





उत्तेजक देह का प्रस्तुतिकरण और अत्यधिक मादकता के भार से लदे यौवन का नाम ही उर्वशी है। यह तो सत्य है कि नारी के साहचर्य के बिना तो कोई भी कला अपूर्ण ही है, चाहे वह संगीत व नृत्यकला की बात हो या फि़र मधुर वार्तालाप की।
अधिकतर साधकों का चिन्तन यही रहता है कि मैं अप्सरा साधना सम्पन्न करूं और साधना सम्पन्न होते ही, वह अप्सरा मुझे प्राप्त हो जाए, किन्तु इतनी शीघ्रता से तो कोई साधारण नारी भी प्राप्त नहीं होती। एक लड़की से विवाह करने के लिए भी उसको देखना, उसके मां-बाप से विवाह की बातचीत चलाना, विवाह की तिथि तय करना, अग्नि के चारों ओर फ़ेरे खाना आदि साधनाएं सम्पन्न करनी पड़ती हैं तभी वह लड़की पत्नी के रूप में प्राप्त हो पाती है, फि़र उर्वशी तो एक अप्सरा है, चिर यौवनमयी है।
अप्सरा साधना में असफ़लता का कारण यह होता है कि ऐसे व्यक्ति एक-आध बार अधूरे मन से प्रयास करने के बाद ही उसे छोड़ देते हैं, यदि वे पूर्ण विश्वास के साथ, मन लगाकर, एकाग्रता पूर्वक साधना को सम्पन्न करें तो साधना में सफ़लता मिलती ही है। उर्वशी जो केवल इन्द्र के दरबार की अप्सराओं के मध्य ही नहीं, वरन् समस्त 108 अप्सराओं के मध्य भी सर्वश्रेष्ठ अप्सरा है, वह न केवल अपने रूप, सौन्दर्य से वरन् अपने शरीर सौष्ठव, नृत्यशैली, हास्य-विनोद कला, सुरुचि प्रियता, श्रृंगार-शैली सभी में नारी सौन्दर्य का पर्याय ही है।
एक स्त्री के द्वारा ही यह संभव है कि वह एक साथ पत्नी, प्रिया, बहू, मां, भाभी और ऐसे ही कई तानों-बानों में बुनी, सभी रूपों में एक साथ अपने स्नेह और प्रेम में सरस करती गति दे सकती है, इसी कारण यह साधना पुरुषों की अपेक्षा किसी स्त्री के लिए अधिक उपयोगी होती हे, क्योंकि सौन्दर्य का सबसे मुखर स्वरूप केवल नारी और नारी देह के मध्य से ही अभिव्यक्त होता है।
गहरे, घने और काले लम्बे बाल, जिसकी कमनीय कोमल काया बेंत की तरह लचकदार हो, जिसके अंग-अंग से यौवन की आभा फ़ूट रही हो, जिसकी झील सी आंखों में गजब का आकर्षण एवं सम्मोहन हो, जो किसी के भी चित्त को बांधा सकने में समर्थ हो, जिसमें रूप और सौन्दर्य का अद्भुत सामंजस्य हो, भरी-भरी सुतवा नाक, रसीले अधर, स्वस्थ कपोल और पुष्ट गर्दन जिमसें पड़ा हो कोई पतला सा सूत्र, जो पता नहीं ग्रीवा के सौन्दर्य से झिलमिला रहा हो या ग्रीवा ही उसके सौन्दर्य से ऐसे बंध गई हो, कि फि़र वह सौन्दर्य बेकाबू होकर कहीं छलक ही न उठे, कंधे ऐसे जिन पर पुरुष अपना सिर टिका देने के लिए आतुर हो उठें और उनमें जुड़ी दो नरम बाहें, लगे कि उसकी कोमलता प्रेम की गरमाहट से पिघल कर बांहों में ढल गई हो, हृदय की मृदुता को व्यक्त सा करता सुगठित और कोमल वक्षस्थल, जिसकी गठन और कसाव समेटे हो सौन्दर्य के दर्प को, सुडौल और चिकनी कमर जिसके आधार में उमड़ रहा हो विशाल नितम्ब प्रदेश। सारे वक्षस्थल का भराव, जो वहां न समा पाया हो और नाभि के पतले से पात्र में उतर ऊन-ऊन कर नितम्ब की पृथुलता और फ़ैलाव में ढल गया हो और फि़र खुद ही शरमा कर जंघाओं की मांसलता में लजाता-शरमाता उसे भरती हुई सुडौल पिण्डलियां—- ऐसी ही पैरों में पहिने घुंघरुओं की रुन-झुन से देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और मनुष्यों के प्राण अटके रह जाते हैं, और जिसके शरीर से निरन्तर अद्वितीय एवं अपूर्व अष्टगंध प्रवाहित होती रहती है, जिसकी सुगन्ध से प्रत्येक प्राणी मोहित होता हुआ, उसे पाने के लिए तड़प कर रह जाता है।
