





आज फिर वंसन्ती बहार बही है, आज फिर कोयल ने कुहुक दी है, आज फिर भीनी-भीनी सुगन्ध चारों तरफ फैली है, आज फिर उन हवाओं से तन-मन पुलकित हो गया है, आज फिर ऐसा लगने लगा है, जैसे यह सारा शरीर एक अजीब सी मस्ती में आप्लावित हो गया है, क्योंकि सद्गुरू जन्मोत्सव आने वाला है। फिर मेघों ने गर्जना की है, फिर मेघों ने अपनी बाहों में बिजलियों को भरा है, फिर बिजलियां इठला कर चलने लगी हैं, आज फिर गगन में रंग-बिरंगे चित्र बने हैं, और इन्द्रधनुष का आकार निर्मित हुआ है और इस इन्द्र धनुष में गुरूदेव का प्रतिबिम्ब साफ-साफ दिखाई देने लगा है— यह क्या हो रहा है, क्योंकि सद्गुरू जन्मोत्सव आने वाला है।
ये पैर फिर नृत्य करने लगे हैं, फिर एक थिरकन सी पैरों में आ गई है, ये फिर प्राणों में एक हिलोर सी उठी है, फिर अजीब सी मस्ती पूरे शरीर में छा गई है, फिर आंखों में सुरूर पैदा हो गया है, ऐसा लग रहा है, जैसे तन-मन और प्राणों ने अंगड़ाई ले ली है, ऐसा लगने लगा है जैसे बहुत कुछ नजदीक है, ऐसा लगने लगा है जैसे मैं दौड़ कर, लिपट कर एकाकार होने की प्रक्रिया में संलग्न हो रहा हूं—
यह क्या हो रहा है—यह सद्गुरूदेव का आवाहन है।
आज फिर आवाज आई है, घुंघरूओं की आवाज एक सुरीली वीणा की आवाज, एक बांसुरी की तान, एक सितार की हल्की सी आवाज, एक अजीब सी थिरकन, एक अजीब सा स्पन्दन, आंखों में एक नई रोशनी और नई चमक पैदा होने लगी है ओर होठों पर गीत मचलने लगे हैं, संगीत थिरकने लगा है, बहुत कुछ बदल सा गया है और अच्छा बदलने लगा है, यह अचानक ही क्या परिवर्तन हो रहा है। यह परिवर्तन इसलिए हो रहा है कि बहुत ही निकट सद्गुरू जन्मोत्सव है।
कुछ-कुछ अजीब सा नृत्य चारों तरफ व्याप्त हो गया है, हिरण कुलांचे मार रहे हैं, भौंरे गुंजरित होने लगे हैं, तितलियां उड़ने लगी हैं और अपने सुनहरे पंखों से जादू बिखेरने लगी हैं, पुष्प अपना सब कुछ लुटा देने के लिए भौंरों का आवाह्न कर रहे हैं और भौंरा अपना सब कुछ लुटा देने के लिए तैयार बैठा है, एक अजीब सा दृश्य बन गया है और बहुत कुछ आनन्द दायक में बदल गया है, ऐसा तो मन में कभी था ही नहीं, यह सब कुछ क्या हो रहा है, यह सद्गुरू जन्मोत्सव की झंकार है।
आकाश में बिजलियों ने ‘गुरूदेव मैं आ रहा हूं’ के अक्षर फिर छोड़े हैं, फिर बादलों ने उसमें रंग भरा है, फिर इन्द्रधनुष ने उसके चारों तरफ घेरा ड़ाला है, फिर चन्द्रमा की शीतल चान्दनी ने अपनी दूध सी मधुरता चारों तरफ बिखेर दी है, एक रूनझुन, एक मस्ती, एक थिरकन, एक आनन्द, एक पुलक, एक प्रेम और एक पूर्णता चारों तरफ दिखाई सी देने लगी है, बहुत आनन्दित हूं, बहुत पुलकित हुं, बहूत रोमान्चित हूं, शायद सद्गुरू जन्मोत्सव आने वाला है और मैं जाने के लिए मचल रहा हूं, तैयार हो गया हूं।
