





एक बार सद्गुरूदेव अपने आसन पर प्रातः अपनी नित्य साधना के पश्चात् बैठे थे, और आगन्तुकों की भीड़ लगी हुई थी, प्रथम व्यक्ति व्यापारी था और बोला कि- गुरूदेव दो साल हो गये, पता नहीं मेरे व्यापार को क्या हो गया है, जो भी काम करता हूं उलटा ही उलटा पड़ रहा है, कहां मैं लाखों में खेलता था और आज लाखों का कर्जा है, मैं क्या करूं? गुरूदेव ने उसे एक पुष्प दिया और कहा कि ‘धूमावती साधना तथास्तु’।
दूसरे सज्जन एक नेता जी थे, राजनीति में जबरदस्त दबदबा था, मुख्य मन्त्री तक पहुंच रखते थे, और उन्होने कहा कि अब यह हालत हो गई है कि मेरे क्षेत्र का प्रधान तब मेरे विरूद्ध हो गया, मुझे टके भाव कोई पूछता, ऐसा अपमान बरदास्त नहीं होता। राजनीति से मैं संन्यास भी ले लू तो करूंगा क्या? नेताओं की तो एक ही जाति होती है, वह है – ‘पोलिटिक्स’, इसके अलावा तो उन्हें कुछ आता नहीं, नेताजी ने कहा, प्रभु! कुछ करिये। गुरूदेव ने कहा ‘धूमावती साधना’।
तीसरे सज्जन की बाधा तो न्यारी थी, वे बोले कि मेरे घर में पिछलें छः महीने से कमरे में कभी कोयला मिलता है, कभी मिट्टी की पोटली तो कभी तिल और सरसों, कभी रंगीन चावल, और कई बार तो ऐसा होता है कि घर में किसी कपड़े में अचानक आग लग जाती है और इन छः महीनों में कभी पत्नी बीमार रहती है तो कभी लड़की बीमार पड़ जाती है, और जहां मैं अच्छा खासा स्वस्थ था, अब मुझे इतना ब्लड प्रेसर रहने लगा कि थोड़ी देर भी निश्चिन्त हो कर काम नहीं कर सकता, गुरूदेव ने कहा कि बहुत दुःख भोग रहे हो, करो- ‘धूमावती साधना’।
पूज्य गुरुदेव के एक पुराने शिष्य पीलीभीत के पास रहने वाले मिश्राजी थे, खेती भी है, थोड़ा बहुत खाद बीज इत्यादि का व्यापार भी करते हैं, और गन्ने की पिराई का काम अपने यहां लगा रखा है। गांव में किसी की हत्या हो गई, किसी ने हत्या कर लाश को उनके खेत के किनारे डाल दिया, मिश्राजी गुटबाजी में विश्वास नहीं रखते थे, गांव की राजनीति से दूर रहते थे, पूजा पाठ और अपने कार्य की ओर ही मगन रहते थे, अब पुलिस पकड़ कर ले गई और कत्ल का मुकदमा चला दिया। मजिस्ट्रेट के यहां तो क्या सेशन कोर्ट में भी जमानत नहीं हुई। जेल से ही उन्होंने गुरूदेव को पत्र लिखा कि प्रभु! आपका शिष्य महान संकट में फंस गया है, मैंने तो कोई दुष्कर्म नहीं किया और मुझे झूठा फंसा दिया गया है, थोड़ी सी अनबन तो उस व्यक्ति के साथ अवश्य थी, और जिस हिसाब से केस चल रहा है, उससे ऐसा लगता है कि फांसी नहीं तो उम्र कैद तो हो ही जायेगी। कुछ करिये वरना मेरी तो लुटिया हो डूब जायेगी।
गुरूदेव ने कहा इसके लिये यहीं आश्रम में ‘धूमावती अनुष्ठान’ संपन्न करते हैं, देखता हूं कि मिश्राजी का कोई बाल भी बांका कैसे कर दे।
ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं, जो सौ टंच खरे उतरे अलग-अलग क्षेत्रों के लोग, अलग-अलग उनका व्यक्तित्व, अलग-अलग उनका लक्ष्य और विशेष बात यह है कि लक्ष्य पूर्ति केवल एक ही साधन द्वारा और वह साधन है- धूमावती साधना। धूमावती साधना का पूर्ण कल्प, जिसे एक बार शुरू करे तो पूरा अवश्य किया जाय और यदि सब कुछ सही रूप से पूर्ण हो जाय तो फिर कमी किसी बात की नहीं। आखिर ऐसा क्या है?
