





(योवन की यह पद्धति तो सृजित की गई है उन हठीले हठ योगियों के द्वारा जिन्होंने काल की सत्ता से बंधन को दूर कर उसका अस्तित्व तक मानने से इंकार कर दिया… और यही पद्धति आपको प्राप्त हो रही है, इस बार नववर्ष के उपलक्ष पर …..)
जीवन निरंतर आगे बढ़ते रहने की एक ऐसी घटना होती है, जिसमें व्यक्ति का कोई वश ही नहीं चलता और जब उसका कोई वश नहीं, तो वह विवश ही होता है, कि उम्र के किसी मनचाहे मोड़ पर अपनी इच्छा से रुक सके। कीन है जो इस जीवन में होना चाहता है ? कोन है जो नही चाहता, कि उसकी युवावस्था हमेशा बनी ही रहे ? चाहे स्त्री हो या पुरुष, सभी के मन की यह चाहत होती ही है । यह बात और है कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ समाज उन्हें कई-कई छलावों के साथ जीने के लिए विवश कर देता है। से खारिज होकर रहने के लिए मजबूर सा कर देता है। यूं न हंसो लोग क्या कहेंगे, यूं न कपड़े पहनो अच्छा नहीं लगता, ऐसी आदतें रही तो कोन सम्मान करेगा – जैसे कई वाक्य किसी भी स्त्री या पुरुष को वृद्ध होने से पहले ही सुनने के लिए मिलने शुरु हो जाते हैं। यानि कि भले ही मन नहीं वृद्ध हुआ हो, लेकिन तन के वृद्ध होने से पहले ही मन को वृद्ध बना दिया जाता ही है और जब मन में वृद्धावस्था को लेकर कोई बात चल पड़ी, तो तन तो वृद्ध होगा ही। तन तो मन का गुलाम होता है। जो मन की गति होगी, तन उसी की आज्ञापालन में गतिविधियों का संचालन करेगा। यह कैसे हो सकता है कि किसी का मन अशक्त हो जाए और उसका तन अशक्त न हो?
– और आज की जो स्थितियां है, उनमें मन बस अशक्त ही नहीं हो रहा, बल्कि अशक्त होते-होते जर्जर हो चुका है। जीवन एक उछाह से मधुर बनता है, लेकिन जिसके मन में कोई उछाह न बचा हो, वह जीवन में कैसे रस पैदा कर सकता है ? जीवन केवल कर्त्तव्यों की गठरी को सिर पर रखकर बेबसी से ढोते रहने से “जीवन” की श्रेणी में नहीं आ जाता। जीवन तो उंमगों और खिलखिलाहटों के ताने-बाने पर बुनकर तैयार होता है और जहां ऐसा सहज सम्भव न हो रहा हो, वहां कोशिशें करके ऐसा कुछ पैदा करने की बात लाई जाती है।
हर एक इंसान अपने तरीकों से, अपने सीमित साधनों में भी, अपने जीवन में रंग घोलने की कोशिशें करता ही रहता है लेकिन एक मुकाम ऐसा भी आ जाता है, जहां सपने भी बेजान होने लग जाते हैं और तब उदासियों का जो सिलसिला कायम हो जाता है, वही इंसान को मनहूसियत के ऐसे काले दायरे में फेंक देता है, जहां से बेबसी का मानों कभी न खत्म होने वाला सिलसिला चल पड़ता है और आखिरकार इन्हीं सब में उलझते-सुलझते इंसान का मन जर्जर हो जाता है।
(जो वृद्धावस्था के विषय में सोचता है वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ चलता है, जो इसे नकार देता है वह इससे मुक्त होता है…) उसी धरती में कोई बीज अंकुर फोड़ सकता हे, जो पानी से भीगी होती है, सूखी धरती में क्या कभी किसी ने किसी पौधे को जन्म लेते देखा है ? सूखी रेतीली जमीन में तो बस कंटीले झाड़ों वाले केकटस ही उग सकते हैं और जिनका मन ना उम्मीद हो चुका होता है, उन्हीं के मन में ईर्ष्या के, डेष के, आलोचना के, वैर के कई-कई कैक्टस उग कर चुभने लग जाते हैं, दूसरों को भी और खुद उनको भी।
वृद्धावस्था वास्तव में नाउम्मीद हो गए लोगों के मन की एक कुढ़न ही तो होती है, जिसे वे व्यक्त कर, उपदेशों की शक्ल में ढाल सारे समाज को बीमार, उदास, रुग्ण और बूढ़ा बना देना चाहते हैं। बहुत से लोग अपने आस-पास ही मिल जाएंगे, जो चालीस-पचास वर्ष का होने के बाद भी हर एक दिन की शुरुआत इस तरह से करते हैं मानों आज ही उन्होंने अपने जीवन का पहला दिन प्रारम्भ किया हो …. और बह्ढत से ऐसे भी मिल जाएंगे जो पच्चीस-तीस के होते न होते भविष्य की चिंता में डूब तरह-तरह की गणित में उलझ जाते हैं और सही शब्दों में कहें, तो अपने बुढ़ापे को निमंत्रण सा देने लग जाते हैं।
जीवन में वृद्धावस्था पास फटक ही न सके इसके लिए कोई बड़ा गोपनीय सूत्र नहीं है। बस जो बुढ़ापे के बारे में सोचता है, बुढ़ापे के बारे में चिंतामग्न होता है वही बूढ़ा होने लग जाता है और जिसके सामने कोई न कोई लक्ष्य बना रहता है, जो काल की सत्ता को भी विस्मृत कर उन्हीं में डूब जाता है, तो काल भी उसके लिए ठिठक कर खड़ा हो जाता है। फिर इस बात से कोई विशेष मतलब नहीं होता कि बाल सफेद हैं या काले, बाल गिर रहे हैं या बढ़ रहे हैं!
