





शास्त्रों के अनुसार माघ शुक्ल त्रयोदशी को ‘विश्वकर्मा जयन्ती’ मनाई जाती है। इसी अवसर पर हम यह दुर्लभ, लक्ष्मी से संबंधित, लामा पद्धति पर आधारित एक गोपनीय साधना प्रस्तुत कर रहे हैं, जो साधकों के लिए परम सौभाग्यदायक है। उनकी मान्यता है, कि इस साधना से एक कंगाल और दरिद्र व्यक्ति भी करोड़पति बन जाता है, जिससे भवन, धन, यश, सुख, सौभाग्य और स्वर्ण का अतुलनीय भण्डार प्राप्त होता है।
लक्ष्मी का पूजन-साधना पूरे विश्व में होता है, और प्रत्येक देश में, उनके ग्रन्थों में, लक्ष्मी से संबंधित विभिन्न प्रकार के प्रयोग और पूजन पद्धतियां हैं। भारतवर्ष में भी तांत्रिक और मांत्रिक दोनों ही रूपों में भगवती लक्ष्मी से संबंधित सैकड़ों प्रयोग हैं और समय समय पर उन प्रयोगों को सम्पन्न कर साधकों ने लाभ उठाया ही है। परन्तु भारत के समस्त योगी और साधक इसको स्वीकार करते हैं, कि लामा पद्धति से लक्ष्मी साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधना कही जा सकती है। वैसे भी लामाओं ने कठोर तपस्या कर उन साधनाओं को प्राप्त किया है, जो कि अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, जिनका प्रभाव अपने आप में अचूक होता है और जिन प्रयोगों के माध्यम से वे निश्चित सफलता प्राप्त करने में सक्षम हो पाते हैं।
उनके ग्रन्थों में लक्ष्मी से संबंधित जितने भी प्रयोग हैं, यह साधना उनमें सर्वश्रेष्ठ और अचूक है। उनकी मान्यता है कि विश्वकर्मा प्रयोग के बाद साधक दरिद्र रह ही नहीं सकता। यदि कंगाल व्यक्ति भी इस साधना को सम्पन्न कर लेता है तो वह देखते ही देखते चमत्कारिक ढंग से उन्नति की ओर अग्रसर होता है और सफलता प्राप्त कर लेता है। कुछ ही महीनों में या एक-दो वर्ष के भीतर-भीतर कंगाल व्यक्ति भी करोड़पति बन सकता है। उसे अनायास धन प्राप्ति होने लगता है, व्यापार वृद्धि हो जाती है और उसके आय के सैकड़ों रास्ते खुल जाते हैं।
संन्यासी जीवन में मुझे कुछ समय एक लामा के साथ रहना पड़ा था। मेरी राय में वह लामा तांत्रिक क्षेत्र में अत्यन्त उच्चकोटि का योगी और तेजस्वी पुरूष था। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि वह भंयकर बर्फीले तूफान में भी नंगे पांव एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ की ओर भागता चला जाता था। शरीर पर मात्र एक लंगोटी रखता था परन्तु न तो उसे कभी सर्दी का अहसास होता था और न गर्मी ही व्याप्त होती थी। मानसरोवर के मार्ग में उसका छोटा सा ‘गोम्पा’ था, जिसमें वह साधना-रत था।
‘गोम्पा’ एक प्रकार से बौद्ध मन्दिर सा होता है, जिसमें अखण्ड दीप प्रज्वलित रहता है। मानसरोवर जाने वाले जितने भी यात्री होते थे, वह लामा उनको अपने यहां रोकता और उस भंयकर सर्दी में भी (यों उस मार्ग में मई जून की गर्मियों में भी बर्फ पड़ती है और अत्यन्त ठंडा मौसम बना रहता है) उन्हें विविध प्रकार के भोजन कराता, रवाना होते समय ओढ़ने के लिए कम्बल देता और अन्य सभी दृष्टियों से उन यात्रियों की सहायता करता, पर इसकी एवज में वह किसी भी प्रकार की धन की याचना नहीं करता।
मैं आश्चर्यचकित था कि जहां आय का कोई साधना नहीं हो, वहां वह लामा कहां से अन्न, द्रव्य और वस्त्र लाता है और किस प्रकार से वह यह सब व्यवस्था करता है। धन की तो जैसे उस गोम्पा में वर्षा ही होती रहती थी। उसको जितने द्रव्य की आवश्यकता होती, वह द्रव्य अनायास प्राप्त हो जाता। मैंने अनुमान लगाया कि शायद इसने कोई याक्षिणी साधना सम्पन्न कर रखी होगी, जिसके माध्यम से यह धन, द्रव्य या वस्त्र आदि प्राप्त करता होगा, परन्तु जब उसके साथ चार छः महीने रहने का अवसर मिला और उससे तिब्बती साधना सीखने का मौका प्राप्त हुआ, तो मुझे पता चला कि वह यह सब ‘विश्वकर्मा साधना’ के माध्यम से प्राप्त करता है।
