





उसके मन में सैकड़ों बाते, विचार, जिज्ञासाएं और मन के उद्गार होते है, ऐसे ही एक शिष्य का यज्ञ गुरुदेव के नाम जिसमें उसने अपने हृदय की भावनाओं और विचारों को स्पष्ट करने का असफ़ल प्रयास किया है, वह पल केवल एक शिष्य का पल नहीं अपितु हम सभी शिष्यों का है, वे विचार केवल उसके विचार ही ह परतु हम सबके विचार है। एक मधुर हृदय की कलम से लिखा हुआ भावभीना पल गुरुदेव के नाम—-
मेरी सेवा में किसी प्रकार की न्यूनता न रहे, ऐसा कोई कार्य न करूं जिससे आपको तनाव हो, क्योंकि यदि मंदिर की एक ईंट भी खिसकती है, तो धीरे-धीरे मंदिर टूट जाता है, और मैं जीते जी ऐसी कल्पना नहीं कर सकता, मेरे लिए तो यही स्वर्ग है, यही पुण्य तीर्थ है, स्वर्ग में जाकर के भी क्या मिल जायेगा, बैकुण्ठ धाम में ऐसा क्या है, जिसके लिए मैं लालायित रहूं। यदि मेरे साथ आप नहीं है, आपका जनम-जनम का साथ नहीं है, तो संसार की प्रत्येक वस्तु मेरे लिए त्याज्य है, इसीलिए तो मैं आपके शरीर को मंदिर के रूप में देखता हूं, जब मैं आपके पास पहुंचता हूं, तो इस मंदिर के गर्भ गृह में बैठे हुए प्राणों के इष्ट को देखकर मन धान्य हो जाता है।
कालोगच्छति धीमताम्:-
निरन्तर समय का चक्र चल रहा है और पल-पल ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है, त्यों-त्यों मेरी उद्विग्नता बढ़ती रहती है, मुझे ज्ञात है, कि आप दृढ़ निश्चयी हैं।, जो सोचते है, उसे पूरा करते ही है, आपने संन्यास लेने की जिस क्षण से बात कही है, हम सभी उसी क्षण से उद्विग्न है, हम कह तो नहीं पाते, परन्तु यदि आप हमारे हृदय के भीतर झांक कर देखे तो उसमें बेचैनी, तड़प, उत्कंठा और उतावलापन, दृष्टिगोचर होगा। इस बात की हम कल्पना ही नहीं कर सकते कि हम गुरु शून्य हो गये है, आपके संन्यास लेने के बाद हम किसके पास जाकर बैठेंगे, किस शीतल छाया में ठण्डी बयार कर अनुभव करेंगे, कहां जाकर अपने प्राणों को धोयेंगे, इस दग्धा हृदय को हम कैसे शीतलता प्रदान कर सकेंगे, अलग रहने की तो मैं कल्पना ही नहीं कर पा रहा हूं। एक ही तरीका है, कि हम कैसे आपके साथ चले और उस जीवन को भी अपनी आखों से देखें, वह जीवन हमारे लिए स्वर्गिक बन जायेगा, तब तक हम पूरा पूरा प्रयत्न कर रहे है, कि हमारे प्राण उपस्थित हो सके और अपने आपको आप में लीन कर सके, सशरीर नहीं तो साधना के द्वारा तो आपसे सम्पर्क स्थापित कर सके, इसीलिये इन दिनों बेचैनी बढ़ गई है।
मैं अपनी बात कैसे और कहां से शुरु करुं कुछ सझ नहीं पाता, मेरे मन में कहने को सैकड़ों विचार और भावनाएं है, हजारों-हजारों स्वर लहरियां हृदय सागर में उमड़ रही है, परन्तु जब मैं आपके पास नहीं होता हूं, तो हर क्षण यह अहसास होता है, कि मैं जब आपसे मिलूंगा तो यह बात कहूंगा, परन्तु जब मैं आपके पास पहुंच जाता हूं, तो आपको देखते ही हृदय के सारे भाव ने जाने कहां तिरोहित हो जाते हैं। आंखों से आंसू बहने लग जाते हैं, गला रुंध जाता है और इच्छा वह होती है, कि मैं आपको एकटक देखता ही रहूं न तो मेरी आंखें थकती है और न वहां से हटने को जी चाहता है। ठीक अपने आपको उस चकोर की भांति महसूस करता हूं, जैसे वह चन्द्रमा को ही अपना सर्वस्व समझता है और एकटक चन्द्रमा की ओर ताकता रहता है।
