





एक साधक या शिष्य के जीवन में ‘गुरू पादुका दिवस’ का सर्वाधिक महत्व है, और वह पूर्ण श्रद्धा, भावना एवं चिन्तन के साथ ‘‘गुरू पादुका दिवस’’ को सपरिवार सम्पन्न करता है।
महर्षि योगी स्वामी पीताम्बर दत्त जी के द्वारा हमें गुरू पादुका पूजन का विशेष प्रयोग प्राप्त हुआ है, जो कि अपने आप में अनुपम एवं अद्वितीय है, अगली पंक्तियों में यह पूर्णता के साथ प्रकाशित है।
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जन्म लेना कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है, यह तो प्रकृति का एक प्रयोग है, जिसकी वजह से जीव-नर देह धारण कर जन्म लेता है, परन्तु जन्म लेने के बाद जिन संस्कारों के फलस्वरूप उसके मन देह का महत्त्व अमरत्व स्पष्ट होता है।
जन्म देना या जन्म लेना एक सहज स्वाभाविक क्रिया है, जिसमें किसी ज्ञान, किसी चेतना या किसी संस्कार की आवश्यकता नहीं होती, मूर्ख व्यक्ति भी किसी बालक को जन्म दे सकता है, दुष्ट और पापात्मा व्यक्ति भी किसी जीवन को बालक रूप प्रदान कर सकता है, और अकुलीन, असंस्कारित तथा पशु तुल्य जीवन जीने वाला व्यक्ति भी बालक को जन्म दे सकता है, इस दृष्टि से देखा जाय तो बालक को जन्म देना कोई महानता नहीं है, या कोई जीवन जन्म लेता है, तो यह श्रेष्ठता या महत्वपूर्ण नहीं है, यह तो प्रकृति का एक नियम है, और उस नियम के अनुरूप बालक जन्म लेता है, बड़ा होता है, और मृत्यु के मुंह में चला जाता है।
जन्म लेते ही बालक से गुरू का संबंध स्थापित हो जाता है, प्रकृति को गुरू ही माना है, गाय आदि अन्य पशुओं के बालक प्रकृति में ही जन्म लेते हैं, उनके चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारों या अस्पताल, डॉक्टर या चिकित्सक नहीं होते, शुद्ध प्रकृति से उनका सीधा संबंध होता है, इसलिये जन्म लेते ही उसका प्रकृति रूपी गुरू से सीधा संबंध स्थापित हो जाता है, और वह चार-छः घण्टों में ही उठ कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है, विचरण करने लग जाता है, या पक्षी पंख फैला कर उड़ने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेते है, या पशु दौड़ने अथवा अन्य कार्य प्रारम्भ कर देते हैं।
परन्तु मनुष्य को यह सब करने में पूरा साल लग जाता है, क्योंकि वह प्रकृति से कटा हुआ होता है, प्रकृति का सीधा संबंध उससे नहीं हो पाता, प्रकृति रूपी गुरू की थपथपाहट उसे अनुभव नहीं होती, वह ऊँची दीवारों के बीच में घिरने के बाद जन्म लेता है, इसलिये अपने पैरों पर खड़े होने में उसे पूरा एक वर्ष लग जाता है, अन्य क्रिया कलाप जो पशु या पक्षी चार छः घण्टों में सीख लेते है, उसे नर बालक को सीखने में तीन-चार वर्ष लग जाते हैं और यह जीवन की विडम्बना या न्यूनता ही है।
