





प्रासोय पूर्णं जगदम्ब अम्ब,
प्राणेश्वरी त्वं परि पालयंति,
ज्ञानं च चिंत्य वदान्यै भवंतुं,
अन्त्यो विलोक्यं अहितं सदैवः।
विश्वामित्र का यह एक श्लोक है, जो भगवती जगदंबा के एक अन्यतम उपासक थे, एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व थे और जिन्होंने जीवन में लीक से हटकर कार्य किया। ऐसे ऋषि को नमन करते हैं क्योंकि उस ऋषि ने उन रास्तों को नहीं चुना जो बने बनाये रास्ते हैं, राजपथ को नहीं पकड़ा। उन पगडंडियों को पकड़ा जो ऊबड़ खाबड़ हैं, जो कटीली हैं, जो झाडि़यों से युक्त हैं और उसमें उन्होंने रास्ता बनाया। जो मर्द होते हैं, जो साहसी होते हैं वे अपना रास्ता खुद बनाते हैं, चाहे मंत्र के क्षेत्र में, चाहे तंत्र के क्षेत्र में, चाहे योग में, चाहे किसी भी क्षेत्र में—— और विश्वामित्र ऐसे ही दुर्धर्ष व्यक्तित्व थे, इसीलिये मैंने उनके प्रति नमन शब्द का प्रयोग किया है, अत्रि, कणाद, वशिष्ठ के लिये नहीं किया। उनके प्रति आदर है, सम्मान है, श्रद्धा है। मगर नमन शब्द तो उस व्यक्ति के लिये किया जा सकता है जो अपने आप में प्राणश्चेतना से बलिष्ठ हो।
पिछले तीस वर्षों के इतिहास में आज मुझे पहली बार बीच में प्रवचन में रूकना पड़ा। (यहां पूज्य सद्गुरुदेव उस घटना की ओर इंगित कर रहे हैं जबकि एक महिला के हठ करने पर सद्गुरुदेव ने उसे उसका पूर्व जन्म दिखलाया। उस महिला ने प्रवचन के मध्य में उठकर हठ करने की दुर्धर्षता की थी। इस घटना का शब्दशः वृत्तांत ‘विश्व की श्रेष्ठ दीक्षायें’ पुस्तक में आ चुका है।)
शायद उसमें कोई दैवीय शक्ति आ गई होगी, मैं नही कह सकता नहीं तो उसकी ऐसे कैसे हिम्मत पड़ी? मगर यह दुर्धर्षता कोई समझदारी की बात नहीं थी। ऐसा एक शिष्य को नहीं करना चाहिये। यह शिष्य के लिये अनुकूल नहीं है। मगर शायद उसकी एक तड़फ होगी, एक बेचैनी होगी, शायद मन में कोई, ऐसा भाव होगा, वह भटकी होगी, और कोई चिंतन आया होगा।
कोई बात नहीं, इसका मुझे कोई गम या अफसोस नहीं है। मगर इन छोटे छोटे कार्यों के लिये ही मैं अपनी शक्ति व्यय करता रहूंगा तो व्यर्थ में यह शक्ति का पतन होगा। इन कार्यों के लिये, चमत्कारों के लिये मैं शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहता हूं और तुम्हारे इस मृत्युलोक के अलावा भी कई ऐसे लोक हैं, जहां भी जाना पड़ता है, विचरण करना पड़ता है, देखना पड़ता है, वहां के लिये भी शक्ति की आवश्यकता होती ही है जाने के लिये भी, आप जैसे शिष्यों को संभालने के लिये भी और संन्यासी शिष्यों को देखने के लिये भी।
केवल इन छोटे मोटे कार्यों में मैं अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहता। तुम्हारे लिये तो यह एक बहुत बड़ा कार्य होगा, इसमें कोई दो राय नहीं, मगर यह ध्यान रहे कि क्रोध में कभी कभी गलती भी हो सकती है। यद्यपि मैं बहुत संयत रहता हूं और किसी भी हालत में मेरे ऊपर क्रोध हावी नहीं हो, इस बात का भी ध्यान रखता हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि यह मेरा संन्यास जीवन नहीं है। यह मेरा गृहस्थ जीवन है और गृहस्थ जीवन में क्रोध पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। संन्यासी जीवन में क्रोध छोड़ना मूर्खता है, क्रोध छोड़ दें तो संन्यासी मारकर खा जाते हैं। इसलिये उनको उनके तरीके में समझाना पड़ता है, लात मारकर के, आंखों में आंखें डालकर और हर क्षण अपने आप में ताकत और क्षमता के साथ उनके सामने खड़ा होना पड़ता है। वह संन्यास जीवन अपने आप में अलग जीवन था, उस जीवन को मैंने कर्मठता के साथ भोगा है, देखा है, अनुभव किया है और अहसास किया है। मैं अपने क्रोध को भी पहचानता था और वहां के संन्यासी भी पहचानते थे कि इनके सामने पड़ने का मतलब है हड्डियां तुड़वाना और डरते थे। प्रेम भी मुझे करते थे, प्यार भी बहुत करते थे। —और वहां गुरु भी थे, किसी के पास पंद्रह बीस शिष्य होते थे, किसी के पास पच्चीस, पचास शिष्य होते थे। वे अपने अपने कटघरे लिये बैठे होते थे। उनके पास यह भी बहुत बड़ी बात थी कि उनके पास पच्चीस शिष्य हैं।
कभी कभी आनंद लेने के लिये उनके जो आश्रम होते थे उनसे पच्चीस पचास गज दूर मैं अपने शिष्यों को लेकर बैठ जाता था। होंगे पांच सौ, सात सौ हजार शिष्य। तो किसी भी साधना के माध्यम से— चाहे वह भूत साधना हो, चाहे कोई और साधना हो- तो मंत्रों के माध्यम से, हलवा पूड़ी बना लेते थे, खीर बना लेते थे, तो वह सुगंध उन आश्रमों में पहुंचनी स्वाभाविक हैः और वे शिष्य भी आते तो हम कहते-आइये खाना खाइये, चिंता मत करिये, बहता पानी निर्मल! वे आराम से हलवा पूड़ी खाते और फिर वापस जाते ही नहीं। गुरु गालियां देते रहते कि यह कैसा आदमी आ गया! तो वहां पर कभी-कभी ऐसे खेल भी खेलने पड़ते थे। अब बैठे-बैठे क्या करें? मगर वह जीवन अलग जीवन था। उसका अपना एक अलग, आनंद था। वहां तो क्रोध भी अपने आप में एक गुण बन जाता है और यहां गृहस्थ में क्रोध तकलीफ भी देता हैं क्योंकि थोड़ा भी शक्तिपात ज्यादा हो जाये, तो व्यक्ति मर भी सकता है, समाप्त ही हो जाता है। क्लास में लड़के चालीस हों, उद्दण्डता करें, तो चालीस को मारने की जरूरत नहीं है। एक लड़के को उठाकर थप्पड़ मारिये तो बाकी अपने आप शांत हो जाते हैं और फिर