





एक साधक की प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित यह वर्णन तो कुछ ऐसा ही सिद्ध करता है।
बात उन दिनों की है जब मैंने साधना के घने जंगल में पहला ही पग रखा था और जैसा कि स्वाभाविक ही था, कि गुरु निर्देशन के अभाव में एक घने वन प्रांतर की ओर बढ़ गया था। अधिकांश साधकों की यही तो नियति होती है, क्योंकि अधयात्म आज हमारे बीच जंगल चले जाने का पर्याय हो गया है। न तो किसी साधना विधि का ज्ञान था न ही किसी उचित मंत्र का। या यों कहें, कि यायावरी का कोई आकर्षण था, बंधनों, दायित्वों से मुक्त होने की कोई छटपटाहट थी, इसी से पलायन न होते हुए भी पलायन सा कर गया था। गुरु का महत्व तो मैंने बहुत बाद में जाना। कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद साधना के मर्म को समझा और वास्तविक रूप में अब जाकर यथार्थ साधक बनने के उपक्रम में पहला पग रखा है।
उन दिनों मेरा न तो कहीं रहने का स्थान निश्चित था और न जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने का लक्ष्य! बस कोई एक प्रवाह था, जिसमें बहता चला जा रहा था। कहां जाना है, कैसे जाना है, क्यों जाना है, कुछ पता ही नहीं था। शायद ऐसा भी था, कि इस तरह से भटकने में अपने पौरुष के दंभ को भी तुष्टि मिलती थी, कि मैं अपने पैरों से सारा भारत नाप देने निकला हूं!
जीवन की अनेक मिथ्या धारणाएं, जो मैंने गुरु साहचर्य को प्राप्त करने से पूर्व निर्मित की थी, उनकी वास्तविकता और उनमें निहित गूढ़ार्थ तो मुझे बाद में पता चला। गुरुदेव ने मुझे बैठाकर ज्ञान नहीं दिया किंतु यही तो सद्गुरु का लक्षण होता है, कि वे अपने मौन से ही सब कुछ व्याख्यित करते चलते हैं, इसके पूर्व दीक्षा आदि उपायोग से वे ही ‘मौन का श्रवण’ करने की कला भी सिखाते हैं। वह तो मेरे जीवन का एक पृथक और सुविस्तृत अधयाय है।
मैं चर्चा करना चाहता था जीवन के उस प्रसंग की जो मुझे अपने यायावर जीवन (अब मैं उसे संन्यास जीवन कहने की धृष्टता नहीं कर पाता) के किसी क्रम पर अनुभूत हुआ और जहां से मैने साधना-सिद्धि का प्रथम पाठ पढ़कर वास्तविक रूप में ज्ञानार्जन की प्रक्रिया प्राप्त की!
अधिक से अधिक मैं इतना ही कह सकता हूं, कि भारत के किसी पूर्वी भाग की है यह घटना। भिक्षाटन की मेरी वृत्ति थी और किसी ग्रामीण से सुनकर उस सौम्य प्रौढ़ महिला के साहचर्य में पहुंचने का सौभाग्य मुझे मिल गया था। उस क्षेत्र में वे नंदिता मां के नाम से विख्यात थी। पूरा नाम था उकन नंदिता मुखोपाध्याय। वे अविवाहिता थी अथवा वैधव प्राप्त – इसके विषय में किसी को भी कोई ज्ञान नहीं था या यो कहें, कि इस विषय में जानने की चेष्टा करना भी उस क्षेत्र के निवासियों की दृष्टि में पाप था। ठीक भी था, जगदम्बा की धारणा भी तो तंत्र उनके कौमार्य रूप में ही करता है। मुझे भी इससे कुछ विशेष लेना-देना नहीं था। मैं तो बस अपने किसी गंतव्य तक पहुंचने के लिए चल रही यात्रा में रात्रि-विश्राम का कोई उपयुक्त स्थान ढूंढ रहा था। रात्रि विश्राम के लिए यद्यपि अनेक उपाय थे, जो मैंने केवल इस कारणवश छोड़ दिए, क्योंकि नंदित मां के विषय में सुनकर मुझे एक प्रकार का कौतूहल भी उमड़ आया था। मुझे लगा कि कोई आध्यात्मिक महिला होगी, जिनसे मिलकर प्रवास का सदुपयोग भी हो जाएगा।