ऐसा अद्वितीय सौन्दर्य देखकर तो पुरुष वर्ग का सारा तनाव दूर हो ही जाता है। साधक अप्सरा के किसी भी रूप को अपने मानस में संजोय यदि साधना करता है तो उसे उसी रूप में उसकी सामीप्यता प्राप्त होती है। यदि प्रेमिका रूप में यह साधना सम्पन्न की जाए, तो साधक को वह उसी रूप में प्राप्त होती है, अन्य सभी रूपों के अपेक्षा, प्रेमिका रूप में साधना करने पर साधक को शीघ्र सफ़लता प्राप्त होती है। क्योंकि प्रेमिका अपने प्रिय को अपना सर्वस्व अर्पित कर, उसे हर समय प्रत्येक प्रकार से प्रसन्न देखना चाहती है।
1 साधक के जीवन में यदि धन का अभाव होता है, तो उर्वशी उसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कई रूपों में आर्थिक सहायता देती है।
2 यदि साधक के जीवन में प्रेम का अभाव हो, तो वह प्रेम का साकार रूप बन, उसके जीवन को प्रेम से आपूरित कर देती है।
3 यदि साधक हीन भावना से ग्रसित होता है और वह किसी सुन्दर स्त्री या लड़की का सामना नहीं कर सकता है, तो उसके मन से इस हीन भावना को निकाल कर उसे पूर्ण पौरुषता प्रदान करने में सहायक बनती है।
4 यदि विवाहित पुरुष इस साधना को सम्पन्न करता है, तो भी उसके मन में किसी प्रकार का द्वंद्व या पति-पत्नी में मतभेद की स्थिति नहीं उत्पन्न होती है, क्योंकि उर्वशी एक ऐसी तेजस्वी शक्ति के रूप में, उसकी पत्नी के शरीर में ही समाहित हो जाती है, जिससे कि उसकी पत्नी सभी दृष्टियों से पूर्ण नारीत्व को धारण कर अपने पति को सभी प्रकार से सुख प्रदान करने वाली बन जाती है।
5 यदि इस साधना को कोई स्त्री या लड़की सम्पन्न करना चाहे, तो बेहिचक हो इस साधना को सम्पन्न कर सकती है, क्योंकि उर्वशी उसकी सहेली तथा सहयोगिनी के रूप में उसकी प्रत्येक समस्याओं का समाधान करती है।
6 उर्वशी साधना सम्पन्न साधिका यदि गायन, नृत्य, श्रृंगार आदि कलाओं में पारंगत होना चाहे, तो उर्वशी उसे इन कलाओं का भी ज्ञान प्रदान करती है, इस प्रकार उर्वशी साधना स्त्री या पुरुष कोई भी कर सकता है।
उर्वशी साधना करने से उपरोक्त लाभ तो साधक को प्राप्त होते ही हैं, साथ ही साथ साधक उर्वशी की तांत्रोक्त साधना को सम्पन्न कर, उसे अपने जीवन में सशरीर नृत्य करने के लिए भी विवश कर सकता है— और यह एक ऐसी ही अद्वितीय श्रेष्ठ साधना है, जिसके माध्यम से ऐसा संभव हो सकता है। साधना सिद्धि प्राप्त कर वह उस सौन्दर्यशालिनी के नृत्य का अपूर्व आनन्द उठा सकता है, किन्तु आवश्यकता है, उस साधना को पूर्ण श्रद्धा एवं प्रसन्नचित होकर सम्पन्न करने की।
प्रयोग विधि: यह साधना अपने आप में पूर्ण ‘‘तांत्रोक्त साधना’’ है, किन्तु इसकी विधि सामान्य ही है, और यह अपने-आप में अचूक एवं शीघ्र सफ़ल होने वाली साधना है।
साधना प्रारम्भ करने से पूर्व ही साधक निम्न सामग्री को पहले से ही प्राप्त कर लें, जिससे उसे साधना काल में किसी प्रकार की रूकावट अनुभव न हो। इसमें हल्के लाल रंग के वस्त्र, हल्का लाल रंग का आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, कुंकुम, केसर, अक्षत, पुष्प, हिना अथवा खस का इत्र, गुलाब या गेंदे के पुष्पों से बनी माला, एक साबूत सुपारी, कलावा आदि की आवश्यकता पड़ती है। इस साधना में ‘‘उर्वशी यंत्र’’ और ‘‘अप्सरा माला’’ का विशेष महत्व है ।