फिर विधाता ने मेरी भाग्यलिपि को सुनहरे अक्षरों में अंकित करने का प्रयास किया है, फिर मेरे सामने सारी सिद्धियां वरमाला लिए खड़ी हैं, माथे पर कुंकुंम लगाये हुए, मांग में सिन्दूर भरे हुए, सारा शरीर सुगन्ध से आप्लावित और कमनीय काया से ओत-प्रोत, पैरों में घुंघरूओं की झनकार और नाभिदर्शना की तरह अत्यन्त रूपवती, लावण्यमयी सुगन्धमयी सिद्धियां पूर्णता के साथ अपने हाथों में लिये हुए हार को मेरे गले में ड़ालने को आतुर हैं, उनकी आंखों में एक प्यास है, एक मस्ती है, एक खुमारी है और मेरे अंदर समाहित हो जाने के लिए आतुर हैं, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ , ऐसा हो रहा है, यह कितना सुखदायक और आनन्ददायक दृश्य है और इसी दृश्य की तो मैं कल्पना करना चाहता था, कर रहा था, अब लगने लगा है कि, शीघ्र ही सद्गुरू जन्मोत्सव आने वाला है और मैं जा रहा हूं।
फिर चाँदनी चारों तरफ बिखर गई है, फिर चन्द्रमा मन्द-मन्द मुस्कुराने लगा है और साथ ही साथ बादलों के साथ लुका-छिपी का खेल खेलने लगा है, फिर चाँदनी ने एक सरस राग छेड़ी है, फिर तारों ने छोटे-छोटे दीपक लगा कर चांदनी और वातावरण को और भी आलोकित कर दिया है, फिर एक अजीब सी बहार, एक अजीब सा अल्हड़पन जो मेरी समझ में ही नहीं आ रहा है—और यह तो सब तभी समझ में आयेगा, जब मेरा सिर गुरू के चरणों मे होगा और वह क्षण तो आ ही रहा है, साल में एक बार, परन्तु शीघ्र ही, क्योंकि सद्गुरू जन्मोत्सव आने वाला है।
फिर मैं प्रेम की परिभाषा सीखने लगा हूं, फिर मेरी आंखों के सामने प्रेम का साकार बिम्ब प्रतिबिम्ब हो रहा है, फिर मेरी आंखों में एक नवीन सपने तैरने लगे हैं, फिर मेरे होठों पर एक हलचल मचलने लगी है, फिर मेरे जीवन में एक सुगन्ध व्याप्त हो गई है, फिर मेरे मन में एक पुलक बढ़ गई है और फिर मैं एक नशे में झूमता हुआ बढ़ने लगा हूं नेपाल की ओर, क्योंकि वही तो मेरा गन्तव्य है, क्योंकि वहीं तो गुरूदेव आने वाले हैं, वहीं तो उनके पास बैठने की इच्छा है, जो साल भर से संजोए बैठा हूं, क्यों कि सद्गुरू जन्मोत्सव का पर्व ही ऐसा है। फिर नदियां तेजी के साथ बहने लगी हैं, अल्हड़पन के साथ, किनारों को तोड़ती हुई, फिर नदियों की लहरों पर संगीत गुनगुनाने लगा है, फिर नदियां आपस में हंसी-ठिठोली करने लगी हैं, फिर लहरों पर प्रतिबिम्बित होता चाँद बहुत ही सुन्दर लगने लगा है, फिर अगाध जलराशि दौड़ कर समुद्र में मिलने के लिए आतुर हो रही है, इतना नदियों का वेग तो मैंने कभी नहीं देखा और ये मुझे सिखा रही हैं, आवाज दे रही हैं, कि तुम्हें दौड़ते हुए, बिना रूके हुए, एकदम से समुद्र में मिल जाना है, क्योंकि समुद्र स्वयं नेपाल में आ रहा है।
