





शिव जगन्नियन्ता जगदीश्वर हैं। एक प्रसंग में पार्वती जी कहती है, कि ‘भगवान शंकर जगद्गुरु हैं और मंगल शिरोमणी हैं’। उनके दिव्य चरणों का ब्रह्मा जी, भृगु, नारदादि महर्षि गण भी ध्यान करते हैं। वस्तुतः यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाए, तो समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में ‘शिव तत्व’ ही व्याप्त है।
भगवान शिव एक हैं, पर अनेक रूप भी उन्हीं के हैं-कभी ‘आशुतोष’ तो कभी ‘महादेव’ या कभी ‘रूद्र’ तो कभी ‘महामृत्युजंय’! अपने अलग-अलग नामों से वे इस संसार में विराजमान हैं और उनका एक भी नाम निरर्थक नहीं है। प्रत्येक नाम के अलग-अलग गुण और प्रयोजन हैं, जिनके प्रचलित होने का यदि मूल देखा जाए, तो अधिकांश नामों से भ्रम-निवृत्ति, मोह-नाश और सौभाग्य लाभादि हो सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- शिव- जो भक्तों के समस्त पाप और त्रिताप को नाश करने में सदैव समर्थ हैं।
2- पशुपति- शिव सबको ज्ञान देने वाले हैं और अज्ञान से बचाने वाले है, तथा पशुवत जीवन से मुक्ति दिलाने के कारण ही वे ‘पशुपति’ कहलाते है।
3- मृत्युजंय- यह सुप्रसिद्ध बात है कि मृत्यु को कोई जीत नहीं सकता, किन्तु जिन्होंने मृत्यु पर भी जय प्राप्त की हैं और जिनके आगे हर बार मृत्यु की ही पराजय होती है, वे ‘मृत्युजंय’ कहलाते हैं।
4- महेश्वर- जो वेदों के आदि में ओऽम्कार रूप में माने गए है और वेदान्त में निर्गुण रूप से स्थित रहते है और जो सम्पूर्ण देवताओ में प्रधान होने से भी ‘महेश्वर’ नाम से विख्यात है।
5- रुद्र- दुःख और उनके समस्त कारणों के नाश करने से तथा संहारादि में क्रूर रूप धारण करने से शिव को ‘रूद्र’ कहा जाता है।
6- आशुतोष- अपने आनन्दित और उल्लसित स्वरूप के कारण ही वे ‘आशुतोष’ कहलाते है।
जिस समय वे जैसा स्वांग भरते है, उस समय उनका वैसा ही नाम पड़ जाता है। संसार का सृजन करने पर वे ‘ब्रह्मा’ कहलाते है, पालन करने पर ‘विष्णु’ तो संहार करने पर वे ‘शिव’ कहलाते है।
तारक देव महेश हैं, सबका तारनहार।
सत, रज, तम के रूप में, व्यापित है संसार।।
शिव की ऐसी ही विराट महिमा है। इस व्यापक जगत में जो लोग नाना दुःखों से पूर्ण संसार रूपी समुद्र के प्रवाह में पतित होकर पुनः उससे निकलना चाहते है, उन्हें शिव की ही आराधना करनी चाहिए। इसीलिए वर्ष में एक दिन शिव-आराधना, पूजन-अर्चन आदि के लिए विशेष रूप से निर्धारित है जिसे ‘महाशिवरात्रि’ के नाम से जाना जाता है, जो आदि देव भगवान शिव के ही उल्लास का पर्व है।
यह पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़ी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव का पार्वती जी के साथ विवाह सम्पन्न हुआ था, अर्थात् इस दिन शिव की उपासना-साधना करने से भक्त को या साधक को एक विशेष प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है, क्योंकि उसे शिवरात्रि के दिन ‘शिवलिंग’ का विधिवत पूजन करने से शिव और शक्ति दोनों का ही सायुज्य प्राप्त होता है और अपने इस शिव-शक्ति स्वरूप के कारण ही वे ‘अर्द्धनारीश्वर’ भी कहे जाते है।