“पूज्यपाद गुरुदेव ने एक प्रवचन में सहास्य कहा था- सिंह के चार बाल होने पर भी वह सिंह ही होता है और पूरा शरीर बालों से भरा होने पर भी गीदड़, गीदड़ ही होता है। ” शरीर तो अपनी गति से चलेगा । जो एक दिन पच्चीस वर्ष का है, वह एक दिन पैंतीस-चालीस और उससे भी आगे के वर्षों में जाएगा ही। यह तो एक सहज गति है, लेकिन जीवन-रस का मुरझा जाना सहज गति नहीं हो सकती ।
वास्तव में जब जीवन में सरसता का एक अविरल प्रवाह होता है, तभी जीवन के प्रति एक स्वस्थ और सकारात्मक दृष्टिकोण बनता है और तभी लक्ष्य निर्धारित होते हैं, तभी स्वप्न उपजते हैं और ऐसी गति का निर्माण होता है, जिस गति का पीछा वृद्धावस्था कभी कर ही नहीं सकती । ऐसी स्थिति होने पर ही जीवन में कोई बोझिलता नहीं रह पाती और न तब कर्त्तव्य किसी भारी गठरी की तरह लगते हैं।
जीवन की मूल सरसता तो सभी आवश्यकताओं, कामनाओं से युक्त आनन्द और खुमारी का ऐसा प्रवाह होती है जिसमें व्यक्ति खुद किसी और के मन में हिलोर पैदा करने में समर्थ होने लग जाता है और ऐसा ही व्यक्ति सही अर्थों में युवा होता है, भले ही उम्र के किसी भी पड़ाव पर क्यों न पहुंच चुका हो ।
जीवन की प्रत्येक हीन भावना, वृद्धावस्था के आगमन का भय, आनन्द के विखंडित हो जाने की आशंका या ऐसी ही कई स्थितियां, ये सब भी जीवन की निरीहताएं ही हैं और क्या वृद्धावस्था स्वयं में एक निरीहता नहीं होती ? जीवन की ऐसी स्थितियों से मुक्त होकर वेगवान व ओजवान बने रहने के लिए साबर तंत्र में एक अत्यन्त श्रेष्ठ साधना मिलती है, जो भगवान शिव के पाशुपति रूप पर आधारित है | साधकों की मनः स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह साधना यहां प्रस्तुत की जा रही है जो वास्तव में कायाकल्प साधना ही है और दैहिक से अधिक मानसिक कायाकल्प की साधना है, क्योंकि कायाकल्प का आधार तो मन ही होता है।
यहां यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यह प्रयोग केवल प्रौढ़ अथवा वृद्ध साधकों हेतु ही नहीं वरन् किसी भी आयु वर्ग के साधक अथवा साधिका द्वारा प्रयोग में लाए जाने योग्य है।
इस साधना को सम्पन्न करने के इच्छुक साधक अथवा साधिका के पास ताम्र पत्र पर अंकित मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुकत ‘पाशुपतेय यंत्र’ एवं ‘रुद्राक्षकी माला’ होना अनिवार्य है। 7 जनवरी 2013 स्वाति नक्षत्र से 10 मार्च शिव गौरी विवाह महोत्सव शिवरात्रि तक के बीच का जो समय है, वह इस साधना के लिए पूर्ण सिद्धिप्रद है, स्वाति नक्षत्र अपने आप में सभी नक्षत्रों में श्रेष्ठ है और सृष्टि में शिव और पार्वती को चिरयौवन माना गया है। अतः इन दोनों के मध्य का समय पूर्ण सफलता दायक समय है।
यह साधना किसी भी सोमवार को की जा सकती है। साधक को चाहिए कि वह पीले रंग की धोती पहन कर बैठे तथा साधिकाओं के लिए पीले रंग के वस्त्र निर्धारित हैं। धूप, दीप, नेवेद्य इत्यादि की इस साधना में कोई भी आवश्यकता विशेष नहीं है। यह किसी भी सोमवार से प्रारम्भ कर फिर अगले सोमवार एवं इसी प्रकार सम्पन्न करते हुए क्रमशः पांच सोमवारों तक सम्पन्न की जाने वाली साधना है, जिसमें मंत्र जप का महत्व ही सर्वोच्च है।
