






इस अखिल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के मूल में आदि शक्ति ही क्रियाशील है। किसी भी वस्तु का सृजन और विनाश शक्ति द्वारा ही होता है। मनुष्य के जीवन में शक्ति के अभाव से ही जीवन में अनेक न्यूनताओं, क्लेश, दुःख, पीड़ा, विषाद, दुर्गति और निराशा ही निराशा व्याप्त होने लगती है।
शक्ति का तात्पर्य ही सद्बुद्धि, बोध, पुष्टि, तुष्टि, शांति, क्षान्ति, श्रद्धा, कान्ति, सद्वृत्ति, धृति, उत्तम स्फूर्ति, लज्जा, दया, परोपकार, श्रेष्ठ सुस्थितियों का निर्माण, भौतिक-आध्यात्मिक जीवन के साथ ही अन्य सद्गुणों का विकास होना है।
इस दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वे शत्रु आभ्यान्तरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेना है, क्योंकि मात्र महाकाली ही वे शक्ति स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार कर, अपने भक्तों को सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं।
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कृष्ण ने अपने जीवन काल में शुद्धता, पवित्रता एवं सत्यता पर ही अधिक बल दिया, अधर्म, व्यभिचार, असत्य जैसी बुराईयों को वध करके योग्य ठहराया, सम्पूर्ण महाभारत एक प्रकार से पारिवारिक जीवन संग्राम था।
कृष्ण ने अपने जीवन में सभी क्षेत्रों को स्पर्श करते हुये प्रेम, सौन्दर्य, आकर्षण, सम्मोहन, वीरता, कर्मठता, सत्यता को विशिष्ट स्थान प्रदान किया।
योगेश्वराय जीवन निर्माण की चेतना को आत्मसात् कर साधक निश्चिंत रूप से जीवन के प्रत्येक रंगों को स्वयं में समाहित करते हुये सभी भौतिक सुखों को पूर्णता से भोग सकेगा। साथ ही योगेश्वर कृष्ण की सोलह शक्तियों से जीवन के उन पक्षों को पूर्णता देने में समर्थ हो सकेंगे।
षोड़स कला सिद्ध कृष्णत्व धन लक्ष्मी दीक्षा से आर्थिक सुदृढ़ता, श्रेष्ठ सफलता, सम्पन्नता, सौन्दर्यता, सम्मोहन, आरोग्यता, आध्यात्मिक चैतन्यता प्राप्त हो सकेगी। जिससे साधक योगी व भोगी दोनों पक्षों को पूर्णता से जी सकेंगे।
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