शिव के समान अन्य कोई देवत्व नहीं, क्योंकि रोग और भोग को एक साथ धारण करने का सामर्थ्य किसी भी अन्य देवता में नहीं है। यों तो किसी भी सोमवार के दिन इस पूजन को सम्पन्न किया जा सकता है, किन्तु समय की अपनी एक विशेषता होती है। जिस प्रकार काल के सिर पर आगे बाल होते है, और पीछे से वह गंजा होता है, यदि मनुष्य उसे आगे से पकड़ लेता है, तो उसके बाल उसके हाथ में आ जाते है, और वह काल पर विजय पा लेता है, किन्तु जो मनुष्य उसे पीछे से पकड़ने की कोशिश करता है, उसके हाथ में कुछ नहीं आता, और उसके पास पछताने के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।
इसी प्रकार समझदार व्यक्ति यदि उन विशेष क्षणों को शीघ्रता से पकड़ लेता है, तो वह जीवन में कभी पराजित नहीं होता और यदि वह उस महत्वपूर्ण क्षण को गंवा बैठता है, तो उसके पास पछतावे के अलावा और कुछ नहीं रहता, फिर उससे बड़ा दुर्भाग्यशाली कोई नहीं होता। इसीलिए समय का अपना विशेष महत्व होता है और उसका प्रत्येक भक्त को लाभ उठाना ही चाहिए।
‘शिवरात्रि’ अर्थात् शिव की रात्रि, जो जगत-गुरु है, जो समस्त कष्टों को दूर करने वाले है, जिनके चिन्तन मात्र से ही समस्त सुखों की प्राप्ति हो जाती है और जो मनुष्य के समस्त पापों को दूर कर उसे मोक्ष प्रदान करने वाले है, उनकी उपासना व आराधना प्रत्येक व्यक्ति या साधक को इस शिवरात्रि के दिन अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। ‘शिवरात्रि’ तो आनन्द की रात्रि है, जो मनुष्य के अन्धकारमय व घोर कालिमा युक्त जीवन को प्रकाशवान कर देने की रात्रि है, जो पूर्णता की रात्रि है, जो श्रेष्ठता की रात्रि है, जो शिव-शक्ति से सामंजस्य की रात्रि है, जो शिवत्व को प्राप्त कर लेने की रात्रि है—- और ऐसे शिवत्व को प्राप्त कर लेना ही तो जीवन का परम सौभाग्य है, परम आनन्द है, जीवन की सर्वोच्चता है।
और यह सर्वोच्चता, यह आनन्द, यह सौभाग्य प्राप्त हो सकता है उस दिन शिव के विधिवत पूजन द्वारा, क्योंकि शिव समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम हैं।
भगवन्तं महोदेवं शिवलिंगं प्रपूजयेत्।
लोक प्रसविता सूर्यस्त च्चिह्नं वाद्भवेत।।
लिंग प्रसतिकर्त्तार लिंगन पुरूषो यजेत्।
लिंगर्थ गमकं चिह्नं लिगमित्य भिधीयते।।
लिंगमर्थं हि पुरूषं शिवत्व गमयतीत्यदः।
शिव शक्त्योश्च चिन्हस्य मेलनं लिंगमुच्यते।।
शिव शक्ति के सभी स्वरूपों का सम्मेलन ही शिवलिंग कहा जाता है। शिवलिंग में संसार की सृष्टि करने वाले की पूजा समाहित है। यह शिवलिंग शिवतत्व का गायन और बोधन है, जो कि शिव-शक्ति सब कुछ देने में समर्थ है। यह जगत चैतन्य स्वरूप है, तो शिवलिंग महा चैतन्यमय! शिवलिंग की सकाम बुद्धि द्वारा, अंहकार रहित साधना से, साधक की वृत्तियों को, कार्यों को उच्चता की ओर ले जाने में समर्थ है।
