





जब साधक के भीतर अहं-भाव का उदय न हो तब ज्ञान की परम अवधि समझा जाना चाहिये।
उपनिषद के ऋषि! यह नहीं कहते कि परमात्मा का दर्शन हो जाये तो ज्ञान की अवधि समझना। परमात्मा तक के दर्शन की बात को उन्होंने ज्ञान की अवधि नहीं कहा, कि आपके बिलकुल सब चक्र खुल जाएं और कुंडलिनी जाग्रत हो जाये और सहस्त्र दल कमल खिल जाये तो ज्ञान की परम अवधि समझना। आप सातों स्वर्ग चढ़ जाएं-और सहस्त्र दल कमल खिल जाये तो ज्ञान की परम अवधि समझना। आप सातों स्वर्ग चढ़ जायें-और न मालूम कितने हिसाब जारी है-कि सारे चौदह खंडों की यात्रा पूरी हो जाये और सच-खंड में प्रवेश हो जाये, तो भी उपनिषद् कहते हैं कि इस सबसे कोई मतलब नहीं है। कसौटी की बात एक है कि अहं-भाव का उदय न हो।
कुंडलिनी से भी अहं भाव का उदय होता है। साधक को लगता है कि हमारी कुंडलिनी जाग्रत हो गई! अब हम कोई साधारण आदमी नहीं! किसी को लगता है कि हमारा आज्ञाचक्र जग गया, ज्योति के दर्शन होने लगे, हम कोई साधारण आदमी नहीं! किसी को लगता है कि हृदय में नीलमणि प्रकट हो गई, नीली ज्योति दिखाई पड़ने लगी, अब हम मुक्त हो गये, अब हमारे लिये कोई संसार नहीं!
ध्यान रहे, जिस चीज से भी मैं निर्मित होता है वह अज्ञान का ही हिस्सा है, चाहे नाम आप कुछ भी देते चले जायें, उपनिषद् कहते हैं, अहं-भाव जब तक पैदा हो-कारण कोई भी हो- जब तक ऐसा लगे कि मैं कुछ हो गया, तब तक जानना कि अभी ज्ञान पका नहीं, अभी ज्ञान में फूल नहीं खिले, अभी ज्ञान का विस्फोट नहीं हुआ। एक ही सूत्र दिया है कि अहं-भाव पैदा न हो।
तो यह भी हो सकता है कि दुकान पर बैठा हुआ आदमी-न जिसकी कुंडलिनी जगी हो, और न जिसने नील-ज्योति देखी हो, और न सच-खंडों की यात्रा की हो-कुछ भी न किया हो, सीधा दुकान पर बैठ कर अपना काम कर रहा हो, लेकिन अहं-भाव न जगता हो, तो वह भी ज्ञान की परम अवधि को पहुंच गया और बड़ा योगी हो, और हिमालय के ऊंचे शिखर पर खड़ा हो, और जितना हिमालय का ऊंचा शिखर हो, उतना ही भीतर अंहकार का भी शिखर हो, और सोचता हो कि मैं पहुंच गया और कोई नहीं पहुंचा,सोचता हो मैंने पा लिया और किसी ने नहीं पाया-तो समझना कि अभी ज्ञान की घटना नहीं घटी है। एक ही कसौटी है कि ऐसी घड़ी आ जाये भीतर, कि कोई भी चीज अहं-भाव का निर्मित न करती हो। कुछ भी होता रहे-खुद परमात्मा सामने आकर खड़ा हो जाये- तो भी यह भाव पैदा न हो कि अहोभाव मेरे, पा लिया परमात्मा को भी! यह परमात्मा सामने खड़े है, दर्शन हो रहा है।
जब साधक के भीतर मैं की वृत्ति निर्मित न हो तो ज्ञान की परम अवधि समझना चाहिये।
इसको भी भीतर खोजते रहना, नहीं तो हर चीज से अकड़ आनी शुरू हो जाती है-हर चीज से! मन बड़ा कुशल है, और हर चीज में से अहं-भाव को निकाल लेता है, इतना कुशल है कि विनम्रता तक मैं से अहं-भाव को निकाल लेता है! कि एक आदमी कहने लगता है कि मुझसे ज्यादा विनम्र और कोई भी नहीं! मुझसे ज्यादा विनम्र और कोई भी नहीं! मगर वह मुझसे ज्यादा कोई भी नहीं। वह कुछ भी हो-चाहे धन हो, चाहे यश हो, चाहे पद हो, चाहे ज्ञान हो, चाहे मुक्ति हो, चाहे विनम्रता हो-मुझसे ज्यादा कोई भी नहीं। वह जो मैं है, निर्मित होता चला जाता है।
तो भीतर जांचते रहना, खोजते रहना, नहीं तो आध्यात्मिक तलाश भी सांसारिक तलाश हो जाती है। आध्यात्मिक और सांसारिक खोज में वस्तुओं का भेद नहीं, आध्यात्मिक और सांसारिक खोज में अहंकार का भेद है। एक आदमी संसार में धन के ढेर लगा लेता है तो अहंकार मजबूत होता है। एक दूसरा आदमी सारे धन का त्याग कर देता है और त्याग से अहंकार को मजबूत कर लेता है। दोनों की यात्रा सांसारिक है। आध्यात्मिक यात्रा तो शुरू होती है अहंकार के विसर्जन से। एक ही त्याग है करने जैसा, और वह मैं का त्याग है। बाकी सब त्याग फिजूल हैं,क्योंकि उन त्याग से भी मैं भर लेता है।
