





लेकिन इस सुख-सम्पन्नता के प्रदाता तो सही अर्थों में वे सद्गुरुदेव हैं जिन्होंने मुझे उन विकट परिस्थितियों में मांतगी महाविद्या की साधना के बारे में बताया और अपने सामने बैठाकर सिद्ध भी करवाया, जिसकी वजह सें आज मैं एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा हूं—– जब मैं उनसे जोधपुर आश्रम में व्यक्तिगत रूप से मिला और अपनी सभी परेशानियों और दरिद्रता भरे जीवन को उनके सामने प्रकट किया तो गुरुदेव ने मुस्कुराकर कहा कि ‘मैं जानता हूं, तुम्हें अपने घर-परिवार की चिंता लगी है और तुम्हारा यहां से जाने का समय नहीं आया है इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हें ऐसी गूढ़ विद्या सिद्ध करा कर भेजूं, जिससे कि तुम उस समाज को, जिसने तुम्हें मृत्यु के लिए विवश कर दिया है, जिसने तुम्हें जलील किया था, जिसने तुम्हें ठोकर मारी थी, इस बार मुह-तोड़ जवाब दे सको और एक सुखी तथा आनन्द युक्त जीवन व्यतीत कर सको, किन्तु इसके लिए मैं तुम्हे कुछ समय पश्चात एक साधना पद्धति सिद्ध करवाऊंगा, जिसके द्वारा तुम ऐसा करने में पूर्ण सक्षम बन सकोगे। अभी कुछ दिन मेरे पास रूक जा, बाद में घर चले जाना।
कुछ दिनों बाद तब उन्होंने मुझे भोर में 3 बजे के आस-पास उस मांतगी साधना की क्रिया पद्धति को सम्पन्न करवाया, जिससे मैं एक श्रेष्ठ जीवन जीने के योग्य बन सका, क्योंकि मांतगी अपने भक्त के सभी दुःखों व दरिद्रता का नाश कर समस्त सुखों को देने वाली देवी हैं और ऐसा वैभवमय जीवन मातंगी साधना द्वारा ही संभव है। इसे सम्पन्न करने के बाद मांतगी उस साधक के हृदय में निवास करने लगती है और उसके भौतिक जीवन के समस्त दुःखों का निराकरण कर उसके जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करने में सहायक होती है। क्योंकि दस महाविद्याएं ‘भोग और मोक्ष’ दोनों को प्रदान करने वाली हैं और मांतगी उन दस महाविद्याओं में से एक है, जिनकी साधना करना अपने-आप में श्रेष्ठ कहा जाता है।
मांतगी मेवत्वं पूर्ण, मांतगी पूर्णत्व उच्चते
मांतगी एकमात्र श्रेष्ठतम साधना है और एकमात्र मांतगी ही पूर्णता दे सकती है। विश्वामित्र ने कहा है- ‘बाकी नौ महाविद्याओं का भी समावेश मांतगी साधना में स्वतः ही हो गया है। चाहे हम बाकी नौ साधनायें नहीं भी करें और केवल मातंगी साधना को ही सम्पन्न कर लें, तो अपने आप में पूर्णता प्राप्त हो सकती है। इसलिए शास्त्रों में मांतगी साधना को सर्वोच्चता और श्रेष्ठता दी गई है। मांतगी शब्द जीवन के प्रत्येक पक्ष को उजागर करने की क्रिया का नाम है और जीवन के सैकड़ों पक्ष है, जहां भौतिक पक्ष हैं- स्वास्थ्य, आयु, धन, सौभाग्य , सुख, पत्नी, पुत्र, पुत्रियों, गृहस्थ सुख, पूर्णायु, भवन सुख, कुटुम्ब, अकाल मृत्यु निवारण, शत्रु निवारण, भाग्योदय, राज्य सुख, धार्मिक यात्राएं और अनेकों प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति।
