामी बन सकता है, किन्तु उन्होने यह भी बताया, कि इस साधना को एक विशेष मुहूर्त में सम्पन्न किया जाना आवश्यक है, क्योंकि विशेष क्षणों में ही साधक को उसका लाभ प्राप्त हो सकता है, और वह विशेष मुहुर्त है ‘‘नाग पंचमी’’, जिस दिन साधना करने से नाग प्रसन्न होते ही हैं, और प्रसन्न होने के उपरान्त व्यक्ति के जीवन से गरीबी व दरिद्रता जैसा शब्द हमेशा-हमेशा के लिये मिटा देते हैं। वैसे तो इस दिन नागों को दूध पिलाने की भी प्रथा जन-सामान्य में प्रचलित है, क्योंकि नाग एक रक्षक के रूप में भी उस मनुष्य की सहायता करते हैं।
किन्तु नागेश साधना सम्पन्न करने वाले साधक को चाहिये कि वह साधना के पश्चात् चांदी का एक सर्प जो कि स्वयं किसी सुनार के द्वारा पहले से ही बनवा कर रख लेना चाहिये, किसी शिव मन्दिर में चढ़ा आये। भूतेश्वरानन्द जी ने बताया, कि ऐसा करने पर ही साधक को पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है, और ऐसा विष्णु पुराण आदि शास्त्रों में भी वर्णित है, उनकी बताई गई इस साधना को प्रामाणिक रूप देने के लिये कई साधकों को इस साधना को सम्पन्न कराया गया, और उन्हें इसके विशेष लाभ भी प्राप्त हुए, जिसके आधार पर ही हम यह कह सकते हैं कि यह एक प्रामाणिक तथ्य है, और इस साधना से निश्चित ही धनागम के स्त्रोत तो खुल ही जाते हैं, साथ ही उसे आकस्मिक रूप से भी धन की प्राप्ति होने लग जाती है।
यह एक गुह्य साधना है, जिसका ज्ञान बहुत कम लोगों को है, किन्तु इस साधना के बाद साधक को जीवन भर कभी धन की कमी महसूस नहीं होती। व्यक्ति को यह साधना नाग पंचमी के दिन ही सम्पन्न करनी चाहिये, परन्तु बिना किसी भय के, और इसके लिये यह आवश्यक है कि साधक के मन में उस साधना के प्रति पूर्ण श्रद्धा व विश्वास हो, जिसके आधार पर ही इस साधना में सफलता प्राप्त हो सकती है।
सामग्री- शंख-निधि, चांदी का सांप, गुह्य माला।
साधना समय- 29 जुलाई नाग पंचमी या किसी सोमवार के दिन प्रातः पांच बजे से आठ बजे तक।
साधना विधि-
साधक ‘नाग पंचमी’ के दिन प्रातः ब्रह्म मुहुर्त में उठकर, स्नानादि क्रिया से निवृत्त होकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जायें। अपने सामने छोटी चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें, तथा बीच में कुंकुंम या चन्दन से नागेश का अर्थात् सर्प का चित्र बनायें तथा सर्प के ऊपर चावलों की एक ढेरी बनाकर उस पर ‘शंख निधि’ को स्थापित करें। उसका मुंह साधक अपनी ओर रखें, तथा उसके आगे स्टील की या अन्य किसी प्लेट में ‘चांदी के सर्प’ (यदि यह उपलब्ध न हो सके, तो चांदी का तार लेकर उसे सर्प की भावना देकर पूजन सम्पन्न करें) को गंगाजल से या दूध से स्नान कराकर स्थापित कर दें, फिर शंख तथा सर्प का कुंकुंम, अक्षत व पुष्पादि से पूजन करें और तेल के पांच दीपक जला दें, (तेल, तिल या सरसों किसी का भी ले सकते हैं) ये दीपक मंत्र-जप करते समय निरन्तर जलते रहने चाहिये, अतः ध्यान रखें कि साधना काल में दीपक न बुझने पायें।
साधक बाद में ‘शंख निधि’ को चावलों से भर दें, और फिर उसी आसन पर खड़े होकर ‘‘नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु’’ इस मंत्र का दस मिनट तक जप करें, फिर आसन पर बैठ कर गुह्य माला, जो कि विशिष्ट मंत्रों से चैतन्य होती है, उससे निम्न मंत्र का पांच माला जप करें।
मंत्र-जप के समय मन बिलकुल शान्त होना चाहिये। आंख बन्द करके अपने इष्ट का या पूज्य गुरूदेव जी का ध्यान करें, और इस साधना में सिद्धि हेतु उनसे मानसिक प्रार्थना करते रहें।
Om Nrim Naageshwaraaya DhanPradaaya Nrim Phat
मंत्र-जप के बाद गुरू आरती सम्पन्न करें तथा जो भी प्रार्थना करना चाहें, वह करें। इस साधना के उपरान्त साधक कुछ दिनों में ही इसके प्रतिफल या लाभ से स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है और आकस्मिक धन लाभ की सम्भावना तो बनती ही है। साधना सम्पन्न करने के पश्चात् उसी दिन या उससे अगले दिन इस साधना में प्रयुक्त पूजन सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें।
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