





मेरी चेतना किसी चंचल खग की तरह उड़ने लगी, किसी घोंसले की तलाश में—- ‘छम-छम’ फिर वही नुपूरों की आवाज! अब यह आवाज कक्ष के भीतर से आई थी। मैंने आंखें खोली- देखा, कमरे में कोई नहीं था, तो फिर कैसा विभ्रम। नहीं, विभ्रम नहीं! मैं सचेत था। एक क्षण दीपक की लौ पर दृष्टि पड़ी, फिर मैंने पलके बन्द कर लीं, किन्तु कुछ पलों के बाद फिर वही नूपुरो की आवाज गूंजी। अब तो एकदम ही आश्चर्यचकित होकर मैंने आंखें खोली। दीपक की लौ पर ही मेरी दृष्टि थी। हां, उस लौ में एक परिर्वतन आ गया था। पहले उसका रंग पीला था और अब उसमें कुछ नीलापन आ गया था।
मैं देखता रहा, बिल्कुल स्थिर दृष्टि से! दीपक की लौ का नीलापन प्रगाढ़ होता जा रहा था, फिर दूसरे ही क्षण उस ‘लौ’ में एक नारी की आकृति उभरने लगी। पहले धुंधली, फिर वह आकृति स्पष्ट होती गई। मेरे देखते ही देखते वह आकृति दीपक की लौ से पृथक हो गई। अब उस आकृति का विस्तार होने लगा। कुछ ही पलों में उस आकृति ने सम्पूर्ण नारी का रूप धारण कर लिया।
नारी का ऐसा पार्थिव सौन्दर्य मैंने कभी नहीं देखा था। वह किसी दिव्य लोक से अवतरित प्रतीत हो रही थी। उन्नत ललाट, जिस पर सिन्दूरी टीका- नवल क्षितिज पर जैसे सूर्य-बिम्ब हो। आंखों में सम्मोहन और अधरों पर वह मुस्कान— कोमल किसलय पर थिरकती रक्तिम किरण की तरह। उसके गोरे शरीर पर परिधान के नाम पर सिर्फ चीते की खाल थी। गले में छोटे-छोटे शंखों की माला— और नितम्बों तक झूलती वेणी थी, जो श्वेत फूलों से सज्जित थी। ‘लो, तांत्रिक, देख लो मुझे!— मैं हूं तुम्हारी भैरवी! तुम मुझे ही खोजने आए हो और मैं तुम्हें शताब्दियों से खोज रही हूं।’ उस नारी ने कहा और अपनी भुजाएं पसार दीं। मैं जैसे किसी चुम्बकीय शक्ति से खींचा-सा उन कोमल भुजाओं के बीच समा गया। चेतना के विविध आयाम होते हैं। केवल प्राणी जगत में ही चेतना नहीं होती, वनस्पति जगत और जड़ जगत में भी चेतना की परिव्याप्ति होती है। सम्पूर्ण सृष्टि ही चेतना का इतिहास है, चेतना को धारण करने वाली आत्मा है और आत्माओं को धारण करने वाली परम-सत्ता है। शरीर के रूप में आत्माये जन्म लेती हैं और कर्म विषय के अनुसार अपनी जीवन-यात्राएं तय करती हैं। आत्मा की सम्पूर्ण जीवन यात्रा में चेतना के विविध आयाम प्रकट होते हैं।
उपनिषदों में जीव की चार अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है- जाग्रत अवस्था, स्वप्नावस्था, सुसुप्तावस्था और तुरीयावस्था। यदि हम गंभीरता से विश्लेषण करें, तो इन चारों अवस्थाओं के और भी अनेक रूप हो सकते हैं। जाग्रत अवस्था के अन्तर्गत जीवन के अंतः परिवेशों में जब सतोगुण का आवेश होता है, तब प्राणी में क्षमा, दया, करूणा जैसे उदात्त भावों का उन्मेष होता है। जब तमोगुण का उन्मेष होता है, तब हिंसा, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से चेतना विकृत हो जाती है। रजोगुण के प्रभाव से जीवन में कर्म और भोग की प्रवृत्तियां उत्पन्न होती हैं।
