





भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में धन को केवल सिक्कों, नोटों और भौतिक संपत्ति का नाम नहीं दिया गया। अपितु धन का व्यापक अर्थ होता है-जीवन को धारण करने की क्षमता, अन्न, साधन, प्रतिष्ठा, यश, स्वास्थ्य, परिवार की सुरक्षा, दान की सामर्थ्य और अपने पुरुषार्थ को सार्थक करने की स्वतंत्रता। इसी अर्थ में लक्ष्मी को “श्री” कहा गया है।
दीपावली केवल बाहरी अंधकार को दूर करने का उत्सव नहीं है। अपतिु यह उस आंतरिक और सामाजिक अंधकार को दूर करने का पर्व भी है, जो अभाव, असुरक्षा, दरिद्रता, निराशा और असहायता से उत्पन्न होता है। लक्ष्मी का तात्पर्य यही है कि हमारा जीवन समृद्धि, सौन्दर्य, कान्ति, यश, पोषण, ऐश्वर्य, सत्य, मंगल समाहित कर प्रकाशवान बने। “सौन्दर्य” चेहरे या शरीर की सुंदरता तक सीमित नहीं है, अपितु वास्तविक सौन्दर्य तब है जब साधक अथवा एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में कान्ति हो, स्वास्थ्य हो, प्रसन्नता हो, शील हो, सम्पन्नता हो और जीवन में मंगल हो।
यदि धनवान व्यक्ति के मन में भी अशांति व्याप्त है, परिवार में प्रेम और जीवन में उद्देश्य नहीं है, तो उसकी संपन्नता अधूरी है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति सीमित साधनों में भी संतोष, श्रम, सदाचार और प्रसन्नता से जीवन जीता है, उसके पास ‘श्री’ विद्यमान रहती है। लक्ष्मी की साधना का उद्देश्य केवल धन प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन को श्रीमय बनाना है।
दश महाविद्याओं में भगवती कमला, लक्ष्मी की तांत्रिक स्वरूप हैं। कमला महालक्ष्मी की आराधना-उपासना का तात्पर्य है कि जीवन में धन, संपत्ति, यश, वैभव तो आये परन्तु व्यक्ति के भीतर अहंकार न आये, वह धन का दास न बने, विनम्र, करुणावान बना रहे। लक्ष्मी के सहस्र स्वरुप होते हैं। लक्ष्मी का वास्तविक अर्थ ही समग्र जीवन में संपन्नता है। आरोग्य लक्ष्मी से स्वस्थ जीवन, धन लक्ष्मी से आर्थिक सामर्थ्य, धान्य लक्ष्मी से अन्न और पोषण, धैर्य लक्ष्मी से संकट में स्थिरता की शक्ति, विद्या लक्ष्मी से ज्ञान और विवेक, संतान लक्ष्मी से योग्य और सुसंस्कारमय संतान, विजय लक्ष्मी से जीवन में सफलता, यश लक्ष्मी से समाज में सम्मान, गृहलक्ष्मी से परिवार में प्रेम-सामंजस्य व आत्मिय प्रेम तथा आध्यात्म लक्ष्मी से मन की शांति और संतोष की प्राप्ति होती है।
धन केवल उपभोग की शक्ति नहीं देता; यदि उचित रूप से धन का अर्जन और उपयोग किया जाये तो वह सेवा और सृजन की शक्ति भी देता है। जीवन में अव्यवस्था, निराशा, कलह, असंतोष, अपवित्रता और निरंतर अभाव रूपी कुस्थितियां भी एक प्रकार से “अलक्ष्मी”काहीप्रतीकात्मकस्वरुपहै।
धन हो लेकिन अन्न न हो तो जीवन अधूरा है। अन्न हो लेकिन स्वास्थ्य न हो तो जीवन कठिन है। स्वास्थ्य हो लेकिन सम्मान न हो तो मन व्यथित होता है। सम्मान हो लेकिन शांति न हो तो वैभव भी बोझ हो जाता है। इसलिये “श्री”कीप्राप्तिसमग्रता, सम्पूर्णता की प्राप्ति है। सहस्त्र लक्ष्मी का भाव-चिन्तन यही है कि जो घर में अन्न, हृदय में संतोष, कर्म में पुरुषार्थ, वाणी में मधुरता, परिवार में प्रेम-सामंजस्य, कुल-वंश वृद्धि, शतायुमय जीवन, समाज में सम्मान और जीवन में प्रकाशमय सुस्थितियों का विस्तार कर दे।
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