नंदिता मां के विषय में मैंने मार्ग में ग्रामीणों से सुनकर जो धारणा बनाई थी वे ठीक उसी के अनुरूप थीं। एक सीधी-सादी प्रायः पचास-पचपन वर्ष की प्रतीत होती नंदिता मां का स्वरूप अपूर्व मातृत्व से भरा था। उनके केश प्रायः अर्धाश्वेत हो चुके थे, किन्तु चेहरे पर विद्यमान ओज और नेत्रों में करुणा की तरलता उन्हें किसी दैवीय व्यक्तित्व से कम नहीं लगने दे रही थी। साधारण से वस्त्र पहने वे सौन्दर्य प्रसाधनों के उपयोग से तो कोसों दूर अपने बालों में कदाचित कंघी तक भी नहीं करती थी। तभी तो उनके केश आपस में मिलकर जटाएं बन गई थी, जो निश्छल स्मित से स्पन्दित हो यूं कम्पायमान हो जाती मानो कोई जल भरी नदी तट को अपने हल्के से स्पर्श से सहला गई हो। ऐसा ही मुझे तब भी लगा जब उन्होंने मेरे पहुंचने पर स्थित युक्त स्वागत के साथ सिर पर हाथ फ़ेर ठोढ़ी का अपनी उंगलियों से स्पर्श कर, बंगाल की प्रथा के अनुसार फि़र अपनी उंगलियों का चुम्बन कर मानों मुझे स्नेहसिक्त ही कर दिया।
संन्यास का जीवन एक रुक्ष जीवन होता है। मोह-ममता से तो पता नहीं कितनी दूरी होती है उस जीवन में, साथ ही भावनाओं के प्रति मन में एक प्रकार की अवहेलना सी पनप जाती है या यों कहें, कि शास्त्रों से संन्यास का ऐसा ही विवारण पढ़कर हम अपने मन में सप्रयास ऐसी अवहेलना (जिसमें दम्भ मिश्रित होता है) विकसित कर लेते हैं, फि़र भी कुछ ऐसा था जो मुझे स्निग्ध कर गया। उनका पहला प्रश्न था – ‘आ गए।’ मानो मेरे आगमन का उन्हें पहले ही समाचार मिल गया था।
वे किसी कि शिष्या थीं, क्यों उस निर्जन से लगते वन प्रांत की सीमा पर निवास कर रही थीं – इसको कुछ तो मैं स्वयं विशेष रूप में समझ नहीं पाया हूं और जितना जान पाया उसे भी बताने में असमर्थ हूं, लेकिन उनके आभा मण्डल से प्रभावित हो मैं संन्यास के नियमों के विपरीत एक सप्ताह से अधिक उनके सामीप्य में यदि कहूं कि रुकने को बाध्य हो गया तो कोई अत्युक्ति न होगी। इस एक सप्ताह में उनके साथ साधनात्मक ज्ञान के विषय में कोई चर्चा न हुई बस अध्यात्म के विषयों पर ही वार्तालाप होता था। ज्ञान-चर्चा करने के लिए अथवा ज्ञान सम्बन्धी प्रश्न पूछने के लिए भी एक स्तर का होना आवश्यक होता है, जिसका अभाव मैंने उनके ही सान्निध्य में रहकर अनुभव किया। अतः मैंने एक दिन आगे प्रस्थान करने का निश्चय ले उन्हें सूचित करना चाहा। प्रत्युत्तर में उनके चेहरे पर करुणा और चिंता का मिला-जुला भाव तैर गया।
‘‘कहां जाएगा? कैसे रहेगा? क्यों जा रहा है ? जैसे अनेक प्रश्नों का मैं स्वयं कोई समुचित उत्तर नहीं जानता था, अतः उन्हें क्या उत्तर देता? ? बस एक सुनी-सुनाई परिभाषा रमता जोगी बहता पानी कह कर टालने की चेष्टा की। यो मुझे भी उनका सान्निध्य छोड़ने की इच्छा नहीं थी, किन्तु उन पर अनावश्यक बोझ समझ कर मन में खेद होता था। प्रसंगवश कहना चाहूंगा, कि मुझे उनके सामीप्य में रहते हुए कभी ज्ञान ही न हो सका था, कि उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताएं कैसे पूरी होती है ?
