





कराग्रे बसती लक्ष्मी कर मध्ये सरस्वती।
कर पृष्ठे स्थितो ब्रह्मा प्रभाते कर दर्शनम्।।
इस सम्बंध में जो अनुसंधान हो रहे हैं, उनसे यही स्पष्ट हुआ है कि प्रत्येक उंगली के मूल में जो छोटी-छोटी नाडि़यां होती हैं, उनका सम्बंध सीधा मस्तिष्क से रहता है, अलग-अलग व्यक्तियों में कोई विशेष नाड़ी सक्रिय रहती है और उसका प्रभाव उसके जीवन में पड़ता है, जैसे तर्जनी उंगली का सम्बंध राज्य उन्नति, लेखन परीक्षा में सफलता, आदि में रहता है, मध्यमा का सम्बंध आर्थिक आधार, व्यापार वृद्धि, भाग्योदय, शत्रु विजय, पराक्रम, व्यक्तित्व से रहता है, अनामिका का सम्बंध प्रेम, वैवाहिक जीवन, मधुरता, आकर्षण के साथ, प्रसिद्धि, सम्मान और यश से रहता है, कनिष्ठिका का सम्बंध भावनाओं से है और यह भोग विलास, ऐश्वर्य, आकर्षण, सम्मोहन से भी सम्बंधित है।
गुरु गोरखनाथ ने स्पष्ट किया है कि उंगलियों में यदि कोई व्यक्ति यंत्र धारण करता है तो उस यंत्र के प्रभाव को नाडि़यों के माध्यम से मनुष्य चौबीस घंटे ग्रहण करता रहता है, उसका मस्तिष्क उस विशेष कार्य पूर्ति हेतु अत्यन्त सक्रिय हो जाता है।
यंत्र का महत्व तो प्राचीन ग्रन्थों ने भी पूर्णता के साथ स्वीकार किया है, ‘श्रीं यंत्र’ तो पूरे संसार में विख्यात है और पश्चिम के वैज्ञानिकों ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है, कि श्री यंत्र अपने आप में आर्थिक उन्नति का प्रभाव उत्पन्न करने में विशेष महत्ता है। इसी प्रकार कुबेर यंत्र, कनकधारा यंत्र, शत्रु स्तम्भन यंत्र आदि भी अपने आप में महत्वपूर्ण हैं और पिछले हजारों वर्षो से उच्च कोटि के राजा-महाराजा, राजकुमारियां इन अंगूठियों को धारण करती रही हैं और अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करती रही हैं।
इसके अलावा चौबीसा यंत्र, छत्तीसा यंत्र, आदि भी अत्यंत महत्वपूर्ण माने गये हैं, श्रेष्ठ धातुओं पर इन यंत्रों को सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त किया जाता है, तभी इन यंत्रों का प्रभाव अचूक होता है।
अनुभव में यह आया है, कि इस प्रकार के यंत्रों से अंकित मुद्रिकाओं को धारण करते ही अनुकूल फल की प्राप्ति संभव होने लगती है और यदि श्रद्धापूर्वक इन अंगूठियों को धारण किये रहें और अपवित्र न होने दें, तो कुछ ही दिनों में उसका पूर्ण अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है। इस प्रयोग को मैंने अपने जीवन में अनेकों बार आजमाया है और हर बार सफलता प्राप्त की है।
छत्तीसा छत्तीसा। क्या करे जगदीशा।।
नाथ सम्प्रदाय में यह कहावत प्रचलित है कि जिसने अपनी उंगली में छत्तीसा यंत्र अंगूठी पर अंकित करवा कर धारण कर लिया है, उसका साक्षात जगदीश भी अर्थात् ईश्वर भी क्या बिगाड़ सकता है।
छत्तीसा यंत्र की यह विशेषता होती है कि इसको किसी भी पंक्ति से गिना जाए, तो उसका कुल जोड़ छत्तीस ही आता है, इसीलिए इसका अत्यंत महत्व माना गया है। इस अंगूठी को मध्यमा उंगली में धारण किया जाना चाहिए और यदि चौबीस घण्टे यह अंगूठी धारण किये रहें, तो पहनने वाला व्यक्ति कुछ ही दिनों में शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है। इस अंगूठी के द्वारा वह शत्रुओं पर तो विजय प्राप्त करता ही है, शत्रु उसके सामने नत्मस्तक रहते हैं, इसको पहन कर मुकदमे में या कोर्ट में जावें तो पूर्ण वातावरण उसके अनुकूल होने लगते हैं। वास्तव में ही जिनको राज्यभय हो, इन्कम टैक्स, सेल्स-टैक्स या अन्य किसी प्रकार की बाधाएं, अड़चनें, कठिनाइयां, शत्रु-भय आदि अनुभव होता हो, तो यह अंगूठी अपने आप में फलदायी है।
