





साधक के समस्याओं का समाधान व भारतीय ज्ञान की अविरल चेतना एक साथ
उपहार स्वरूप
एक वर्ष तक पत्रिका आपके घर रजिस्टर्ड पोस्ट से
आधुनिक युग में कर्म की आवश्यकता और भी अधिक प्रासंगिक है;
क्योंकि आज अवसर भी अधिक हैं और भ्रम भी अधिक हैं।
“निरन्तर कर्म करने की चाह एक ऐसी ज्वाला है, जो राह में आने वाली बाधाओं को नहीं देखती
अपितु अपने कदमों को सतत् अपने लक्ष्य तक पहुँचने हेतु बाध्य कर देती है।”
वर्तमान समय में जब हमारे पास सूचना अधिक है, साधनों की प्रचुरता है, परिणाम तुरंत उपलब्ध हैं,
परन्तु साधक की एकाग्रता, धैर्य और प्रतीक्षा करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है।
साधक संकल्प तो लेता हैं परन्तु उसे पूर्ण नहीं कर पाता, खुद को लक्ष्यहीन व भयभीत महसूस करता है।
ऐसे समय में दीक्षा ही एक मात्र ऐसा सहारा है जो साधक को उसके कर्म के पथ पर अग्रसर कर सकता है।
परन्तु यह ध्रुव सत्य है कि किसी कार्य में बिना दैवीय कृपा प्राप्त हुये सफलता प्राप्त करना कठिन है। इसके लिये यह आवश्यक है कि कर्म के साथ-साथ भाग्य का संबंध भी बने। कृष्ण सर्व गुण संपन्न, कार्य सिद्ध पुरुष थे। उनके पास यश, वैभव, सम्पन्नता, क्षमता सर्वस्व था। परन्तु उन्होंने आजीवन अपने कर्म का निर्वहन किया। वर्तमान परिदृश्य में व्यक्ति पहले परिणाम चाहता है, जबकि वास्तविकता यह है कि परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया में प्रवेश किये बिना परिणाम प्राप्ति असंभव है।
“साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता-वह पीढ़ियों की सोच गढ़ता है,
संस्कृति को जीवित रखता है और समाज को नई दिशा देता है।”
पत्रिका आपकी आद्यात्मिक विरासत है जो पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेगी इसे पढ़ना आपका कर्तव्य है अतः इस दीक्षा को ग्रहण करने पर एक वर्षिय पत्रिका सदस्यता उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी।
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