





त्रेता युग में उत्तानक नाम के एक ऋषि थे। उनकी एक सुन्दर पुत्री थी, जिसका नाम मालती था। यौवनभार से भरी हुई सौन्दर्यमयी मालती एक दिन गोदावरी नदी के तट पर घूम रही थी। तभी दिग्विजय हेतु लंकाधिपति रावण उसी रास्ते से जा रहा था। तभी मालती के सौंदर्य से आकृष्ट हो कर बलपूर्वक उसके साथ अपनी काम वासना को चरितार्थ किया और उसे गोदावरी नदी में फ़ैंक दिया। गोदावरी नदी ने करूणावशतः पुनः मालती को अपने किनारे पर ला कर छोड़ दिया। जब मालती होश में आयी तो वह विलाप कर रही थी और उसकी क्रन्दन की ध्वनि सुन कर भगवान गणपति का वाहन मूषक (इन्दुर) आ पहुंचा। मालती के रूप-सौंदर्य से आकृष्ट हो कर सहायता का प्रलोभन दे कर उसने भी उसका उपभोग किया। फ़ल स्वरूप राक्षस और मूषक के मिलित प्रभाव से दुराचारी मूषक दैत्य का जन्म हुआ। जो कि जन्म के समय ही अपनी माता को निगल गया। बाद में कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर के शिव जी से वरदान प्राप्त कर दिव्य शक्तियों का स्वामी बन कर गंधमार्दन पर्वत पर निवास करने लगा। जिस कारण न तो उसे कोई परास्त कर सकता था और न ही कोई उसका नाश कर सकता था और वह अमरत्व को प्राप्त किया। इसी कारण वह देवताओं पर, ऋषि-मुनि, साधु-सन्यासी, संत-महात्माओं पर अत्याचार करता था।
उसकी राक्षसी वृति देखकर सभी देवता, साधु, संन्यासी, तपस्वी, प्रजा भगवान शिव जी की शरण में गए। भगवान शिव जी ने ध्यानमग्न हो कर इस विपदाओं से सभी को मुक्त करने का असुर का ऐसे प्राणी के हाथ से वद्ध हो सकता है जिसका शरीर विकराल मार्जर रूप हो जो कि दिखने में सिंह जैसा हो और यह अवतार पुरूषोत्तम स्वरूपमय भगवान विष्णु जल्द ही धारण कर आप सभी को अभय प्राप्त कराऐंगे। तभी देवताओं ने विष्णु जी के पास जाकर अपनी गाथा सुनाई। फि़र भगवान ने एक विराट शेर स्वरूप धारण किया और उसी चैतन्य, दिव्य शरीर में सभी देवताओं ने अपने भयंकर रूप को स्थापित किया और भीषण भयंकर नाद किया जो कि सहस्त्र सिंह के हुंकार से भी डरावनी थी। इस नाद को सुन कर मूषिक दैत्य चौंक गया और तभी भगवान भयंकर मार्जर केशरी स्वरूप को दर्शन दिये एवम् भगवान को देखते ही वह अत्यंत भयभीत हो कर इधर-उधर भागने लगा। परन्तु भगवान का यह रूप देखकर तीनलोक में उसको कहीं शरण नहीं मिली आखिर में वह पर्वतराज गंधमार्दन की शरण में गया और पर्वतराज ने धर्म का पालन करते हुए उसे आश्रय दिया।
हुकार नाद करते हुए मार्जर केशरी गंधमार्दन पर्वत पहूंचे और मूषिक को आश्रय देने वाले गन्धमार्दन को क्रोध पूर्वक कहा कि वे दुराचारी मूषिक दैत्य को आश्रय न दें। परन्तु गंधमार्दन पर्वत ने भगवान मार्जर केशरी के शरणागत हो कर भगवान को यह विश्वास दिलाया की, ‘‘धार्म को साक्षी मानते हुए मैंने दुराचारी मूषिक दैत्य को शरण में नहीं लिया है, मैंने तो एक भयभीत मूषिक दैत्य को आश्रय दिया है, जैसे मैं अभी आपके शरण में हूं।’’
भगवान मार्जर केशरी भी दयावतार हो कर अभय धर्म का पालन करते हुए गन्धमार्दन पर्वत को अभय प्रदान किया और मूषिक दैत्य के सुरंग से निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। उसी दिन से सभी देवी-देवता गन्धमार्दन पर्वत के चारों ओर स्थापित हो गए। दक्षिण दिशा में लक्ष्मण भगवान शिव के स्वरूप में हरि शंकर के रूप में प्रसिद्ध हुए। पश्चिम में भगवती दुर्गा दूर्गेईखोल में अवस्थित हुए।
भगवती काली मार्जर केशरी मंदिर के पूर्व दिशा में स्थापित हुईं। भगवान श्रीराम के साथ सारे देवी-देवता इसी जगह में अवस्थित होने के कारण उसी दिन से यह क्षेत्र साधना के लिए पवित्र, दिव्य और चैतन्य स्थल बन गया। भारतवर्ष में यह केवल एक ही स्थान है जहां भगवान विष्णु का मार्जर केशरी स्वरूप विद्यमान है और साधनात्मक दृष्टि से यह ज्ञात होता है कि आज भी यहां इच्छाधारी नाग-नागिन क्रीड़ा करने हेतु आते हैं।