वैसा ही आध्यात्मिक पक्ष भी है। कुण्डलिनी जागरण, ध्यान, धारणा, समाधि, अपने इष्ट के दर्शन, आने वाले भविष्य को देख सकने की क्षमता, किसी भी व्यक्ति के भूतकाल को परखने की पहचान और सशरीर सिद्धाश्रम प्रवेश की प्राप्ति। ये सभी क्रियाएं, ये सभी स्थितियां केवल मांतगी साधना की सिद्धि से ही प्राप्त हो सकती है। यदि हम मांतगी साधना को भली प्रकार से सम्पन्न कर लें, तो निश्चय ही ये सारी स्थितियां स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। मांतगी साधना सम्पन्न करने के बाद मैं शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तीनों ही दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ, सुखी और सम्पन्नता युक्त जीवन प्राप्त कर सका और अब मेरा गृहस्थ जीवन भी पूर्णतः सुखमय है। अतः इस साधना के द्वारा साधक सभी भौतिक-सुखों को प्राप्ति करने में सक्षम हो सकता है। इस साधना को कोई भी स्त्री या पुरुष सिद्ध कर सकता है।
साधना विधान
साधक को चाहिए कि वह यह साधना मातंगी सिद्धि दिवस, माघ मास की सप्तमी तिथि, के दिन सम्पन्न करें। इस साधना को करने से सातों ही जन्म पूर्ण भौतिक और आध्यात्मिक सुखों से युक्त बनते हैं। इस साधना में माला, गुटिका और यंत्र पूर्ण प्राण-प्रतिष्ठित एवं मंत्र-सिद्ध होने चाहिए। इसमें साधक पीले वस्त्र धारण करें। इस प्रकार से क्रिया करने से साधना में पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। ऐसा ही सुयोग गुरुवार 23 जनवरी को बन रहा है।
इस दिन प्रातः काल स्नान आदि से निवृत होकर, उत्तर दिशा की ओर मुंह कर, आसन पर बैठ जाएं और अपने सामने गुरु चित्र, यंत्र और दरिद्रता विनाशक मांतगी यंत्र एक लकड़ी के बाजोट पर स्थापित कर दें। उसका कुंकुंम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन सम्पन्न करें।
फिर साधक ‘मांतगी गुटिका’ को आसन के नीचे रख कर 4 माला गुरु मंत्र जप सम्पन्न करे तथा मातंगेश्वरी माला से 5 माला निम्न मंत्र की जप करें।
उक्त मंत्र को एकादशी तक अर्थात् मात्र 5 दिन तक करें, पांच दिन मंत्र जप सम्पन्न होने के पश्चात् उस गुटिका, यंत्र एवं माला को किसी नदी, कुंए या तालाब में विसर्जित कर दें। साधक को 3-4 महीने के अंदर-अंदर अनुकूल फल प्राप्त होने लगते हैं, आवश्यकता है तो साधना में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ मंत्र-जप सम्पन्न करने की।
गुरु से व्यक्तिगत रूप से मिल कर मांतगी दीक्षा प्राप्त करें, जिससे कि आपको जीवन में सभी मनोरथों की पूर्णता से प्राप्ति हो सकें और अपने लक्ष्यों को सामान्य क्रिया करते हुए भी शीघ्रता से प्राप्त कर सकें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि जो काम आप पिछले कई वर्षों से पूर्ण नहीं कर पा रहे थे, उन कार्यों की पूर्णता में गतिशीलता आनी प्रारम्भ हो जाती है। मगर उसके लिए धैर्य, विश्वास, श्रद्धा और समर्पण आवश्यक है।
देवता, यंत्र, साधना और गुरु की आलोचना या निन्दा सुनना ही अपने आपमें एक अपराध है, जीवन को दोष युक्त बनाता है- और ऐसा व्यक्ति साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
मांतगी साधना किसी भी तांत्रोक्त दिवस शिवरात्रि, होली, नवरात्रि पर भी सम्पन्न की जा सकती है लेकिन कुछ मुहूर्त इस साधना के लिए श्रेष्ठतम हैं। भविष्य में ऐसा ही शुभ मुहूर्त 04 फरवरी वंसत पंचमी और रोहिणी नक्षत्र युक्त माघी दशमी 09 फरवरी को आ रहा है। और इसी दिन नवशक्ति सिद्धि दिवस भी है। इस दिन दरिद्रता-विनाशक मांतगी साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।
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