सच कहता हूं, जब आप मुझे वापस जाने के लिए कहते हैं, तो मन भारी हो जाता है, और जी चाहता है, कि अपना पूरा जीवन इन्हीं चरणों के आसपास व्यतीत कर दूं। चरणों के पास बैठे रहने का अवसर दें, मैं तो केवल बाहर बैठा-बैठा उस क्षण का इंतजार करता रहता हूं, कब दरावजा खुले, और एक क्षण के लिए आपकी झलक पा लूं, और वह क्षण मेरे लिए सार्थक हो जाता है, जीवन का इतिहास बन जाता है, पूर्णता का प्रतीत हो जाता है।
नाता जनम-जनम का:-
ऐसा प्रतीत होता है, कि आपका और मेरा यह सम्बन्ध तो वर्षों-वर्षों का है, जब मैंने आपको देखा नहीं था, तो मन बड़ा छटपटाता रहता था, व्याकुल रहता था, मैं सारा काम करता रहता था, परन्तु उस काम में न तो कोई रस था, और न कोई आनन्द की अनुभूति थी। ऐसा लगता था, कि जैसे मैं अपने जीवन के लाश को ढो रहा हूं, और यंत्र की तरह कार्य में जुटा हुआ हूं। ऐसे समय में मैं कई तीर्थ स्थानों पर गया, अनेक साधु-संतों को मिला, परन्तु मेरे दग्ध हृदय को कोई शांति नहीं दे सका, ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मुझे स्वर्गिक आनन्द मिला हो, जिस क्षण मैं आपके दरवाजे पर आया और आपकी झलक देखी तो ऐसा लगा जैसे आपसे पहली बार नहीं मिल रहा हूं, परन्तु इसके पहले कई-कई बार मिल चुका हूं, आपके थोड़ा ही तो समय बचा है, जो आपके साथ बिताने के लिए है, इसके बाद तो बावरों की तरह जीवन भर कमाना ही है, गृहस्थ के भार को ढोना ही है, उस दलदल और कीचड़ में अपने आप को लिप्त करना ही है, आगे का पूरा जीवन उस नर्क में बिताना ही है, तो फि़र इस थोडे से समय का हम क्यों न सदुपयोग करें, क्यों न आपके पास ज्यादा से जदा आवें, रहें और एकाकार हों। इसीलिए मैं इन सारे शिविरों में भाग लूंगा ही, और यह पूरा वर्ष आपके साथ ही बिताऊंगा, बीच में चार-छः दिन के लिए जाना पड़ा तो जाऊंगा, परन्तु वर्ष का अधिकांश समय आपके चरणों में रहेगा और केवल गुरु साधना के द्वारा ही अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करूंगा। मैं भी आपका शिष्य हूं, दृढ़ निश्चयी हूं, मेरे प्राणों में भी आपके ही प्राण ध्वनित हैं और इसी बूते पर मैं कह रहा हूं कि आप स्वयं कर्म संन्यास साधना में देख लें कि मैं अपने ‘‘स्व’’ को आपमें विलीन कर दूंगा, साधना के द्वारा उस स्थान को प्राप्त कर लूंगा, जो प्राणों से प्राण जोड़ने की क्रिया से संबंधित है।
कितना थोड़ा समय रह गया है वह समय भी इतनी तीव्रता से बीत रहा है, मुझे तो एक-एक क्षण का हिसाब रखना है, प्रत्येक क्षण चरणों को छूते ही मेरे सारे शरीर में एक विद्युत लहर सी दौड़ गई, सारा शरीर झनझना गया और दूसरे ही क्षण मुझे एक ऐसी शांति, सुख और शीतलता का अनुभव हुआ जिसकी खोज मुझे वर्षों से थी। मैं इसी शीतल छाया को पाने के लिए ही तो भटक रहा था, परन्तु वह सुखद बयार मुझे कहीं पर भी प्राप्त नहीं हो पा रही थी।
सच कहता हूं, आपका चेहरा, आपका शरीर, आपकी आकर्षक मुद्रा और आपके चरण सब कुछ मुझे परिचित से लगे, ऐसा लगा जैसे मैं इन चरणों में हजारों-हजारों बार आंसुओं से धोया है, हजारों-हजारों बार अपने हृदय से इन चरणों को पौंछा है, इसमें कुछ भी मुझे अटपटापन या नयापन नहीं लगा, ऐसा लगा ही नहीं कि जैसे मैं आपको पहली बार मिला हूं, मुझे तो ऐसा अनुभव हुआ कि इस जीवन में नहीं पिछले कई जन्मों से आपका मेरा सम्बन्ध रहा है, मैं आपके साथ रहा हूं, और आपका वरद हस्त अपने सिर के ऊपर अनुभव किया है।