एक दिन उसने बातचीत के प्रसंग में स्पष्ट किया कि तिब्बती साधना में विश्वकर्मा साधना सर्वाधिक तेजस्वी और अचूक है। यदि भगवान कृष्ण से सुदर्शन चक्र का वार खाली जाये तो विश्वकर्मा साधना में भी न्यूनता रहे। इस साधना के द्वारा जीवन में धन की, स्वर्ण की और सुख सौभाग्य की कोई कमी नहीं रहती, अपितु उसे अपने जीवन में यह चिन्ता बनी रहती है, कि इस धन को कहां व्यय किया जाये, किस प्रकार से व्यय किया जाये? बाद में मुझे तिब्बत में और भी कई गोम्पाओं में जाने का अवसर मिला और विभिन्न लामाओं से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ और बातचीत के प्रसंग में उन सभी से यही सुनने को मिला की विश्वकर्मा साधना विश्व की श्रेष्ठ साधनाओं में से एक है और यह साधना तेजस्वी और प्रभावकारी है। यह एक ऐसी साधना है जिसके द्वारा निश्चय ही लक्ष्मी प्रसन्न होती है और उससे मन चाहा वरदान प्राप्त हो जाता है। इस साधना को सम्पन्न करने के बाद जीवन में धन की कमी रह ही नहीं सकती। उसे अनायास और आकस्मिक रूप से विभिन्न स्त्रोतों से धन प्राप्ति होती रहती है।
उन लामाओं के निष्कर्ष स्वरूप इस साधना को सम्पन्न करने के छः प्रमुख लाभ हैं जो कि निश्चय ही फलदायक हैं।
1- यह साधना तिब्बत की श्रेष्ठ और प्रमुख साधना है, जिससे लक्ष्मी निश्चय ही प्रसन्न होती है, वरदायक बनती है और उसके घर में स्थायी रूप से लक्ष्मी का निवास बना रहता है। कंगाल से कंगाल व्यक्ति भी इस साधना के द्वारा पूर्ण सम्पन्न बन जाता है।
2- इस साधना को सम्पन्न करने के बाद उसका दुर्भाग्य समाप्त हो जाता है यदि उसके भाग्य में या हाथ में भाग्य रेखा नहीं भी हो, तब भी वह दोष समाप्त हो जाता है और जीवन में धन की कोई कमी नहीं रहती।
3- ऐसे साधक को अनायास और आकस्मिक रूप से धन प्राप्ति होती रहती है और वह अपने जीवन में जो कुछ भी आर्थिक दृष्टि से प्राप्त करना चाहता है, वह अनायास प्राप्त होता रहता है, उसकी आय के विभिन्न स्त्रोत बन जाते हैं।
4- इस साधना के द्वारा व्यापार में निरन्तर उन्नति होती रहती है और यदि किसी ने व्यापार बांध दिया हो या तांत्रिक प्रयोग कर दिया हो, तो भी इस साधना से वह समाप्त हो जाता है और व्यापार निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होता रहता है।
5- उसे स्वप्न में या प्रत्यक्ष रूप में ज्ञात हो जाता है, कि कहां पर जमीन में द्रव्य गड़ा हुआ है या कहां पर किस प्रकार से द्रव्य प्राप्त हो सकता है, इसका अहसास लाटरी से या अन्य तरीकों से उसे होता रहता है।
6- विश्वकर्मा स्वयं उसे नित्य रात्रि को स्वर्ण प्रदान करते रहते हैं, जिसकी वजह से उसके जीवन में धन की किसी प्रकार से कोई कमी नहीं रहती।
इसके अलावा भी उन लामाओं ने और भी कई लाभ विश्वकर्मा साधना के बताये थे परन्तु सारभूत तथ्य ये हैं, कि यह साधना जीवन की महत्वपूर्ण और दुर्लभ साधना है। इस साधना के द्वारा जीवन में धन की कोई कमी नहीं रहती और यह साधना लक्ष्मी की श्रेष्ठ और सफलता युक्त साधना है।
साधना समय
