





शक्तिपात भी शिष्य के मस्तिष्क पर एक आत्मिक घटना है और शिष्य के व्यक्तित्व पर हुए परिर्वतन का अनुभव आत्मिक चेतना का परिणाम है। यह आत्मिक अनुभव जब भेजा जाता है और शिष्य द्वारा इसे ग्रहण किया जाता है तो यह क्रिया शक्तिपात कहलाती है। आत्मिक जाग्रता में शक्तिपात की भूमिका एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। सद्गुरु ही अपने शिष्यों पर विशेष कृपा कर यह तीव्र क्रिया सफलता के साथ कर सकते हैं और उन्हें ऊपर उठा सकते हैं, उर्ध्वगति को प्रदान कर सकते हैं।
वास्तव में साधना के जीवन में मनुष्य इस योनी में आता है तो वह तेजी से प्रवृत्ति मार्ग की ओर वैसे ही जाता है जैसे पानी ढलान की ओर। मनुष्य जीव जब ऊपर के लोकों से उतर जब पृथ्वी लोक की योनियों में विचरण करता है तो वह अविद्या का आवरण अपने ऊपर चढ़ाता रहता है। कई जन्मों के सुख दुःख आदि द्वन्दों के झोंके खाने के पश्चात् उसे विषय वासनाओं से निकलने की इच्छा उत्पन्न होती है और अध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा होती है।
मनुष्य के कई जन्म होते हैं, पहला जन्म तब उसका होता है जब वह माता के गर्भ से बाहर आता है, दूसरा जन्म तब होता है जब अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दूसरों से पढ़-सुनकर, संसार को देखकर प्राप्त करता है। तीसरा जन्म उसका तब होता है जब वह अपने गुरु से चेतना रूपी ज्ञान लेकर, मंत्र दीक्षा से अपने स्वरूप को जानने के लिए ज्ञानरूपी आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ कर देता है। संसार में कुछ अज्ञानी कहते है कि गुरु से जुड़ना मानसिक दासता को बढ़ावा देता है लेकिन यदि हम बिना किसी तर्क कुतर्क के देखे तो सारे जीव किसी न किसी रूप से पराश्रयी है। प्रत्येक मनुष्य अपनी वृतियों का गुलाम है, वासना व्यक्ति की मालकिन है और वह उसका गुलाम है। अतः पराधीनता तो रहती ही है।
अब जब व्यक्ति गुरु की शरण में जाता है तो यह निम्न कोटि की पराधीनता अर्थात् वासना और वृत्तियां समाप्त होने लगती है, व्यक्ति स्वयं अपने मन का स्वामी बनने लगता है, अपने वृत्तियों पर नियंत्रण करने लगता है, अपनी चंचलता को संभालने लगता है। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं अपना स्वामी बन जाता है। अधिपति हो जाता है। सांसारिक भाषा में उसका प्रमोशन तो हो गया लेकिन अब दूसरी ओर गुरु पर आश्रित हो गये। इस स्थिति में एक चीज का चुनाव करना है-हमारे सामने एक पिशाच खड़ा है और एक देव स्वरूप दयालु व्यक्तित्व भी खड़ा है, ये दोनों हर समय हमारे सामने हैं। गुरु जी कहते है ‘बेटा इधर आ जाओ’ और शिष्य कहता है ‘गुरुजी हम आपके अधीन नहीं बनेंगे’ और सांसारिक पिशाच गला पकड़े हुए है।
ऐसी स्थिति में बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है यदि यह सांसारिक वृतियों, वासनाओं और अज्ञानता का पिशाच मेरा गला पकड़े हुए है तो उससे अच्छा है कि उसकी पकड़ से निकलकर गुरु जी की पकड़ लग जाए। चाहे वह हमको पराधीन बनावे, नौकर बनाए अथवा गुलाम बनाये कम से कम कुछ तो भला होगा ही कम से कम सद्गुरु हमारा गला तो नहीं काटेंगे, नीच बुद्धि तो नहीं देंगे, संसार दुःख रूपी राक्षस से तो हम स्वतंत्र रहेंगे।
दूसरी बात सबसे महत्वपूर्ण है कि गुरु शिष्य नहीं बनाता अपितु शिष्य गुरु को बनाता है, अपनाता है। जब शिष्य गुरु को बनाता है तो यह उसकी इच्छा है। दुनियां में बुद्धिमान व्यक्ति को शिष्य बनने में ही मजा आता है, हनुमान जी का उदाहरण हमारे सामने है जिन्होंने सेवा का धर्म अपना कर शिष्यत्व को महानता प्रदान की। तीसरी विशेष बात गुरु एक सर्जन की तरह है उसक हाथ में एक पैना चाकु है और उस चाकू से वह शिष्य की अविद्या की ग्रंथियों को काटता रहता है। उस समय शिष्य को बड़ी तकलीफ होती है, सोचता है कि कहां आकर फंस गये, लेकिन जब एक बार अविद्या की ग्रंथि कट जाती है तो कई प्रकार के सांसारिक दुःखों से मुक्ति मिल जाती है। गुरु शिष्य को अनुशासन देते हैं, उसे पराधीन या गुलाम नहीं बनाते। यदि गुरु शिष्य को अपने ऊपर आश्रित कराते हैं, निर्भर कराते हैं तो वह उसका विनाश नहीं करते, अपितु उसे संभालते हैं।
