





सम्मोहन साधना संसार की सर्वश्रेष्ठ साधना है। यह साधना इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसे समाज में रहना ही पड़ता है, चाहे वह गृहस्थ हो, साधु हो, संन्यासी हो। व्यक्ति जिस प्रवृत्ति का होता है, वैसा ही समाज अपने आस-पास एकत्रित कर लेता हे। समाज में कहीं कोई उस पर प्रभावी न हो जाये, उस पर अपनी श्रेष्ठता न स्थापित कर लें, इसके लिए सम्मोहन साधना सर्वश्रेष्ठ साधना है।
सम्मोहन के माध्यम से कई समाजोपयोगी कार्य तो होते ही है, अपने प्रतिद्वनदी को भी इसके द्वारा मनोनुकूल बनाया जा सकता है ओर जहां कटुता, कलह और द्वेष होता है, वहां प्रेम पैदा किया जा सकता हे, भावनात्मक स्थितियां निर्मित की जा सकती हें। इससे जीवन में अनुकूल परिस्थितियां निर्मित कर, जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है।
सामान्यत: सम्मोहन का अर्थ होता है कि हम किसी को भी अपने तरफ आकर्षित कर लें, अपने विचारों के अनुकूल बना लें। यदि कोई व्यक्ति शत्रु बाधा से पीड़ित है, शत्रु उसका कहना नहीं मानता, जबरदस्ती उसकी सम्पत्ति पर अधिकार करके बेठा है या मानसिक-शारीरिक रूप से हानि पहुंचाने का प्रयास कर रहा हे- ऐसी स्थिति में कमजोर व्यक्ति असहाय हो जाता है, उसे किसी ऐसी शक्ति की खोज रहती है, जिससे सामने वाला व्यक्ति उसकी बात मान ले।
इसके अलावा भी समाज में कई प्रकार की अडचनों का सामना व्यक्ति को करना ही पड़ता हे जैसे- पुत्र आपका कहना नहीं मानता, गलत-संगति में पड़कर अपने जीवन के साथ-साथ आपका जीवन भी दुर्भाग्यमय बनाने पर तुला हुआ है या पुत्री के कदम बहक गये हैं और वह आपक कहने से बाहर होकर आपकी प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने पर तुली है या पति शराब पीने की आदत के कारण घर-परिवार को ही बरबाद किये जा रहा है, नोकरी में अफसर आपका कहना नहीं मानता, ऐसी अनेक समस्याओं का सामना पग-पग पर व्यक्ति को करना ही पड़ता है।
घर में नित्य कलह रहती है, कोई किसी का कहना नहीं मानता, इससे पड़ोस में भी आपकी बदनामी होती हे, पड़ोसी निरन्तर आपके लिए कुचक्र रचता रहता हे, शत्रु बाधा बढ़ती जा रही है, ऐसी स्थिति में या तो व्यक्ति आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए मजबूर हो जाता है या फिर सब कुछ छोड-छाडकर भाग जाने के लिए विवश हो जाता है। इस कायरता पूर्ण पलायन को रोकने के लिए इस साधना का जो महत्व है, वह अन्य किसी साधना का तो हो ही नहीं सकता।
सम्मोहन भी तीन प्रकार का होता है
समूह सम्मोहन के माध्यम से तो पूरी की पूरी फौज को वश में कर युद्ध तक को टाला जा सकता है। इस प्रकार तीनों ही स्थितियों में सम्मोहन साधना श्रेष्ठ है।
सम्मोहन केवल मनुष्य पर ही नहीं होता, अपितु देवी-देवताओं पर, पशुओं पर, भूत-प्रेतों आदि पर भी होता है। सम्मोहन के द्वारा तो पत्थर को भी वश में किया जा सकता है, समस्त जड़-चेतन सम्मोहन के द्वारा आपके वशीभूत हो सकता है।