पूरी क्लास में हल्ला करते ही नहीं है। वहां संन्यास में तो सभी शेरों की तरह होते हैं पिजरों से निकले हुये। अब संन्यासियों का क्या भरोसा, कब क्या कर बैठें? उनको कंट्रोल करना बड़ा कठिन कार्य होता है, मगर वे बड़े अनुशासन प्रिय रहे और बहुत प्यार करते रहे, बहुत स्नेह करते थे, जिस प्रकार आपका मेरे हृदय के प्रति प्रेम है, एक अटैचमैंट हैं इसको मैं अनुभव करता हूं। इस बात को भी मैंने अनुभव किया कि दिन भर आप इस बात से चिंतित रहे कि व्यर्थ में गुरुजी को तकलीफ उठानी पड़ी। इस बात की खुशी नहीं थी कि यह सब देखा हमने। यह तुम्हारे मन में अहसास रहा कि एक छोटी सी बात से गुरुजी को तकलीफ रही, परेशानी हुई, प्रवचन बीच में बंद करके उठना पड़ा, क्रोध करना पड़ा। मैं अधिकांश लोगों के मन की भावना को समझ रहा था।
कोई बात नहीं। ऐसा कभी हो जाता है। मगर क्रोध से अतिरेक हो जाये तो भी तकलीफ हो जाती है, और शक्तिपात भी ज्यादा हो जाये तो डोज बहुत ज्यादा हो जाती है। आपने देखा मेरा चेहरा लाल सुर्ख हो गया था और मैं बहुत मुश्किल से क्रोध को कंट्रोल कर पा रहा था। आदतें संन्यास जीवन की पड़ी हुई हैं इसलिये शिष्य भी बेचारे परेशान हैं कि न जाने कब इनको क्रोध आ जायेगा! इसलिये शिष्यों को चाहिये कि इस प्रकार से उद्दण्डता न करें। यह उद्दण्डता ही थी, ऐसा न करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा। मगर फिर किसी ने कर दिया तो शक्तिपात से मृत्यु कैसे होती है यह भी बतायेंगे, इसमें क्या बात हो गई? इसलिये आप ऐसा कुछ सोचें तो घर पर कह कर आयें कि अच्छा भाई राम-राम, हम जा रहे हैं, गुरुजी के पास जा रहे हैं। इस बार शक्तिपात करवा कर बस — और इसमें आपके कई फायदे हैं – शक्तिपात होगा, गुरुजी के चरणों में मरेंगे, लकडियों का प्रबंध मुझे करना पडे़गा, इतने शिष्य शव यात्र में आयेंगे, आपको तो फायदा ही फायदा है।
थोड़ा ध्यान रखना, ऐसी चुनौतियां आती हैं। और गुरु के लिये बड़ा ही कंटीला रास्ता होता है क्योंकि उस समय मैं ऐसा नहीं करता तो आपके मन में कई प्रकार की भ्रांतियां भी पैदा हो सकती थीं कि गुरुजी कैसे हैं, कुछ करते ही नहीं! और यदि ऐसा करता तो गड़बड़ हो रही थी, मेरे कर्त्तव्य में न्यूनता आ रही थी, क्योंकि ऐसा करने से फिर आदमी चमत्कारी बाबा बन जाता है कि हर शिविर में एक चमत्कार दिखाइये गुरुजी, आप हमारे घर में आयें चमत्कार दिखाइये गुरुजी। ऐसा करने लगा तो मूल मेरा उद्देश्य है, वह समाप्त हो जायेगा।
खैर जो हुआ, अच्छा हुआ। उस बहन के लिये भी अच्छा हुआ कि उसके मन का साहस का भ्रम टूट गया और गुरुओं के प्रति अनास्था थी, वह समाप्त हो गई। अब गुरुओं के प्रति उसके मन में आदर-सम्मान जागेगा और आने वाले गुरुओं के प्रति भी उसके मन में प्रेम स्नेह का अटैचमैंट बनेगा और शायद उसका सौभाग्य है कि मेरे द्वारा शक्तिपात हुआ। शायद पूर्व जन्म में कुछ पुण्य किये होंगे। कुछ न कुछ तो पुण्य किये ही होंगे। वे पुण्य किये होंगे कि शिष्यों के रूप में साथ में रही। ये पुण्य तो रहे ही होंगे और बाकी उसके पाप रहे होंगे जैसा बताया उसने जिसकी वजह से आज तक भटकती रही होगी। गुरु से तार तो कहीं न कहीं जुड़ना ही है। पिछले जीवन का तार इस जीवन से जुडेगा ही, चाहे पंद्रह साल की अवस्था में जुडे़, चाहे बाईस साल की अवस्था में जुडे़। मगर एक बात इससे यह प्रमाणित हुई कि आप सभी पिछले जन्मों में मेरे शिष्य थे। यह तो गारंटी हो गई। अब इसमें कोई दो राय नहीं।
अब आप मुझसे अपना तार जोडें या नहीं जोडें यह आपकी मर्जी। अब ये बिजली वाले भाखड़ा नांगल से तार नहीं जोड़ें जो बिजली नहीं होगी, और हम तार जोड़ दें तो लाइट हो जायेगी। वह तो आपके हाथ की बात है कि आप उस तार को जोड़ें, नहीं जोड़ें या सोचते रहें। मगर यह सत्य है कि आप सभी मेरे शिष्य हैं, और आपके और मेरे बीच एक एग्रीमैंट है, एक समझौता है कि मैं आपको साधनाओं में पूर्णता दूं, सिद्धाश्रम अपने साथ ले जाऊँ, मेरा आपसे एग्रीमैंट है और ऐसा मैं जरूर करूंगा ही। मगर एग्रीमैंट में दो शर्तें होती हैं। मेरी शर्त है कि मैं ले जाऊंगा और आपकी शर्त है कि आप चलें। आप मेरे साथ चलें ही नहीं, साल में एक बार मिलने आयें और बस गुरुदेव, गुरुदेव कहते रहें तो उसमें मैं क्या करूंगा? आपका चुनौती का भाव होना चाहिये। मैंने पहले भी आपसे कहा था कि साधना अपने आप में सही है पर साधना से भी ज्यादा आवश्यक है कि आप गुरु के चरणों में नमन हों और नमन ऐसे हों कि उन देवताओं के चित्र गुरु के चरणों में दिखाई दें। इतनी भावना आपकी जाग्रत हो। अगर इतनी भावना नहीं बनती तो आप शिष्य नहीं बन सकते और मैं इतना अधिकार पूर्ण रूप से इसलिये कह रहा हूं क्योंकि मैं भी अपनी जिंदगी में शिष्य रहा हूं और मैं इतना ही समर्पित शिष्य रहा हूं। —एक बद्रीनाथ का जो मंदिर है, आप गये होंगे। इससे आगे छः सात किलोमीटर आगे आदि बद्रीनाथ का मंदिर है। यह बद्रीनाथ तो बाद में बनाया हुआ है। मूलभूत बद्रीनाथ के दर्शन करने हों तो इस बद्रीनाथ के दर्शन अपने आप में बद्रीनाथ के दर्शन नहीं है। आदि बद्रीनाथ का मंदिर तो आगे है जहां पर अभी भी ऑरिजनल मूर्ति है। वह छोटा सा मंदिर है। वहां मै संन्यासी जीवन में अपने संन्यासी शिष्यों के साथ बैठा हुआ था, पूर्णिमा की रात्रि थी और बड़ा अच्छा वातावरण था।
