





विष्णु ने क्रोध में भर कर कहा- तुम्हारा कर्त्ता तो मैं हूं, तुम मेरी नाभि से उत्पन्न मेरे ही अंश हो। तुम मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हारी रक्षा कंरूगा। इस पर दोनों में युद्ध छिड़ गया, तभी आकाश में गम्भीर वाणी में ‘ऊँ-ऊँ’ की ध्वनि हुई और एक लिंगाकार स्वरूप प्रकट हुआ। विष्णु ने उस स्वरूप मे भी ऊँ आदि अक्षरों को देखा। इस अग्नि सदृश लिंग को देखकर दोनों ही विचार करने लगे, तभी वहां पर परम ऋषि प्रकट हुए, जिन्होंने शिव जी को ज्ञान दिया। इसके बाद मृत्युंजय मंत्र उत्पन्न हुआ। उसके साथ ही पंचाक्षर मंत्र ‘ नमः शिवाय’ तथा ‘क्षम्यो’ चिंतामणि मंत्र भी उत्पन्न हुआ दक्षिणामूर्ति मंत्र भी उत्पन्न हुआ और ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य भी उत्पन्न हुआ। तदुपरांत दोनों ने प्रसन्न चित से स्तुति प्रारम्भ की और विष्णु ने भगवान शिव से पूछा- ‘हे प्रभू! आप किस प्रकार प्रसन्न होते हैं?’
शिव ने कहा- मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं, तथा लिंग रूप में सदा पूज्य हूं। इसकी स्तुति से जैसे तुम्हारा दुःख दूर हुआ है, उसी प्रकार दुःखी प्राणी मुझे लिंग में पूजकर अपना दुःख दूर कर सकता है। मैं अनेक प्रकार के फलों और मनोरथों को देने वाला हूं। इस प्रकार शिव की किसी भी प्रकार से साधना करना पूर्ण फलप्रद होता ही है और वह भी यदि शिवरात्रि या श्रावण मास में की जाए, तो और भी उत्तम रहता है।
श्रावण मास को ‘शिव सिद्धि मास’ भी कहते है। भगवान शिव को प्रिय यह श्रावण मास प्रत्येक साधक के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। जो साधनाओं के क्षेत्र में काल, मुहूर्त और पर्व विशेष के महत्व को समझते हैं, उन्हें ज्ञात है, कि श्रावण मास के सोमवारों का तंत्र दृष्टि से कितना अधिक महत्व होता है। ये सोमवार भगवान शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त करने के दिवस होते हैं, जिनमें कोई भी साधक शिव से सम्बन्धित साधना सम्पन्न कर अपेक्षित लाभ प्राप्त कर सकता है।
जीवन में क्षय और क्षीणता के निवारण और जीवन के पग-पग पर हो रही मृत्यु पर पूर्ण विजय हेतु पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रदेव से कर दिया, परन्तु चन्द्रमा का अनुराग एक मात्र रोहिणी से हुआ, जिससे अन्य 26 उपेक्षित हो गई। इस पर दक्ष ने चन्द्रमा को शाप दे दिया- ‘जा तू क्षयी हो जा!’ फलतः सुधाकर का सुधावर्षण कार्य रूक गया और चराचर में त्राहि-त्राहि होने लगी।
चन्द्रमा की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को भगवान मृत्युंजय की आराधना करने की सलाह दी। छः मास तक महामृत्युंजय मंत्र जप व कठोर तप से भगवान मृत्युंजय प्रकट हुए और चन्द्रमा को अमरत्व प्रदान किया और कहा- ‘कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, पर साथ ही शुक्ल पक्ष में उसी क्रम में तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी और प्रत्येक पूर्णिमा को तुम पूर्ण चन्द्र हो जाया करोगे। इस प्रकार संसार में पुनः सुधाकर की सुधा किरणों का संचार होने लगा।