भारतीय दर्शन में आत्मा को पंचकोशों में आवेष्ठित भी बताया गया है। पंचकोश हैं- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, ज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश। एक-एक कोश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता चला गया है। अन्नमय कोश पार्थिव शरीर का पर्याय है। शरीर से अधिक सूक्ष्म प्राण, प्राण से अधिक सूक्ष्म मन, मन से अधिक सूक्ष्म ज्ञान और ज्ञान से भी अधिक सूक्ष्म आत्मा होती है। ‘आनन्द’ आत्मा का प्रधान गुण है। योग की साधना करने वाले अपनी साधना के उत्तरोतर विकास के साथ ही, अपनी चेतना को उक्त पंचकोशों में संचरित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। समाधि में क्या होता है? योगी की चेतना ‘अन्न’ (स्थूल) को छोड़कर ‘प्राण’ (वायु) के स्तर पर रहने वाले योगी का शरीर नष्ट हो जाता है। तो भी वह संकल्प मात्र में पुनः अन्नमय कोश में अवतरित हो सकता है।
प्रस्तुत सत्य-कथा के आरम्भ में जिस घटना का वर्णन किया गया है- वह वास्तव में भैरवी का प्राणमय कोश से अन्नमय कोश में पुनः प्राकट्य था। मैं उन दिनों ‘श्री शैलम्’ की यात्रा पर था। ‘श्री शैलम्’ को ‘मल्लिकार्जुन’ के नाम से भी जाना जाता है। यह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। भू मध्य रेखा की पश्चिमी सीमा जहां आंध्र प्रदेश से लगती है, ‘श्री शैलम् तीर्थ’ वहीं स्थित है। यहां से दस किलोमीटर दूर ‘पाताल-गंगा’ एवम् ‘भद्राचलम् तीर्थ’ है।
चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पर्वत और इनके बीच लहराती हुई ‘पाताल-गंगा’। हरिद्वार में भागीरथ-गंगा का जो वेग है, उससे भी कहीं अधिक तीव्र प्रवाह यहां पाताल-गंगा में हैं। जंगली लता-गुल्मों और बिल्व के सहस्त्रों वृक्षों से यह वनांचल आच्छादित है। यत्र-तत्र झरनों के कल-कल नाद और विभिन्न पक्षियों की चरचराहट से यहां का मनोरम वातावरण गूंजता रहता है।
मैंने ‘द्वादश ज्योर्तिलिंगों’ और ‘इक्यावन शक्तिपीठों’ की यात्रा का संकल्प लिया था। मैं जब ‘मल्किार्जुन’ पहुंचा तो रात हो चुकी थी। मेरा पहला काम था भगवान आशुतोष के दर्शन करना। ‘मल्लिकार्जुन’ का शिवलिंग बड़ा ही भव्य और मन को मोहने वाला है। पूजनोपरांत मंदिर में बाहर निकला तो भूख सताने लगी, किन्तु भोजन की व्यवस्था नहीं हो सकी। थका-हारा मंदिर के पास ही स्थित एक जीर्ण-शीर्ण धर्मशाला के कक्ष मे विश्राम करने लगा, वह भैरवी तभी मेरे सामने प्रकट हुई थी। दूसरे दिन प्रातः काल स्नान के बाद जब मैं मंदिर पहुंचा, तो नदी की प्रतिमा के पास एक आठ-दस साल की बालिका अकेली बैठी मिली। पूजा के बाद जब मैं बाहर आ रहा था, तो उस बालिका ने मुझे पुकारा- ‘ऐ! इधर आओ’। मैं उसके पास पहुंचा तो देखा, वह एक रेशमी पोटली खोल रही थी। बोली- तुम भूखे हो ना? लो, खाओ! पोटली में कुछ फल और मिठाइयां थी।
मैं आश्चर्यचकित था कि इस वीरान जंगल में यह कौन बालिका है जो मेरे अंतर्मन की बात समझकर मुझे खाद्य पदार्थ दे रही है। मैं फल और मिठाई उसके हाथ से लेकर खाने लगा। नदी के सामने स्थित कुंड से जल पी रहा था, कि उसने पूछा- ‘क्या? मुझे भूख लगी थी?’ हां! मैंने धीरे से कहा- ‘तुम कौन हो? उसकी आंखों में एक अजीब सी चपलता उभरी ‘क्यों’ मुझे पहचाना नहीं? मैं तो हूं वही—- भूल गए रात की बात!’ मैं जैसे आसमान से गिरा! वह मुस्कराई और नदी की प्रतिमा के पीछे जाकर मेरे देखते ही अदृश्य हो गई। ‘श्री शैलम्’ के मंदिर के आस-पास के जंगलों में भ्रमण करते हुए मैं संयोग वश उस स्थान पर जा पहुंचा था, जहां विशाल चट्टानों के बीच एक छोटा-सा पोखर बन गया था। पोखर के तट पर ही किसी की समाधि बनी थी, समाधि के पास ही लताओं से आच्छादित एक शिलाचित्र देखने को मिल गया। चट्टान पर रत्तिफ़म वर्ण से किसी नारी की आकृति उत्कीर्ण की गई थी। आस-पास के गांव वाले शायद उस शिलाचित्र की पूजा करते थे, तभी तो शिलाचित्र पर सिंदूर, गुलाल आदि की छाप थी, बुझे हुए दीप और सूखे फूलों की पंखुडि़यां पड़ी थीं। मैंने शिलाचित्र को ध्यान से देखा, तो चौंक पड़ा— ‘अरे, यह तो उसी का चित्र है।’ मैंने चारों ओर दृष्टि फैलायी, दूर पगडंडियों से एक बूढ़ा जाता हुआ दिखाई पड़ा। मैंने आवाज दी, तो वह मुड़कर मेरे नजदीक आया। मैं उस समाधि और शिलाचित्र के बारे में कुछ जान लेना चाहता था, किन्तु उसकी भाषा (ग्रामीण तेलगु) को समझ पाना मुश्किल था। सकेंतो से बात करने की चेष्टा की और जो आशय निकला, वह यह था- कि समाधि ‘श्री शैलम् तंत्रपीठ’ की किसी पुजारिन की थी। उसने वहीं पोखर में जीवित जल-समाधि ले ली थी, वह बड़ी जादूगरनी थी, हवा से उड़ती थी और अंतर्ध्यान हो जाती थी।
चेतना के अनेक सोपानों में सुसुप्तावस्था का बड़ा महत्व होता है। जागरण और प्रसुप्ति के बीच एक स्थिति आती है- जिसे ‘स्वप्नावस्था’ कहते हैं। स्वप्नों को देखने के बाद ही शायद आदि-मानाव ने यह कल्पना की होगी, कि जब हम गहरी नींद में होते हैं, तब आत्मा शरीर छोड़कर बाहर निकल जाती है और लोक-लोकान्तरों का भ्रमण करती है। आदि मानव की इस अवधारणा की पुष्टि अनेक परा-मनोविद् भी करते हैं। मेरी अपनी धारणा है कि सुसुप्तावस्था में जब आत्मा की आभ्यांतरिक चेतना स्फुटित होती है, तब स्वप्नलोक का निर्माण होता है, तब आत्मा की सम्पूर्ण सृजन-क्षमता प्रकट होती है। वहां कोई वर्जना नहीं, कोई निषेध नहीं, भावना मात्र से ही आत्मा की सृष्टि हो जाती है। ठीक उसी तरह, जैसा की पुराण कथाओं में कहा जाता है- भगवान विष्णु तो सतत् निद्रा में लीन रहते हैं, किन्तु सृजन और विनाश के कार्य चलते रहते हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान विष्णु के स्वप्नों का अंतरजाल है। शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन जिसे ‘माया-तत्व’ की संज्ञा देते हैं, वह यही तो है।
मैं शंकराचार्य के ‘माया-तत्व’ पर सोच रहा था। हां, माया असत्य तो है, परन्तु संवेदनाओं की कहानी भी तो झूठी नहीं हो सकती। काया को अनुभव करने वाली संवेदनायें उसे भी सत्य मानती हैं। सांख्य-मत से, तब तो दोनों ही सत्य हैं- प्रकृति भी और पुरूष भी।
यही सब सोचते हुए मैं न जाने कब सो गया। मैं शायद गहरी नींद में था या स्वप्न देख रहा था। मुझे लगा कि कोई दरवाजे को खटखटा रहा है। मैं उठा, उठकर दरवाजा खोला- वहां कोई नहीं था, बस गहरा अंधकार था, फिर हवा में एक ओर से तैरती हुई भीनी गंध आई। मैं पीछे मुड़कर दरवाजा बंद करने की इच्छा करने लगा, किन्तु ‘छम्म’ से वह सुन्दरी वहां प्रकट हुई और कक्ष में प्रविष्ट हो गई, उसने मुझे एक ओर हटाते हुए स्वयं ही दरवाजा बंद कर दिया।