साधक अथवा साधिका को चाहिए, कि वह साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व किसी थाली अथवा (यदि उपलब्ध हो तो) भोजपत्र पर कुंकुम व तीली की सहायता से निम्न यंत्र का अंकन करें। अंकन करने में बहुत अधिक सुगढ़ता की आवश्यकता नहीं है, किन्तु अंकन स्पष्ट अवश्य होना चाहिए ।
उपरोक्त अंकन के मध्य भाग में “श्र बीज मंत्र का अंकन करना है। इसके पश्चात् इसी अंकन के ऊपर पाशुपतेय यंत्र का स्थापन होना चाहिए। यंत्र के स्थापन के पश्चात् भगवान शिव व माता गौरी से मन ही मन चिर यौवन की प्राप्ति व अशक्ता के विनाश की प्रार्थना करते हुए यंत्र व स्वयं के मध्य प्राणों का सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए। साधक अथवा साधिका को चाहिए, कि वह अपने दाहिने हाथ की चारों उंगलियों (अंगूठे का छोड़कर) को यंत्र के ऊपर रखें तथा बांए हाथ को हृदय पर रख कर निम्न मंत्र का उच्चारण करें –
उपरोक्त प्राण स्थापन व प्राण सम्बोधीकरण की क्रिया स्वयं में अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जिससे साधक के प्राण, यंत्र में निहित समस्त ऊर्जा से सम्पुटित होते हुए सम्बन्धित मंत्र जप के साथ एक पूरा आवर्तन बनाने लग जाते हैं और ऐसे आवर्तन का निर्मित होना ही साधना में सफलता का एक महत्वपूर्ण सोपान होता है। इसके पश्चात् सम्बन्धित मंत्र का जप करना चाहिए ।
(यह प्रयोग एक तरह से उस तत्व का कायाकल्प करने का प्रयोग है, जिस तत्व से साधक का मन निर्मित होता है। एक तरह से यह साधक के लिए एक नवजीवन का प्रारम्भ बिन्दु है।)
इस साधना में निम्न मंत्र का जप करना होता है, जो कि अपनी सरंचना में यद्यपि सामान्य संस्कृत मंत्र ही प्रतीत होता है, किन्तु मूलतः साबर मंत्र ही है और इसी कारण वश प्रभाव में अत्यन्त तीव्र भी है।
मंत्र जप में इस बात का ध्यान रखें, कि प्रथम सोमवार को प्राण-प्रतिष्ठित मंत्र सिद्ध रुद्राक्ष माला से जिस समय मंत्र जप प्रारम्भ किया होगा, यथा सम्भव क्रमशः दूसरे, तीसरे, चोथे एवं पांचवें सोमवार को भी उसी समय मंत्र जप प्रारम्भ करें। प्रथम सोमवार को ३ माला जप करना है एवं दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें सोमवार को क्रमशः ५, ७, ९, ११ मालाएं जप करना है। इस साथना में प्रत्येक सोमवार के लिए नए अंकन का करना आवश्यक नहीं है वरन् प्रारम्भ में जिस अंकन को किया है, उसी पर आगे भी साधना सम्पन्न की जा सकती है। यदि किसी को असुविधा हो, तो वह प्रत्येक सोमवार पर नवीन अंकन करने के लिए स्वतंत्र है।
इस साधना में जिस विशिष्ट यंत्र की आश्वयकता पड़ती है, उस “पाशुपतेय यंत्र” का निर्माण अत्यन्त सीमित संख्या में करवाया गया है तथा यह तेजस्वी यंत्र उन साथकों के लिए पूज्यपाद गुरुदेव की ओर से नववर्ष के अवसर पर उपहार स्वरूप है | पूज्यपाद गुरुदेव की विशिष्ट ऊर्जा से संस्पशित एवं उनके आशीर्वाद से युक्त इस अतिदुर्लभ व महत्वपूर्ण यंत्र को पूज्यपाद गुरुदेव की ओर से किसी भी न्यौछावर पर प्रदान न करते हुए केवल उन्हीं को प्रदान करने की स्पष्ट आज्ञा है, जो निम्न नियम को पूर्ण करेंगे।
यह साधना पूज्य गुरुदेव ने आशीर्वाद स्वरूप प्रदान की है, जिसकी साधना सामग्री आप निःशुल्क प्राप्त कर सकते है। साथ ही फोटो द्वारा पाशुपतये प्रणीत चिरयौवन शक्तिपात दीक्षा प्रदान की जायेगी । आप केवल पांच पत्रिका सदस्य बनाएं (जो आपके परिवार के सदस्य न हों) ।
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