वास्तविक मानव जीवन तब प्रारम्भ होता है, जब उसके हृदय में अध्यात्म शक्तियों का विकास होने लगता है, जब उसे यह अहसास होने लगता है, कि मेरा जीवन एक क्षण-संयोग है, इसके पीछे कोई निश्चित योजना या चिन्तन नहीं है, अब मैं अपने जीवन को पूर्णता तभी दे सकता हूं, जब मुझे गुरू का चिन्तन प्राप्त हो, मेरे शरीर में और जीवन में गुरू का महत्त्व हो, मेरा मार्गदर्शक और जीवन में पूर्णता देने में गुरू सहायक हो, ऐसा चिन्तन आने पर ही उसके जीवन की सार्थकता प्रारंभ होती है।
जब मनुष्य इस चिन्तन से अनुप्राणित होता है, तब वह गुरू के सत्संग में और गुरू के साहचर्य में रहने की इच्छा अनुभव करता है और तब गुरू अपनी कृपा से उसे शक्तिपात प्रदान कर पूर्ण पुरूष बनाने की, ओर अग्रसर करते है, शक्तिपात जीवन का प्रारंभ है, जीवन का अन्त नहीं है, जिनका शक्तिपात हो चुका होता है, उनको स्वयं शास्त्र, वेद, आगम, तंत्र और चिन्तन का बोध होने लग जाता है, उन्हें शिव की पूर्ण अनुभूति होने से वह शिवमय बन जाता है, और उसके हृदय में पूर्ण ज्ञान का उदय हो जाता है, ऐसे ही शिष्य को ‘‘प्रतिभा’’ कहते हैं।
गुरू पादुका
आज के युग में यह संभव नहीं रहा, कि शिष्य प्रति क्षण, प्रति दिन गुरू के साहचर्य में रह सके, ऐसी स्थिति ये गुरू की पादुका ही उसके लिये साक्षात् गुरूमय हो जाती है, क्योंकि-
पृथिव्या यानि तीर्थानि तानि तीर्थाति सागरे।
सागरे सर्व तीर्थानं गुरूस्य दक्षिणे पदे।।
अर्थात् संसार के सभी तीर्थ और पुण्य क्षेत्र गुरू के चरणों में साकार रूप में उपस्थित होते है, इसीलिये गुरू के चरणों का जल जिसको ‘‘चरणामृत’’ कहा जाता है, स्वीकार किया जाता है, गुरू चरण जल से स्नान कर समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त करता है, इसलिये गुरू के चरणों में धारण की हुई खड़ाऊ या पादुका स्वयं गुरू का साक्षात स्वरूप, बन जाती है, और इसीलिये शास्त्रों में इस दिवस को ‘गुरू पादुका दिवस’ के नाम के सम्बोधित किया है, भगवत् पाद शंकराचार्य ने तो कहा है, कि गुरू से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण गुरू पादुका है, उसे अपने पूजा स्थान में ठीक उसी प्रकार से स्थापित करना चाहिये जिस प्रकार हम सम्मान के साथ गुरू को अपने घर में श्रेष्ठ आसन पर बिठाते है, गुरू पादुका की उपस्थिति साक्षात् गुरू की उपस्थिति ही मानी गई, गुरू पादुका स्तवन मूल रूप में गुरू स्तवन ही है, इसीलिये पूरे भारत वर्ष में जितना महत्त्व गुरू पूर्णिमा का है, उससे भी ज्यादा महत्व ‘‘गुरू पादुका दिवस’’ का है।
भगवान शिव ने पार्वती को समझाते हुये कहा है, कि मात्र गुरू पादुका पूजन करने से साधक की सोलह कलायें स्वतः विकसित होने लग जाती है, ये सोलह कलायें निम्न प्रकार से कही गयी है- 1 मूलाधार, 2 स्वाधिष्ठान, 3 मणिपुर, 4 अनाहत, 5 विशुद्ध, 6 आज्ञा, 7 बिन्दु, 8 कला पद, 9 निर्वाधिका, 10 अर्धचन्द्र, 11 नाद, 12 नादान्त, 13 शक्ति, 14 कृयापिका, 15 समन्ना, 16 उन्मना।
