





जीवन में कोई भी व्यक्ति, चाहे कितना भी सक्षम या शक्तिशाली क्यों न हो, वह समस्याओं से अछूता नहीं रह सकता। प्रत्येक सांसारिक गृहस्थ मनुष्य अपने जीवन में पैसों की समस्या, शादी की समस्या, स्वास्थ्य की समस्या, सामाजिक रिश्तों की समस्याओं से परेशान है। इसके अलावा कितने ही लोग ऐसे हैं जो आत्मविश्वास की कमी के कारण आत्महत्या कर लेते हैं, ऐसी न जाने कितनी ही अनगिनत समस्याएं हैं, जिनसे लोग पीड़ित हैं।
कुछ समस्याएं ऐसी भी होती हैं जो हमें खुली आंखों से दिखाई नहीं देती, परंतु जब इंसान इसका शिकार होता है तो जीवन में ऐसी समस्याएं उभर कर आती हैं, जिनका समाधान वो स्वयं नहीं खोज पाता और जीवन से निराश होने लगता है। व्यक्ति के जीवन में अचानक बीमारियाँ, मानसिक तनाव, व्यापार में भारी नुकसान, विवाह में बाधा और पारिवारिक कलह जैसी समस्याएं आ जाती हैं। यह नकारात्मक तांत्रिक क्रियाओं का प्रभाव होता है, जिससे बनते काम भी बिगड़ जाते हैं और जीवन में हर काम में अड़चनें आती हैं। जिसके फलस्वरुप कभी-कभी इंसान जीवन में उन्नति के लिये शॉर्टकट अपना लेता है, परंतु वह शॉर्टकट कभी-कभी लॉन्ग कट में बदल जाता है।
सीधे शब्दों में कहें तो हमनें अपनी तुच्छ सृष्टि को आध्यात्म की सृष्टि से भी महान मान लिया है। यही सारे कष्टों की बुनियादी जड़ है। हमने जीवित रहने का अर्थ ही खो दिया है। हमारे दिमाग में आया कोई विचार-भाव हमारे अनुभव को तय करने लगता है। हमारा जीवन अच्छी तरह चल रहा होता है, पर कोई एक भाव-विचार सब कुछ नष्ट कर देता है। जबकि हो सकता है आपकी भावनाओं और विचारों का आपके जीवन की सीमित वास्तविकता से भी कोई लेना-देना न हो।
आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य मनुष्य के सर्वोत्तम विकास पथ को आलोकित करना होता है, जिसमें परम् आनंद, संतोष, सुख-शांति की कामना शामिल है अध्यात्म की यात्रा मानसिक शांति और सद्भावना का विकास करती है। गायत्री कोई स्वतंत्र देवी-देवता नहीं है, यह तो परब्रह्म परमात्मा का क्रियात्मक भाग है। गायत्री माता समस्त धर्मावलम्बी मानवों का कल्याण करने वाली, सर्वविध दुःख तरंगों को हरने वाली, समस्त प्रकार के वरदानों को देने वाली, भक्तजनों की पीड़ा का विनाश करने वाली हैं, अतः गायत्री परब्रह्म की सात्विक शक्ति स्वरूप है।
भगवती गायत्री की साधना-दीक्षा ग्रहण करने से मनुष्य के शरीर का स्वास्थ्य, चेहरे का तेज और वाणी का ओज बढ़ता है। बुद्धि में तीक्ष्णता और सूक्ष्मदर्शिता की मात्रा में वृद्धि होती है एवं अनेक मानसिक सद्गुणों का विकास होता है, यह लाभ ऐसे हैं जिसके द्वारा जीवन यापन में सहायता मिलती है तथा मनुष्य में आत्मशक्ति की वृद्धि होती है।
शास्त्रों में भी भगवती गायत्री की सम्पूर्णता को व्यक्त करते हुए कहा गया है-
गायत्र्येव परो विष्णु र्गायत्र्येव परः शिवः।
गायत्र्येव परो ब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः।।
“गायत्री ही परमात्मा विष्णु हैं, गायत्री ही परमात्मा शिव हैं और गायत्री ही परमात्मा ब्रह्मा हैं। अतः गायत्री से ही वेदों की उत्पत्ति हुयी है।”
साधक को उक्त दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करनी चाहिए जिससे उसके जीवन में उपरोक्त वर्णित समस्त दोष, बाधायें, कष्ट-पीड़ा सब समाप्त हो सकें। साधक का मन आत्मज्ञान से सम्पन्न बने, उसे संकल्प शक्ति प्राप्त हो, वह अपने कर्तव्यों का पालन श्रद्धा और भक्ति भावना से करता रहे, मन शांत और एकानित रहे, ऐसी विवेक शक्ति मिले जिससे वो सत्य का साक्षात्कार प्राप्त कर सके। साधक की इन्द्रियाँ स्वस्थ एवं शक्ति शाली बन सकेंगी। जिससे उनके जीवन में यज्ञ भावना व्याप्त होगा तथा वे सामवेद के संगीत से परिपूर्ण बनें रह सकेगें।
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