अच्छा वातावरण इसलिये कि मैं अपने जीवन में संन्यासी तो रहा मगर ऐसा रूढ़ संन्यासी नहीं रहा कि मुस्कुराये ही नहीं, कि गुरुजी मुस्कुराये जो बहुत गलत क्योंकि गुरु कैसे मुस्कुरा सकते हैं? गुरुजी कुछ खा नहीं सकते, कुछ पी नहीं सकते, होटल में बैठ नहीं सकते। गुरुजी कुछ नहीं कर सकते, बस मर सकते हैं। शिष्यों के मन में धारणा है कि गुरुजी होटल में जा नहीं सकते। अरे गुरुजी! आप होटल में कैसे? अरे भाई! क्या कोई पाप कर दिया होटल में आकर खड़े हो गये तो। कौन सा अन्याय हो गया? आज मै पैंट पहनूं तो आप कहेंगे-अरे! देखिये गुरुजी पैंट पहन कर घूम रहे थे। अब पैंट पहनने से मेरा ज्ञान खत्म हो गया? मेरे जीवन में व्यक्तिगत कुछ क्षण मिलते ही नहीं। कई बार मन में इच्छा रहती है कि विधाता ने सब कुछ लिखा मेरी जिंदगी में, सब अच्छा ही अच्छा लिखा, मगर एक सुख नहीं लिखा। उसने कहा तुम फ्री नहीं रह सकोगे, कभी और कभी तुम अकेले नहीं रह सकोगे। जहां भी जायें, शिष्य कोई न कोई ताकता ही रहता है। भगवान जाने उन शिष्यों को कैसे गंध आती है, कोई ऐसी साधना जरूर है शिष्यों के पास जो मेरी समझ में नहीं आई। ऐसी दो घटनायें अभी घटी। एक घटना तो अभी महीने भर पहले घटी।
मैं कार से आ रहा था दिल्ली से तो मार्ग में बहरोड जगह है दिल्ली जयपुर के बीच में और इतनी छोटी सी जगह है कि मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था कि यहां भी कोई शिष्य मेरा हो सकता है और होगा तो गांव मे होगा। तो मैनें सोचा कि बाहर बैठते हैं और चाय पीते हैं। पत्नी ने पूछा-बाहर बैठेंगे? मैने कहा – क्यों नहीं बैठेंगे, यहां कोई शिष्य थोडे़ ही हैं, कप प्लेट धुलवा लेते हैं और चाय पी लेते हैं। कुछ भूख भी लगी थी तो मैंनें दुकान वाले को कहा – कुछ गर्म चीज तेरे पास है? उसने कहा – नमकीन बना हुआ है। माताजी ने कहा – नमकीन मत लीजिये। तो मैंने कहा – चलो छोड़ो। बस चाय बनाओ। चाय कप में ली ही थी, कि एक आदमी आया और बोला – गुरुदेव! गुरुदेव! अब चाय हाथ में। कप नीचे रखा और पूछा – तू कहां से आ गया भाई। वह बोला गुरुदेव मैं तो बहरोड में ही रहता हूं। मैने कहा – बहरोड में? वह बोला – गुरुदेव पत्रिका का लाइफ मेम्बर हूं। मैने कहा – तुझे तो कभी देखा नहीं। उसने कहा – देखा क्या गुरुजी, सन् 85 में आया था, बस दो मिनट बात की आपने। आप तो मिलते नहीं, परवाह करते नहीं, अब मैं आपसे आधा घंटा बात करूंगा। अब मैं वहां से कैसे जाता, मेरे जाने का सवाल ही नहीं। मैने कहा – चल, अच्छा भाई! उसने कहा – अप्सरा साधना की थी गुरुजी, पर अप्सरा आई ही नहीं। मैंने कहा – मैं क्या करूं अब। मैंने तो उसे पकड़ा नहीं और बहरोड में आयेगी कहां से बेचारी। कुछ अच्छा मकान बना, कुछ रेशमी कपड़े लगा। अब बहरोड में तू ठूंठ की तरह बैठा हुआ है और कह रहा है अप्सरा आई नहीं गुरुजी। वह बोला – पर गुरुजी! आपने तो कहा था आयेगी। मैंने कहा – मैंने अप्सरा को भी कहा था कि चली जाना, मगर नहीं माना मेरा कहना मैं क्या कर सकता हूं? कल तेरी पत्नी कहना नहीं मानेगी, तू मर्दानगी रखेगा तो आयेगी।
वह बोला – आप मजाक मत करिये। मैंने कहा – अरे भई, मजाक नहीं कर रहा हूं। खैर वे दोनों चाय के कप तो रह ही गये। मैनें उससे हाथ जोड़े कि बहुत अच्छा हुआ तू आया, मुझसे मिला, यह मुझे पता लग गया कि मैं अकेला जिंदगी में कहीं नहीं हो सकता। हम कार में बैठे तो पत्नी ने कहा यहां भी शिष्य आ ही गया। मैंने कहा – शिष्यों की तो तुम चिंता ही मत करो। कभी मैं अकेला भी रहूं, तो तुम घबराना नहीं। शिष्य मेरे हरदम साथ हैं, हर क्षण हैं, हर जगह पर हैं। ऐसी ही एक और घटना है। शिमला में एक बार शिविर लगाया था तो शिविर के आयोजक को मैंने कहा कि 28 तारीख को शिविर है, शिमला थोड़ा घूमेंगे। पत्नी, बच्चों को साथ ले लेते हैं। वे कभी अहसास नहीं करते कि हमारे पिताजी हैं। उनको मैं पितृत्व दूं, साथ में घुमाऊं। पत्नी भी नहीं अहसास करती कि मेरे पति हैं। उसके मन में तो रहती ही होगी कि मैं उनके साथ रहूं। पहले मैं यात्रयें बहुत ज्यादा करता था, तो एक दिन शाम को खाना खाने बैठे तो पत्नी ने बच्चों को कहा मेरे सामने ही – कि तुम्हारे पिताजी जोधपुर टूर पर आये हैं एक दिन के लिये और कल चले जायेंगे। मैंने सोचा यह गड़बड़ हो रहा है, यह बिल्कुल सही चोट है। महीने में एक दिन विजिटिंग टूर होगा तो घर कैसे चलेगा मेरा? तो फिर मैनें यात्रायें थोड़ी कम कीं। कोशिश भी की, कभी गर्मियों में बच्चों को घुमाने ले जायें। तो मैनें कहां – 28 तारीख को शिविर है, मैं आऊंगा 21 तारीख को, किसी को कुछ कहना ही नहीं कि गुरुजी आये हैं। और मैं भी पायजामा पहने थोड़ा घूमूंगा, धोती वोती पहनूंगा नहीं और तू होटल का प्रबंध कर लेना। उसने होटल फिक्स कर दिया। मैंने पत्नी को कहा – चलो माल रोड घूम कर आ जाते हैं। पत्नी ने कहा – आप किसी शिष्य को फोन नहीं करेंगे।