इन सोलह कलाओं का विकास और कुण्डलिनी जागरण हो कर जब कुण्डलिनी उर्ध्वगामी होती है, तब स्वतः साधक की ‘खेचरी मुद्रा’ प्रारम्भ हो जाती है और ऐसा होने पर वह शिवात्मक गुरू शिष्य से संबोधित हो जाती है।
आगे के पृष्ठों में मैं गुरू पादुका-पूजन प्रयोग स्पष्ट कर रहा हूँ, इससे पहले ही शिष्य को ‘गुरू पादुका’ प्राप्त कर अपने पूजा स्थान में या अपने कक्ष में सम्मान पूर्वक स्थापित कर देना चाहिये, और यह अहसास करना चाहिये कि यह खड़ाऊ या ये पादुकायें साक्षात ब्रह्ममय गुरू ही सशरीर उपस्थित है और उनकी उपस्थिति में साधक निश्चित होकर अध्यात्म पथ पर निरन्तर अग्रसर होता रहता है, ऐसे साधक की कुण्डलिनी निरन्तर विकसित होती रहती है, और वह उस ब्रह्म रस का आस्वादन करने में समर्थ हो पाता है, जिसे जीवन मुक्त स्थिति या विदेह कहा जाता है।
साधक ‘‘गुरू पादुका दिवस’’ के दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ स्नान कर शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करे, और उत्तर दिशा की ओर आसन बिछा कर अपनी पत्नी के साथ या स्वयं बैठें, सामने श्रेष्ठ लकड़ी के तख्ते पर पीला वस्त्र बिछा कर उस पर गुरू पादुका स्थापित करें, और फिर अपने सामने पूजन सामग्री रख कर गुरू पादुका पूजन कार्य सम्पन्न करें।
पादुका चिन्तन
साधक या शिष्य अपने दोनों हाथ खड़ाउओं पर रखता हुआ निम्न प्रकार से चिन्तन-उच्चारण करें-
ऊँ गुरूभ्यो नमः
ऊँ परम गुरूभ्यो नमः
ऊँ परात्पर गुरूभ्यो नमः
ऊँ परमेष्ठि गुरूभ्यो नमः
ऊँ गणपतये नमः
ऊँ मूल प्रकृत्यै नमः
ऊँ मण्डूकाय नमः
ऊँ मूलाधारयै नमः
ऊँ कालाग्नि रूद्राय नमः
ऊँ कूर्माय नमः
ऊँ आधार शक्तये नमः
ऊँ आनन्दाय नमः
ऊँ अनन्ताय नमः
ऊँ पृथिव्यै नमः
ऊँ सुधार्भवाय नमः
ऊँ मणिद्विपाय नमः
ऊँ कल्पवृक्षाय नमः
ऊँ चिन्तामणि गृहाय नमः
ऊँ हेमपीठाय नमः
इसके बाद बांई तरफ चावल की ढेरी बना कर उस पर एक गोल सुपारी रख कर उसे भैरव मान कर उसकी संक्षिप्त पूजा करे, जिससे कि किसी प्रकार का कोई विघ्न उपस्थित न हो, पूजन के बाद भैरव के सामने हाथ जोड़ कर उच्चारण करें-
तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्ते दहनोपम्।
भेरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमहंसि।।
इसके बाद अपने बांये हाथ में थोड़े से चावल ले कर अपने चारों ओर घुमाते हुये दसों दिशाओं की ओर इस उद्देश्य से फेंके कि दसों दिशाओं का बन्धन हो सके, और किसी भी दिशा से किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो तथा शरीर पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े।
दस दिशा बन्धन
अप सर्पन्तु ये भूता भूमिसंस्थिताः।