फि़र आप बताईये कि इतने लम्बे वर्षों का संबंध कैसे टूट सकता है, आप कहते हैं, चले जाओ, मैं अब कहां जा सकता हूं, यदि मैं चला भी गया तो मेरे इस शरीर की लाश तो वहां डोल सकती है, कार्य कर सकती है, पर मेरा अन्तर, मेरे प्राण और मेरी जिन्दगी की धड़कने तो आपके आसपास ही रहेंगी, मैं मरकर के भी फि़र जन्म लूंगा, और फि़र आपके चरणों में पहुंच जाऊंगा, आपका मेरा संबंध युगों-युगों से है, और रहेगा ऐसा मैं अनुभव करता हूं।
साधना क्या आराधना क्या:-
शिविर में आने का तो एक बहाना है, मैं तो केवल आपको देखने के लिए आता हूं, मेरी इच्छा यह रहती है कि कुछ दिन मैं आपके चरणों में बैठ सकूंगा, और आपके मुंह से निकले अमृत शब्दों का जी भर के पान कर सकूंगा। मेरी आंखे उस क्षण तक व्यग्र रहती है, जब तक आप प्रवचन के लिए नहीं आ जाते, यह अलग बात है कि मैं शिविर में बैठा रहता हूं, मंत्र जप करता हूं, ध्यान लगाता हूं, अगरबत्ती लगाता हूं, परन्तु इन सब में मुझे कोई रस अनुभव नहीं होता, मेरा इष्ट कोई देवता या महाविद्या नहीं है, मेरे इष्ट तो आप हैं और आप के द्वारा ही मैं इन समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर सकूंगा, मुझे महर्षि वैशम्यायन के शब्द स्मरण है, कि ‘‘समस्त साधनाएं व्यर्थ हैं, यदि जीवन में भली प्रकार से गुरु साधना ही संबंध हो जाती है तो अन्य समस्त साधनाएं स्वतः पूरी हो जाती हैं, वे सारी सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।’’
महर्षि वशिष्ठ के शब्दों में जब शिष्य गुरु के हृदय से एकाकार हो जाता है, अपने हृदय को गुरु के हृदय से पूर्णरूपेण मिला देता है, तो वह एकाकार हो जाता है, ऐसी स्थिति में शिष्य का सब कुछ गुरु के हृदय में समाहित हो जाता है, और बदले में गुरु के पास जितनी भी साधनाएं, सिद्धियां और श्रेष्ठता होती है, वह सब कुछ उस को प्राप्त हो जाता है, और वह सिद्ध योगी बन जाता है, उसकी निर्विकल्प समाधि लग जाती है, चेहरे की कांति बढ़ जाती है, और वह बिना कुछ प्रयत्न किये भी एक सफ़ल योगी, एक सफ़ल साधक, एक सफ़ल मंत्र दृष्टा बन जाता है। मेरी यही इच्छा है, मेरा लक्ष्य भी यही है, मैं पूरा-पूरा आपके साथ व्यतीत करना है, और ये ही क्षण मेरे आगे के जीवन की पूंजी है, जिसके बल बूते पर मैं अपना भविष्य संवार सकूंगा और साधना के द्वारा उस स्तर को प्राप्त कर सकूंगा, जिससे आपसे सम्पर्क स्थापित कर सकूं, आप जहां कही भी हों, साधनात्मक दृष्टि से आपसे मिल सकूं और निश्चित रूप से आपके साथ सिद्धाश्रम चलकर उस स्वर्ग के वैभव युक्त आश्रम को अपनी आंखों से निहार सकूं, अपने जीवन को धन्य कर सकूं।