मेरे उत्तर से उनका क्लेश और भी बढ़ गया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मेरे गुरु ने मुझे यही सिखाया है ? किंतु तब तक तो मैं गुरुदेव के सान्निध्य में आया ही नहीं था, अतः मैने उन्हें सहज रूप से बता दिया, कि मेरे कोई गुरु है ही नहीं। मेरा उत्तर सुन वे पता नहीं किस विचार-विमर्श में लीन हो गई और मुझे रुकने को कह घर (जिमसें घर के नाम पर बस दो कोठरियों ही थी) के भीतरी कमरे में चली गई। दिवस के मध्यानह से सांयकाल हुआ और सांयकाल के पश्चात् रात्रि के भी क्षण आ गए। मैं घबराया, कि लगता है आज अभी और रुकना होगा। मैं जाना चाहता था, किंतु कुछ तो उनके प्रति सम्मानवश और कुछ एक विचित्र से सम्मोहन में आब) हो मैं जाना तो दूर, वहां बैठा ही रहा।
रात्रि का प्रथम प्रहर बीता और सहसा वे कक्ष से बाहर आई। नंदिता मां के चेहरे पर उस समय वात्सल्य के स्थान पर एक विचित्र सी दृढ़ता दिखाई दे रही थी। यह बात और है, कि उस दृढ़ता में भी उनकी आत्मीयता छुप नहीं पा रही थी। बिना कुछ बोले, उन्होंने मुझे अपने पीछे आने का संकेत किया और घर से निकल उस ओर बढ़ गई जहां से चट्टानों का अवरोध पार करते हुए पहाड़ी की चोटी की ओर एक पगडंडी जाती थी। मैं मंत्रबद्ध सा उनका अनुसरण करता रहा था। उनसे प्रश्न पूछने का मेरा साहस ही नहीं था।
(यह तो अभूपर्णा की ही साक्षात् तांत्रोक्त साधना है – पूर्ण प्रामाणिक निश्चित और शीघ्रातिशीघ्र फ़ल देने में सक्षम!) पहाड़ी पर चढ़ते-चढ़ते अचानक वे एक स्थान पर रुकी, कुछ विचित्र से परीक्षण किए और सहसा संतुष्ट हो इस यात्रा में प्रथम बार बोली ‘‘— उधर बैठ जा।’’ मैंने भी वैसा ही किया। मुझसे कुछ अलग हट कर वे एक ऊंची सी चट्टान पर बैठ गई और वहीं से मुझे निर्देश दे कर, कि मैं अपने स्थान से न उठूं मेरी ओर पीठ करके मंत्र जप में लीन हो गई।
माह कदाचित कृष्ण पक्ष चल रहा था। अतः उन सुनसान वन-प्रांतर में हाथ को हाथ नहीं दिखाई देने वाली स्थिति थी, किन्तु पता नहीं क्यो जहां नंदिता मां बैठी थी, उस स्थान पर प्रकाश की हल्की सी आभा झलक रही थी। मैं बार-बार आंखे बंद कर, खोल कर समझने का प्रयास कर रहा था, कि क्या यह प्रकाश इस चट्टान की विशेषता है अथवा नंदिता मां के श्वेत केश इस अंधकार में विरोधाभास उत्पन्न कर प्रकाश का आभास दे रहे हैं? किन्तु कुछ समझ में आ नहीं रहा था। केवल 17-18 वर्ष की ही तो आयु थी मेरी उस समय। न तो जगत का व्यावहारिक अनुभव था और साधना के क्षेत्र में तो पूर्णतया अनभिज्ञ ही था। मैं नंदिता मां के क्रिया-कलापों को किंचित कौतूहल से देखता जा रहा था और सच कहूं तो उस गहन अंधकार में जहां अनेक कीड़े-मकोड़े बार-बार काट कर शरीर में जलन उत्पन्न कर दे रहे थे, मैं मन ही मन खीझता भी जा रहा था। अपने को कोस रहा था, कि क्यों नहीं बिना बताए निकल पड़ा ?