शास्त्रकार कहते हैं, उपनिषद् कहते हैं, विद्वान कहते हैं कि ब्रह्म निर्गुण है, चेतना निर्गुण है, आत्मा निर्गुण है, ईश्वर निर्गुण है, लेकिन इस निर्गुण को भी अनुभव करने के लिए कुछ कार्य तो अवश्य ही करना पड़ेगा। इसका अनुभव करने के लिए एक महीने की यदि मौन साधना की जाए और मन से यह पूछा जाए की मन क्या सोच रहा है? कहां जा रहा है तो एक सप्ताह बाद ही ऐसा लगेगा की चारों ओर कैसा कोलाहल है, मन में एक विचार आ रहा है, एक जा रहा है, हजारों तरंगे उठ रही हैं। यह माना कि मनुष्य के जीवन में दुःख है, गरीबी है, बेकारी है लेकिन यह दुःख का कारण नहीं है, दुःख का कारण चित्त का निरन्तर चलायमान, विचलित और उतेजित होना है। दुःख का मूल कारण मनः शक्ति का उद्वेलित हो जाना है, मनुष्य इसे पहचान नहीं पाता है और इसको शांत कर सही गति देने वाले गुरुओं की हमारे यहां कमी नहीं है। कमी है उन व्यक्तियों की जो इस महान विद्या को जान सकें। गुरुओं ने तो भक्ति मार्ग का उपदेश दिया, योग का उपदेश दिया, मंत्र का उपदेश किया।
इस प्रकार हमारे यहां सैकड़ों पंथ हो गए। धर्म, मठ, सम्प्रदाय सब एक ही चीज है लेकिन लोग अपनी अपनी अलग कुटिया बनाकर बैठ गए। कभी किसी गुरु को कोई शिष्य पसन्द नहीं आया तो कभी शिष्य को गुरु पसन्द नहीं आया। किसी गुरु को लगा कि भस्त्रिका, प्राणायाम बताएं, किसी गुरु को लगा कि अजपा जप का ज्ञान दें, किसी ने ताड़न क्रिया सिखालाई तो किसी गुरु ने क्रिया योग की शिक्षा दी। जहां तक साधना का प्रश्न है इसमें गलती किसी की नहीं है किसी गुरु ने यह नहीं कहा कि केवल मेरा ही पंथ श्रेष्ठ है। बाकी सब पंथ बेकार है, यह तो शिष्यों ने अपने अपने पंथ को सर्व श्रेष्ठ बताकर साधना करने के बजाय आपस में लड़ाई करनी प्रारम्भ कर दी जबकि सभी साधनाएं, मत, पंथ एक दूसरे के पूरक हैं। इन सब परम्पराओं के बावजूद किसी ने भी गुरु की अवहेलना नहीं की, सभी ने गुरु को सर्वमान्य माना है।
जिस प्रकार मां बाप अपने छोटे बच्चे को सड़क पर अकेले जाने से रोकते हैं, आग से दूर रखते हैं। ऐसी स्थितियों में मां बाप का लक्ष्य उसे पराश्रित बनाना नहीं अपितु उसकी सुरक्षा करना ही है। इसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में शिष्य की सांसारिक उम्र चाहे कितनी भी हो लेकिन वह है बालक ही, वह उस बच्चे के समान है जिसने ज्ञान के मार्ग पर डगमगाते कदमों से अभी अभी चलना प्रारम्भ किया है। इस आध्यात्मिक शिशु के चारों और मन की प्रवृतियां, राक्षस-पिशाच-भूत-प्रेत आदि रूप में चारों तरफ से जकड़े हुए हैं और कभी भी आक्रमण कर सकते हैं। ऐसे में बालक को कौन बचायेगा? ऐसी स्थिति में गुरु ही उस बालक का हाथ पकड़कर अपने साथ चलाते हैं और जब शिष्य सरल बन जाता है, अपने अंदर की भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता का विकास कर लेता है, अपनी वृतियों और वासनाओं को नियंत्रित करने की क्षमताओं का विकास कर लेता है, अपनी शक्तियों को पहचान जाता है, अपने भीतर के अंतःकरण का ज्ञान हो जाता है तब गुरु कहते हैं कि अब तुम स्वतंत्र हो। अतः गुरु और शिष्य का सम्बन्ध अनुशासन का ही विशेष सम्बन्ध है।
