



जब आलस्य टूट कर प्रकृति नया अध्याय प्रारम्भ करती है
आप भी वंसत का आनन्द ले रति-अनंग और सरस्वती के ज्ञान से


काल का चक्र अपनी नियत गति से सतत् गतिशील रहता है और प्रदर्शित करता रहता है ऋतुओं के माध्यम से अपनी कलाएं। कभी सूख कर दरकने-दरकने को हो जाती धरती, तो कभी उसे रिमझिम फुहारों से भिगो कर मनाने की चेष्टा करते काल देवता स्वयं, कभी शरद की कुनकुनी धूप तो कभी घने कुहरे में किसी उदास मन सी उलझी-उलझी यह धरती! मानों जो कुछ मानव के मन में चल रहा है वहीं प्रकृति में भी प्रतिबिम्बित हो रहा है, ऐसा कहना आनायास नहीं है। अनायास हो तो क्यों पुरूष व प्रकृति के तादात्म्य की धारणा बनती? मानव जीवन की ही तरह प्रकृति के भी उतार-चढ़ावों के साथ काल पता नहीं किस अव्यक्त लक्ष्य के प्रति सतत् गतिशील बना रहता है।
इन्हीं सब के मध्य में एक ऐसा भी अवसर आ जाता है जब केवल प्रकृति ही नहीं मनुष्य खुद भी अपने उनीदेपन को छोड़ कुछ अचम्भित हो अपने नेत्रों को विस्फारित करते हुये देखने लग जाता है, कि अचानक यह चारों ओर क्या घटित हो गया है? या यों कहे कि वह बस अपने दो नेत्रों से ही नहीं, रोम-रोम से कुछ का कुछ और ‘देखने’ लग जाता है। लेकिन वह ‘देखना’ भर भी कहां होता है? वह तो ‘सुनना’ भी होता है रोम-रोम को कान बनाकर! उन मादक स्वर लहरियों में, बिखरे गीतों को सुनना, जिन्हें स्वयं प्रकृति ने ही रचा होता है और स्वयं ही गाया भी होता है……..
……….ये गीत होते है प्रेम के, यौवन के, यौवन की मस्तियों के, खिलने के, बिखरने के और बस बिखरने के ही नहीं छितरा जाने के भी, ज्यों हरे भरे खेतों में सरसों के फूल अपनी पीली आभा के साथ मीलों-मील तक छितरा जाते है …….क्योंकि यह वसंत के पर्व का अवसर होता है, प्रकृति के कुछ विशेष घटित होने के क्षण होते है….. सचमुच! कुछ विशेष घटित होने लग जाती है,
वसंत, माघ के शुक्ल पक्ष की पंचमी का एक दिवस अथवा उस दिवस की कुछ घड़ियां ही नहीं परिवर्तन के क्षण होते है। परिवर्तन यदि होना होता है तो क्षणों में ही संभव हो जाता है।
इसी से आवश्यक है कि साधक एक और जहां जीवन के बाह्य पक्षों का श्रृंगार करे, वही उससे भी अधिक तल्लीनता से अंतरपक्ष का भी श्रृंगार करे।। वसंत इन दोनों ही बातों को एक साथ, एक ही घड़ी में सम्पन्न करने का अवसर प्रदान करता है और तभी तो जहां एक और यह अनंग साधना पर्व होता है वही सरस्वती साधना का भी। दोनों साधनाओं में बस बाह्य भेद है, अन्तः सम्बन्ध तो प्रखरता से विद्यमान है ही। वसंत पंचमी पर एक सम्पूर्ण साधना क्रम जो मूलतः दो प्रयोगों अनंग प्रयोग व सरस्वती प्रयोग के समाहितीकरण पर आधारित है।
वसंत पंचमी (23.01.2026) के दिन प्रातः शीघ्र उठे और दैनिक पूजन क्रम को संक्षिप्त रूप में सम्पन्न कर इस दिवस विशेष के मूल प्रयोग को मन में पूर्ण उत्साह, उमंग और प्रकृति के समान नूतन होने की भावना के साथ साधना में संलग्न हो। यदि पुरूष साधक है तो वह पीली धोती पहने और साधिका पीली साड़ी पहन, अपने बालों को खुला छोड़ दे।
जैसा कि प्रारम्भ में वर्णित किया गया है, वसंत की मूल भावना सरस्वती व अनंग दोनों की साधनाओं को एक विशिष्ट क्रम में तादात्म्य के साथ सम्पन्न करने पर ही प्राप्त हो सकती है जिससे केवल साधक बाह्य रूप से उल्लासमय, यौवनवान और चिरनूतन बना रह सके वरन उसके हृदय में भी आनन्द की मधुर स्वर लहरी सदैव तंरगित बनी रह सके। यद्यपि यह तो साधक की अपनी मान्यता और इच्छा है, कि वह सरस्वती अनंग प्रयोग को सम्पन्न करता है अथवा केवल सरस्वती प्रयोग या अनंग प्रयोग के लघु रूप को सम्पन्न करता है, किन्तु जहां तक इस प्रयोग की विशिष्टता इस बात पर है कि वह केवल वसंत पंचमी के अवसर पर ही सम्पन्न कर ही प्राप्त की जा सकती है।
इस प्रयोग को सम्पन्न करने के इच्छुक साधक-साधिका के लिये आवश्यक है, कि उसके पास ‘सरस्वती अनंग यंत्र’ व सरस्वती अनंग माला’ हो। इसके अतिरिक्त इस साधना में किसी अन्य सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती। पूर्वाभिमुख हो, पीले ही आसन पर बैठ कर साधक सरस्वती देवी के चित्र का, माला का संक्षिप्त पूजन कर यथाविहित माला से निम्न मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
ऊँ ऐं वीणावादिनी प्रमोदिनी कं सिद्धि यौवनदायिनी नमः।।
उपरोक्त मंत्र साधक को कुछ बड़ा प्रतीत हो सकता है अतः वह बीच में आधा घंटे का विश्राम ले कर, इसे ग्यारह-ग्यारह माला मंत्र जप के दो चरणों में भी विभाजित कर सम्पन्न कर सकता है। किन्तु ध्यान रहे इस विश्राम काल में सर्वथा मौन धारण कर अपने आसन पर ही लेटकर अथवा बैठकर विश्राम करे। न तो इस काल में व्यर्थ की बातचीत करे, न किसी भोज्य पदार्थ का प्रयोग करें।
प्रयोग इस विशिष्ट साधना को सम्पन्न कर ही यह समझने में सक्षम हो सकता है, कि किस प्रकार आनन्द के उछाह में भी गरिमा की समायुक्त हो सकती है।
साधना के उपरांत यथासंभव उसी दिन सायंकाल तक समस्त साधना सामग्रियों को विसर्जित कर दें तथा शेष दिवस ही नहीं शेष जीवन में वसंत को चिरस्थायी ही बना ले।
वास्तव में ही यह वसंत पंचमी पर्व हमारे जीवन का सौभाग्य है, और हमें चाहिये कि इन अद्वितीय साधनाओं को सम्पन्न कर अपने जीवन में पूर्णता, साधना में सिद्धि और सभी दृष्टियों से सफलता प्राप्त करें।
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