





शाक्त प्रमोद के अनुसार जीवन की सर्वश्रेष्ठ और महत्वपूर्ण भुवनेश्वरी विद्या ही है। शाक्त प्रमोद के प्रामाणिक श्लोक के अनुसार आनन्दमयी भुवनेश्वरी खड्ग माला से निम्न लाभ निश्चय ही प्राप्त होते हैं।
सबसे पहले साधक गुरूवार रात्रि को स्नान कर सफेद वस्त्र धारण कर सफेद आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठ जायें और सामने पात्र में आनन्दमयी भुवनेश्वरी शक्ति खड्ग माला रख दें, यह माला जीवन की दुर्लभ और महत्वपूर्ण माला कही जाती है, जो कि 108 महादेवियों के मंत्र से सिद्ध की जाती है, इसका प्रत्येक मनका अपने आप में महत्वपूर्ण होता है।
माला की स्थापना के बाद श्रीं ह्रीं क्लीं आनन्दरूपिणीं भुवनेश्वर्यैं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः का 108 बार उच्चारण कर प्रत्येक मनके पर केशर का तिलक करें और उस पर पुष्प समर्पित करें उपरान्त निम्न प्रकार से विनियोग करें।
विनियोग
ऊॅं अस्य श्रीभुवनेश्वरी खड्ग माला मंत्रस्य
श्री प्रकाशात्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः,
श्री भुवनेश्वरी देवता, हं बीजं, ईं शक्तिः, रं कीलक,
श्री भुवनेश्वरी पराम्बा-प्रसन्नार्थ जपे विनियोगः।।
इसके बाद साधक बताये हुये अंगों को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुये ऋष्यादि न्यास करें।
ऋष्यादि न्यास
श्री प्रकाशात्मा-ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः
मुखे, श्री भुवनेश्वरी-देवतायै नमः हृदि, हं बीजाय नमः
गुह्ये, ईं शक्तये नमः पादयोः, रं कीलकाय नमः नाभौ,
श्री भुवनेश्वरी पराम्बा प्रसन्नार्थे जपे विनियोगाय नमः
सर्वाघ्गे।
अब पूर्ण विनियोग पूर्वक अपने हाथों में पुष्प ले कर इस माला को पुष्प समर्पित करते हुये निम्न ध्यान सम्पन्न करें।
ध्यान
स्मरदे् रवान्द्धग्नि विलाचेना तां,
सत-पुस््तकां जाप्य वटीं दधानाम।
सिहं शसनां मध्यम यंत्र संसथां,
श्रीतत्त्व विद्यां पराम्बां भजामि।।
य एनां सचिन्तयेनमन्त्री, सर्व कामार्थ सिद्धिदाम।
तस्य हस्ते सदवै शस्ति, सर्व कामार्थ सिद्धिदाम।।
तस्य हस्ते सदवै शस्तिः, सर्व सिद्धिर्न सश्ंयः।।
तादृशं खडग्माप्नोति, यने हस्त स्थितते वै।
अष्टादश-महाद्वीपे, सम्राट् भोक्ता भविष्यतिः।
सामने पात्र में रखी हुई आनन्दमयी भवुनेश्वरी शक्ति खडग् माला पर इस दुर्लभ मंत्र का जप करते हुये एक-एक पुष्प अपिर्त करें, इसी प्रकार प्रत्येक पाठ की समाप्ति पर एक गलुाब पुष्प खडग् माला को अपिर्त करें, इस प्रकार 21 पाठ कर 21 पुष्प समपिर्त करें ।
ऊँ श्रीं हीं श्रीं भुवनेश्वरी हृदय देवि शिरादेवि शिखा देवि
कमल देवि नेत्र देव्यस्व देवि कराले विकराले उमर सरस्वति
श्रीदुर्ग उषे लक्ष्िम श्रुति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कान्ति आर्ये
श्रीभुवनेश्वरि दिव्यौघ गुरू रूपिणि सिद्धौघ गुरू रूपिणि
मानवोधगुरू रूपिणि श्रीगुरू रूपिणि परमगुरू रूपिणि
परात्परगुरू रूपिणी पारमेष्ठिगुरू रूपिणि अमृत भैरव सहित
श्रीभुवनेश्वरि हृदय शक्ति शिर: शक्ति शिखा शक्ति कवच
शक्ति नेत्र भक्त्यस्त्र हल्लेखे गगने रक्ते करालिके महोच्छृष्मे
सर्वानन्दमय चक्र स्वामिनि!