अब मुझे वापिस जन्म लेने की इच्छा नहीं है, अब मैं वापस मल-मूत्र भरी जिन्दगी बिताने में रूचि नहीं रखता, मैं सशरीर सिद्धाश्रम जाना चाहता हूं, पिछले पांच सौ वर्षों में सैकड़ों हजारो योगी, साधु, संन्यासी गुरु पैदा तो हुए होगे पर सिद्धाश्रम का रास्ता किसी के पास नहीं था, किसी ने इस पथ को नहीं बताया, यह पथ तो योगियों के लिए भी अगम्य है, देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, इस रास्ते को तो वही बता सकता है, जो वहां पहुंचा हुआ हो, जिसका वर्चस्व हो, प्रतिष्ठा हो, जो अपने साथ शिष्यों को ले जाने की क्षमता रखता हो। पिछले एक हजार वर्षों में आप पहले व्यक्तित्व हुए है, जिन्होंने सिद्धाश्रम के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी है, उस रास्ते पर चलने की राह सुझाई है और यह हमारा कितना बड़ा सौभाग्य है कि ऐसे सिद्ध, सफ़ल, सिद्धाश्रम सिद्ध योगी हमें गृहस्थ रूप में प्राप्त हुए हैं और इससे भी बड़ी बात आप हमारे गुरु के रूप में सम्मुख है, फि़र हम आपको छोड़कर रह जाय, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है, फि़र आगे हजार दो हजार वर्षों तक कौन इस पथ को बता सकेगा, अब यह क्षण चूकने का नहीं है, इस अवसर को हाथ से गंवाना नहीं है, आपके साथ सशरीर उस पावन पर्व दिव्य आश्रम को देखना ही है, जिससे मेरे पूर्वज मुझ पर गर्व कर सकें।
तेरा तुझको अर्पण:-
मेरा मन, मेरे प्राण, मेरा शरीर और मेरा रोम-रोम आपके चरणों में समर्पित है। मैं स्वयं सही रूप में देखा जाय तो कुछ भी नहीं हूं, यह सब कुछ आपका है, और आपके चरणों में समर्पित है, मेरी बुद्धि कुण्ठित है, बराबर तर्क वितर्क मेरे मानस में घुमड़ते रहते है, संशय-असंशय के झूले में बराबर झूलता रहता हूं, फि़र ये मेरे विकार है और मैं प्रयत्न करके भी इन विकारों पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा हूं।
यह मेरा मैला शरीर, भ्रष्ट बुद्धि आपके चरणों में समर्पित है। मेरा स्वयं का कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी है, वह आपका है। मुझे आप हाथ पकड़ कर उठा लें, मेरे प्राणों को चेतना दें, दिव्यता दें, एक ऐसी चिंगारी प्रदान करें जिससे मेरे सारे संशय और कुण्ठाएं समाप्त हो जाये, मैं सही अर्थों में साधक शब्द सार्थक कर सकूं, मैं आपके हृदय के इतना निकट पहुंच जाऊं कि मैं अपने आप को आपका शिष्य कह सकूं, आपके हजारों उच्चकोटि के योगियों और साधक शिष्यों के बीच मैं भी आपका एक शिष्य हूं, यह मेरा कितना बड़ा सौभाग्य है कि स्वामी ज्ञानदेव, किंकर स्वामी आदि शिष्यों की तरह मैं भी शिष्य हूं, वे मेरे गुरु-भाई हैं, क्या यह मेरा सौभाग्य कम है ?
मेरे हाथ चल नहीं रहे है, मेरी आंखे प्रयत्न करता हूं कि मेरा हृदय आपके हृदय से एकाकार हो जाय, मैं पूरी कोशिश करता हूं कि मैं आप में लीन हो जाऊं, मेरा अस्तित्व आपमें लय हो जाय, मेरा खुद का कोई महत्व न रहे और सही अर्थों में मैं गुरुमय बन जाऊं, अगर यही साधना जीवन के किसी भाग में प्राप्त कर सका, तो फि़र मेरे जीवन में न्यूनता रहेगी भी क्या ? ऐसी स्थिति में इन साधनाओं से क्या हो जायेगा ?
इसीलिए तो मैं कहता हूं कि आप जितने भी शिविर लगायेगें, सभी शिविरों में भाग लूंगा, कोई मौका हाथ से जाने नहीं दूंगा, क्योंकि यह अवसर, यह समय, यह पुण्य पर्व हजारों लाखों रूपये खर्च करने पर भी पुनः प्राप्त नहीं हो सकेगा, यह अवसर मिल नहीं सकेगा कि तपोमय सा वातावरण हो, सभी साधक एक स्थान पर ऋषि तुल्य बैठे हो, सामने हमारे आराध्य गुरु बैठे हों, हम एकटक उन्हें ताकते हों और उनके हृदय से निकले हुए शब्दों का हम पान करते हों, क्या बाद में ऐसा संभव है ? क्या प्रयत्न करने पर भी ऐसा अवसर पुनः प्राप्त हो सकेगा ?
