





हमने अनुभव किया है, कि इस एक वर्ष में साधकों में गुरूदेव के प्रति आत्मिय ललक, उजास ज्यादा चेतना और प्रेमभाव में प्रबलता आई है। वे गुरूतत्व की गहराई में उतर कर साधना की ओर अग्रसर हो रहे हैं और देश विदेश से प्राप्त साधकों के पत्रों के द्वारा हमें ज्ञात हुआ कि उन्हें साधना में जो अनुभूतियां अनुभव हो रही हैं, जो सफ़लताऐं मिल रही हैं, वह केवल और केवल सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानंद जी के वरद हस्त और पूज्यपाद गुरूदेव कैलाश श्रीमाली जी के क्रियात्मक आशीर्वाद के फ़लस्वरूप ही प्राप्त हो सकी है। यह निःसन्देह है कि आने वाले समय में जल्दी ये साधक साधना के क्षेत्र में पूर्णरूपेण अग्रणी होंगे, अद्वितीय होंगे।
अब समय आ गया है कि आप जैसे साधनात्मक शक्ति से सम्पन्न साधकों को गुरुदेव स्वयं अपने पास बुला कर साधना सम्पन्न कराना चाहते हैं और पूर्णता से ऐसा प्रदान करना चाहते हैं कि आने वाला समय आपके सामने नतमस्तक हो सके, आप उनके लिए उदाहरण बन सकें, उन्हें आप पर गर्व हो सके। यह लेख आप जैसे ही श्रेष्ठ और साधनात्मक विचारों से सम्पन्न साधकों के लिए आवाहन है ताकि आप गुरुदेव के सानिध्य में रह कर श्रेष्ठतम साधनाएं सम्पन्न कर सकें।
घटित होने वाला है कुछ अद्भुत इन्हीं विचारों को मानस में रखते हुए गुरुदेव ने यह निश्चय किया है कि आप जैसे श्रेष्ठतम साधकों को गुरुधाम जोधपुर में बुलाकर साधनाएं सम्पन्न करानी हैं। इन साधनाओं को गुरुदेव गुरुधाम जोधपुर में समक्ष सम्पन्न कराने के लिए तत्पर हैं जिससे आप शीघ्रता से सफ़लता की ओर अग्रसर हो सकें।
शिष्यवस्तल्य पूज्यपाद गुरूदेव कैलाश जी अपने शिष्यों के जीवन को श्रेष्ठता, धवलता, उज्ज्वलता तथा अपने शिष्यों को पूर्णता के अधिकारी बनाने हेतु एवं साधकों के साधनात्मक भावना को देखते हुए यह संकल्प लिया है कि यह विक्रम संवत नववर्ज 2070 के प्रारंभ से पहले ही गुरूधाम जोधपुर में साधकों को ब्रह्म मुहूर्त में जो कि प्रातः काल 4-24 से 6-00 बजे तक होता है तथा उसी दिन के विशिष्ट शुभमुहूर्त में स्वयं उपस्थित हो कर साधना करवाएंगे व साधना में जल्द से जल्द सफ़लता प्रदान करने हेतु उसी साधना से संबंधित विशेष दीक्षा भी प्रदान करेंगे। इस मार्च माह की 29, 30, 31 तारीख को पूज्य गुरूदेव ने शिष्य व साधकों को कुण्डलिनी जागरण शक्ति साधना संपन्न करवाने का निश्चय किया है।
आप सभी साधक-साधिकाओं को तो यह संकल्प ले कर आना है कि अब हम सफ़ल हो कर ही रहेंगें और जब स्वयं गुरुदेव के संरक्षण में आप साधना संपन्न करेंगें तो फि़र असफ़लता की संभावना भी कहां रह जाती है। कुछ जरुरत है तो वह है स्वयं पर और उस से भी कहीं अधिक अपने गुरु पर विश्वास होना!