महर्षि कपिल का आश्रम इसी दिव्य पर्वत में अवस्थित था जो कि वर्तमान स्थित मंदिर से लगभग दो किलोमीटर की चढ़ाई पर है और यह झरने की तलहटी पर है। इसी हेतु यह कपिलधारा के नाम से प्रसिद्ध है। मन्दिर के पास पंचपाण्डव नाम से घाट है। भीम के गदाघात से बनने के कारण यह गदाधार नाम से भी नामित है जिससे कि पंचपाण्डव की अवस्थान के बारे में सूचना मिलती है। पहाड़ के ऊपर में भीममण्डप है। यहां सत्यआम वृक्ष हैं। इस वृक्ष ने भीम को जब भूख लग रहा था तो असमय ही आम खाने को दिया था। इस हेतु यह गंधमार्दन पर्वत अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक तथा ऐतिहासिक स्थल है।
हर साल फ़ाल्गुन माह में होली के महापर्व (नृसिंह जयन्ती) के अवसर पर यहां सप्तदिवसीय विराट मेला लगता है।
उड्राख्यं प्रथमं पीठम्—
तंत्रमतानुसार उडीसा सभी तंत्र पीठ में सर्वश्रेष्ठ है। इसको उडीयान पीठ भी कहते हैं। पूरे प्रदेश में तंत्र का पूरा प्रभाव दिखने को मिलता है। ऐसे प्राचीनतम और दिव्यतम श्रेष्ठ तंत्र क्षेत्र भगवती समलश्वरी का क्षेत्र है। पुरातन हीराख्ण्ड राजा बलीयार सिंह के समय में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा आदि प्रदेश के विविध प्रांतों को लेकर एक समृद्धशाली राज्य में विभूषित था उस विशाल राज्य अधिष्ठात्री भगवती समलेश्वरी देवी, जिनको आज भी श्रद्धालु अपने श्रद्धा के भेंट चढ़ाते हुए सुख और दुःख में शामिल करते हैं।
मान्यता है कि पाटन के महाराज नरसिंह देव के अनुज भ्राता बलराम देव प्रबल प्रतापी थे। उनकी वीरता और साहसिकता के कारण नरसिंह देव उनको इसी क्षेत्र का शासनभार प्रदान किया। बलराम देव इस भूखण्ड का प्रथम राजा। वे सन् 1540 से सन् 1557 तक शासन किये थे। उस समय संबलपुर एक छोटा सा गांव था। महाराजा बलराम देव ने सर्व प्रथम बरगढ़ में जीरा नामित से एक नदी के बायें दिशा में अस्थायी राजधानी स्थापित किया था।
राजा बलराम देव स्थायी राजधानी निर्माण करने हेतु चाउॅंरपुर पहुंचे। और वह उसी क्षेत्र में विश्राम करने के लिए रूके। उसी जगह में उनके शिकारी कुत्तों को खरगोशों ने दौड़ कर भगा दिया। यह अद्भुत दृश्य देखकर राजा बलराम हैरान हो गये। इस दृश्य के बाद वे चिंता में डूब गये।
परन्तु उसी रात में उनको चिन्ता से मिुक्त भी मिल गई। रात के चैतन्य मुहूर्त में भगवती जगदम्बा प्रकट हुईं और उनको कहा, ‘‘मैं अवस्थान कर रही हूं, और तू मुझे वहां से लेकर महानदी के पूर्व पार्श्व में शिमली क्षेत्र में स्थापित कर। जो मेरी आराधना करेगा वह सब पापों और तापों से मुक्त हो सकेगा।’’ ऐसा आदेश माता भगवती ने महाराजा बलराम को दिया। शिमली पेड़ को सम्बलपुर में सेमेल कहा जाता है। सेमेल क्षेत्र में स्थित होने के कारण से समलेई, समलाई, सोमलाई, समलेश्वरी आदि नामों से नामित हुईं। दुर्गा सप्तशती में भी भगवती जगदम्बा को समलेश्वरी नाम से नामित किया गया है।
दिव्यमय तेजमय सदाशिव हरि शंकर के स्वरूप में, आद्याशक्ति दुर्गा, भगवती शक्ति के स्वरूपा दिव्य लौकिक देवभूमि पर 25-26 मार्च, बरगड़ (उड़ीसा) में पुरूष से पुरूषोत्तम स्वरूप नृसिंहनाथ-कामदेव शक्तिपात दीक्षा, आद्याशक्ति शिव-पार्वती स्वरूप उर्वशी सौन्दर्य दीक्षा, समलेश्वरी अष्टलक्ष्मी दीक्षा, शत्रु संहारक श्यामाकाली शक्तिपात दीक्षाऐं प्राप्त होगी। जिससे कि आनेवाला नववर्ष 2070 दैहिक दैविक भौतिक सुखों से परिपूर्ण हो सके।
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