अहंकार में वृद्धि का क्या कारण हो सकता है-उन्हें लगता है कि विशेष कर रहे हैं जो दूसरे नहीं कर रहे हैं। बस जहां विशेष का खयाल आया, अहंकार निर्मित होना शुरू हो जाता है, फिर वह कोई भी विशेष हो। किसी भी कारण से आप विशिष्टता पैदा कर लें अपने लिये, तो अहंकार निर्मित होता है।
तो साधक का क्या अर्थ हुआ? साधक का अर्थ हुआ कि अपने भीतर से विशेषता पैदा करना बंद करता जाये, धीरे-धीरे ऐसा हो जाये कि नोबडी, कोई भी नहीं वह। धीरे-धीरे इतना सामान्य हो जाये भीतर, कि यह भाव ही पैदा न हो कि मैं भी कुछ हूं, ना-कुछ हो जाये। जिस दिन साधक ना-कुछ हो जाता है, उसी दिन से ज्ञान की परम अवधि आ जाती है।
ज्ञान के संग्रह से नहीं, अहंकार के विसर्जन से।
जानकारी के संग्रह से नहीं, मैं की मृत्यु से।
‘इसी प्रकार लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हो, वह उपरति की अवधि है। ऐसा स्थितप्रज्ञ यति सदा आनंद को पाता है।’
‘लय को प्राप्ति हुई वृत्तिया फिर से उत्पन्न हो, वह उपरति की अवधि है। ऐसा स्थितप्रज्ञ यदि सदा आनंद को पाता है।’
‘लय को प्राप्त हुई वृत्तियां फिर से उत्पन्न न हो।’
बहुत बार वृत्तिंया लय हो जाती है, बहुत बार। लेकिन वह लय होना, वापस-वापस लौट आता है। एक दिन लगता है कि मन बिलकुल शांत हो गया, दूसरे दिन फिर अशांत हो जाता है। एक दिन लगता है बड़ा आनन्द है, दूसरे दिन फिर दुःख में घिर जाते हैं।
मन के कुछ नियम है, वे समझने चाहिये। एक नियम तो मन का यह है कि वह सतत एक जैसा कभी नहीं रहता, परिवर्तन उसका स्वभाव है। तो जो शांति मिले और खो जाये, समझना कि वह आध्यात्मिक शांति नहीं, मन की ही शांति थी-एक बात। जो आनंद मिले और खो जाए, समझना कि वह आध्यात्मिक आनंद न था, मन का ही आनंद था। जो भी बने और बिखर जाये, वह मन का है। जो आये और चला जाये, वह मन का है। जो आये और फिर कभी न जाये, जो आए तो बस आ जाए, और जाने का कोई उपाय न रहे, आप चेष्टा भी करें और उसे हटा न पायें।
इसलिये सदैव खयाल रखेंः मन में शांति आ जाये, तो आप लाख चेष्टा करें कि बनी रहे, बनी नहीं रहेगी, बदलेगी ही, और आत्मिक शांति आ जाये, तो आप लाख चेष्टा करें उसे नष्ट करने का, तो भी आप नष्ट नहीं कर सकते, वह बनी ही रहेगी। मन में प्रयास से भी सातत्य नहीं रह सकता, और आत्मा में प्रयास से भी सातत्य तोड़ा नहीं जा सकता।
अतः जो वृत्तियां उठनी बंद हो जायें, जल्दी मत करना, यह मत सोच लेना कि पहुंच गये। प्रतीक्षा करना कि वे दुबारा तो नहीं उठती हैं। अगर दुबारा उठती हैं तो समझना कि क्रम अभी मन के तल पर ही चल रहा है। और मन की शांति का क्या मूल्य है? वह तो आयेगी और चली जायेगी और फिर अशांति आ जायेगी। मन में तो प्रतिपल विपरीत की तरफ गति होती रहती है। जब आप अशांत होते हैं तो मन शांति की तरफ गति करता है, और जब शांत होते हैं तो अशांति की तरफ गति करता है। मन द्वंद्व है। इसलिये विपरीत हमेशा मौजूद रहेगा और गति करता रहेगा।
कैसे अनुभव करेंगे कि जो हो रहा है वह मन का है?
अगर मन शांत हो, तो एक बुनियादी खयाल रखना, जब मन शांत हो-जब मन ही शांत हो और भीतर के तल पर शांति न पहुंची हो-तो शांत होते ही एक वासना पैदा हो जायेगी कि यह शांति बनी रहे, मिट न जाये। अगर यह वासना पैदा हो तो समझना कि यह मन का मामला है, क्योंकि मिटने का डर मन में ही होता है। शांति आ जाये और यह डर न आये कि मिट तो नहीं जायेगी, तो समझना कि यह मन का नहीं है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,