

सूर्य असीम शक्ति और सामर्थ्य से युक्त ग्रह है, जो अत्यधिक ऊष्मा, प्रचण्ड ताप और हिम से भी अधिक शीतलता रखने वाला ग्रह है। संसार के समस्त पदार्थों की सरंचना सूर्य रश्मियों के माध्यम से संभव हैं। यदि सही प्रकार से सूर्य और उसकी रश्मियों के गुणों को समझ लिया जाए तो पूरी पृथ्वी पर आश्चर्यजनक परिणाम को समझ सकते हैं।
साधक के जीवन में अनेक प्रकार की इच्छाये होती है, हम जीवन में चाहते है कि दीर्घायु हों, हमारा सुखी परिवार हो, श्रेष्ठ पुत्र-पुत्रियां हो, श्रेष्ठ व्यापार-नौकरी हो, हम आर्थिक दृष्टि से उन्नति करें, किसी प्रकार की कोई बाधा हमारे जीवन में ना रहें, हम पूर्ण स्वस्थ हों, और भी कई प्रकार की मनोकामनाये होती है।
मनुष्य जीवन में सुयोग्य मुहुर्त व ग्रह काल का विशेष महत्व होता है, मनुष्य जीवन तो ग्रह स्थिति के अनुसार ही चाल्यमान होता है। अत: इन सुयोंगो में सर्वश्रेष्ठ सूर्यग्रहण पर्व नवरात्रि की चेतना से आपूरित है, ऐसा स्वर्णिम ग्रहण-संयोग से जीवन में हम साधनाओं व शक्तिपात दीक्षाओं कि क्रिया के माध्यम से-धन, पद, प्रतिष्ठा, यश, मान, ऐश्वर्य, कुण्डलिनी जागरण, पूर्णता, श्रेष्ठता, तेजस्विता और जीवन में जो कुछ भी हमें चाहिये वह सब ऐसे अद्वितीय ग्रह संयोग व सद्गुरू निर्देशन में दीक्षा स्वरूप प्राप्त कर सकते हैं।
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नूतन कार्य-व्यापार, सौभाग्यता युक्त निरन्तर धन लक्ष्मी प्राप्ति हेतु कार्तिक शुक्ल पंचमी जो लाभ पंचमी प्राप्ति दिवस है। इस दिन भगवान गणपति व माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना सम्पन्न करने से जीवन के दुर्भाग्य निश्चिन्त रूप से समाप्त होते है। लाभ पंचमी पर्व का अभिजीत लाभ का चौघड़िया युक्त पूजन मुहुर्त प्रारंभ हो रहा है, ऐसे चैतन्य मुहुर्त में नूतन कार्य-व्यापार सफलता, कार्य-व्यापार बाधा निवृत्ति, ग्राहक आकर्षण, निरन्तर धन आगम, संकल्प भाव की पूर्णता प्राप्ति में निरन्तरता बनी रहे। साथ ही जीवन शुभ-लाभमय मंगलमय चेतना से क्रियाशील रहे, इसी हेतु सद्गुरूदेव जी द्वारा साधकों हेतु पूजा-साधना सम्पन्न कर इस चैतन्य दिवस पर दीक्षा प्रदान करेंगे। जिससे रोजगार, कार्य, व्यापार वृद्धि में धन, ज्ञान, सौभाग्य, लाभ युक्त मनोकामना पूर्ण हो सकेगी।
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भगवान श्रीकृष्ण द्वापर युग में विष्णु के आठवें अवतार स्वरूप में सृष्टि में अवतरित हुये। पूरे विश्व में सर्वाधिक स्वरूप में भगवान श्रीकृष्ण के देवमय चैतन्य धाम जीवन्त-जाग्रत हैं। पुरी में भगवान श्री कृष्ण जग के नाथ जगन्नाथ रूप में और साथ ही माता सुभद्रा, बलभद्र भी अपने पूर्ण चेतन्य स्वरूप में विराजित है। जिनके दर्शन मात्र से जीवन में नूतन चेतना व ऊर्जा का संचार होने लगता है। ऐसे दिव्य धाम भूमि पर साधनात्मक क्रियायें सम्पन्न करने से हर रूप में दुःख, कष्ट, पीड़ा, संताप, धन हीनता आदि अनेक जन्मों से भोग रहे कुस्थितियां पूर्णरूपेण भस्मिभूत होती ही हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में संदेश दिया की जीवन वृद्धि के लिये संघर्ष रूपी युद्ध करना आवश्यक है। बिना युद्ध के जीवन की विलगता, न्यूनता, अभाव, तकलीफ, बाधायें समाप्त नहीं हो सकती। उन्होंने गीता में संदेश दिया कि मनुष्य के अहंकारी होने पर विनाशमय स्थितियां बनती हैं। अतः ऐसे अर्नगल क्रियाओं के फलस्वरूप जीवन में जो भी दूषितता, मलिनता का विस्तार होता है उसका पूर्ण निदान केवल और केवल जगन्नाथ पुरी धाम में भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र, सुभद्रा के सुभावों को साधनात्मक रूप में आत्मसात् करने से साधक सर्व स्वरूप में पराक्रमी योगमय चौसठ कलामय की सुचेतनाओं से परिपूर्ण होता है।
दिव्य जगन्नाथ पुरी धाम की देव भूमि पर सद्गुरूदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में श्री जगन्नाथ हरि केशव योग-भोग चक्रधारी साधना, पूजा, हवन व समुद्र के तट पर विशेष शक्तिपात दीक्षा की क्रियायें जगन्नाथ पुरी के चैतन्य धाम में सम्पन्न होगी। जिससे हर रूप में दुःख, कष्ट, पीड़ा, संताप, धन हीनता रूपी विष के सागर को अपने आगोश में लेकर साधक के जीवन को जगन्नाथ स्वरूप सभी योगमय सुक्रियाओं से युक्त कर सकेगा।
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