शिवलिंग ब्रह्माण्ड का स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माण्ड को अण्डकार माना गया है, इसीलिए उसकी साकार प्रतिमा शिवलिंग भी अण्डाकार है। सभी देवी-देवता, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र लक्ष्मी ब्रह्माण्ड के अधीन हैं। इनमें से किसी एक देवता के पूजन से एक विशिष्ट उद्देश्य का फल प्राप्त होता है, परन्तु इन सभी ब्रह्माण्ड स्थित शक्तियों की एक साथ पूजा, उपासना, साधना करनी हो तो शिवलिंग पूजन एवं साधना सम्पन्न करनी चाहिए। भगवान महादेव अपने उपासक साधक की हर मनोकामना को पूर्ण करने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते हैं। जिसने पूर्ण भक्ति भाव से शिव स्वरूप शिवलिंग की पूजा सम्पन्न की, उसे भगवान शिव ने स्वर्ग तक का वरदान दे दिया।
शिव की पूजा केवल देवताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शिव की साधना राक्षसों, मनुष्यों और यहां तक कि भगवान राम ने लंका पर विजय हेतु रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना कर शिव उपासना की, जिसके पश्चात् ही वह महान कार्य पूर्ण हुआ। महाशिवरात्रि कल्प जो शिवरात्रि से नवरात्रि तक का कल्प है, उस समय साधक विशिष्ट शिवलिंग की पूजा साधना कर शक्ति स्वरूप शिव का साधना फल प्राप्त कर, शक्ति पुंज के रूप में प्रकाशमान होकर अपने जीवन की समस्त मनोकामनाओं को पूरा कर सकता है। शारदा तिलक में लिखा है, कि पूरे वर्ष शिव की पूजा साधना करने पर भी वह अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता है, जो कि महाशिवरात्रि कल्प में शिव साधना करने से प्राप्त होता है। भगवान शिव के प्रत्येक साधक तथा साधिका का यह कर्त्तव्य है, कि वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो, महाशिवरात्रि कल्प में शिवलिंग पूजा, विधि-पूजन सहित अवश्य सम्पन्न करे।
जहां साक्षात रूप में भगवान सदाशिव महाकाल विराजमान हैं, ऐसे दिव्यतम स्थान पर कुंभ महोत्सव का आयोजन होता है। निश्चित रूप से इस धारा की रज के कण-कण में साक्षात् शिव विराजमान हैं। ऐसी दिव्य भूमि पर अपने आप को सदाशिव आनन्द युक्त बनाने के लिए और अपने जीवन में सहचरी रूप में माता गौरी की अखण्ड सौभाग्यता को प्राप्त करने के लिए ऐसे दिव्यतम 12 ज्योर्तिलिंगों में सर्वश्रेष्ठ महाकाल ज्योर्तिलिंग, उज्जैन में जीवन का आलौकिक, दिव्यतम महोत्सव, महाशिवरात्रि पर्व हम सपरिवार स्व रूद्राभिषेक सम्पन्न कर अपने आप को शिवमय और गौरीमय के भाव चिंतन को पूर्णता से आत्मसात कर सकेंगे। साक्षात् शिव स्वरूप में कैलाश गुरुदेव और परम वन्दनीय सौभाग्य प्रदाता माताजी के सानिध्य में महाकाल इन्द्राक्षी धन वैभव महामृत्युजंय साधना महापर्व उज्जैन में सम्पन्न करेंगे। सभी शिष्य और साधकों को अपने जीवन को हर तरह की सुस्थितियों से श्रेष्ठमय बनाने और जीवन में ऋिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ और कार्तिकेय विजयश्री का अक्षुण भाव निर्मित हो सके, इस हेतु इस महाशिवरात्रि पर्व में अपने साथ पुत्र-पुत्रियों, बन्धु-बान्धवों और रिश्तेदारों को अवश्य ही लायें, जिससे कि शिव परिवार के समान हमारे भी कुल और वंश में श्रेष्ठ वृद्धि हो सके।
26, 27 फ़रवरी 2014
शिविर स्थल: महात्रिपुर सुन्दरी मंदिर प्रागंण, ललिता घाट, क्षिप्रा तट उज्जैन (म- प्र-)
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