ये भूताः विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।।
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाःसर्वतो दिशः।
सर्वेंषामविरोधेन पाद पूजां समारभेत्।।
आसन पूजन
इसके बाद अपने आसन को हटा कर उसके नीचे कुंकुम से त्रिकोण बनावे, और उस पर पुनः आसन बिछा दें, फिर आसन पर जल छिड़कते हुये निम्न उच्चारण करें-
ऊँ क्षेत्रपालाय नमः। ऊँ पृथ्वीत्यासन-मन्त्रस्य मेरूपृष्ठ ऋषिः।
सुतलं छन्दः। कूर्मो देवता। आसने विनियोगः।
ऊँ पृथ्वित्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय यां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
इसके बाद जो आसन बिछा हुआ है, उस पर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये आसन पर केसर की पांच बिन्दियां लगावे जिससे कि आसन सिद्ध हो सके।
ऊँ पृथिव्यै नमः
ऊँ अनन्ताय नमः
ऊँ कूर्माय नमः
ऊँ विमलाय नमः
ऊँ योगपीठाय नमः
इसके बाद खड़ाऊ के सामने पांच चावल की ढेरियां बनावे, और उस पर एक-एक गोल सुपारी रख कर केसर की बिन्दी लगावे तथा उच्चारण करें-
ऊँ गुं गुरूभ्यो नमः
ऊँ पं परम गुरूभ्यो नमः
ऊँ पं परात्पर गुरूभ्यो नमः
ऊँ पं परमेष्ठि गुरूभ्यो नमः
ऊँ पं परापर गुरूभ्यो नमः
शरीर गुरू स्थापन प्रयोग
इसके बाद दाहिने हाथ से संबंधित अंगो को स्पर्श करते हुये गुरू को अपने पूर्ण शरीर में समाहित करें-
ऊँ कूर्माय नमः
ऊँ वैराग्याय नमः
ऊँ आधार शक्तये नमः
ऊँ अनैश्वर्याय नमः
ऊँ पृथिव्यै नमः
ऊँ अनन्ताय नमः
ऊँ धर्माय नमः
ऊँ सर्वतत्वात्मकाय नमः
ऊँ ज्ञानाय नमः
ऊँ आनन्दकन्द कन्दाय नमः
ऊँ सविन्नालाय नमः
ऊँ ऐश्वर्याय नमः
ऊँ विकारमयकेशरेभ्यो नमः
ऊँ प्रकृतमयपत्रेभ्यो नमः
ऊँ पंचाशर्णबीजाढ्यकणिकायै नमः
इस प्रकार अपने शरीर में गुरू को स्थापित कर अपने शरीर की संक्षिप्त पूजा करें, सिर पर जल छिड़के सिर के मध्य में केसर की बिन्दी लगावे, हृदय पर केसर का लेप करें, और प्रसन्नता अनुभव करें, कि मेरे शरीर के रोम-रोम में पूज्य गुरूदेव स्थापित हुये है, जिससे कि मेरी कुण्डलिनी स्वतः जागृत होने लगी है।
इसके बाद खड़ाऊ दाहिनी ओर एक दूसरे लकड़ी के बाजोट पर कलश स्थापित करें, उसमें जल डाले, कलश के मुंह पर पांच या ग्यारह पत्ते रखकर उसके ऊपर नारियल स्थापित करें, कलश के मुह पर मौली या कलावा बांधे नारियल के ऊपर यज्ञोपवीत पहनावे, और कलश के चारो ओर चारो दिशाओं की ओर केसर की बिन्दी लगाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
ऊँ पूर्वें ऋग्वेदाय नमः
ऊँ उत्तरे यजुर्वेदाय नमः
ऊँ पश्चिमे अथर्व वेदाय नमः
ऊँ दक्षिणे साम वेदाय नमः
इस प्रकार कलश के चारों ओर चार बिन्दियां लगाते हुये चारों वेदों की स्थापना करे और संक्षिप्त पूजन करें।
कलश के पास में शंख स्थापित करे, और उसका पूजन करे, शंख के पास ही घण्टा स्थापित करें, और उसका भी पूजन करते हुये निम्न उच्चारण करे-