मैंने कहा – नहीं करेंगे। किसी से बात नहीं करेंगे। मैंने कहा – किसी को पता ही नहीं है कि मैं आया हूं। तो बात करने का सवाल नहीं। माल रोड पर घूम घाम कर वापस होटल के पास आये तो पानी पताशे वाला खड़ा था। मैंने पत्नी को कहा-एक पानी पताशा खाते हैं। पत्नी ने कहा – इसमें कोई दोष तो है नहीं, मैदा है और पानी है। आपकी तबीयत मानती है तो एक ले लीजिये मगर ज्यादा मत लेना। मैंने कहा – ज्यादा नहीं लेंगे, एक लेंगे। पानी पताशा वाला बैठा ही था। मैंने उससे कहा – एक पानी पताशा बना दे और दे दे। उसने दोनों में दिया। अरविंद, लड़का साथ में था, उसने दो तीन लिये होंगे। मैंने लिया। गुड्डी, लड़की साथ में थी, उसने लिया। पत्नी ने कहा – मैं नहीं लूंगी। मैंने कहा – तुम्हारी मर्जी। जीवन में भोग भी भोगने चाहिये, आनन्द भी लेना चाहिये, गोल-गप्पे खाने का एक आनन्द है, तुम कब सीखोगी इस चीज को? वह बोली, नहीं, मुझे नहीं लेना। मैंने एक गोल – गप्पा लिया, तो एक लड़का ताक रहा था। सड़क के उस पार खड़ा था। मेरे मन में डाउट तो हुआ कि यहां खतरा है, यह गड़बड़ जरूर करेगा। पर फिर सोचा – यह गड़बड़ करेगा क्या? एक तो मैं इसे जानता नहीं और एक मैंने कुर्ता पायजामा पहना हुआ। तो वह कैसे समझेगा, गुरुजी कोई पायजामा थोडे़ ही पहनते हैं! तो उस गोल गप्पे वाले ने पहले अरविंद को दिया, फिर गुड्डी को दिया, फिर मैंने लिया, ज्योंही लेकर के मुंह की तरफ बढ़ाया तो वह वहां से तीर की तरह दौड़ा।
—और बोला – गुरुदेव! गुरुदेव! और सड़क पर लेट गया। अब पताशा हाथ में, फेंकू भी नहीं। वह एकदम से उठा। उसने कहा – आप गुरुदेव ही है पक्का। मैं सोच रहा था गुरुदेव कैसे हो सकते हैं, गुरुदेव कैसे हो सकते है? गुरुदेव गोल गप्पे कैसे खा सकते हैं? फिर मन ने कहा नहीं, ये गुरुदेव हैं। फिर एक मन ने कहा, ये गुरुदेव नहीं हो सकते, गुरुदेव पायजामा पहन कैसे सकते हैं? फिर मन ने कहा, नहीं, तू ठीक सोच रहा है। ये गुरुदेव हैं। गुरुदेव आप कैसे आये? मैंने कहा- खड़ा हो, ऐसा कर यह पानी पताशा ले पहले, पहले इसे खा ले। फिर बात कर। मैंने तेरे लिये ही बनवाया था। तू आ गया। पूर्व जन्म का हिसाब किताब बाकी है तेरा-मेरा, तू इसको खा। वह बोला – गुरुदेव, आप आये, मेरे शिमला में आये। आप चिंता मत करिये मैं हूं। मैं 83 में आपके पास आया था। मैंने पूछा 83 के बाद आया ही नहीं? वह बोला, आ नहीं पाया गुरुजी। पर आप बताइये, पहचान लिया या नहीं, पहचान लिया? मैंने कहा – तूने बहुत अच्छा किया और तेरी बहुत कृपा है। मैं होटल पहुंचा और आधे घंटे में ही सारे शिष्य आकर खड़े हो गये, होटल के बाहर और चिल्लाने लगे – गुरुदेव की जय हो, गुरुदेव की जय हो। पत्नी ने कहा – हम 21 तारीख को तो आये मगर अब खत्म हो गया खेल, घूमना वूमना, अब तो गया बस। अब आप 28 का रखो या 21 का रखो हमारे लिये तो शिविर शुरू हो गया अब।
ऐसी ही मेरा जीवन है, —मगर इस जीवन का भी कोई आनन्द होगा, पूर्वजन्म का कोई हिसाब किताब आपका मेरा होगा, इसलिये अकेला मैं नहीं रह सकता। बहुत कोशिश भी करता हूं कि शिष्यों से हटकर कोई दो चार दिन बितायें। इसलिये कि थोड़ा रेस्ट हो जाये। मगर आपका प्यार है, आप फोन करें तो बाकी शिष्य दौड़ कर आयेंगे ही मुझसे मिलने और यह उनका धर्म और कर्तव्य भी है, ठीक भी है। यह तो खेल है चूहे – बिल्ली का। चूहा बेचारा कितना बचेगा? मैं तो कोशिश बहुत करता हुं, बिल में घुसता हूं, मगर बिल्ली झपट्टा मारेगी, तो मारेगी। अब बिल्लियां हैं दस लाख और चूहा बेचारा एक, वह क्या करेगा इसमें। फिर भी आप सब शिष्यों से मुझे प्यार है बहुत स्नेह है। स्नेह है तभी मैं आपको सही मार्ग पर गतिशील करने की ओर अग्रसर हूं, स्नेह है तभी मैं आपको सही ज्ञान देने को तत्पर हूं। जीवन में भौतिकता भी जरूरी है, तो साधना भी जरूरी है, आध्यात्मिकता भी जीवन में जरूरी है, चाहे योग हो, चाहे दर्शन हो।
मगर जीवन में तुम्हारे प्रयत्नों से साधना में सफलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसके लिये तो एक सही मार्गदर्शक, एक सही गुरु की आवश्यकता है और जीवन में तुम्हारे प्रयत्नों से धन की प्राप्ति भी नहीं हो सकती। अगर प्रयत्नों से, परिश्रम से धन की प्राप्ति होती तो कोई गरीब रहता ही नहीं। एक मजदूर दिन भर परिश्रम करता है, बहुत मेहनत करता है, दिन भर मेहनत करता है और शाम को बीस-तीस रूपये लेकर घर लौटता है। इसका मतलब है कि केवल परिश्रम से धन नहीं आ सकता और बिना भाग्य में लिखे हुये भी नहीं आ सकता। अगर भाग्य में आपके लिखा हुआ नहीं है तो धन प्राप्त नहीं हो सकता। जीवन यापन तो होगा, प्रभु ने जिसे पैदा किया उसे रोटी तो देंगे ही।
उस भाग्य लिपि को बदलने का एक मात्र साधन है मंत्र साधना। साधना के माध्यम से गरीबी को अमीरी में परिवर्तित किया जा सकता है। साधना के माध्यम से बीमारी को दूर करके व्यक्ति को रोग मुक्त किया जा सकता है और साधना के माध्यम से जीवन में भोग, सुख ऐश्वर्य, सम्पन्नता, वैभव, विलास, प्रभु के दर्शन भी प्राप्त किये जा सकते है। यदि आपके भाग्य में नहीं भी होगा तो भी मंत्र द्वारा यह सब लिखा जा सकता है आपके भाग्य में कि ऐसा हो ही। विश्वामित्र के श्लोक में भी यही बात कही गयी है। विश्वामित्र जब लक्ष्मी के पास गया तो लक्ष्मी ने कहा – मैं तेरे घर नहीं आऊंगी। किसी हालत में नहीं आऊंगी। उसने कहा – क्यों नहीं आओगी? लक्ष्मी ने कहा – इसलिये कि तुमने ब्राह्मण का वेश धारण कर रखा है और मैं ब्राह्मणों के घर जाती ही नहीं। विश्वामित्र ने कहा – ब्राह्मणों ने ऐसा क्या कर दिया?