अंगूठी पर सुन्दर ढंग से छत्तीसा यंत्र अंकित किया हुआ, अपने आप में सुन्दर तो दिखाई देती ही है, सामने वाले पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालने में समर्थ होती है, इस अंगूठी के पहनने से जीवन सभी दृष्टियों से निष्कंटक, निर्भय और तनाव रहित हो जाता है। इसके अलावा यह अंगूठी या दूसरे शब्दों में छत्तीसा यंत्र मुद्रिका व्यापार वृद्धि और भाग्योदय में विशेष रूप से अनुकूल होती है, वास्तव में यह मुद्रिका सही शब्दों में कहा जाये तो जीवन का सौभाग्य मानी गयी है।
यंत्र पहिर चौबीसा। धन, सुख, भाग अनीसा।।
अर्थात- जो अपनी उंगली में चौबीसा यंत्र की अंगूठी बनवा कर धारण कर लेता है, वह आश्चर्यजनक रूप से लक्ष्मी प्राप्त करने लगता है, जैसा भी भोग, अर्थ वह अपने जीवन में चाहता है, वह भोग सुख, ऐश्वर्य उसे अनायास ही प्राप्त होने लगता हैं।
इन अंगूठी की विशेषता है कि इसके धारण करने से आर्थिक दृष्टि से निरंतर उन्नति होती रहती है, चारों तरफ वातावरण कुछ ऐसा बन जाता है, कि उसके आर्थिक स्त्रोत पूर्णरूपेण खुल जाते हैं, अच्छे व्यक्तियों से परिचय और सम्पर्क बनता है और उनके माध्यम से ही जीवन में भोग एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होने लगती है। गुरु गोरखनाथ के अनुसार चौबीसा और बीसा यंत्र का एक सा ही प्रभाव है और दोनों ही कलियुग में तो अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
इसे बाएं हाथ की मध्यमा उंगली में पहिना जाना चाहिए। मैंने इस अंगूठी का प्रभाव अनुभव किया है, यदि कहीं पर रूपया फंसा हुआ हो या निकल न रहा हो, तो इसके पहिनने से कार्य सम्पन्न होने लगता है। इस अंगूठी की यह विशेषता है कि यदि व्यक्ति पर कर्जा हो तो, यह शीघ्र ही ऋण मिटा देती है, व्यापार नहीं चल रहा हो, तो इसके पहनने से व्यापार बढ़ने लगता है, नया व्यापार शुरू होने लगता है, रूके हुए व्यापार में तेजी आने लगती है, व्यापार में बिक्री बढ़ जाती है और एक प्रकार से देखा जाए, तो घर में धन की वर्षा सी होने लगती है। वास्तव में ही यह अंगूठी कलियुग में कल्पवृक्ष के समान फलदायक है।
यंत्र काम पहरण। पत्थर को वश करण।।
नाथों और प्राचीन ग्रन्थों में तो यह कहावत है कि कामदेव यंत्र को पहिन लिया जाये, तो वह व्यक्ति पत्थर को भी अपने वश में कर सकता है, फिर पुरूष या स्त्री की तो बिसात ही क्या है, इस यंत्र में कुछ ऐसी विशेषता है कि यह किसी को भी सम्मोहित करने में समर्थ है, सामने वाले को अपने आकर्षण में बांधने के लिए यह यंत्र मुद्रिका अपने आप में लाजवाब है। इस प्रकार की मुद्रिका को सबसे छोटी उंगली में धारण करना चाहिए।
यह अंगूठी जिस पर कामदेव यंत्र अंकित हो, यदि पहन ली जाए तो कुछ ही दिनों में पुरूष या स्त्री के शरीर में विशेष प्रकार का आकर्षण पैदा होने लगता है, उसका व्यक्तित्व चुम्बकीय हो जाता है, और यदि अपने अधिकारी से मिलते समय उसकी नजर अंगूठी पर पड़े, तो निश्चय ही वह अधिकारी पहिनने वाले के अनुकूल होता ही है और उसके कहे अनुसार कार्य करने लग जाता है।
इसी प्रकार यदि प्रेमी अपनी प्रेमिका से बात-चीत करते समय उसका ध्यान आकृष्ट कर ले तो वह पूर्ण सम्मोहन में बंध जाती है और उसके कहे अनुसार कार्य करने लगती है, इसी प्रकार प्रेमिका भी अपने प्रेमी को इस मुद्रिका के माध्यम से आकर्षण में बांध सकती है, पति अपनी पत्नी को या पत्नी अपने पति को इस प्रकार के कामदेव यंत्र अंकित मुद्रिका के माध्यम से अपने अनुकूल बना सकती है।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस अंगूठी के माध्यम से किसी भी व्यक्ति, पुरूष या स्त्री को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। व्यापारी इसके माध्यम से महत्वपूर्ण ग्राहक बांधे रख सकता है, अपने पार्टनर को अनुकूल बनाये रख सकता है, जीवन के किसी भी क्षेत्र में यह अंगूठी अपने आप में महत्वपूर्ण है।