साधक इस साधना को किसी भी शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को अथवा किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न कर सकता है। यह रात्रि कालीन साधना है, अतः इसे रात्रि में ही प्रारम्भ करें। यह साधना एकान्त स्थल में, छत पर अथवा कमरे में की जा सकती है, ध्यान रहे साधना काल में परिवार का कोई भी सदस्य आपको बाधा न पहुंचाए।
साधना काल में साधक का मानस एक उत्साह तथा सौन्दर्यबोध से परिपूर्ण होना आवश्यक है, तथा जितना हो सके कम वार्तालाप करें। साधक स्नान आदि से निवृत होकर, लकड़ी के एक बाजोट पर हल्के लाल रंग का आसन बिछाकर, किसी ताम्रपात्र अथवा स्टील की प्लेट में ‘‘उर्वशी यंत्र’’ को स्थापित कर दें।
सर्वप्रथम साधक गणपति का स्मरण कर, सुपारी पर कलावा बांध कर, एक थाली में अथवा प्लेट में कुंकुंम से स्वस्तिक बनाकर, गणपति स्थापन करें तथा साधक स्वयं का पवित्रीकरण ‘दैनिक साधना विधि’’ पुस्तक के अनुसार करते हुए भगवान गणपति को जल से तथा दुग्ध से स्नान करायें, तथा धूप, दीप, नैवेद्य जो कि दूध का बना हो, से पूजन करें।
उर्वशी साधना को सम्पन्न करने से पूर्व साधक उर्वशी यंत्र का पूजन धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत आदि से सम्पन्न करें, तथा हिना अथवा खस के इत्र की कुछ बूंदे उर्वशी यंत्र पर तथा कुछ बूदे स्वयं के वस्त्रों पर डाल लें। यह साधना साधक को पूर्वाभिमुख होकर सम्पन्न करनी है।
उपरोक्त सभी क्रिया करने के बाद साधक हाथ में जल लेकर जिस उद्देश्य से साधना की जा रही है, बोलकर साधना में सफ़लता प्राप्ति कर संकल्प लें, तथा ‘‘अप्सरा माला’’ से निम्न मंत्र पर निश्छल भाव से 11 माला मंत्र जप सम्पन्न करें –
मंत्र जप के दौरान साधक को यदि किसी भी प्रकार का अनुभव हो, जैसे अचानक तीव्र सुगन्ध का झोंका आना, किसी के पीछे खड़े होने का आभास होना या पायल की आवाज का सुनाई देना, ऐसा कुछ भी हो तो साधक विचलित न हो और मंत्र जप न छोड़े तथा साधना के पश्चात साधक पत्र द्वारा पूज्य गुरुदेव को अपने अनुभव की सूचना दें, और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें।
मंत्र-जप समाप्ति के पश्चात, पहले से लाकर रखी माला में से एक माला तो उर्वशी यंत्र को पहिना दें, तथा दूसरी माला स्वयं पहिन लें। इसके बाद साधक ‘‘अप्सरा माला’’ को भी पहिन लें तथा रात्रि में आसन के पास ही भूमि पर ही शयन करें।
साधना सम्पन्न करने के पश्चात दूसरे दिन साधक इस यंत्र तथा अन्य सभी साधना सामग्री को, किसी नदी अथवा तालाब में विसर्जित कर दें, तथा अप्सरा माला को 21 दिनों तक धारण करें। साधक रात्रि में उपरोक्त मंत्र का दो माला नित्य 21 दिन तक जप करें, तथा उसके बाद इस माला को भी किसी नदी या कुंए में विसर्जित कर दें।
माघी पूर्णिमा के अवसर पर प्रत्यांगिरा उर्वशी शक्तिपात दीक्षा प्राप्त करने से जीवन में रस, आनन्द, धवलता और चेतना का भाव प्राप्त होता ही है। उर्वशी प्रत्यांगिरा दीक्षा लेने पर यह साधना पैकेट उपहार स्वरूप निशुल्क भेजा जायेगा।
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