लक्ष्मी ने कहा – पहली बात तो यह कि समुद्र की बेटी हूं, समुद्र से पैदा हुई हूं। एक ब्राह्मण अगस्त्य पैदा हुआ, उसने पूरे समुद्र को ही पी लिया। मेरे पिताजी को ही खा गया। अब अपने पिताजी के भक्षक के घर में कैसे आऊंगी। क्रोध नहीं है, क्या मुझमें? दूसरी बात और, मैं कमल में निवास करती हूं और सुबह ब्राह्मण हरि ओम करता कमल को तोड़ देता है, मेरा घर ही उजाड़ देता है। फिर भी कोई बात नहीं थी, मगर एक भृगु पैदा हुआ, उसने मेरे पति के ही लात मार दी छाती में। अब ऐसे ब्राह्मणों के घर में तो कभी आ ही नहीं सकती। संभव ही नहीं है, तुम्हें जो कुछ करना है करो। —और विश्वामित्र ने कहा – अगर मुझमें ताकत और क्षमता होगी तो मैं घर में तुम्हें लाऊंगा ही। हर हालत में लाऊंगा। अगर मेरे भाग्य में नहीं लिखा है तब भी मैं लाऊंगा, तू नाराज है तब भी लाऊंगा और तुम्हें मेरे घर में आना ही पड़ेगा।
ऐसा चैलेंज केवल विश्वामित्र ही दे सकता था, जिसमें कर्मठता थी, एक योग्यता थी, एक चैलेंज का भाव था, प्राणों में ऊष्मा थी, अहसास था कि मैं ऐसा कर सकता हूं। —और अपने जीवन में तंत्र के माध्यम से उस लक्ष्मी को अपने घर में लाया ही। और उस जमाने में जितने भी ऋषि थे उनमें सबसे श्रेष्ठतम धनवान और वैभववान विश्वामित्र रहे, अद्वितीय! वह विश्वामित्र, जिन्होंने जीवन के सत्तरवें साल में भूसे पर से, कुड़े करकट के ढेर पर से अनाज के दानों को चुन कर के पेट भारा। इतनी गरीबी से इतना सम्पन्न बना कि दशरथ को जब यज्ञ में और युद्ध में जरूरत पड़ी तो उन्होंने उसको करोड़ स्वर्ण मुद्रायें दीं। कहां से प्रारंभ हुआ वह ऋषि और कहां तक पहुंचा और केवल चैंलेंज के भाव के साथ, तंत्र के माध्यम से उस लक्ष्मी को कंट्रोल करके। —और वह अपने आप में लक्ष्मीवान भी था, ऐश्वर्यवान भी था और योगी-संन्यासी भी था। जिसने राम लक्ष्मण को धनुर्विद्या सिखाई। इतना क्रोधी भी था कि वशिष्ठ के सौ पुत्रें को समाप्त कर दिया, इतनी आंखो में ज्वाला भी थी।
जिसमें चैलेंज का भाव होता है, वही आदमी ऐसा कर सकता है। जब मैं कह रहा हूं कि कोई चीज भाग्य में नहीं लिखी है तुम्हारे, तो इसमें घबराने की जरूरत नहीं है। हो सकता है तुम्हारे भाग्य में धन नहीं लिखा हो, हो सकता है स्वास्थ्य नहीं लिखा हो, हो सकता है तुम्हारे जीवन में पूर्णता नहीं लिखी हो, इसका मतलब यह नहीं कि ये चीजें, तुम्हारे जीवन में हो ही नहीं सकतीं। हो सकती हैं। यदि तुम्हें सही गुरु मिले जो तुम्हें सही गाइड कर सकें, सही रास्ता दिखा सकें और गुरु मिलने की जरूरत नहीं हैं। गुरु तुम्हारा हित नहीं कर सकता, सद्गुरु तुम्हारा हित कर सकता है, गुरु और सद्गुरु में अंतर है। गुरु तो तुम थोक के भाव में जाकर हरिद्वार से खरीद कर ला सकते हो। बहुत गुरु बैठे हैं, कहीं भी चले जाओ। एक ढूंढो तो पचास मिल जायेंगे। वे गुरु हैं, सद्गुरु तो उन हजारों में कोई एकाध ही होगा, जो तुम्हें सही रास्ता दिखा सके। तुम्हारी धड़कनों में अपनी धड़कन मिला सके, तुम्हें बता सके कि यह सही है, यह सही नहीं हैं, जो बता सकें कि यह तुम्हारे भाग्य में नहीं है और यही भी बता सके कि किस तरह से तुम भाग्य को बदल सकते हो।
प्रयत्न तो तुम्हें करना ही पडे़गा और उसके बाद भी सद्गुरु की यह ड्यूटी है, धर्म है, कर्त्तव्य है कि यदि प्रयत्न के बावजूद भी आपके जीवन में परिवर्तन नहीं आता है जो वह अपनी तपस्या का अंश देकर भी आपके भाग्य को बदल दे, मगर यह तब संभव है जब आप सद्गुरु से जुड़े हैं, अटैच्ड हैं, यदि आप उनकी सेवा कर रहे हैं कि शक्तिपात के माध्यम से अपनी तपस्या का अंश देकर आपका भाग्य बदल दे। तरीके ये ही हैं – सेवा, साधना और समर्पण। अगर तुम्हारी सेवा नहीं है तो गुरु दें भी, यह नहीं हो सकता। संभव ही नहीं हैं। दे भी नहीं सकता और सेवा का मतलब यह नहीं है कि तुम घर बार छोड़ कर आ जाओ। सेवा का मतलब है, तुम्हारे मन में गुरु के प्रति एक प्यार, एक स्नेह होना चाहिये। अगर उनके कांटा चुभे तो तुम्हें दर्द होना चाहिये। अगर दर्द नहीं है तो तुम्हारा कोई जुड़ना नहीं है, फिर कोई मतलब नहीं है। गुजराती में एक लोक गीत है और उस लोक गीत की एक लाइन यह है कि मनै आड़ी जो चितारे मनै आवे हिचकी! कि दो हजार मील दूर बैठा मेरा एक प्रेमी है चितारे – मुझे याद कर रहा है इसलिये मुझे हिचकी आ रही है। अब कोई तार नहीं है बीच में। साइंस इस पर विश्वास नहीं करेगा।