इस अंगूठी के माध्यम से सम्मोहन, आकर्षण तथा वशीकरण क्रिया तो सम्पन्न होती ही है, पहिनने वाले के जीवन में भोग-विलास की भी वृद्धि होने लगती है, विशेष प्रकार से पुरूषत्व का प्रभाव अनुभव करने लगता है। वास्तव में ही स्त्रियों के लिए यह मुद्रिका सही अर्थों में जीवन का सौभाग्य कही जा सकती है।
मनोवांछित विवाह के लिए गन्धर्व यंत्र
मैंने अपने जीवन में जितनी बार भी इस अंगूठी के प्रभाव को परखना चाहा, मुझे पूर्ण अनुकूलता ही अनुभव हुई। गन्धर्व मुद्रिका तो देवताओं तक ने धारण की है।
गन्धर्व सारा संसारा। अब सब कोई हमारा।।
गुरु गोरखनाथ की इन पंक्तियों का तात्पर्य यह है कि गन्धर्व यंत्र की यह विशेषता हे कि इसको धारण करने पर सारा संसार उसके अनुकूल होने लगता है, वह अपने जीवन में जिसको चाहता है, जिस प्रकार से चाहता है, कार्य होने लगता है।
यदि लड़की बड़ी हो गई हो और उसका विवाह नहीं हो रहा हो, अथवा लड़के का विवाह नहीं हो रहा हो तो गन्धर्व यंत्र मुद्रिका अपने आप में महत्वपूर्ण उपाय है। पहनने वाला किसी निश्चित पुरुष या स्त्री से ही शादी करना चाहता हो और सामने वाला स्वीकृति नहीं देता हो तो इसके धारण करने से सामने वाले व्यक्ति का आकर्षण स्वतः बढ़ जाता है और अनुकूल स्थिति पैदा हो जाती है। यह नहीं अपितु शीघ्र मन की इच्छा के अनुरूप विवाह कार्य सम्पन्न होने की दृष्टि से यह मुद्रिका या दूसरे शब्दों में कहा जाये तो गन्धर्व यंत्र अंकित मुद्रिका अपने आपमें महत्वपूर्ण है।
विवाह के बाद पति पत्नी में प्रेम बना रहे, पति अनुकूल बना रहे, इस दृष्टि से भी यह यंत्र महत्वपूर्ण है, यदि प्रेमिका चाहे कि उसके प्रेमी की चित्त बदले नहीं तो यह यंत्र महत्वपूर्ण है, यदि कोई प्रेमी-प्रेमिका को जीवन भर अपने अनुकूल बनाये रखना चाहे, तो यह यंत्र सर्वाधिक सहयोगी है। वास्तव में ही यंत्र मुद्रिका जीवन का सौन्दर्य है, इसे किसी भी हाथ की अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।
वास्तव में ही वे मनुष्य दुर्भाग्यशाली कहे जा सकते हैं, जिनके सामने ऐसे यंत्र या सुविधा उपलब्ध हो और वह अपने जीवन में लाभ न उठा सके या अपनी इच्छा के अनुरूप कार्य सम्पन्न न कर सकें, तो दुर्भाग्य के अलावा और क्या कहा जा सकता है? यह अंगूठी वैवाहिक जीवन को पूर्ण रूप से मधुर बनाये रखने में विशेष रूप से सहायक है।
कुशाग्र वाक् सिद्धि के लिए सरस्वती यंत्र
जो अपने जीवन में परीक्षा में सफल होना चाहते हैं, जो यह चाहते हैं कि उनकी स्मरण शक्ति तेज हो, जो राज्य में प्रमोशन या उन्नति चाहते हों, जो किसी भी प्रकार के इन्टरव्यू में सफलता चाहते हैं, उनके लिए सरस्वती यंत्र मुद्रिका वास्तव में ही अपने आप में अद्वितीय है। इसके धारण करने से स्मरण शक्ति तेज होने लगती है, उसकी बुद्धि तीव्र रहती है और निरन्तर उसे यश और सम्मान प्राप्त होता रहता है।
इस अंगूठी को तर्जनी के मूल में धारण करना चाहिए, बालकों और बालिकाओं के जीवन में पूर्ण सफलता, चातुर्य, बुद्धिमानी और अद्वितीयता के लिए यह मुद्रिका जीवन का सौभाग्य कही जा सकती है।
विशेष तथ्य
ऊपर कुछ विशिष्ट यंत्र और उन से सम्बंधित मुद्रिकाओं का वर्णन विवरण दिया है, तांत्रिक ग्रन्थों और शास्त्रों में इनके बारे में विस्तार से विवेचन है। प्राचीन समय में योगियों, यतियों, संन्यासियों ने तो अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मुद्रिकाओं को धारण किया ही है, राजाओं, महाराजाओं, सम्राटों, रानियों महारानियों और सुन्दरियों ने भी अपने जीवन की पूर्णता के लिए इस प्रकार की मुद्रिकाओं को धारण किया है और अपने जीवन में पूर्ण सफलता पाई है।
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