‘ भगवान श्रीकृष्ण” के पास भी सम्मोहन साधना सिद्धि थी, उनका एक नाम मोहन भी केवल इसलिए पडा था, क्योंकि वे अपने सामने वाले किसी व्यक्ति को, भीड को, यहां तक कि जड़-चेतन को भी अपने वश में करने में पूर्ण सक्षम थे। कृष्ण की बांसुरी की आवाज सुनकर पशुओं का दौड़ कर चले आना, गोपी-ग्वालों का उनके इशारे पर नाचना तो एक आम बात थी, यह सब कुछ सम्मोहन के माध्यम से ही सम्भव हो सका था।
“महात्मा गांधी ‘ जैसे दुबले-पतले व्यक्ति, जिनका शरीर भी जर्जर था, पूरी भीड़ को सम्मोहित करने में सक्षम थे और इसी बल पर उन्होंने कई असम्भव कार्यों को अंजाम दिया। जो कार्य उन्होंने अपने सम्मोहन से युक्त व्यक्तित्व के द्वारा किये, वे आज सम्पूर्ण मानव जाति के सम्मुख हें ही।
इस साधना को कोई भी स्त्री, पुरूष व बालक आसानी से सम्पन्न कर सकता है। इस साधना को किसी भी धर्म-जाति का व्यक्ति सम्पन्न कर सकता है।
यह आज के युग में सभी के लिए आवश्यक भी है, कि सम्मोहन साधना को प्राप्त कर जीवन का नव-निर्माण करें और समाज की उन्नति में अपना विशेष योगदान प्रदान करें।
यहां इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी हे, कि इस विद्या का कभी भूलकर भी दुरूपयोग न करे, यदि कोई इसका दुरूपयोग करेगा भी, तो इससे उसकी स्वयं की शारीरिक ऊर्जा सम्मोहन शक्ति का हास ही होगा और उसकी क्षमता निरन्तर क्षीण होकर समाप्त हो जायेगी। इसलिए समाजोपयोगी कार्यों में इस साधना का प्रयोग करें, जिससे आत्मबल में वृद्धि होगी और वह समाज उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकेगा।
यह साधना देखने में तो छोटी है, मगर इसके परिणाम बहुत ही अनुकूल एवं प्रभावकारी होते हैं। जिस प्रकार से एक बीज अत्यन्त लघु होने के बावजूद भी अपने अस्तित्व में सम्पूर्ण वृक्ष को लिए होता है, उसी प्रकार साधनाएं भी जीवन पथ को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण स्थान रखती हें।
ऐसी दशा में “मोहिनी सम्मोहन साधना’ सभी दृष्टियों से अनुकूल और शुभफल प्रदान करने वाली होती है। प्रतिद्वन्दी के मन में छाई बेर-भाव की भावना को समाप्त कर उससे मनोनुकूल कार्य लिए जा सकते हैं।
इस साधना को करने वाले साधक को सर्व प्रथम दृढ़ निश्चयी होना आवश्यक हे, इस साधना को पूर्ण दूढ़ता और क्षमता के साथ करें। यह साधना तो प्रत्येक शिष्य, प्रत्येक साधक को करनी ही चाहिए तथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भी करनी ही चाहिए।
साधना विधान
स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें, सामने बाजोट पर पीले वस्त्र पर ‘सम्मोहन यंत्र’ को स्थापित कर उसका कुंकुम, अक्षत, पुष्प तथा नैवेद्य चढ़ाकर पूजन करें।
मोहिनी गुटिका को भी यंत्र की दायीं ओर पीले चावलों की ढेरी पर स्थापित कर उसका इसी प्रकार पूजन करें। फिर “आकर्षण माला ‘ से निम्न मंत्र की 5 माला मंत्र जाप करें।
नित्य 5 माला 7 दिन तक जाप करें, पूर्ण मंत्र जाप के पश्चात् समस्त सामग्री नदी में विसर्जित कर दें ऐसा करने से साधना पूर्ण हो जाती है।
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