यह तो स्पष्ट है कि प्रत्येक व्यक्ति का मन बड़ा चंचल है, वह पानी की तरह बहता है, हवा की तरह उड़ता है, समुद्र की लहरों के समान इसमें भी विचार तरंगें निरन्तर बनती रहती हैं। इस मन में नाम मात्र के लिए भी स्थिरता नहीं है। मन चेतना और चित्त जो कुछ भी व्यक्ति के भीतर है वह निरन्तर गतिमान है। यह एक अद्भुत शक्ति है, जो निरन्तर बहती ही जा रही है, इसका हमारे जीवन में सदुपयोग हो रहा है अथवा दुरूपयोग हो रहा है। इसीलिए इस बहती हुई चित्त शक्ति की उपयोगिता जानने के लिए इसे एकाग्र करना आवश्यक है और इसे एकाग्र करने के लिए किसी आधार की आवश्यकता अवश्य पड़ती है और यही से हमारे देश में ही नहीं विश्व में प्रतीक उपासना का शुभारम्भ हुआ।
गुरु पूर्णिमा
गुरु पूर्णिमा का दिवस केवल गुरु पूजा का ही दिवस नहीं है, यह दिवस प्रत्येक शिष्य के लिए अपने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति का दिवस है। भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में गुरु से शिष्य का गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मिलन एक संगम की भांति है। जहां हजारों शिष्य रूपी नदियां गुरु में आकर विलीन होती हैं। इसी कारण गुरु पूर्णिमा के दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी चेतना को गुरु का अधिष्ठान, गुरु का आधार लेकर व्यक्त करता है। इसीलिए यह दिवस प्रत्येक शिष्य के लिए परम हर्ष का दिवस है।
यह तो सब को जानकारी है कि गुरु शब्द का अर्थ है अधंकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला लेकिन गुरु पूर्णिमा ऐसा अवसर है जब चित्त शक्ति अपनी परकाष्ठा पर पहुंचती है। उस समय शिष्य के भाव में, लय में, गति में एक सम्पूर्णता आ जाती है।
गुरु पूर्णिमा का तात्पर्य क्या है? जिस समय शिष्य अपनी इन्द्रियों के माध्यम से, इन्द्रियों से भी अतीत के माध्यम से, अपने सूक्ष्म अनुभवों के माध्यम से प्रकट करती हुई चित्त शक्ति सम्पूर्ण व्यक्तित्व में, शरीर, मन, बुद्धि में व्याप्त हो जाती है, उस स्थिति को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है और गुरु पूर्णिमा इसको पूर्ण साकार रूप देने का एक माध्यम है। जब यह शक्ति व्याप्त होती है तो साधक अपने तपोगुणमय अंधकार को दूर कर अपने भीतर प्रकाश फैलाने में समर्थ होता है और जब अंधकार दूर होता है तो उसे पूर्णिमा कहा जाता है।
गुरु का दर्शन ही ज्ञान की पूर्णिमा है। कोई भी कार्य या योजना प्रारम्भ करने के पहले गुरुदेव का आशीर्वाद ले लो। उनके आशीर्वाद और आदेश के बिना तुम अन्दर नहीं जा सकते। उनसे मिलना होगा। उन्हें पहचानना होगा। उनके स्वरूप का ध्यान करो। गुरु का स्वरूप तीन प्रकार का होता है- स्थूल, सूक्ष्म और आत्मदर्श। स्थूल रूप में- वह हमारी, तुम्हारी तरह भौतिक शरीर को धारण करने वाला, खाने-पीने, सोने तथा लौकिक व्यवहार करने वाला होता है। परन्तु उनके विचारों में अधिक संयम, विवेक और तेजस्विता होती है।
शिष्य जब गुरु से भेंट करने जाता है तो वह अपने अहम के प्रतीक रूप में नारियल, पुष्प, मिष्ठान, धन इत्यादि चढ़ाता है। यह तो अहं के बाह्य स्थूल रूप को अभिव्यक्त करता है।
अहं आपके विचारों और भावनाओं में रहता है और पैसे के बल पर आप उसे रखते हैं। इसलिए नारियल आपके सिर का प्रतीक है, फूल आपके हृदय का प्रतीक है, मिठाइयां आपकी इच्छाओं का प्रतीक हैं और रूपये-पैसे आपके मोह के प्रतीक हैं। अतः जब आप गुरु बनाते हैं तब अपने अहं को समर्पण करते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो आप उनसे हमेशा झगड़ा करेंगे और अन्तर्द्वन्द्व में अपनी शक्ति व्यर्थ गंवाते रहेंगे। दो अहं एक साथ नहीं रह सकते। अतः गुरु या शिष्य किसी एक के ही अहं को रहने दें। तब आपके आध्यात्मिक जीवन में महत्वपूर्ण घटना घटेगी। जब शिष्य अपना अहं समाप्त कर देता है तब वह गुरु के संदेश को आज्ञा चक्र के सूक्ष्म माध्यम से ग्रहण करने में समर्थ होता है और उनके महान मिशन (अभीष्ट) का वाहक बन जाता है।
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