यहां यह बात बतानी अत्यन्त ही आव”यक है कि ये विशेष दिवस हर मास संपन्न होने वाले साधना शिविरों से अलग हैं। यहां हम केवल उन दृढ़ निश्चयी साधकों का आवाहन कर रहे हैं जो भीड़ से अलग हट कर अपनी पहचान साधनात्मक जगत में बनाना चाहते हैं, जिनके लिए गुरु से प्राप्त साधना, मंत्र व दीक्षा का विशेष महत्व है। गुरुदेव का यह आवाहन ऐसे ही साधकों के लिए है जो इस सुअवसर पर बहुत कुछ प्राप्त करना चाहते हैं और इसलिए इस शिविर में भाग लेने के लिए कुछ नियम है जो हर साधक को मान्य होने चाहिए।
यह तो वह साधना है जिसकी हरेक साधु, संत, तपस्वी को ललक रहता है क्योंकि इस साधना के द्वारा व्यक्ति अपने इष्ट के, अपने आराधय के, भक्त अपने भगवान के, शिष्य अपने सद्गुरू के दर्शन कर पाता है। इसके माध्यम से ब्रह्माण्ड की परम ज्योति में अपने आपको लीन कर आत्मदर्शन और उसके माध्यम से ब्रह्म साक्षात्कार की क्रिया संपन्न होती है। इस साधना में सफ़लता प्राप्त करने के बाद साधक के लिए कोई भी कार्य दुर्लभ नहीं होता। वह किसी भी स्थान में अबाधक रूप से गतिशील हो सकता है। साधक को स्वतः इच्छागमन सिद्ध हो जाता है। खुद को अन्नमय कोष से प्राणमय कोष में परिवर्तित करके किसी भी स्थान में विचरित होने की क्रिया प्राप्त हो जाती है।
भगवान शिव का दर्शन कैलाश में जाकर वैसे ही कर सकता है जैसे अपने घर में अपने माता-पिता, भाई-बहिन को देखता है। ब्रह्म लोक में जाकर के ब्रह्मा जी के चारों मुख से जो वेद उच्चरित हो रहे हैं उनको सुन सकता है। बस यही नहीं अपितु इसके द्वारा साधक अपने पूर्ण शरीर का कायाकल्प कर लेता है, परिवर्तित कर सकता है।
शंकराचार्य का नाम आज विश्वप्रसिद्ध है। उन्होंने जब शिव जी की साधना की तो स्वयं भगवान शिव ने कहा तेरा नाम आज से शंकर रहेगा, मगर पूर्णता प्राप्त करने के लिए तुझे सद्गुरू की आवश्यकता है। और वे नर्मदा के किनारे स्थित हैं। उनका नाम गोविन्दपादाचार्य है। जब तक तुम्हारे अन्दर का एक एक अणु नहीं खुलेगा, नहीं जाग्रत होगा, जब तक अन्दर की चेतना जाग्रत नहीं होगी, तब तक तुम्हारी सारी साधनाएं व्यर्थ है और वही सद्गुरू ही तुम्हारे अन्दर इस क्रिया को गतिशील करा सकते हैं। परंतु तुम्हें यह जल्द से जल्द सिद्ध करना है क्योंकि तुम्हारी आयु 32 वर्षों की ही है। उसके बाद वे अपने गुरू गोविन्दपादाचार्य के पास गए तो एक ही सिद्धि मांगी, एक ही साधना मांगी और वह थी कुण्डलिनी जागरण। गृहस्थ को पूर्णता तक पहुंचा सकूं, उनके जीवन के अभावों को दूर कर सकूं। शंकराचार्य ने कहा है कि मेरी आयु केवल 32 वर्ष की है और इन 32 वर्षों मैं उस जगह पहुंचना चाहता हूं जहां अपने आपमें संपूर्णता प्राप्त हो। बस केवल यही इच्छा है। मेरे जैसा कोई अद्वितीय न बने। तो गोविन्दापादाचार्य ने उन्हें उनकी इच्छाओं की पूर्ति हेतु, पूर्णता प्रदान करने हेतु, अद्वितीय बनाने हेतु कुण्डलिनी जागरण साधना और दीक्षा प्रदान की थी।
साधक के भाग्य उदय होते हैं, तभी कोई गुरू ऐसा प्राप्त होता है जो उसे इस प्रकार की साधना पूर्णता के साथ संपन्न करवा दे। गृहस्थ साधकों के लिए तो यह साधना वरदान है। वस्तुतः ऐसा जीवन ही वास्तविक श्रेष्ठ और दिव्य जीवन कहा जा सकता है जो गुरू कृपा से गुरूदेव के सान्निध्य में कुण्डलिनी जागरण साधना संपन्न कर मानव जीवन को सार्थक कर सकें।
29 मार्च 2013 को दोपहर 1 बजे तक साधक जोधपुर पहुंच जाये। उसी दिन श्रेष्ठ अमृतकाल में साधना प्रारम्भ होगी जो कि 31 मार्च सांध्यबेला तक विशेष मुहुर्त में पूर्ण सम्पन्न हो सकेगी।
नियम
1- इस शिविर का उद्देश्य प्रत्यक्ष साधना सिद्धि है। इसी कारण केवल वो साधक ही आयें जो साधना सिद्धि के आकांक्षी हों।
2- प्रत्येक साधक को प्रातः 4:00 बजे उठना है और अपनी पूजा-साधना प्रारम्भ करनी है।
3- साधक अपने साथ स्वच्छ पीली धोती, गुरु चादर, आसन, पंच पात्र और सद्गुरुदेव का चैतन्य चित्र लेकर आयें।
4- साधना काल में व्यर्थ की बातों में समय व्यय न कर गुरुदेव द्वारा प्रदान किए गए मंत्रों का अधिक से अधिक जप करना है जिससे आपको हाथों हाथ सफ़लता प्राप्त हो सके।
5- साधना काल में बाहर का खाना पीना वर्जित है। गुरुधाम में ही सभी साधकों को स्वयं खाना बना कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें। जिससे आपको किसी प्रकार का अन्न दोष न लगे।
6- किसी भी प्रकार का व्यसन सर्वथा वर्जित है।
7- आपको रहने, खाने पीने का कोई अन्य व्यय नहीं उठाना है। यह स्नेह आपको गुरुदेव की ओरसे ही प्राप्त होगा।
8- प्रत्येक साधक को 3100- रु/- अग्रिम भेज कर अपना पंजीकरण 15-मार्च तक सुनिश्चित करवा लेना अनिवार्य है। इस न्यौछावर राशि में ही गुरुदेव द्वारा आपको मंत्र साधना विधान, साधना सामग्री एवं दीक्षा प्रदान की जायेगी।
9- केवल साधना में भाग लेने वाले साधक ही पंजीकरण कराये और अपने साथ परिवार के अन्य सदस्यों को साथ नहीं लाये है। बहिन, बेटिया, मातायें अकेली कभी नहीं आये। यह साधनात्मक वातावरण बनाये रखने की दृष्टि से अनिवार्य है।
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