फिर देवताओं का जमघट लगने लगा है, फिर ऋषियों का आवाह्न होने लगा है, फिर अजीब सी मस्ती छाने लगी है, फिर अजीब सा पवित्र वातावरण बनने लगा है, फिर ऐसा लगा है, जैसे हम कल्पतरू की छांव के नीचे बैठे हैं। हमारे लिए सिद्धाश्रम के द्वार खुल गए हैं और यह प्राप्ति ही जीवन की पूर्णता है, दिव्यता है। क्योंकि जहां गुरू हैं, वहीं सब कुछ है, और यह पूर्णता में समावेश होने के लिए आतुर है और इस बार मैं पूर्ण रूप से समर्पित हो कर ही सब कुछ पा लेना चाहता हूं, क्योंकि मेरे सामने पूर्णतः स्पष्ट है, कि सद्गुरू जन्मोत्सव आ रहा है।
जो रूका, वह समाप्त हो गया, जो झुका वह मिट गया, जो डरा वह मर गया, जो घबराया वह जीवित नहीं रह पाया। असम्भव जैसी कोई चीज है ही नहीं, यह एक कल्पना है और मेरे शब्दकोष में असम्भव जैसा कोई शब्द है ही नहीं। क्योंकि हर हालात में साधक बनकर, गुरू चरणों में समर्पित होकर, शिष्य बनकर गुरू चरणों में मुझे पहुंचना ही है, जहां मेरे प्राणप्रिय गुरूदेव हैं, स्नेह है, करूणा है, अपनत्व है, सब कुछ है और उन सबको बाहों में समेट लेना चाहता हूं और सीने से भींच करके अपने अन्दर उतार देना चाहता हूं। क्योंकि ऐसा अद्वितीय अमृत महोत्सव तो सद्गुरू जन्मोत्सव ही है और मैं हर हालत में पहुंचूंगा। यह मेरा दृढ़ निश्चय है, विधाता भी मुझे नहीं रोक सकता।
मेरे जीवन का ध्येय, मेरे जीवन का चिन्तन, मेरे जीवन का लक्ष्य गुरूदेव हैं, मेरे प्राण गुरूदेव हैं, मेरे श्वास गुरूदेव हैं, मेरी आत्मा गुरूदेव हैं, मेरे हृदय की धड़कन गुरूदेव हैं। मेरे जीवन की पूर्णता गुरूदेव हैं। जब सब कुछ मेरे लिए मेरे गुरूदेव ही हैं तो यहां पर मेरे अस्तित्व, मेरी स्थिति को मैं कैसे छोड़ सकता हूं। मुझे हर हालत में गुरूदेव के पास पहुंचना ही है, निश्चित रूप से पहुंचना ही है। क्योंकि ऐसा अमृत महोत्सव साल में एक बार ही तो मानसरोवर की धारा पर साधकों के लिए, शिष्यों के लिए, गुरूदेव के मानस पुत्रों के लिए पूर्णता, श्रेष्ठता तथा हम जैसे शिष्यों को उस परमतत्व के साथ आत्म साक्षात्कार कराने के लिए अवतरित होता है।
मुझे इस पार और उस पार के विभेद को मिटा कर गुरूदेव के पावन पवित्र चरणों तले पहुंचना ही है, स्वयं को भुला कर स्वयं को श्रद्धा से आप्लावित करके गुरूदेव में विलीन हो जाना है, और मुझे आपके पास पहुंचने में कोई भी बाधा, अड़चने, किसी भी प्रकार के नकारात्मक स्थितियां, मेरे और आपके बीच बाधक नहीं बन सकती, क्योंकि मैं आपके सहारे हूं, मैं आपके चरणारविन्दे नतमस्तक हूं। मैं आ रहा हूं गुरूदेव— मैं आ रहा हूं—।
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