‘‘बालमुकुन्द! तुम यहां क्यों आये? बस, अब तुम यहां से चले जाओ।’’ उसने कहां। मैं फर्श पर बैठ गया था। ‘तुम मुझे पुंश्चली समझते होंगे, लेकिन सावधान, मैं सिद्ध भैरवी हूं। मैं यहां तांत्रिकों को दर्शन देती हूं, सिर्फ इसलिए की कोई मुझे भैरवी-चक्र का रहस्य समझा दे।’ तुम नहीं जानती?—नहीं मैं तो एक असहाय सी नारी थी, यहां पास ही के एक गांव में रहती थी। बाल्यावस्था में ही मुझे देवदासी बना दिया गया था। मैं युवा हुई तो भोग-विलास की वस्तु बना दी गई। देवता को समर्पित मेरी देह, उसके सभी पुजारियों को प्रसाद की तरह वितरित होती थी। तुम कल्पना कर सकते हो, मैं कितने संत्रास में थी, फिर वर्षों बाद मुझे एक तांत्रिक ने कुछ साधनाएं सिखलाई और समाधि की दीक्षा दी।
मैंने पूछा की तुम मुझसे क्या चाहती हो देवी? रहस्य का ज्ञान दीजिए गुरुदेव—वह एकदम ही विनम्र हो गई। वह भी तो अंततः मोक्ष का ही एक विधान है देवी। ‘‘भैरवी-चक्र’’ में साधक और साधिका को सतत् ही यह ध्यान रखना चाहिए, कि शरीर और आत्मा के बीच संवेदना का जो सेतु है, वह कभी दूषित नहीं होना चाहिए, जिस अवस्था में हम परम शांत और निर्मल ब्रह्म की चेतना का अनुभव करते हैं, वह वास्तव में सृष्टि का मूल है। मैं उस समय एकदम गंभीर था। उसकी छितराई अलकों में गूंथे फूलों की गंध मुझे अशांत सी करती थी, किन्तु उस समय मर्यादा का आंचल मुझसे नहीं छूटा था, वह लुढ़क कर मेरी गोद में आ गिरी। एक ऐसा सम्मोहन, जिसे निवृत्त करना असम्भव हो!
उसने पूछा ‘भैरवी-चक्र से मोहन-वशीकरण भी सिद्ध होते हैं? क्यों नहीं अवश्य—- सर्वार्थ सिद्ध हो सकते हैं– — यहां तक कि मारण भी।’ मैं न जाने किस प्रवाह में कह गया। मेरा सिर उसकी ओर झुकने लगा। मेरी आंखों में, हृदय में एक प्यास थी।’ चेतना की चरम अवस्था समाधि है, सृष्टि की परम सत्ता इसमें बिल्कुल हमारे सामने होती है। आनन्द का ऐसा ड्डोत सा प्रड्डवित होता है, कि इस अवस्था से चेतना प्रत्यावर्तित नहीं होना चाहती, किन्तु सिद्ध पुरूषों को भी कर्म-विपाक के कारण माया के साम्राज्य में फिर-फिर कर लौटना पड़ता है। मैं उस दिन जब भगवान आशुतोष के सामने उपस्थित हुआ, तो क्षमा के लिए मेरा सिर झूका गया था।
भैरवी ने मेरी वर्षों की तपस्या का हरण कर लिया था। मेरा पूरा आस्तित्व उस रात्रि जब कक्ष में उसके अस्तित्व में डूबा जा रहा था, आत्मलीन की उस समाधि अवस्था में वह मुझे अपने आवेश में खींचकर उस पोखर तक ले गई। मैं उसके साथ पोखर में जल-समाधि में था। यह तो भगवान आशुतोष की कृपा थी कि मंदिर से एक पुजारी ने प्रातःकाल ही मुझे पोखर में देख लिया और मुझे वहां से निकाल कर मंदिर में ले आए थे। मैं सम्भवतः मृत समझ लिया गया था, किन्तु जब मेरी चेतना शरीर में लौटी, तो उस समय मंदिर में पूजा समाप्त हो चुकी थी और सभी मुझे आश्चर्य से देख रहे थे। प्रकृतिस्थ होने में तीन घण्टे से भी अधिक समय लगा। जल-समाधि का अभ्यास नहीं होने के कारण मेरे मस्तिष्क में सुन्नता थी और हृदय की धड़कनें एकदम शांत। किसी पंडित के ‘‘आदित्य हृदयम!’ पाठ से ही
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