उसे याद करे तो हिचकी कैसे आयेगी? मगर अब सांइस माने न माने, वह कह रहे हैं गीत में कि सत्य तो यही है कि उसने जरूर मुझे याद किया होगा, याद किया इसलिये हिचकी आ रही है और यह बात सत्य भी है। लड़का बीमार होता है अमरीका में तो यहां मां का हृदय धड़कने लग जाता है, बेचैन हो जाती है, दो तीन घंटे इतनी बेचैन होती है कि वह समझ नहीं पाती मैं बेचैन क्यों हूं? तार जुडे़ होते हैं, अज्ञात तार, और ठीक ऐसे ही तार तुम्हारे गुरु के साथ जुड़े रहने चाहिये। अगर तुम शिष्य हो और यदि वह गुरु हो तो तुम्हारी सेवा व्यर्थ नहीं जा सकती क्योंकि अपने शक्तिपात के माध्यम से गुरु उन परिवर्तनों को ला सकता है जो तुम्हारे जीवन में आवश्यक हैं।
—और ऐसा भी नहीं है कि अभी शक्तिपात किया और अभी सब हो गया। व्यर्थ तो शक्तिपात जा नहीं सकता – संभव ही नहीं है। जिस लिये शक्तिपात किया है वह उद्देश्य तो पूरा होगा ही, निश्चित रूप से होगा, और बहुत शीघ्र होगा। यदि गुरु देखें कि यह शिष्य छः महीने से सेवा कर रहा है और इसको कुछ लाभ हो नहीं रहा है तो जरूर वे शक्तिपात के माध्यम से उसकी मंत्र साधना को पूरा कर दें। संबंध दोनों तरफ से है। तुम पत्रिका में पढ़ते हो कि पांच दिन तक यह साधना करें तो ऐसा होता है, तुमने पांच दिन तक उर्वशी साधना की और उर्वशी आयी ही नहीं। और फिर सीधा तुम्हारा टेलीफोन आ जाता है कि गुरुजी! अब क्या करें? हमने पांच दिन किया। कई बार पत्रिका में लिखा होता है कि यह एक रात्रि की साधना है। एक रात्रि की साधना करिये और लक्ष्मी तुम्हारे सामने खड़ी हो जायेगी। आपने एक रात साधना की और लक्ष्मी आई ही नहीं। अब तुम्हारे मन में या तो यह आयेगा कि पत्रिका में झूठ लिखा है या यह आयेगा कि गुरुजी ने गप्प मार दी।
आयेगी ही, लेकिन गलत बात जल्दी पकड़ते हो। गुरुजी गलत नहीं हैं, न पत्रिका गलत है, न मंत्र गलत गलत है, मगर पहली क्लास वाला कैसे एकदम से एक रात्रि साधना में सफल होगा। पहले आप उस लेवल पर पहुंचें जिसे एम-ए- पास कहते हैं। उन लोगों के लिये यह बात सही है जो उस लेवल पर पहुंचे हुये हैं। उन्हें एक दिन में साधना सिद्धि होगी ही, क्योंकि वह लेवल है उनका। पहली क्लास में तुम कैसे अंग्रेजी में बोलोगे धारा प्रवाह। बी-ए- तक पहुचोगे तो अंग्रेजी बोल सकोगे, सुन सकोगे। तब तुम अंग्रेजी की किताब पढ़ सकोगे। अब पहली क्लास में ही कहें कि यह उपन्यास तुम पढ़ो तो तुम पहला अक्षर पढ़ोगे ए, फिर सी, फिर यू, अब यूं आप पढ़ नहीं पाओगे, ऐसे कैसे होगा? इसलिये धीरे-धीरे निरंतर करने से होगा।
इसीलिये मैं कहता हूं कि अच्छा, फिर साधना करो। दूसरी बार साधना करो, तीसरी बार साधना करो, चौथी बार साधना करो और चौथी बार आप माला फेंक देते हैं कि बस बहुत हो गया, माला फेंक दी, लक्ष्मी का चित्र फेंक दिया। यह तुम्हारी न्यूनता है। पहले आप उस स्तर पर पहुंचें। उस स्तर तक पहुंचा जाता है सेवा और समर्पण से। अगर शुद्ध मन से तुम सेवा कर सको, शुद्ध मन से समर्पण कर सको, शुद्ध मन से चिंतन कर सको तो यही पहली क्लास से एम-ए- तक पहुंचने की क्रिया है। अगर यही नहीं है तो फिर साधना करते रहिये एक बार, दो बार, चार बार, आठ बार, दस बार, बीस बार, पचास बार करिये, एक दिन जरूर उसमें सफलता प्राप्त करेंगे क्योंकि साधना से पुण्य का, ज्ञान का, चेतना का विस्तार हृदय में होता ही है। या फिर सफलता संभव है शक्तिपात के माध्यम से। जो तुम्हारे शरीर में जड़ता है उसको उस रोशनी से, दिव्यता से दूर किया जा सके। कई तरीके हैं, जो आपको अच्छा लगे उस तरीके से चलिये। एक एम-ए- या बी-ए- करने के लिये आप चौदह साल झौंकते हैं और कम से कम एक लाख रूपये खर्च करते हैं इन चौदह सालों में तब जाकर दो, अक्षर आपको मिलते हैं और साधना करने के लिये चौदह साल तो क्या चौदह दिन भी धैर्य नहीं! दो दिन किया और तुम्हें मिल जाना चाहिये सब कुछ! ऐसा कैसे होगा? जब एम-ए- या बी-ए- करने के लिये तुम चौदह साल लगाते हो तो क्या साधना करने के लिये चौदह दिन या बीस दिन या दो साल भी नहीं लगा सकते?