आगमर्थं तु देवानां गमनार्थं तु राक्षसाम्।
घण्टानादं प्रकुर्वीत पश्चाद् घण्टा प्रपूजयेत।।
फिर कलश के आगे बारह चावल ढेरियां बनावे और उस पर एक-एक सुपारी रख कर निम्न देवताओं की स्थापना करें।
1- ऊँ कालाग्नि रूद्राय नमः
2- ऊँ कूमोयै नमः
3- ऊँ पृथिव्यै नमः
4- ऊँ धर्माय नमः
5- ऊँ ज्ञानाय नमः
6- ऊँ वैराग्याय नमः
7- ऊँ ऐश्वर्याय नमः
8- ऊँ राग्याय नमः
9- ऊँ अनन्ताय नमः
10- ऊँ सर्वतत्वात्मकाय नमः
11- ऊँ आनन्दमयकन्दाय नमः
12- ऊँ प्रकृतिमय पंत्रभ्यो नमः
खड़ाऊ- विनियोग
ऊँ अस्य श्री पादुका मन्त्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिः गायत्रीछन्दः श्री गुरू देवता प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
इसके बाद खड़ाऊ में गुरू प्राण प्रतिष्ठा करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
पादुका गुरू मंत्र
ऊँ ऐं हृीं श्रीं ऐं क्लीं सौः हंसः शिवः सहं हंसः स्वरूप निरूपणहेतवे श्री गुरूवे नमः
इसके बाद साधक न्यास करें-
न्यास –
ऊँ हां अंगुष्ठाभ्यां नमः
ऊँ हीं तर्जनीभ्यां नमः
ऊँ हूं मध्यमाभ्यां नमः
ऊँ हें अनामिकाभ्यां नमः
ऊँ हौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ऊँ ह: करतलकर पृष्ठाभ्यां नम
इसी प्रकार हृदयादि न्यास करें-
ऊँ हां हृदयाय नमः
ऊँ हृीं सिरसे स्वाहा
ऊँ हूं कवचाय हुं
ऊँ हैं नेत्रत्रयाय वौषट
ऊँ हौं शिखायै वषट
ऊँ ह: अस्त्राय फट्
उपरोक्त न्यास करते हुये संबंधित अंगो का स्पर्श करे फिर गुरू ध्यान करें।
महा-रोगे महोत्पाते महा-देवी महा-मये।
महा पदि महा-पापे स्मृता रक्षति पादुका।।
तेनाधीनं स्मृतंज्ञानं दुष्टं पत्तं च पूजितं।
जिह्वायां वर्तते यस्य श्री परा-पादुका-स्मृतिः।।
भोग भोगार्थिना ब्रह्म-विष्णवी-पद कांक्षिणाम।
भक्ति रेव गुरौ देवि ’‘नान्यः पंथा’’ इति श्रुतिः।।
इसके बाद एक अन्य पात्र में परम गुरू की स्थापना करें, स्थापना में पात्र में चावलों की ढ़ेरी बनाकर उस पर सुपारी रख कर उन्हें परम गुरू मान कर उपरोक्त प्रकार से ही न्यास करे फिर परम गुरू का ध्यान निम्न प्रकार से करें।
परम गुरू ध्यान-
गुरू भक्ति-विहीनस्य तपो विद्या कुल व्रतम्।
सर्व नश्यन्ति तत्रैव भूषण लोक रंजनम्।।
गुरू भवत्यग्निना सम्यग् दग्ध्या सर्व-गतिदंसः
श्वपचो पि परैः पूज्यो न विद्वानपि नास्तिकः।।
परमेष्ठि गुरू ध्यान-
परम गुरू के पास ही चावल की ढ़ेरी बना कर उस पर सुपारी रख कर परमेष्ठि गुरू की स्थापना करें, और संक्षिप्त पूजन कर उपरोक्त प्रकार से ही न्यास करें, और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें-
गुरूः र्पिता गुरूर्माता गुरूर्देवो गुरूर्गति।
शिवे रूष्टो गुरूस्त्राता गुरौ रूष्टे न कश्चन।।
पादुका लय पूजन