भगवान महामृत्युजंय शिव का वह रूप है, जिसकी साधना कर साधक समस्त रोगों, आकस्मिक दुर्घटनाओं, असामयिक मृत्यु कलिष्ट रोगों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर सकता है। दुःसाध्य रोगों के निवारण हेतु भी यह प्रयोग सफल होते देखा गया है। इस प्रयोग को करने के लिए ‘महामृत्युंजय यंत्र’, ‘आपदाहारिका’ और काली हकीक माला’ की आवश्यकता होती है। श्रावण मास के प्रथम सोमवार को प्रातः शुद्ध होकर साधना में सफलता के लिए गुरुदेव से प्रार्थना करें-
योगीश्वर गुरोस्वामिन् दैशिक स्वरात्मनापर,
त्रहि त्रहि कृपा सिन्धो, नारायण परात्पर।
त्वमेव माता च पिता—-
इसके बाद गणपति का स्मरण करें-
विघ्नराज नमस्तेऽस्तु पार्वती प्रियनन्दन,
गृहाणार्चामिमां देव गन्धपुष्पाक्षतैः सह।
ऊँ गं गणपतये नमः।
सामने थाली पर कुंकुम से ‘ऊँ’ व स्वस्तिक बनाएं।
‘ऊँ’ पर ‘महामृत्युजंय यंत्र’ एवं स्वस्तिक पर
‘आपदाहारिका’ को स्थापित करें। दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ मम आत्मनः श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल
प्राप्ति निमितं अमुकस्य (नाम) शरीरे सकल रोग
निवृर्त्ति पूर्वकं आरोग्य प्राप्ति हेतु महामृत्युंजय
मंत्र जप करिष्ये।
जल को भूमि पर छोडे़ व महामृत्युंजय का
ध्यान करें-
मृत्युंजय महादेव सर्वसौभाग्यदायकं
त्रहि मां जगतां नाथ जरा जन्म लयादिभिः।
इसके बाद ‘ऊँ ह्रौं जूं सः प्रसन्न पारिजाताय स्वाहा’ मंत्र बोलते हुए एक-एक कर 108 बिल्व पत्र यंत्र पर चढ़ाएं। आरोग्य और धन प्राप्ति की कामना करें, फिर काली हकीक माला से निम्न मंत्र की 11 माला जप करें-
अगले दिन सभी सामग्री को शिव मंदिर में चढाएं।
साधनाओं में पूर्ण सिद्धि व भाग्योदय के लिए महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सलाह दी थी, कि वह यदि महाभारत में विजयी होना चाहता है तथा कौरवों की असंख्य सेना पर सफलता पाना चाहता है, वह यदि मृत्यु को जीतना चाहता है और वह यदि जीवन में पूर्ण सफलता के साथ भाग्योदय चाहता है, तो भगवान शिव की ‘पाशुपतास्त्रेय साधना’ के अलावा और कोई ऐसी साधना नहीं है, जो कि जीवन मे पूर्णता दे सके।
पाशुपतास्त्रेय साधना को प्राप्त करने के लिए विश्वामित्र जैसे दुर्धर्ष ऋषि को भी पांच हजार वर्ष तक तपस्या करनी पड़ी थी। मार्कण्डय ऋषि ने एक स्वर में स्पष्ट किया है कि पाशुपतास्त्रेय साधना प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिए यही प्रयोग श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
‘शिव पुराण’ में कई लाभ बताए गए हैं-
1- कुग्रहों के प्रभाव एवं स्वयं के कर्म दोषों से साधनाओं में सिद्धि मिलते-मिलते रह जाती है, उन सभी के दुष्प्रभाव भगवान पशुपति की कृपा से समाप्त हो जाते हैं और अगले वर्ष भर के लिए उसके कर्म दोषों व ग्रह नक्षत्रों का विपरीत प्रभाव लगभग नगण्य हो जाता हैं जिससे किसी भी साधना में सफलता निश्चित हो जाती है।
2- साधक को जीवन में कहीं पर भी असफलता, अपमान या पराजय नहीं देखनी पड़ती।
3- भगवान शिव भाग्य के अधिपति देवता हैं। जिनका भाग्योदय नहीं हो रहा हो या जिनका भाग्य कमजोर हो, जीवन में कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो रहे हों अथवा कर्म के विपरीत स्थिति प्राप्त हो रही हो तो उन्हें अवश्य ही भगवान शिव की साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