चाहे अप्सरा साधना सिद्धि हो, चाहे लक्ष्मी साधना सिद्धि हो, चाहे हनुमान साधना सिद्धि हो या कोई भी सिद्धि— एक साल, दो साल, पांच साल, दस साल या चालीसवें साल भी मिली तुम्हें, तो पिछले चालीस साल तुम्हारे स्वर्णिम हो जायेंगे। अगले चालीस साल भी स्वर्णिम बन जायेंगे। अद्वितीय बन जायेंगे अपने आप में। पूरा भारत वर्ष तुम्हें मानने लग जायेगा, पूरा भारत वर्ष तुम्हारे चरणों को छूने लग जायेगा उस स्थिति की बदौलत। एक सिद्धि ही तुम्हारे पूरे जीवन को सुधार देगी, चाहे बीस साल बाद मिले। तुम्हारे पैसों से, तुम्हारी नौकरी से नहीं संवर सकता तुम्हारा जीवन, तुम नाम और प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सकते यह समझ लीजिये आप, परंतु उसके लिये धैर्य चाहियेगा। एकदम से मैं तुम्हें यह बात समझा नहीं सकता, नहीं तो तुम उदास हो जाओगे। तो मैं तुम्हें कभी टॉफी दे देता हूं, कभी आइसक्रीम देता हूं, कभी कुछ और देता हूं कि चल भई, साधना करता रह, अबकी कर, अबकी बार अप्सरा आयेगी ही आयेगी।
फिर तुम झींकते हुये मिलते हो और कहते हो- आप भी कमाल हो गुरुजी, आप बताओ, आपने शिविर किया, मैं आया, साधना भी की। आपको मालूम होना चाहिये अमृतसर से किराया पिचहत्तर रूपये लगता है गुरुजी! भई, तुमने मेरे ऊपर बहुत अहसान किया। मेरी पूरी पीढि़यों को तार दिया, तो मैं क्या करूं? पैसे दिये तो रेल्वे को दिये। दिये गुरुजी, साधना भी की, गुरुजी लेकिन इस बार भी नहीं आई गुरुजी। मैं कहता हूं – मैंने भी कोशिश की थी तेरे पास भेजने की मगर तेरे पास गई ही नहीं। अब कमजोर आदमी के पास कैसे जायेगी? उसने कहा कि मैं गई, पर वह शिष्य आपका कमजोर आदमी हैं, मैं क्या करूं? ऐसा कहा गुरुजी! हां, ऐसा कहा उसने। ऐसा कैसा कह दिया, मैं तो बहुत मर्द हूं। मर्दानगी क्या हैं, तुम दो पसली के आदमी तो हो नहीं। अच्छा, अबकी बार वापस आता हूं गुरुजी। वह आता है दण्ड बैठक लगाता है तेल मालिश करता है और वापिस आता है वह अमृतसर का लड़का। अब देखिये गुरुजी, सीना देखिये! अब मुझे याद नहीं, क्या कहा था उसने। मैंने कहा – सीने का क्या करना भाई? उसने कहा – आप देखिये। मैंने कहा – क्या देखूं? क्या करूं? आपने कहा था गुरुजी अप्सरा आती नहीं हैं कि सीना ठीक नहीं है। अब सीना देखिये गुरुजी। मैंने कहा – चलो अब की बार कह दूंगा, कि सीना थोड़ा चौड़ा हो गया है, अब तू चली जा। आप उससे बात तो कराइये गुरुजी, बाकी मैं खुद निपट लूंगा। वास्तव में शिष्यों पर मुझे बहुत गर्व है। मैं खुद कह रहा हूं गर्व है मुझे गृहस्थ शिष्यों पर। अगर संन्यासी शिष्य कोई इतनी सी बात कहता तो, सामने चेहरा नहीं उठता उनका, आंख नीची किये हुये बात करते हैं अच्छे से अच्छे योगी और संन्यासी। इतनी बात तो किसी ने सीखी ही नहीं होगी कि गुरुजी से कह सकता हूं और कह दे, तो फिर हल्दी और दूध ही पीते हैं बैठे बैठे।
मगर वे संन्यासी शिष्य थे, आप गृहस्थ शिष्य हैं इसलिये तुम्हें समझाना पड़ता है कि सीना तुम्हारा बहुत अच्छा हो गया है, मैं भी प्रभावित हुआ हूं। और एक बात तुझे कहूं? तो वह बोला – हां कहिये गुरुजी। अगर लड़की होती तो तेरे घर जरूर चलती। – क्या गुरुजी, मजाक करते हो! – नहीं भई, सीरियस हूं! वह समझता है सही कह रहा हूं, वह समझता ही नहीं कि टॉन्टिंग कर रहा हूं और अपना कॉलर झटक कर खड़ा हो जाता है। और मैं कहता हूं – अब की बार आयेगी ही आयेगी। वह बेचारा चला जाता है। वह नहीं समझ पाता कि मेरे पास एक प्राण शक्ति होनी चाहिये, एक चेतना शक्ति होनी चाहिये। जब चेतना शक्ति तुम्हारी होगी, तब सफलता मिल पायेगी। मै तुम्हें निराश नहीं कर रहा हूं मगर तुममें उतनी क्षमता आनी ही चाहिये। और बीस साल प्रयत्न करने पर भी अगर, मिल गई सफलता तो भी पूरा जीवन संवर जायेगा। आने वाली पीढि़यां याद करेंगी। तुम्हें पिछले बीस साल भी तुम्हारे स्वर्णिम होंगे कि यह अद्वितीय व्यक्तित्व है और इसके पास यह सिद्धि है। यह एक छोटी सी बात नहीं है, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है, अद्वितीयता है।
मगर धैर्य के साथ साधना भी, सेवा भी, समर्पण भी, चिंतन भी और धारण शक्ति होनी ही चाहिये, होगी तो सब कुछ प्राप्त होगा। मैं बात कर रहा था लक्ष्मी की! उस नवार्ण मंत्र में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती तीनों का चिंतन दिया है और तीनों का समन्वित स्वरूप जीवन में जरूरी है। हम साधना करते ही इसलिये हैं कि हमारा एक पक्ष ही मजबूत नहीं हो, हम सम्पन्न भी हों, हम बोलें वह सत्य हो। वचन सिद्धि हो हमारी और शत्रुओं पर हम वज्र की तरह प्रहार कर सकें, इतनी क्षमता हों, आखों में इतनी ताकत हो कि आप शत्रु की ओर देखें तो वह नीचे गिरे, गारंटी के साथ गिर जाये। यदि आपमें इतनी ताकत नहीं है तो आप शत्रुओं पर कैसे हावी हो सकेंगे। इस प्रकार के चिंतन के लिये साधनाओं का उपक्रम हमारे ऋषियों, हमारे पूर्वजों ने रखा है और ऐसे ऋषि भी हुये विश्वामित्र जैसे जिन्होंने बिल्कुल नवीन मंत्रों की रचना की, उन मंत्रों को लिया ही नहीं जो मंत्र प्रचलित थे उस जमाने में। केवल दो व्यक्तित्व ही ऐसे हुये, विश्वामित्र और गोरखनाथ। विश्वामित्र ने उन मंत्रों का प्रयोग किया ही नहीं जो उस समय प्रचलित थे। गोरखनाथ ने भी उन मंत्रों को नहीं लिया जो शास्त्रें में थे। नवीन मंत्रों को टैस्ट किया, अनुभव किया, कि क्या इन मंत्रों के माध्यम से ऐसा हो सकता है, और हुआ। आपने गोरखनाथ की गोरखवाणी को अगर पढ़ा हो तो ज्ञात होगा कि हिन्दी भाषा में सब मंत्र लिखे।