यदि आप साधक हैं, भक्ति में आपकी रूचि है, साधना आपका जीवन दर्शन है तो निश्चय ही आपका दृष्टिकोण दूसरों से अलग होगा, आपके चित्त में एक निर्मलता होगी, सात्विक भाव होगा, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने में अथवा किसी की हानि में आपकी प्रसन्नता नहीं होगी।
इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि आप निर्बल बन जाय, किसी भी शास्त्र में ऐसा नहीं लिखा है कि व्यक्ति को साधक को दूसरों का आघात सहन करना चाहिये, दुष्टों से डरते रहना चाहिये, अपने जीवन में व्यर्थ की पीड़ा झेलते हुये भी प्रसन्नता का नाटक करते रहना चाहिये, ऐसा करना तो उस महान शक्ति का अपमान होगा, उस गुरू का अपमान होगा, जिसके आप शिष्य हैं। जब तक जीवन की पीड़ाओं को हटा कर जीवन में निर्मलता नहीं ला सकते, तब तक शुद्ध भाव जागृत कर अपना अंतिम लक्ष्य निराकार परब्रह्म में विलीन हो कर जीवन में पूर्णता प्राप्त करने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।
किसी हिंसक जानवर से सामना होने पर उसे हाथ जोड़ कर नमस्कार नहीं करेंगे उसे निवेदन भी नहीं करेंगे कि आप मुझे छोड़ दीजिये, उसका तो अपने सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्र सहित मुकाबला कर उसे परास्त करना ही पडे़गा। और जीवन क्या है? इसमें भी तो हिंसक पशु आपकी बीमारियों के रूप में, शत्रुओं के रूप में, दुर्घटना के रूप में, तांत्रिक प्रयोगों के रूप में, धोखा देने वालों के रूप में, गरीबी, मुकदमें के रूप में पग-पग पर भरे पड़े हैं, और इन पर विजय प्राप्त कर ही इन्हें वश में किया जा सकता है।
धूमावती की कथा में तो दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारिणी शक्ति है, दूसरी कथा के अनुसार यह पार्वती का यह विशाल एवं रूक्ष स्वरूप है, जो क्षुधा से विकलित कृष्ण वर्णीय कलहकारी, कुटिल रूप है, जो भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिये साक्षात् काल स्वरूप है, जहां धूमावती साधना संपन्न होती है वहां इसके प्रभाव से शत्रुनाश का विग्रह, बाधा नाश का कार्य अवश्य ही प्रारम्भ हो जाता है उसके साथ साथ समस्त पाप दोष से मुक्ति मिलती है और कामनाओं की पूर्ति होती है।। धूमावती साधना मूल रूप से तांत्रिक साधना है, भूत-प्रेत पिशाच तो धूमावती साधना से इस प्रकार गायब होते हैं, जैसे जल को अग्नि देने पर वाष्प रूप में विलीन हो जाता है। धूमावती का स्वरूप क्षुधा अर्थात् भूख से पीडि़त स्वरूप है और इसे अपने भक्षण के लिये कुछ न कुछ अवश्य चाहिये। अतः जब साधक इसकी साधना करता है तो वह प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण ही कर लेती है।
धूमावती साधना केवल कुछ विशेष दिनों में ही प्रारम्भ की जा सकती है, तन्त्र विद्या के जानकार और नित्य प्रति तन्त्र साधना करने वाले तांत्रिक और कोई साधना करें अथवा न करें, अष्टमी और अमावस्या के दिन धूमावती अनुष्ठान अवश्य ही संपन्न करते हैं।
इस वर्ष 12 जून 2016 ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को धूमावती जयन्ती है, इस दिन दुर्गाष्टमी का एक विशेष योग भी बना है, अतः साधक को इस दिन धूमावती अनुष्ठान या साधना अवश्य ही संपन्न करना चाहिये। धूमावती साधना का यह विधान अत्यन्त विलक्षण एवं विशिष्ट फलप्रदायक विधान है, बाधायें चाहे कितनी ही विकराल अथवा विशाल हों, धूमावती साधना से बाधाओं पर विजय प्राप्त होती ही है। इस साधना के संबंध में ज्यादा लिखने के बजाय यह कहना उपयुक्त होगा कि इसे सम्पन्न कर इसका प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त कर साधक स्वयं ही निर्णय करें।
