





जीवन को समझने के लिए उसके बाह्य रूप का चिन्तन व्यर्थ है, इसकी अपेक्षा शरीर के अन्दर स्थित सूक्ष्म शरीर और उसके चक्रो को समझना नितांत अनिवार्य है, शरीर में मुख्य रूप से सात चक्र हैं। कुण्डलिनी जागरण के प्रारम्भ में आन्तरिक प्रकाश प्रकट नहीं होता किन्तु प्राण अपना कार्य इन चक्रों में प्रारम्भ कर देता है, अर्थात मूलाधार में स्थित अपान-प्राण ध्यान की ठोकर खाकर यहां की नाडि़यों को मथित करके मूलाधार से ले कर सुषुम्ना तक चीटियों के रेंगने जैसी गति या कम्पन करता है या गर्म-गर्म जल के बहने जैसी क्रिया उत्पन्न हो जाती है कभी यह स्पर्श अत्यन्त शीतल होता है जिससे सारा देह रोमाचित हो जाता हैं तो कभी प्राण की इस वेगवती अवस्था में साधकों के हाथ पैर बड़े वेग के साथ उठते-बैठते, झटके लगते है ओर कोई-कोई साधक को तो ऐसी स्थिति में घण्टे की आवाज या चिडि़यों की चीं चीं, ढोल, वीणा या मेघ गर्जन आदि के शब्द सुनाई देता है, ये सारी स्थितियां इस बात की द्योतक होती है कि साधक की कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई हैं।
जो मूलाधार से आज्ञा चक्र तक हैं, ये सभी चक्र अपने आप में सुषुप्तावस्था में रहते हैं, परन्तु विशेष क्रिया के द्वारा तथा गुरुदेव के सहयोग से इन चक्रों को जगाने की क्रिया प्रारम्भ की जाती है, जब ये चक्र जगते है, तो विचित्र और विविध अनुभव प्राप्त होते है, प्रत्येक चक्र जगने पर नवीन विचार और नवीन अनुभूतियाँ होती रहती हैं, प्रत्येक चक्र के साथ-साथ एक ऐसा अनिवर्चनीय आनन्द प्राप्त होता है, जो शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता यह तो तभी अनुभव होता है, जब साधक स्वयं इसमें प्रवेश करें।
आज्ञा चक्र तक पहुँचते-पहुँचते साधक स्वयमेव सिद्ध बन जाता है, और उसे कई सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं, वह देखता है, कि धीरे-धीरे प्रकृति उसके नियन्त्रण में हो रही है, वह अनुभव करता है कि वह जो कुछ भी चाहता है, तुरन्त प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाता है, वह वायु में से पदार्थ की सृष्टि करने में समर्थ हो पाता है, और इसके द्वारा लाखों लोगों का कल्याण होने लगता हैं। परन्तु यह तो उस लम्बे रास्ते का एक पड़ाव हैं, जिसे आज्ञा चक्र कहते हैं, इसके आगे पहुँचना जीवन की सर्वौच्च सिद्धि हैं, जो कि योगियों के लिए भी दुर्लभ हैं, इसको सहस्त्रार जागरण कहते हैं।
हमारे सिर के मध्य भाग में एक ऐसा उल्टा छाते की तरह का गुम्बज हैं, जो अधोमुखी है, ओर जिसमें से निरन्तर रस प्रवाहित होता रहता है, इसके हजार से भी ज्यादा छेद होते है, जिन छेदों में से अमृत तत्व टपकता रहता है, इसीलिये इसको सहस्त्रार कहा गया है, जब साधक आज्ञा चक्र जागरण करने के बाद कुण्डलिनी को आगे बढ़ाता है, तो एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में रूपान्तरित करने की सामर्थ्य पैदा कर लेता है, उससे भी ज्यादा वह ध्यान लगाने की प्रक्रिया में सिद्ध हो जाता हैं।
जब कुण्डलिनी ईगंला और पिगंला नाडि़यों के माध्यम से सुषुम्ना को साथ लेकर सहस्त्रार गुम्बेद से टकराती है, और टकराने से उनमें से रस झरने लगता है, जो कि अमृत तत्व होता है, यह अमृत तत्व इन नाडि़यों के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाता है, और सारा शरीर स्वस्थ निरोग, तेजस्वी, कांतिमान तथा प्रकाशयुक्त हो जाता है, उसके चेहरे पर एक अपूर्व आभा ओर ज्योति दिखाई देने लगती है, एक ऐसा आभा मण्डल बन जाता है, जैसा कि देवताओं के सिर के चारों ओर दिखाई देता हैं, ऐसा होने पर साधक को स्वतः ही वाक् सिद्धि प्राप्त हो जाती है वह किसी को श्राप भी देता है, तो वह तुरन्त प्रभावयुक्त हो जाता है, और वरदान भी देता है तो पूर्ण हो जाता है, ऐसे ही साधक को सिद्ध पुरूष कहा जाता हैं।
साथ ही साथ सहस्त्रार जागरण के विचार शून्य होकर अखण्ड आनन्द में लीन हो जाता है, मानसिक संताप और कष्ट हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं, और वह अखण्ड समाधि में लीन होने की प्रक्रिया सीख जाता हैं, इसकी वजह से साधक मनचाही समाधि प्राप्त कर अखण्ड आनन्द में निमग्न हो जाता हैं। ऐसी समाधि, ऐसा अनिवर्चनीय आनन्द और ऐसी तृप्ति तो उच्चकोटि के योगियों को भी तभी प्राप्त हो जाती है, जब उसके जीवन के पुण्य उदय हों जब उसे योग्य गुरु मिले और इससे भी बड़ी बात यह कि वह गुरु इस प्रकार की साधना कराने के लिए तत्पर हों, उनके आशीर्वाद से ही तो ऐसा अवसर प्राप्त होता है, और जो व्यक्ति ऐसे अवसर पर चूक जाता है, उससे ज्यादा दुर्भाग्याशाली व्यक्ति और कौन हो सकता हैं?