इसी झुंझलाहट में मुझे तन्द्रा आ गई थी, कि सहसा एक हल्की सी ‘धम्म’ की ध्वनि के साथ जो नेत्र खुले तो मैं सामने का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया। मैंने अपने को चिकोटी काट कर निश्चित करना चाहा, कि जो मैं कुछ देख रहा हूं वह सत्य ही है या कोई विभ्रम हो गया है? मेरे सामने की चट्टान पर नंदिता मां उसी प्रकार से मेरी ओर पीठ किये बैठी थी, किन्तु उनके सामने पता नहीं किसी चट्टान पर अथवा शून्य में (अंधकार में स्पष्ट नहीं हो पा रहा था) एक विकराल और विशालकाय स्त्री उपस्थित थी।
वास्तव में वह केवल अपने लिंग से ही ‘स्त्री’ कही जा सकती थी अन्यथा उसमें स्त्रीत्व जैसा तो कुछ था ही नहीं—-
— अत्यंत विशालकायल और घोर काली उस स्त्री का उदर प्रदेश आवश्यकता से कहीं अधिक विस्तृत था। एक प्रकार से कहूं तो उसके शरीर में केवल उदर ही उदर परिलक्षित हो रहा था। अपने उन्नत वक्षस्थलों और कटि प्रदेश को उसने छाल जैसे आवरण से ढक रखा था तथा हाथ, पांव गले और जहां-जहां संभव हो सकता था, उसने कौडि़यों की माला से अपने शरीर को संभवतः स्वयं के विचार से तो सुसज्जित किया था किन्तु अनतोगत्वा वह उसकी वीभत्सता बढ़ाने में ही सहायक सिद्ध हो रहा था। पता नहीं माथे पर लिपटे सिंदूर के कारण अथवा उसके शरीर से निकलती आभा के कारण नंदिता मां की शुभ्र श्वेत आभा में एक लालिमा-घुल मिल गई थी। उसके स्वरूप से भी अधिक जो भयंकर था वह था उसका श्वास-प्रश्वास लेने का ढंग।
नथुनों से श्वास-प्रश्वास लेने के स्थान पर वह विचित्र प्रकार से बार-बार अपने मुंह को खोलती और फ़ू ऽ ऽ ऽ की धवनि कर पता नहीं श्वास लेती या जुगुप्सा उत्पन्न करने की कोई क्रिया करती जा रही थी। मेरा मन उसकी इस क्रिया को देख जुगुप्सा से भी अधिक भय से भरा जा रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था, कि नंदिता मां ने मुझे किस वीभत्सव घटना को देखने के लिए आज की रात्रि में रोक लिया है ? उस अज्ञात स्त्री के कपोल, जो स्थूलता से लटक गए थे, उसकी इस फ़ुफकार से हिल-हिल के विचित्र सा रोमांच उत्पन्न कर रहे थे। मैंने कब यह दृश्य देखते-देखते अपने नेत्र बंद कर लिए, मुझे स्वयं ही पता नहीं चला। मेरा मन तो यद्यपि आसन से उठ कर भाग जाने का अथवा चीखने का कर रहा था, किन्तु मेरी वाणी के साथ-साथ मेरे पग भी स्तम्भित हो गए थे—
—कुछ देर बाद जब, एक प्रकार से कहूं चेतना लौटी तो सामने न कोई स्त्री थी औ न नंदिता मां स्वयं। मैं विचित्र से खेद से भर गया और नंदिता मां पर क्रोध आने लगा, कि वे मुझे किस स्थिति में छोड़ कर चली गई हैं। न तो मुझे वापस जाने का मार्ग पता था और न उस गहन अंधकार में ऐसा कर पाना मेरे लिए संभव था। प्रातः होते ही अनुमान से मार्ग ढूंढ मैं नंदिता मांत्र के स्थान तक पहुंचा। मन में सोचा था, कि उन्हें खरी-खोटी सुनाकर अपनी राह हो लूंगा, लेकिन उनके समीप पहुंच उनकी वही निश्छल स्मित देख मैं सब कुछ भूल, एक बालक बन गया। नंदिता मां ऐसे बैठी थी जैसे कल रात की किसी भी घटना का उन्हें ज्ञान ही नहीं है!