साधक स्नान कर काली धोती धारण कर, ऊनी आसन बिछा कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाये। सामने लकड़ी के बाजोट पर काला कपड़ा बिछा कर उसके ऊपर स्टील या लोहे की थाली रख दें, इस थाली के अन्दर पूरी तरह से काजल लगा दें।
इसके बाद साधक चांदी शलाका से या किसी तिनके की सहायता से एक बूढ़ी स्त्री का चित्र अंकित करें जिसके बाल बिखरे हुये हों और जिसके गले में नरमुण्ड माला धारण की हुई हो, यह धूमावती का प्रतीक चिन्ह है। इसके बाद साधक एक दूसरी स्टील की थाली में ग्यारह तेल के दीपक लगावें, इसमें किसी भी प्रकार के तेल का प्रयोग किया जा सकता है, इस साधना में अगरबत्ती आदि की आवश्यकता नहीं होती।
इसके बाद साधक थाली में स्वस्तिक बनाये, उसके चारों ओर ‘नौ चावल की ढेरी बनाये’ धूमावती के बांयें पैर के पास ‘लघुनारियल’ स्थापित करें और दाहिने पैर के पास ‘सुपारी’ स्थापित करें। धूमावती के वक्षस्थल पर या हृदय पर ‘चिरमी की दाने’ रखें और नाभी स्थल पर धूम्रविलोचिनी शक्ति युक्त धूमावती यंत्र स्थापित करें।
इसके बाद साधक हाथ में जल लेकर संकल्प लें, कि मैं अमुक गोत्र अमुक पिता का पुत्र अमुक नाम का साधक पूर्ण क्षमता के साथ जालन्धर पीठ धूमावती को सिद्ध कर रहा हूं, ऐसा कह कर जल को जमीन पर छोड़ दें। इसके बाद हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़े।
विनियोग :
अस्य धूमावतीमन्त्रस्य
पिप्पलादऋषिः निवृच्छन्दः ज्येष्ठा देवता धूं बीजं स्वाहा
शक्तिः धूमावती कीलकं ममाभीष्टसिद्धयर्थे (शत्रुहनने)
जपे विनियोगः।
हृदय न्यासः-
ऊँ धूं धूं हृदयाय नमः, ऊँ धूं शिरसे स्वाहा, ऊँ मां
शिखायै वषट्, ऊँ वं कवचाय हुं, ऊँ तीं नेत्र त्रयाय
वौषट्, ऊँ स्वाह अस्त्रय फट्
इसके बाद साधक करन्यास सम्पन्न करें इसमें अंगूठे तथा जिन उंगलियों का वर्णन है उनको देखते हुये मन्त्र उच्चारण करें-
करन्यासः-
ऊँ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः ऊँ धूं तर्जनीभ्यां नमः ऊँ मां
मध्यमाभ्यां नमः ऊँ वं अनामिकाभ्यां नमः ऊँ तीं
कनिष्ठिकाभ्यां नमः ऊँ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
इसके बाद साधक ‘हकीक माला’ से निम्न
धूमावती मंत्र की 11 माला मन्त्र जप करें, इस अवधि में साधक उठे नहीं और पूरी 11 माला मन्त्र जप होने के बाद ही उठें, साथ ही साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि जो ग्यारह तेल के दीपक लगायें वे बराबर जलते रहें।
जब मन्त्र जप पूरा हो जाय तब साधक थाली में जो कुछ तांत्रोक्त सामग्री है, उसमें से धूमावती यन्त्र तथा हकीक माला को छोड़कर सारी सामग्री घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर जमीन में गाड़ दें अथवा नदी या तालाब में विसर्जित कर दें, यदि साधक दिन में साधना कर रहा है तो रात्रि को यह सामग्री विसर्जित कर सकता है अथवा दिन में पूरी सामग्री को जो थाली में है, जमीन में गाड़ सकता है अथवा नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित कर सकता है।
जीवन में निरन्तर आ रही धनहीनता को पूर्णतः शमन और भौतिक जीवन में स्थाई लक्ष्मी की क्रियायें भी भगवती धूमावती की कृपा से ही सम्भव हो पाती है। इसी हेतु आप अपने किन्हीं तीन मित्रों या रिश्तेदारों को पत्रिका सदस्य बनाने पर आपको धूम्रविलोचनी दीक्षा उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी। जिसको ग्रहण कर आप अपने जीवन में आ रही पूर्व जन्मकृत पाप दोष, पिशाच दोष, कालरूपी यम दोषों को जड़ मूल से शमन कर सकेंगे, और साथ ही निर्भीक जीवन की प्राप्ति हो सकेगी।
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