





हर स्त्री की इच्छा होती है अखण्ड सौभाग्यवती होने की, इसीलिए वह अनेक प्रकार के कठोर व्रत रखती है, व्रत के साथ ही या फिर बिना किसी कठोर व्रत को किये हुए यदि वह सम्पन्न कर ले यह साधना, तो निश्चय ही सौभाग्यवती बनेगी ही –
स्तुत: भारत ही ऐसा देश है, जहां इतने सारे त्यौहारों की व्यवस्था है और हर त्यौहार अपने आपमें भिन्न है,अद्वितीय है, अपना एक अलग अर्थ एवं प्रयोजन लिए हुए है। जहां कई त्यौहार समृद्धि, धन, वैभव आदि के लिए हैं, पुत्र-पुत्री प्राप्ति, विद्या प्राप्ति के लिए हैं, वहीं ऐसे त्यौहार भी हैं, जिनके सहयोग द्वारा पूर्ण आध्यात्मिक ऊंचाइयों को स्पर्श किया जा सकता है।
अनेक कथाएं जुड़ी हैं इन त्यौहारों से। इन त्यौहारों में ऋषियों ने स्त्रियों को भी विशेष महत्त्व दिया है, उनके लिए भी अनेक पर्व निर्धारित किये हैं, जिससे कि वे उन पर्वों के महत्त्व को समझ कर, उनका सही तरह से उपयोग कर, अभीष्ट पूर्ति कर सकें।
स्त्रियां स्वभाव से एवं प्राकृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील होती हैं और अत्यधिक लज्जाशील होने के कारण अपने मन की बात खुल कर दूसरों से व्यक्त नहीं कर पातीं। यह बड़ी ही गम्भीर स्थिति है, क्योंकि हमारे ऋषि कालीन समाज में स्त्री को हमेशा बराबर का दर्जा दिया गया और उनके विचारों, इच्छाओं को सर्वोपरि समझा गया।
परन्तु आज स्थिति ऐसी नहीं है। कई कारणों से स्त्री अपने मन की इच्छा को खुल कर प्रकट नहीं कर पाती और मन ही मन घुटती रहती है। यह एक विचारणीय स्थिति है और इस स्थिति को भांप कर ही ऐसे पर्वों की संरचना हुई, जो स्त्रियों के लिए ही विशेष रूप से हों।
ऐसे ही पर्वों में से एक है ‘सौभाग्य पंचमी’। स्त्रियों के जीवन में विशेषतः निम्न स्थितियां हो सकती हैं, जिनसे वे खुल कर बोल नहीं पातीं और मन मसोस कर रह जाती हैं –
जहां ‘अखण्ड सौभाग्य’ का शाब्दिक अर्थ यह है, कि स्त्री पति से पूर्व ही इस संसार से प्रस्थान करे, वहीं इसका तात्त्विक अर्थ है – जीवन में हर प्रकार से सम्पूर्ण अखण्ड सौभाग्य, चाहे वह इच्छित पति हो, चाहे धन-धान्य, पुत्र प्राप्ति आदि, उसे प्राप्त हो सके। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक सुख जीवन में प्राप्त हो सके और किसी भी क्षेत्र में न्यूनता न रहने पाए।
पहली स्थिति यह है, कि स्त्री किसी इच्छित वर से विवाह करना चाहती है या किसी से उसका प्रेम है, तो वह जाहिर नहीं कर पाती और उसके घर वाले उसकी सलाह लिए बगैर उसका विवाह कहीं और तय कर देना चाहते हैं, तो उस स्त्री के लिए यह बड़ी ही मानसिक तनाव की स्थिति होती है तथा कई बार तो वह आत्महत्या जैसे जघन्य कदम भी उठा लेती है।
दूसरी स्थिति यह है, कि स्त्री का पति किसी दूसरी स्त्री पर मोहित हो गया हो और उसके सास-श्वसुर उस बेचारी अबला को ही दोषी ठहराते हों; इस प्रकार वह पति की कटुता एवं सास- श्वसुर के तानों के बीच पिस कर रह जाती है।
तीसरी स्थिति यह है, कि यहां पर बहू को तब तक बहू नहीं माना जाता, जब तक वह ‘पुत्र’ को जन्म न दे और एक वंश को बढ़ाने वाले को पैदा न करे। अतः जब तक स्त्री ससुराल वालों की यह मांग पूरी नहीं कर देती, वह नित्य तनाव में ही रहती है और चुपचाप सब दुःख सहन करती है।