4- भगवान शिव मोक्ष प्रदायक देवता हैं, इस साधना के प्रभाव से सांसारिक जीवन से निरंतर अनूकुलता आनी प्रारम्भ हो जाती है।
5- इस साधना को यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाए, तो भगवान शिव के अत्यन्त भव्य दर्शन भी साधक को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
इस साधना में ‘बाण लिंग’ की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है। बाण लिंग को बिल्प पत्र का आसन देकर किसी पात्र में स्थापित करें और निम्न मंत्र से ध्यान करें-
ऊँ ध्यायेनित्यं महेशं रजत गिरि निभं चारु
चन्द्रावतंसं, रत्न कल्पोज्वालांगं परशु मृग
वराभीति हस्तं प्रसन्नं पप्रासीनं समन्तात् स्तुत
ममरै र्गणैर्व्याघ्र-कृतिं वसानं, विश्वाद्यं विश्व
वन्द्यं निखिल-भय- हरं पंच वक्त्रं त्रिनेत्रं।।
अब अपने सिर पर एक पुष्प रखें तथा बाण लिंग के सामने भी एक पुष्प रखकर अपने और शिव के परस्पर प्राण सम्बन्ध स्थापित करते हुए अग्र लिखित मंत्र उच्चारण करें-
पिना-धृक् इहावह इहावह, इह तिष्ठ इह तिष्ठ,
इह सिन्नधेहि इह सिन्नधेहि, इह सिन्नधत्स्व,
यावत् पूजां करोम्यहं तावत्वं सुस्थिरो भव पशुपतये नमः।
इसके बाद ‘रुद्रयामल तंत्र’ के अनुसार ‘रुद्राक्ष माला’ से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें-
।। ऊँ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धृक्,
पशुपति, शिव, महादेव, ईशान नमः शिवाय।।
यह सम्पूर्ण प्रकार की सफलता देने वाला मंत्र है और इसके माध्यम से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे ‘अष्टाष्ट मंत्र’ या ‘अष्ट शिव मंत्र’ कहते हैं, जो अपने आप में अद्वितीय है। प्रयोग समाप्ति के बाद आरती करें। रुद्राक्ष माला व बाण लिंग को पूजा स्थान में ही स्थापित करें।
तनाव तथा क्लेश से मुक्ति व जीवन में रस प्राप्ति हेतु भगवान शिव का ही नाम रसेश्वर भी है। भारतीय शास्त्रों में ‘रस’ की धारणा पारद से ही की गई है। पारद के लिए कहा गया है –
रसनात्सर्वधातुनां रस इत्याभिधीयते
जरारुग्मृत्युनाशय रम्यते वा रसो मतः।
अर्थात जो समस्त धातुओं को अपने में समाहित कर लेता है और जो बुढ़ापे, रोग व मृत्यु की समाप्ति के लिए ग्रहण किया जाता है, वही रस की संज्ञा से विभूषित है।
पारद को भगवान शिव का वीर्य कहा गया है इसी के फलस्वरूप भगवान शिव नित्य आनन्द में मग्न रहते हैं, इसी रस मग्न होने की क्रिया से उन्हें रसेश्वर भी कहा गया है। रस का अर्थ है आनन्द, मस्ती, प्रफुल्लता, जोश, तरंग। भगवान शिव को यदि देखा जाए, तो उनकी सवारी नंदी बैल और पार्वती जी की सवारी शेर- दोनों ही परस्पर बैरी। भगवान शिव के गले में नाग और शिव के पुत्र कार्तिकेय की सवारी मोर- दोनों परस्पर बैरी हैं। शिव के गले में सर्प और गणेश का वाहन चूहा भी परस्पर बैरी हैं। अब शेर बैल पर झपटे, कि सांप चूहे पर झपटे या मोर सांप पर झपटे, पर भगवान शिव किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्त अपने ही रस में मग्न है। यही आनन्द की स्थिति प्राप्त करना ही जीवन में रस घोलना है।—- और भगवान रसेश्वर की साधना से यह संभव है।