अगर मेरी दुकान को नहीं बांधे तो तुझे ख्वाजा पीर साहब की दुहाई। आप सोचेंगे ऐसे कैसे मंत्र हो गये? उस जमाने में संस्कृत भाषा थी तो संस्कृत में मंत्र बन गये, गोरखनाथ के समय अपभ्रंश भाषा थी इसलिये उस भाषा में मंत्र बन गये। मंत्र का तो तब लाभ है जब आपमें एक चैतन्यता हो, आपके अंदर सरस्वती स्थापित हो। जो बोलें वह मंत्र बने ही। आप बोलें और प्रभाव नहीं हो, तो काहे की सरस्वती साधना, कैसे शिष्य, काहे के गुरु? जो बोलें वह सत्य हो, इसलिये उस सरस्वती की आराधना भी जीवन में जरूरी होती है। —और तंत्र भी अपने आप में कोई गंदा नहीं है, ये तुम्हारे मन के विचार गंदे है, तंत्र में आप सोचते हैं वशीकरण होता है, मारण होता है, उच्चाटन होता हैं यह सब तंत्र है ही नहीं। प्रत्येक शब्द अपने आप में मंत्र है और जो भी व्यवस्थित तरीके से कुछ किया जाये वह तंत्र है। बिल्कुल सिस्टैमेटिक किया जाये, वह तंत्र है और तंत्र का अर्थ है जो कार्य हम चाहें वह हो ही। आपमें से कुछ मिलते हैं कि गुरुजी! मंत्र जाप किया और कुछ होता नहीं या कुछ हुआ नहीं। आपने जो प्रयोग बताये वो भी किये पर हुये नहीं।
आपकी धारणा शक्ति में कमजोरी है, विश्वास में कमजोरी है और आप कहते हैं मुझे विश्वास है, उससे विश्वास नहीं होता है। आप कह देंगे अच्छा गुरुजी, आज से आप पर विश्वास हो गया। अब पंद्रह मिनट मंत्र जप किया और कुछ हुआ नही। तो आप ही कह देंगे – लो सब बेकार है। कुछ नहीं हो तब भी आस्था रहनी चाहिये, कार्य नहीं हो तब भी गुरु में आस्था रहनी चाहिये, उसे आस्था कहते हैं। रोज रोज पत्नी बदलने से थोडे़ ही जीवन का आनंद आ सकता है। ऐसे नहीं आ सकता। उस पत्नी को भी पच्चीस पति मिले तो भी कुछ काम नहीं आयेगा। एक विश्वास होना चाहिये कि अच्छा है या बुरा इसके साथ ही मेरा जीवन निर्वाह होना चाहिये। तब पति पत्नी के संबंध बनते है। ठीक गुरु शिष्य का भी संबंध वैसा ही होता है, आस्था हो। किसी प्रकार का भी संबंध हो, चाहे प्रेमी-प्रेमीका का संबंध हो, चाहे पति-पत्नी का संबंध हो। —पूर्ण आस्था हो और जीवन के अंतिम क्षण तक आस्था।
गुरु में पूर्ण आस्था हो। साधना में सफलता मिले तो ठीक, नहीं मिले तो ठीक। सफलता होगी तो इन्हीं के माध्यम से होगी। मंत्र में और गुरु के प्रति आस्था हो, विश्वास डिगे ही नहीं। किसी भी प्रकार से विश्वास नहीं डिगे, पूर्ण विश्वास हो कि यह आदमी गड़बड़ कर ही नहीं सकता। रोज-रोज गुरु बदलने से आस्थाहीन होने से कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। आस्थाहीन तो समाज है, तुम अमरीका जाओ, जापान जाओ, इंगलैंण्ड जाओ जो आस्थाहीन समाज है। उसको भी मैंने देखा है। वहां रहा हूं। अमरीका में कई महीने रहा हूं, इंगलैंण्ड में रहा हूं और पूरे यूरोप को देखा है, पांच छः बार देखा है, एक बार नहीं देखा—और भारत वर्ष को भी देखा है।
और विश्वामित्र ने जिस मंत्र के माध्यम से उस लक्ष्मी को, उस वैभव को प्राप्त करने की क्रिया सम्पन्न की, वह वास्तव में अद्वितीय और अचूक मंत्र है। उस मंत्र के माध्यम से जीवन में पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती ही है। इस मंत्र को मैंने स्वयं सिद्ध किया, देखा, अनुभव किया और एक बार नहीं, पचास बार किया और हर हालत में वह कार्य होता ही है, ऐसा हो ही नहीं सकता कि उस मंत्र को जपें और प्रभाव न हो। और अगर विश्वामित्र ने इतने बड़े चैलेंज के साथ में भी लक्ष्मी को अपने घर में आबद्ध कर दिया तो आप भी कर सकते हैं। मगर विश्वामित्र को अपने गुरु के प्रति आस्था थी, ईश्वर के प्रति आस्था थी। तुम्हारी भी आस्था मजबूत होनी चाहिये। उस यंत्र के प्रति, उस माला के प्रति, अपने आप के प्रति और अपने गुरु के प्रति और उस मंत्र के प्रति। —और यदि ऐसा हो तो एक दिन में ही सिद्धि मिल सकती है, एक घंटे में ही सिद्धि मिल सकती है।
—और आप कहेंगे कि एक दिन में लक्ष्मी कहां से आयेगी? उस जमाने में तो लक्ष्मी के आने के बहुत थोडे़ चान्सेस थे। शिष्य ने लाकर भेंट कर दिया, एक तो यह चान्स था या राजा द्रव्य दे देता या गांव दे देता। आज तो लॉटरी और दूसरे सैकड़ों प्रकार के माध्यम हैं। जमीन में से भी धन निकल सकता है, और पचास तरह से रास्ते बन गये जहां लक्ष्मी प्राप्त हो सकती है। लक्ष्मी प्राप्ति के अब विकल्प ज्यादा हैं।
मगर उस मंत्र साधना के माध्यम से ही ऐसा हो सकता है और आस्था हो तभी साधना में सफलता मिल सकती है। आपकी गुरु के प्रति आस्था हो और आप साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करते हुये जीवन में भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर सकें, ऐसा ही मैं हृदय से आशीर्वाद देता हूं, कल्याण कामना करता हूं-
– सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी
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