मैंने पोटली को खोल कर देखा तो ताम्र पत्र पर अंकित एक यंत्र, एक विचित्र-आभा से युक्त गुटिका और ऐसे मनकों की माला थी, जिसको मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैं प्रश्नवाचक मुद्रा से उनकी ओर देखने लग गया। नंदिता मां की वही पुरानी मुद्रा लौट आई थी और वे धीरे-धीरे मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फ़ेरती हुई गुरु गंभीर स्वर में बोलने लगी – ‘न तो संन्यास बुरा है न गृहस्थ जीवन। न संन्यास श्रेष्ठ है न गृहस्थ जीवन। तेरा जहां मन हो जा लेकिन इस तरह से तो न भटक। इस तरह से तो तू न इधर का रहेगा न उधर का —-।’’
(क्षुधा से आतुर विश्व का पोषण करने के लिए जिन भगवती ने अवतरण लिया – शाकम्भरी देवी की रूप में क्या यह संभव है, कि उनकी साधना करने के बाद किसी साधक का भौतिक जीवन अपूर्ण रह सके?)
मैं फि़र भी उनका आशय समझने में असमर्थ था अतः पुनः उसी मूक भाव से उनकी ओर निहारने लग गया। ऐसा लग रहा था, कि नंदिता मां कुछ बताना भी चाह रही है और कुछ छिपाना भी चाह रही है। उनके मन में कोई द्वंद्व चल रहा था। अन्त में मन ही मन कुछ निश्चित कर वे निर्णायक स्वर में बोली ‘‘यह यंत्र है और गुटिका है। हर एक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को इसे अपने सामने लाल वस्त्र पर रख इसी माला से ग्यारह माला मंत्र जप करते रहना। गृहस्थ में रहे या संन्यास में, लेकिन इस तरह पराश्रित होना पुरुष को शोभा नहीं देता—।’’ उनके स्वर में दृढ़ता उतर आई थी और जैसे उन्होंने मेरे जाने का अपना निर्णय सुना दिया। बात को कहकर वे घर के भीतर जाने लगी फि़र सहसा जैसे कुछ याद आया और लौट कर उन्होंने मुझे एक विशेष मंत्र भी बता दिया। मैंने साहस करके पूछना चाहा ‘‘—लेकिन मां! मैं जाऊं किधार ?
यह भी तो बताती जाइए।’’ प्रत्युत्तर में वे हल्का सा हंसी और गूढ़ स्वर मे बोली ‘‘जिधर के संस्कार प्रबल होंगे उधर वे ही खींल लेगें, तू क्यों सोचता है रे।’’
नंदिता मां की बात असत्य नहीं थी! वास्तव में ऐसा संभव हुआ कि मैं संयोगवश ही पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आ सका और फि़र वह तो एक अलग ही गाथा है। पूज्यपाद गुरुदेव से ही मुझ ज्ञात हो सका, कि वास्तव में उस दिन नंदिता मां ने किसी करुणा के वशीभूत होकर मुझे न केवल शाकम्भरी देवी के साक्षात दर्शन करवाए थे वरन वह साधना विधि भी उपलब्ध करवा दी थी, जो शाकम्भरी देवी की सर्वाधिक प्रमाणिक साधना विधि है। मैंने स्वयं इस बात का पग-पग पर अनुभव किया है। बाद में तो मैंने अपने साधनाओं के आयामों को स्पर्श किया, किंतु भौतिक जीवन को संवारने में जितना अधिक प्रभावशाली शाकम्भरी देवी की साधना प्रतीत हुई है, उसकी तो कोई तुलना ही नहीं।
आज मेरा रोम-रोम नंदिता मां के प्रति तो कृतज्ञ है ही साथ ही पूज्य गुरुदेव के प्रति भी और कृतज्ञता से भरा है – जिन्होंने मुझे इस साधना के विविध रहस्यों को सप्रमाण समझाने की महती अनुकम्पा की। वास्तव में कृतज्ञता तो बहुत छोटा शब्द है उनके प्रति, किन्तु इससे अधिक प्रभावशाली मुझे कोई शब्द नहीं मिला जिसमें मैं उनके प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकूं।
आज मेरे पास जीवन में वह सब कुछ है, जो कि एक सद्गृहस्थ के जीवन में होना चाहिए, जो होना आवश्यक होता है, किन्तु कभी-कभी मेरी स्मृति में नंदिता मां का वही स्नेह युक्त मुखमण्डल उभर आता है। साथ ही उभर आते है अनेक प्रश्न-
– क्या अनेक योगीजन इसी प्रकार, स्वयं समाज की दृष्टि से ओझल रह कर साधकों के हित साधना में तत्पर रहते है ?