इस साधना को सम्पन्न करने से साधक के जीवन में सर्प, शेर रूपी शत्रु समाप्त होते है साथ ही सामान्य मनुष्य चूहे की तरह जीवन व्यतीत करता है और जिससे तनाव चिंता व्याधि प्राप्त होती है उन से वह पूर्ण मुक्त हो जाता है। जीवन में युवा अवस्था चिरकाल तक बनी रहती है उसके अंदर एक नवीन तरंग और मस्ती का संचार हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आना, तनाव में आ जाना, गृह क्लेश हो, लड़ाई झगड़ा हो, तो वह सब समाप्त हो जाता है। व्यक्ति स्वयं तो प्रसन्न रहता है, उसके सम्पर्क में आने वाले लोग भी प्रभाविक होते हैं, क्योंकि उसके जीवन में रस समाविष्ट हो जाता है इस प्रयोग द्वारा।
इस साधना में ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’, ‘रसेश्वरी पारद गुटिका’ तथा ‘पंचमुखी रुद्राक्ष’ की आवश्यकता होती है। इसमें माला की आवश्यकता नहीं होती है। पहले संक्षिप्त गुरु पूजन व गणेश-स्मरण कर लें। हाथ में जल लेकर मन में संकल्प करें कि ‘मैं (नाम बोलें) जीवन में समस्त तनाव, क्लेश, अशान्ति, द्वन्द्व की निवृत्ति एवं जीवन में पूर्ण आनन्द तथा रस प्राप्ति के लिए रसेश्वर साधना सम्पन्न कर रहा हूं।’
सामने ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ को किसी पात्र में स्थापित करें। शिवलिंग के बाई ओर अक्षत की ढेरी पर ‘रसेश्वरी पारद गुटिका’ को स्थापित करें। दोनों हाथ में ‘पंचमुखी रुद्राक्ष’ लेकर भगवान शिव का निम्न ध्यान मंत्र बोलते हुए रुद्राक्ष को यंत्र पर अर्पित करें।
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं
चारुचन्द्रावतंसम्, रत्नाकल्पोज्जवलाड्गं
परशुमृगवराभीति हस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं
समन्तात् स्तुतमरगणैर्व्याघ्रकृतिं वसानम्,विश्वाद्यं
विश्वन्धं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।
निम्न मंत्र बोलते हुए शिवलिंग पर बिल्व पत्र चढ़ाएं।
ऊँ रसेश्वराय नमः। ऊँ भवाय नमः। ऊँ रुद्राय
नमः। ऊँ कालान्तकाय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
ऊँ नागेन्द्रहाराय नमः। ऊँ कालकरणाय नमः।
ऊँ लास्यप्रियाय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः। ऊँ
शिवाय नमः। ऊँ मृडाय नमः। ऊँ नर्मदेश्वराय
नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
प्रत्येक मंत्र बोलते हुए शिवलिंग पर अक्षत चढाएं –
ऊँ रसेश्वराय नमः। ऊँ शर्वाय नमः। ऊँ भवाय
नमः। ऊँ महेशाय नमः। ऊँ उग्राय नमः। ऊँ
नर्मदेश्वराय नमः। ऊँ ईशानाय नमः। ऊँ
महादेवाय नमः। ऊँ भद्राय नमः। ऊँ रसेश्वराय
नमः।
एक-एक मंत्र बोलते हुए शिवलिंग पर लाल
पुष्प या धतूरे का पुष्प चढ़ावें –
ऊँ अघोराय नमः। ऊँ शर्वाय नमः। ऊँ विरुपाय
नमः। ऊँ विश्वरूपिणे नमः। ऊँ त्रय्म्बकाय नमः।
ऊँ कपर्दिने नमः। ऊँ भैरवाय नमः। ऊँ
शूलपाणाये नमः। ऊँ ईशानाय नमः। ऊँ
महाकालाय नमः। ऊँ रसेश्वराय नमः।
फिर निम्न मंत्र को आधे घण्टे तक जप करें –
प्रयोग समाप्ति पर शिवलिंग को पूजा स्थान में रख दें व अन्य सामग्री को शिव मंदिर में अर्पित करें।