गायत्री सहित ब्रह्म मयि, सावित्री सहित विष्णुमयि,
सरस्वती सहित रूद्रमयि, लक्ष्मी सहित कुबेरमयि, रति सहित
काममयि, पुष्टिसहित विघ्न राजमयि, शंड्खनिधि सहित
वसुधामयि, पदम्निधि सहित वसुमतिमयि, गायत्र्यादि सह
श्रीभुवनेश्वरि, ह्रां हृदय देवि, ह्रीं शिरो देवि हैं कवच देवि,
ह्रौं नेत्र देवि, ” अस्त्र देवि, सर्व सिद्धिप्रद चक्र स्वामिनि!
अनंड्ग कुसुमे अनंड्ग कुसुमातुरे अनंड्ग मदने
अनंड्ग मदनातुरे भुवन पाले गगन वेगे शशि रेखे अनंड्ग
वेगे सर्व-रोग हर चक्र स्वामिनि!
कराले विकराले उमे सरस्वति श्रीदुर्गें उषे लक्ष्मि
श्रुति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कान्ति आर्ये सर्व संक्षोभण
चक्र स्वामिनि!
ब्राह्मी माहेश्वरि कौमारि वैष्णवी वाराहि इन्द्राणि
चामुण्डे महालक्ष्म्यनंड्ग रूपेऽनंड्ग कुसुमे मदनातुरे भुवनवेगे
भुवन पालिके सर्वशिशिरेऽनंड्ग मदनेऽनंड्ग मेखले सर्वाशा
परिपूरक चक्र स्वामिनि!
इन्द्र मय्यग्निमयि यममयि वरूणमयि वायुमयि
सोममयि ईशानमयि ब्रह्ममयि दण्डमयि खड्गमयि
पाशमय्यंकुश मयि गदामयि पाश मय्यभयमयि बटुकमयि
योगिनीमयि श्रेत्रपालमयि गणपति मय्यष्ट वसुमयि
द्वादशादित्यमय्येका दशरूद्रमयि सर्वभूत मय्यमृतेश्वर सहित
भुवनेश्वरि त्रैलोक्य मोहन चक्र स्वामिनि नमस्ते नमस्ते स्वाहा
श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ ।।
श्रद्धा पूर्वक 21 बार पाठ पूर्ण हो जाये तब माला को अपने गले में धारण कर लें, निरन्तर धारण किये रहने से व्यक्ति की कीर्ति चारों ओर फैलती है और उसे समस्त कार्यों में निश्चय ही सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसे साधक के घर में स्वर्ण धन की निरन्तर प्राप्ति होती रहती है।
भुवनेश्वरी महाशक्ति लक्ष्मी का साक्षात् रूप है, और यह स्वयं महालक्ष्मी है। जो जीवन में आर्थिक समृद्धि और सम्पन्नता चाहते हैं, उन्हें भुवनेश्वरी की आराधना अवश्य ही करनी चाहिये।
महर्षि वशिष्ठ
भुवनेश्वरी ही सरस्वती हैं, सरस्वती को वाणी और वाक् कहते हैं, अतः सरस्वती पूर्ण रूप भुवनेश्वरी में समाहित है।
श्री भुवनेश्वरी महास्तोत्र ग्रंथ
भुवनेश्वरी देवी का दर्शन ही दुर्लभ है, परन्तु जो साधक नवरात्रि में भुवनेश्वरी महामंत्र का सवा लाख जप पूर्ण कर लेता है, उसे अवश्य ही भुवनेश्वरी महादेवी के दर्शन सुलभ हो जाते हैं।
नागार्जुन
भुवनेश्वरी महामंत्र तो कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है, वास्तव में ही वे नर सौभाग्यशाली हैं, जो अपने घर में भुवनेश्वरी महायंत्र की स्थापना करते हैं।
महेशानन्द, आबू
जिसके घर में भुवनेश्वरी यंत्र हैं, वह घर स्वयं स्वर्ग के समान होता है।
मंत्र महार्णव
भुवनेश्वरी देवी की साधना से एक तरफ जहां लक्ष्मी प्रसन्न होकर पूर्णता देती हैं, वहीं दूसरी ओर यह साधना शत्रु संहार में भी अद्भुत सफलतादायक है।
त्रिजटा अघोरी
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