चौथी स्थिति यह है, कि घर में कलह रहती हो, धन-धान्य, सम्पन्नता का अभाव हो, पति शराबी-जुआरी हो और स्त्री चाह कर भी कुछ नहीं बोल सकती हो, क्योंकि यदि वह साहस कर बोलती भी है, तो प्रताड़ना एवं अपमान या मार के सिवा उसे कुछ प्राप्त नहीं होता।
पांचवीं स्थिति यह है, कि हर स्त्री चाहती है, कि वह अखण्ड सौभाग्यशालिनी हो, उसकी मृत्यु पति से पूर्व ही हो।
उपरोक्त पांच स्थितियों में से कोई न कोई स्थिति प्रत्येक स्त्री के जीवन में रहती है और वह इनसे परेशान होकर मानसिक तनाव की शिकार होती रहती है। ये समस्याएं हैं भी ऐसी, कि स्त्री चाह कर भी कुछ कर नहीं सकती, उसके हाथ में कुछ भी नहीं रहता और वह सहायता के अभाव में पूरी तरह बिखर जाती है।
इन्हीं समस्याओं के निराकरण के लिए ही है यह दिवस, जिसे ‘सुहाग पंचमी’ के नाम से जाना जाता है और इसी दिवस से सम्बन्धित है यह अद्वितीय साधना पद्धति, जिसे ‘अखण्ड सौभाग्य कल्प’ कहते हैं। वास्तव में ही यह साधना अपने आप में अद्वितीय एवं सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ, कि यह साधना फलीभूत न हुई हो।
जहां ‘अखण्ड सौभाग्य’ का शाब्दिक अर्थ यह है, कि स्त्री पति से पूर्व ही इस संसार से प्रस्थान करे, वहीं इसका तात्त्विक अर्थ है-जीवन में हर प्रकार से सम्पूर्ण अखण्ड सौभाग्य, चाहे वह इच्छित पति हो, चाहे धन-धान्य, पुत्र प्राप्ति आदि, उसे प्राप्त हो सके। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक का सुख जीवन में प्राप्त हो सके और किसी भी क्षेत्र में न्यूनता न रहने पाये।
इस साधना की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है, कि स्त्री इसके द्वारा अपने मन की सभी दबी इच्छाओं को पूरा कर सकती है, उसे दूसरों के निर्णय पर निर्भर होने की जरूरत नहीं होती, अपने मन की बात किसी पर प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपनी आकांक्षा इस साधना के द्वारा पूर्ण कर सकती है।
अखण्ड सौभाग्य कल्प साधना
प्रत्येक साधना के अपने कुछ विशेष नियम होते जिनके फलस्वरूप वह साधना शीघ्र सिद्ध होती है। इस साधना के भी नियम निम्न हैं
अखण्ड सौभाग्य यंत्र
अर्पणा
कल्प माला
साधना विधान
साधना प्रारम्भ करने से पूर्व स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पीले आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठ जायें और अपने सामने पीले वस्त्र से ढके बाजोट पर ‘अखण्ड सौभाग्य यंत्र’ को स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें।
तदुपरांत उस पर ‘अर्पणा’ अर्पित करते हुए अपनी समस्या या इच्छा विशेष का उच्चारण कर, उसके निदान के लिए प्रार्थना करें, और फिर ‘कल्प माला’ से निम्न मंत्र 51 माला मंत्र जप करें –
मंत्र
।। ह्रीं गौरि योगेश्वरि हुं फट् स्वाहा।।
।। HREEM GOURI YOGESHWARI HUM PHAT SWAHA।।
प्रयोग समाप्त होने पर अगले दिन यंत्र, माला तथा अर्पणा को नदी में प्रवाहित करें। आप स्वयं इसके प्रभाव को देख कर अपने दांतों तले ऊंगली दबा लेंगी। इसके प्रभाव से स्त्री का इच्छित विवाह होता है, पुत्र योग न हो तो भी पुत्र उत्पन्न होता है, पति दूसरी स्त्रियों, जुआ आदि छोड़ कर पूर्ण रूप से प्रेम करता है और वह जीवन पर्यन्त प्रत्येक प्रकार से धन, वैभव, ऐश्वर्य प्राप्त कर ‘अखण्ड सौभाग्यवती’ होती हुई इस संसार से विदा लेती है।
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