आपने हम सब शिष्यों पर बहुत कृपा की है कि ऐसे जीवन्त शिविरों के आयोजन किये है, यह हमारा सौभाग्य है कि हम इतने लम्बे जीवन के बाद पहली बार इस प्रकार के शिविरों को देख रहे हैं, हमने अपने जीवन में और सब कुछ देखा है, परन्तु तपोमय वातावरण, महत्वपूर्ण चिंतन पद्धति, प्रामाणिक साधना विवरण पहली बार अनुभव किया है, देखा है, और इससे मेरे विचारों में, प्राणों में परिवर्तन आया है, मैं स्वयं अपने आप में परिवर्तन महसूस कर रहा हूं, मुझे घर जाने पर कई प्रकार की अनुभूतियां होने लगती है और मैं ऐसा अनुभव करता हूं कि इन साधनाओं के माध्यम से मैं अपने जीवन को अवश्य ही पूर्णता दे सकूंगा।
परन्तु मेरी साधना, मेरी आराधना का केन्द्र बिन्दु आपका व्यक्तित्व, आपकी उपस्थिति, आपका शरीर और आपके प्राण हैं। मैं तो इन प्राणों में अपने आपको लीन करने को ही साधना समझता हूं, जिस दिन मैं अपने अहं को अपने व्यक्तित्व को, अपनी उच्चता, गर्व, नाम, पद, प्रतिष्ठा को तिरोहित कर पूर्णरूपेण आप में लीन हो सकूंगा, उसी दिन मैं अपनी साधना को सफ़ल समझूंगा, मैं बराबर इसके लिए प्रयत्नशील हूं, और मुझे पूरा भरोसा है, कि मैं अपने इस लक्ष्य में निश्चित रूप से सफ़लता प्राप्त कर सकूंगा।
आपका शरीर ही मंदिर है:-
मंदिर, मस्जिद, चर्च, साधना स्थल अपने आप में क्या मायने रखते हैं, वे निर्जीव पत्थरों से निर्मित है। इसकी अपेक्षा जो सजीव है, हलचल युक्त और प्राणवान है, ऐसा आपका शरीर ही मेरे लिए मंदिर है, मैं आपके शरीर को ही पवित्र तीर्थ मानता हूं, मेरे लिए यही केदारनाथ है, यही बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री है, जिसके शीतल स्नेह जल में अवगाहन कर अपने आपको पवित्र और दिव्य अनुभव करता हूं। इसकी सेवा ही मेरे मंदिर की सेवा है, आपके पूरे शरीर को मैं ऐसा अनुभव करता हूं जैसे यह एक सजीव देवालय हो, जो प्राणवान है, चेतनायुक्त और स्पन्दनशील है, मैं इसका पुजारी हूं, आपकी किसी प्रकार की ठेस न लगे, आंसुओं से सिक्त है, गला रुंध गया है और इन डबडबाई आंखों से जिधर भी दृष्टि डालता हूं, आप ही आप दृष्टिगोचर हो रहे हैं। बहुत कम समय हम सभी शिष्यों के पास बचा है और हम सभी एक-एक क्षण के मूल्य को पहिचानने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह मेरा सारा जीवन आपके चरणों में समर्पित है और मैं भाव पूर्ण हृदय से अपने आपको आप में लीन करने की भावना रखता हुआ एक ही शब्द उच्चरित कर रहा हूं,
‘‘त्वदीयं देह गोविन्द तुभ्य मेवं समर्पयेत’’।
मैं समझ नहीं पा रहा हूं, कि मैं कुछ लिख भी पाया हूं, कि नहीं, अपनी बात कह भी पाया हूं, या नहीं, परन्तु मैं तो न्यून हूं ही, मैं तो समर्पित हूं और पूर्ण रूप से आपके प्राणों से प्राण जोड़ने की क्रिया के साथ समर्पित हूं, इस भावना से कि आप मुझे अपना कर अपने साथ सिद्धाश्रम तक ले जा सकें।
सद्गुरूदेव के कलम से——-
तुम्हारी हर सॉंस में मैं ही बैठा हूं।
तुम तो मेरे मानस पुत्र हो, तो तुम मुझसे इतने दूर क्यों खड़े हो। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कब से कर रहा हूं।
मैं जानता हूं कि तुम्हारा जीवन अंसख्य मोड़ों से भरा है, मार्ग में बार-बार रूकावटें है, परंतु हर मोड़ पर पीछे देखोगे तो मैं तुम्हारे पीछे ही नजर आऊंगा, जीवन में हर भंवर में तुम्हारा हाथ पकड़ कर बाहर खींच लूंगा, मेरा भरोसा ही सच्चा है।
-पूज्यपाद गुरूदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
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