भगवान शंकर काल के भी महाकाल हैं, महाकाल तो वह धुरी है, जिस पर समस्त ब्रह्माण्ड गतिशील हैं। महाकाल में ही यह समस्त चराचर विश्व व्याप्त है, जीवन को महामृत्युंजय युक्त, वैभव लक्ष्मी, श्रेष्ठ सौभाग्य प्राप्ति, अष्ट सिद्धि और नव-निधि की प्राप्ति के लिए स्वर्ण खप्पर साधना पूर्ण लाभप्रद है। ब्रह्मयामल में एक जगह कहा गया है, कि यदि साधक गुरु द्वारा प्रदत्त दिव्य शक्तिपात दीक्षाओं (महामृत्युंजय, वैभव लक्ष्मी, अखण्ड सौभाग्यवती आदि) को अक्षुण्ण बनाये रखना चाहता है, तो उसके लिए रावण कृत स्वर्ण खप्पर साधना अनिवार्य है। रुद्रयामल में स्पष्ट है, कि साधक इस साधना में गुरु आज्ञा एवं उनका दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करके ही प्रवृत हो। आज्ञा मानसिक रूप से प्राप्त की जा सकती है— पर यह है अति आवश्यक, क्योंकि महाकाल अति उग्र देव हैं और साक्षात महाकाल को उपस्थित करना एक प्रकार से मृत्यु का आलिंगन करना है।
तभी तो दया से अभिभूत महाकाल कभी भी साधना के दौरान साधक के सामने उपस्थित नहीं होते— फिर भी साधक को स्पष्टतः अनुभव हो जाता है, कि कोई आया है और उसे आवाज भी सुनाई देती है। तब महाकाल आशीर्वाद स्वरूप मृत्यु देते है—– मृत्यु देते हैं साधक की दरिद्रता की, उसकी वासनाओं की, उसके रोगों की, उसके अष्टपाशों को, उसके जीवन की असफलताओं को—-
—- और चूंकि महाकाल स्वयं काल स्वरूप हैं एवं उस पर आरूढ़ हैं, अतः ऐसा साधक स्वतः ही त्रिकालदर्शी हो जाता है, कई-कई जन्मों पूर्व एवं कई जन्मों की स्थिति उसके सामने स्पष्ट हो जाती है। रावण ने भी शिव को प्रसन्न कर अपने राज्य लंका को स्वर्ण निर्मित किया साथ ही उसे अभय का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।
ऐसा साधक शतायु जीवन प्राप्त करता है, उसके अनेक जन्मों के ग्रह दोष स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं, शत्रु उसके समक्ष आते ही वीर्यहीन हो जाते हैं एवं स्वर्ण युक्त वैभव लक्ष्मी और जीवन को अखण्ड सौभाग्य युक्त बनाने में यह साधना सक्षम है। सोमवार को यह साधना प्रारम्भ करें। रात को 9 बजे के बाद स्नान कर, स्वच्छ लाल पीताम्बर धारण कर गुरु पूजन सम्पन्न करना चाहिए और अपने पूजा कक्ष में बाजोट बिछा कर उस पर एक थाली में ‘स्वर्ण खप्पर यंत्र’ स्थापित कर धूप, दीप, पुष्प, सिन्दूर, नैवेद्य से पंचोपचार पूजन करें।
इसके बाद महाकाल का ध्यान करें-
स्त्राष्टारोऽपि प्रजानां प्रबलभवभवयाद यं नमस्यन्ति देवाः।।
यावत ते सम्पृष्टोऽप्यवहितमनसां ध्यानमुक्तात्मनां चैव नूनं।।
लोकनामकदिदेवः स जयतु भगवांछीमहाकालनामा।
विभ्राणः सोमलेखा महिवलयुतं व्यक्तलिंगं कपालम।।
ध्यान के उपरान्त ‘स्वर्ण चैतन्य माला’ से निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप 21 दिन तक नित्य करें-
यदि साधना के दौरान भयानक दृश्य उत्पन्न हो, तो डरे नहीं, गुरु स्मरण कर साधना में लगे रहें। साधना समाप्त होने पर यंत्र तथा माला को किसी नदी में विसर्जित कर दें।
धर्म अर्थ काम युक्त पूर्ण जीवन की प्राप्ति एवं सर्वरक्षा हेतु ‘रूद्र सहितां’ में वर्णन आता है कि एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया पर भगवान शिव को नहीं बुलाया। फिर भी जिद करके सती अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने पहुंची, लेकिन उन्होंने वहां अपने पिता दक्ष से पतिदेव शिव के प्रति अपमानजनक शब्द सुने और इस दुःख को सहन न कर उन्होंने वहीं यज्ञ कुण्ड में कूद कर प्राण त्याग दिये।