हमारे मस्तिष्क में लाखों छोटे-छोटे सैल हैं, पर इनमें से केवल एक प्रतिशत सैल ही जागृत है, बाकी सारे सैल या ग्रन्थियां सुषुप्तावस्था में हैं, इन सेलों में आश्चर्यजनक गुण और प्रभाव है, इसके जाग्रत होने से व्यक्ति त्रिकालदर्शी हो जाता है, भूत, वर्तमान, और भविष्य उसके सामने साकार होता है, ऐसा व्यक्ति अमृत तत्व सैल को जगाकर मृत्यु पर नियन्त्रण प्राप्त करता हुआ पूर्ण निरोग और स्वस्थ बना रहता है, प्रकृति पर अधिकार कर लेता है, प्राणश्चेतना ग्रन्थी के जगने से वह स्वयं के और किसी भी व्यक्ति के पिछले जीवन और आगे के जीवन को देख पाने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है और जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता प्राप्त करता हुआ अजर अमर ऐसी ही क्रिया कि प्रारम्भिक अवस्था में साधना का कुछ अंश साधक को प्राप्त हो सकें इसीलिए दिव्यतम कुण्डलिनी जागरण चेतना का आगाज सद्गुरुदेव के पूर्ण आर्शीवाद और वरदहस्त स्वरूप साक्षीभूत रूप में प्रमुख रूप से इन साधकों ने साधना में भाग लेकर अपने जीवन को श्रेष्ठतम बनाने की चिंतन शीलता की और एक कदम आगे बढ़ाया।
इस साधनात्मक शिविर को पूर्णतया सही रूप से क्रियान्वित करने में तन मन से, समर्पित मानस पुत्र-पुत्री रूपी शिष्यों ने हृदय भाव से सद्गुरुदेव को सहयोग दिया वे अरूण मिश्रा, रामप्रताप, अमृत, नीलाम्बर, निर्मल, मनीष, सिंधु, शंकर, लेखराम, तरूण, स्वस्तिक, अंकुश, अमित, अंजलि, संजय, मुकेश, भास्कर और मनोज गौतम जैसे आत्मीय शिष्यों ने साधना में भाग लेने वाले साधकों को हर तरह की व्यवस्था प्रदान करने और लगातार पांच दिनों तक दोनों ही समय मिष्ठान के साथ सुस्वादु भोजन, प्रसाद, चाय, विश्राम इत्यादि की सेवा हर समय मुस्कुराहट और प्रेम भाव से अपने सद्गुरु के नाम को सुशोभित करते हुए सेवा कार्य किया। सही अर्थों में इन सभी शिष्यों को सद्गुरुदेव का पूर्ण वरद हस्त और आर्शीवाद प्राप्त हैं। परन्तु इनसे भी श्रेष्ठ इनके माता-पिता हैं जिन्होंने ऐसे पुत्र-पुत्रियों को ज्ञान और चेतना से आप्लावित कर सेवा के लिए कैलाश सिद्धाश्रम में भेजा। सही अर्थों में इन शिष्यों से भी अधिक इनके माता-पिता को सद्गुरुदेव का यही आर्शीवाद है कि उनका जीवन वंसन्तोमय बना रहे साथ ही अनेक-अनेक रगों से हर्ष-उल्लास के साथ आनन्दमय बना रहें और ये सही अर्थों में साधुवाद के पात्र हैं। ज्ञान से ओत-प्रोत होने हेतु भविष्य में भी ऐसे ही शिष्यों की गुरु को खोज रहती हैं जो भी सेवा और ज्ञान के लिए शिष्य आना चाहे उनके लिए आश्रम हर रूप में खुला हैं।
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