इसके बाद साधक पादुका लय पूजन करें, जो सामने दोनों पादुकायें स्थापित की है, दोनों पादुकाओं पर कुंकुम से त्रिकोण बनाये, और द्वादस कलाओं में से छः कलाओं की स्थापना वाम पादुका में तथा छः कलाओं की स्थापना दाहिनी पादुका में स्थापित करें-
वाम पादुका कला स्थापन
1- ऊँ तपिन्ये नमः
2- ऊँ तापिन्यै नमः
3- ऊँ ज्वालिन्यै नमः
4- ऊँ रुच्यै तमः
5- ऊँ सूक्ष्मायै नमः
6- ऊँ भोगिन्यै नमः
दाहिनी पादुका कला स्थापन
इसके बाद दक्षिण पादुका पर निम्न छः कलाओं की स्थापना करें-
1- ऊँ विश्वायै नमः
2- ऊँ धूम्रायै नमः
3- ऊँ मरीच्यै नमः
4- ऊँ बोधिन्यै नमः
5- ऊँ धारिण्यै नमः
6- ऊँ क्षमायै नमः
उपरोक्त सूर्य की द्वादस कलाएं कही जाती है, और इन कलाओं की स्थापना से दोनों पादुकाओं में पूर्ण सूर्य मण्डल स्थापित हो जाता है, इसके बाद दोनों पादुकाओं पर कलश में से जल (अमृत) छिड़कते हुये निम्न सोलह चन्द्र कलाओं की स्थापना करें, जिससे कि इन पादुकाओं में चन्द्र कलाओं के साथ-साथ अमृत तत्व का प्रादुर्भाव हो सके।
1- ऊँ अमृतायै नमः
2- ऊँ मानदायै नमः
3- ऊँ पूषायै नमः
4- ऊँ तुष्टयै नमः
5- ऊँ पुष्टयै नमः
6- ऊँ रत्यै नमः
7- ऊँ धृत्यै नमः
8- ऊँ शशिन्यै नमः
9- ऊँ चण्डिकायै नमः
10- ऊँ काल्यै नमः
11- ऊँ ज्योत्स्नायै नमः
12- ऊँ श्रियै नमः
13- ऊँ प्रीत्यै नमः
14- ऊँ अंगदायै नमः
15- ऊँ पूर्णायै नमः
16- ऊँ पूर्णामृतायै नमः
इस प्रकार करने के बाद बांये हाथ में केसर से चावल रंग कर दाहिने हाथ से थोड़े-थोड़े चावल दोनों पादुकाओं पर डालते निम्न उच्चारण करें-
1- मध्ये श्री कृष्ण आवाहयामि स्थापयामि
2- दक्षिणे वासुदेवं आवाहयामि स्थापयामि
3- पश्चिमे अनिरूद्धाय नमः स्थापयामि
4- पूर्वे वैशंपायनाय नमः स्थापयामि
5- उत्तरे जैमिन्यै नमः स्थापयामि
इसके बाद जिस पात्र में खड़ाऊ हो वह पात्र अपने सिर पर रख कर दोनों हाथों में ले कर साधक निम्न प्रकार से उच्चारण करें-
1- ऊँ श्री शंकराचार्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि
2- ऊँ विश्वरूपाचार्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि
3- ऊँ पद्यपादाचार्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि
4- ऊँ हस्तामलकाचार्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि
5- ऊँ त्रोटकाचार्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि
6- ऊँ दत्तात्रेयाय नमः आवाहयामि स्थापयामि
7- ऊँ जीवन मुक्ताय नमः आवाहयामि स्थापयामि
8- ऊँ नारदं वामदेवं कपिलं आवाहयामि स्थापयामि
इसके बाद हाथों में पुष्प ले कर खड़ाऊ को सामने रख कर खड़ाऊ पर पुष्प समर्पित करते हुये निम्न उच्चारण करें-
1- ऊँ गुरवे नमः गुरू आवाहयामि स्थापयामि
2- ऊँ परम गुरवे नमः परम गुरू आवाहयामि स्थापयामि
3- ऊँ परात्पर गुरवे नमः परात्पर गुरू आवाहयामि स्थापयामि