यों तो प्रत्येक वर्ष की माघ शुक्ल त्रयोदशी को विश्वकर्मा जयन्ती है जिस दिन यह प्रयोग सम्पन्न किया जाता है, परन्तु लामा पद्धति के अनुसार किसी भी पूर्णमासी की रात्रि को अथवा किसी भी पुष्य नक्षत्र की रात्रि को यह प्रयोग सम्पन्न हो सकता है और उसका समान फल प्राप्त होता है, पर यदि साधक को सुविधा हो, यदि उसके जीवन का सौभाग्य उदय हो तो, उसे विश्वकर्मा जयन्ती के अवसर पर इस साधना को सम्पन्न करना ही चाहिए। इस वर्ष अंग्रेजी तिथि के अनुसार यह विश्वकर्मा जयन्ती 12 फरवरी 2014 को सम्पन्न हो रही है।
साधना प्रयोग
साधक जिस दिन यह विश्वकर्मा साधना सम्पन्न करना चाहे, उस दिन रात्रि को वह स्नान कर सफेद धोती धारण कर ले, ऊपर किसी प्रकार का कोई वस्त्र न पहिने, यदि चाहे तो ऊनी वस्त्र पहन सकता है, या ओढ़ सकता है। फिर सफेद आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाये और सामने एक स्वच्छ थाली में पीला कपड़ा बिछा दें, जो कि रेशम का हो।
फिर थाली के मध्य में कपड़े के ऊपर लामा पद्धति से मंत्र सिद्ध ‘विश्वकर्मा महायंत्र’ को स्थापित करें, जो कि मंत्र सिद्ध प्राणश्चेतना युक्त और लामा पद्धति से अनुसिक्त हो। इस महायंत्र पर एक श्रेष्ठ कमल गट्टे की माला चढ़ा दें या यंत्र के चारों ओर लपेट दें और केसर से उस यंत्र की पूजा करें। अब यंत्र पर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए केसर की 108 बिन्दियां लगायें, जो कि 108 लक्ष्मियों का प्रतीक है। फिर यंत्र के सामने पांच शुद्ध घृत के दीपक लगाये, यंत्र पर बिन्दियां लगाते समय ‘ऊँ मणिभद्रे हुं’ का उच्चारण करते रहें।
दीपक लगाने के बाद फिर पास में ही छोटा सा हवन कुण्ड स्थापित करें। बने बनाये तांबे के हवन कुण्ड बाजार में प्राप्त होते है, अथवा छोटा सा हवन कुण्ड बनवाया जा सकता है। यदि यह संभव न हो तो किसी थाली में लकडि़यां जला कर उसमें आहुतियां प्रदान कर सकते हैं। इसके बाद साधक उन लकडि़यों में कपूर मिला कर हवन कुण्ड प्रज्वलित करें और उपरोक्त मंत्र से ही 108 आहुतियां शुद्ध घृत की दें। अर्थात् चम्मच से घृत लेकर उपरोक्त मंत्र उच्चारण कर वह घृत सामने रखे हुए हवन कुण्ड में डालें, इसे ‘आहुति’ कहते हैं। इस प्रकार 108 आहुतियां दें।
इसके बाद उसी अग्नि में 108 कमल गट्टे के बीज को निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए आहुति दें, पर इस बात का ध्यान रखें कि हवन कुण्ड की अग्नि बुझने से पहले हवन को सम्पन्न करें। कहने का तात्पर्य यह है कि अग्नि देव आपकी आहुति को स्वीकार कर लक्ष्मी तक पहुंचाने की व्यवस्था करें।
एक एक मंत्र का उच्चारण करते हुए शुद्ध घृत के साथ एक एक कमल बीज आहुति के द्वारा अग्नि देव को समर्पित करें।
हवन करते समय या कमल बीजों को घृत के साथ अग्नि में समर्पित करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
जब यज्ञ कार्य सम्पन्न हो जाये, तब साधक यंत्र के सामने दूध का बना हुआ प्रसाद चढ़ाएं और वह प्रसाद घर में वितरित कर दें। दूसरे दिन प्रातः काल विश्वकर्मा यंत्र एवं कमल गट्टे की माला को श्रद्धा और सम्मान के साथ नदी में विसर्जित कर दें, अथवा किसी मन्दिर में चढ़ा दें। ऐसा करने से यह साधना सम्पन्न हो जाती है।
वास्तव में ही यह प्रयोग अपने आप में अत्यन्त तेजस्वी और दुर्लभ है। साधकों को चाहिए कि इस महत्वपूर्ण अवसर का अवश्य लाभ उठायें और इस साधना को सम्पन्न कर इसके प्रत्यक्ष प्रभाव को अनुभव करें।
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