– क्या नंदिता मां वास्तव में सिद्धाश्रम संस्पर्शित कोई विशिष्ट योगिनी हैं ?
– क्या भगवती शाकम्भरी का वही मूल रूप है, जो मैंने उनके साहचर्य में अनुभूत किया ?
– क्या देवता अथवा देवी साधक की मनोभावनाओं के अनुकूल और किन्हीं गुह्य चिंतनों के वशीभूत हो कर अपना कोई एक विशिष्ट स्वरूप ही साधक के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो फि़र उनका मूल स्वरूप क्या होता है—-?
—– ऐसे ही अनेक प्रशन आज भी मेरे मानस में अनुतरित है जिन्हें प्राप्त करने की चेष्टा में मेरा आध्यात्मिक जीवन अत्यन्त आनन्द के साथ संलग्न है।
साधना विधि:- पूज्यवाद गुरुदेव ने शाकम्भरी साधना के विवेचन में स्पष्ट किया है, कि वस्तुतः यह संतुलित जीवन की साधना है और संतुलित, जीवन जिन चौदह बिन्दुओं से गठित होता है वे है – सुंदर स्वस्थ रोग रहित देह, पूर्ण आयु, मन में आनन्द, सफ़ल गृहस्थ जीवन, सुंदर व मनोहारिणी पत्नी, उन्नति को अग्रसर पुत्र-पुत्रियां, शत्रु रहित जीवन, राज्य सम्मान, आर्थिक दृष्टि से पूर्णता, अध्यात्म की ओर रुचि, तीर्थ यात्रा एवं परोपकार जैसे श्रेष्ठ कार्यों में व्यय करने की पात्रता, वृद्धावस्था का निराकरण, जीवन में गुरु व इष्ट से साक्षात्कार, मृत्यु के उपरांत सद्गति व मोक्ष प्राप्ति।
पूज्यपाद गुरुदेव के संशोधन के अनुसार (जो पूर्ण प्रामाणिका है) यह साधना न केवल किसी भी माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी वरन कृष्ण पक्ष के किसी भी मंगलवार अथवा शुक्रवार को भी सम्पन्न की जा सकती है।
इस साधना में वस्त्र, दिशा का कोई बंधन नहीं है, न ही किसी अन्य धूप दीप आदि उपकरण की, किन्तु साधक के पास इस साधना की आधारभूत सामग्रियां ताम्र पत्र पर अंकित ‘‘शाकम्भरी यंत्र’’, ‘‘कराली गुटिका’’, ‘‘शाकम्भरी माला’’ का होना अति आवश्यक है। साधक इन्हें अपने समक्ष रख इनका संक्षिप्त पूजन जल, कुंकुंम, अक्षत व पुष्प की पंखुडि़यों से करें। भगवती शाकम्भरी का धयान करें –
स्थूलोदरी विशालाक्षी कृष्णवर्णां महेश्वरी।
सर्वशक्तिमयी देवी शाकम्भरी नमाम्यहम्।।
फि़न निम्न मंत्र की 31 माला जप करें –
मंत्र जप के उपरांत समस्त सामग्री को दूसरे दिन किसी तालाब, सरोवर या नदी में विसर्जित कर दें। यह साधना रात्रि में ही सम्पन्न करें।
साधक का जीवन शक्तिमय होने के साथ साथ सभी प्रकार से पूर्ण हो सके, विविध बाधाओं, कष्ट, तनाव, रोग एवं शत्रु भय से मुक्त हो सके तथा जीवन में निर्भयता को सुख को अनुभव कर सके, इसका प्रामाणिक उपाय शाकम्भरी साधना ही मानी गई है। गुरू कृपा के माध्यम से ही साधक इस प्रकार की श्रेष्ठ साधना अपने जीवन में संपन्न कर पाता है। उच्चकोटी के साधकों, शिव शक्ति साधना में रूचि रखने वाले साधकों को चाहिए, रामनवमी 19 अप्रैल 2013 से पूर्व प्रयास कर पूज्य गुरूदेव से चैतन्य शाकम्भरी दीक्षा प्राप्त करें जिससे जीवन को श्रेष्ठता की ओर उन्मुख किया जा सके।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,