भगवान शिव को पार्वती के बारे में ज्ञात हुआ तो तब भगवान शिव ने रौद्र रूप में आकर अपने गणों को भेजकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस किया। भगवान रुद्र अपने साधक के जीवन में आयी सभी बाधाओं को उसी प्रकार ध्वंस्त कर देते हैं, जिस प्रकार उन्होंने दक्ष के यज्ञ को ध्वंस्त किया था। मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की बाधायें आती रहती है- शत्रु बाधा, तंत्र बाधा, शारीरिक पीड़ा के फलस्वरूप असमय मृत्यु के ग्रास बन जाते है। भगवान शिव अपने साधक के कार्यों में आ रहे हर विघ्न, अड़चनों को ध्वंस कर उसे पूर्ण सफलता और विजय प्रदान करते हैं। साथ ही स्वस्थ्य दीर्घायु जीवन की प्राप्ति सम्भव हो पाती है। इस साधना को पति-पत्नी दोनों करे तो जीवन में स्नेह प्रेम अखण्ड सौभाग्यता की वृद्धि होती है।
इसके लिए साधक के पास स्फटिक शिवलिंग, शिव सुहाग माला एवं श्रृंगारी होना आवश्यक है। संक्षिप्त रूप से गुरु पूजन करें व गणपति का ध्यान करें। इसके बाद स्फटिक शिवलिंग को किसी पात्र में स्थापित करें। एक पात्र में पंचामृत बनाकर उसमें श्रृंगारी को डुबो दें। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करें-
सर्वव्यापिन मीशानं रूद्रं वै विश्वरूपिणम्,
गंगाधरं दशमुखं सर्वाभरण भूषितम्।
अब नीचे दिये पांच श्लोकों का उच्चारण करें, प्रत्येक श्लोक के साथ एक बिल्व पत्र अर्पित करें, इस प्रकार पांच बिल्व पत्र यंत्र पर चढ़ाएं-
पश्चिमं पूर्ण चन्द्राभं जगत् सृष्टिकरोज्ज्वलम्।
सद्योजातं यजेत् सौम्यं मन्दस्मित मनोहरम्।।1।।
उत्तरं विद्रुमप्रख्यं विश्वस्थितिकरं शुभम्।
सविलासं त्रिनयनं वामदेवं शिवगौरी नमः।।2।।
दक्षिणं नीलजीभूत संहारकारकम्।
वक्रभ्रकुटिलं घोरमघोराख्यं तमर्चयेत्।।3।।
यजेत् पूर्वं सुहाग श्रृंगार सदृशप्रभम्।
तिरोधान ट्टत्यपरं शिव तत्पुरूषाभिधम्।।4।।
ईशानं स्फटिकप्रखयं सर्वभूतानुकम्पिनम्।
दीर्घायु आरोग्यम् रूप ऊर्ध्वमुखं यजेत्।।5।।
ऊँ साम्ब सदा शिवाय नमः।
इसके बाद ‘शिव सुहाग माला’ से अखण्ड सौभाग्यवती लक्ष्मी प्राप्ति के लिए 11 माला मंत्र जप करें।
माला व शिवलिंग को पूजा स्थान में रखें। श्रृंगारी को अगले दिन किसी शिव मंदिर में चढ़ा दें।
ये पांचों साधनाएं अत्यंत तेजस्वी और अद्वितीय है। जीवन का तात्पर्य ही अभय और निडर होना है मानसिक प्रसन्नता के पश्चात् ही आनन्द की अनुभूति प्रारम्भ होती है। इसीलिए व्यक्ति को बलशाली, अभय, निरोगी, धनवान, पूर्ण ऐश्वर्यवान, प्रत्यक्ष सिद्धिवान होना चाहिए।
मेरे अनुभव में जीवन को उक्त विशेषताओं से पूर्ण करने हेतु शिष्य और साधक को ये पाचों दीक्षाएं सद्गुरु से प्राप्त करनी ही चाहिए। क्योंकि ये दीक्षाएं प्राप्त करने के पश्चात् ही व्यक्ति अपने भौतिक और गृहस्थ पक्षों को पूर्ण कर पाता है। जीवन की समस्त बाधाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर जीवन को आरोग्य युक्त बना सकेंगे साथ ही काल को पूर्ण वश में करना सम्भव हो पाता है । श्रावण मास में ये पांचों दीक्षाएं प्राप्त कर अपने जीवन को सौभाग्य, आरोग्य से ओत-प्रोत करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो सकेगी। प्रत्येक दीक्षा के साथ भगवान सदा शिव महादेव की चेतना से ओत-प्रोत एक साधना सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान की जा सकेगी। जिससे की आप जीवन के हर क्षेत्र में दक्ष हो सके और साधना के माध्यम से शिवतत्व का भाव अक्षुर्ण बना रह सके।
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