





इस संसार में कर्म फल देने के लियें ही सृष्टि होती है। व्यक्ति अपने जीवन में नाना प्रकार के सुख और दुःख भोगता हुआ अन्ततः पूर्ण सृष्टि में विलीन हो जाता है। इसलिये भगवान शिव को प्रलय का देव कहा गया है जो व्यक्ति के जीवन में सब दुःखों को हर लेते हैं, इसीलिये वे हर हैं और प्रार्थना में भी कहा जाता है- हर हर महादेव अर्थात जो हरण करने वाले हैं, वे ही तो महादेव हैं।
भगवान शंकर तेजोमय, समस्त श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करने वाले समस्त द्रव्यों के स्वामी एवं विद्या आदि के कारण हैं, अज्ञेय और अगम्य है, तभी सभी के लिये सर्वत्र कल्याणकारक हैं, भगवान सदाशिव भोलेनाथ भी हैं, रसेश्वर भी हैं, नटराज भी हैं, शक्ति से सदैव युक्त हैं। सृष्टि की उत्पति से संहार तक केवल शिव ही शिव हैं।
सांसारिक जीवन की सुवृद्धि हेतु महाशिवरात्रि के शुभ मुहूर्त में सद्गुरूदेव जी रूद्राभिषेक युक्त पूजा-साधना सम्पन्न कर पाशुपतास्त्रेय चैतन्य दीक्षा प्रदान करेंगे। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिये पाशुपतास्त्रेय शक्ति श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
दीक्षा के प्रभाव से साधक को ग्रह संयोगों एवं स्वयं के कर्म दोष भगवान पशुपति की कृपा से समाप्त हो जाते है और अगले वर्ष भर के लिये कर्म दोषों व ग्रह नक्षत्रों का विपरीत प्रभाव लगभग नगण्य हो जाते है, जिससे किसी भी साधना में सफलता असंधिग्ध हो जाती है। जीवन में असफलता, अपमान या पराजय नहीं देखनी पड़ती। भगवान पशुपति भाग्य के अधिपति देवता हैं। जिनका भाग्योदय नहीं हो रहा हो या जिनका भाग्य कमजोर हो अथवा कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो रहे हों, तो उसका निवारण करते हैं, साथ ही साधक का परलोक सुधर जाता है।
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