4- ऊँ पारमेष्ठि गुरवे नमः परमेष्ठिगुरू आवाहयामि स्थापयामि
5- ऊँ परम गुरवे नमः परम गुरूं आवाहयामि स्थापयामि
इसके बाद दोनों हाथ में पुष्प लेकर साथ में अक्षत, कुंकुंम, पुष्प माला लेकर पादुका के ऊपर समर्पित करते हुये उच्चारण करें-
1- ऊँ सर्वशास्त्रार्थतत्क्षं निखिलेश्वरानन्दाय आवाहयामि स्थापयामि
2- ऊँ परमानन्दरूपेण स्वामी सच्चिदानन्द आवाहयामि स्थापयामि
3- ऊँ ब्रह्मण्य रूपेण वेद व्यासाय आवाहयामि स्थापयामि
4- ऊँ पूर्णत्व प्रदाय चतुर्मुख ब्रह्मा आवाहयामि स्थापयामि
सूक्ष्म गुरूतत्व मंत्र
सर्वथा गुप्त और दुर्लभ द्वादशार्ण सरसी रूह के रूप में जो गुरू मंत्र के बारह वर्ण है, वे निम्न है जो कि ब्रह्माण्ड के गुरूओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, साधक को स्फटिक माला से चार माला निम्न ब्रह्माण्ड गुरू मंत्र की जपनी चाहिये।
।। स ह फ्रे ह स क्ष म ल व र यू म् ।।
इसमें प्रथम द्वादश वर्ण है अंतिम म् ‘‘वाग्भव’’ बीज है, इस प्रकार यह द्वादश वर्ण युक्त मंत्र तुरन्त कुण्डलिनी जागरण में पूर्ण रूप से सहायक है। यदि साधक पादुका पूजन कर उपरोक्त ब्रह्माण्ड गुरू मंत्र का जप करता है, तो निश्चय ही उसकी कुण्डलिनी और सहस्त्रार जाग्रत होता है, यह प्रामाणिक वचन है।
इसके बाद ‘गुरू पादुका पंचक’ का मधुरता के साथ पाठ करें।
श्री गुरू पादुका पचंकम्
ऊँ नमो गुरूभ्यो गुरूपादुकाभ्यो नमः परेभ्यः परपादुकाभ्यः।
आचार्यसिद्धेश्वरादुकाभ्यो नमो नमः श्री गुरूपादुकाभ्यः ।।
ऐंकारहृींकाररहस्ययुक्त- श्रींकारगूढ़ार्थमहाविभूत्या।
ओमकारमर्मप्रतिपादिनीभ्यां नमो नमः श्री गुरू पादुकाभ्याम् ।।
होत्राग्निहोत्राग्निहविष्ययहोतृ- होमादिसर्वाकृतिभासमानम्।
यद् ब्रह्म तद् बोधवितारिणीभ्यां नमो नमः श्री गुरू पादुकाभ्याम्।।
कामादिसर्पव्रजगारूडाभ्यां विवेकवैराग्यनिधिप्रदाभ्यां।
बोधप्रदाभ्यां द्रुतमोक्षदाभ्यां नमो नमः श्री गुरूपादुकाभ्याम्।।
अनंतसंसारसमुद्रतार- नौकायिताभ्यां स्थिरभक्तिदाभ्यां।
नमो नमः श्री गुरू पादुकाभ्याम् ।।
इसके बाद साधक पांच बत्तियों और कपूर से आरती सजा कर गुरू आरती करें और परिवार के सदस्यों को प्रसाद वितरित करें।
यह पादुका पूजन प्रयोग मात्र पूजन प्रयोग ही नहीं है अपितु भारतीय तांत्रिक ग्रंथों का अनमोल रत्न है, जो मैंने पत्रिका पाठकों के लिये प्रस्तुत किया है। केवल पादुका पूजन से ही पूरा शरीर झंकृत हो जाता है, रोम-रोम में देवताओं का निवास और ब्रह्माण्ड के समस्त गुरूओं की स्थापना हो जाती है, और साधक की कुण्डलिनी पूर्ण रूप से चैतन्य तथा जागृत हो जाती है जिससे वह समस्त ब्रह्माण्ड को अपने आप में समेटे हुये, पूर्ण ब्रह्मानंद का आस्वादन करने में समर्थ सफल हो पाता है।
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