





जो आदि है वही अनन्त हो सकता है, भगवान विष्णु आदि देव हैं तथा अनन्त देव भी, जिन्हें समय काल की सीमा में बांधा नहीं जा सकता, जिनके स्वरूप को किसी एक रूप में स्थिर नहीं किया जा सकता, जिनके तेज से उत्पन्न सहस्त्रों देवी- देवताओं को नित्य पूजा जाता है, उन अनन्त देव विष्णु के तेज का अंश भी प्राप्त हो जाये, तो फिर जीवन में कोई न्यूनता रह जाये, यह असंभव है। श्री विष्णु आकाश तत्व के अधिष्ठाता हैं, आकाश का तात्पर्य हैं- विशालता, गहनता, महानता, ऊंचाई।
संसार विष्णु की ही माया लीला का स्वरूप है, भगवान विष्णु का सगुण स्वरूप भी है और निर्गुण स्वरूप भी, माया रूपी स्वरूप में वे लक्ष्मी के साथ अपने भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।
मुझे याद है कि बचपन में जिस गुरुकुल में हम जाते थे, वहां आचार्य प्रातः और सायं कालीन संध्या करते थे तो हम सब बालक वहां बैठते थे, संध्या की विशेष विधि का ज्ञान नहीं था, तो हमारे आचार्य श्री ने कहा कि सब बालक नेत्र बन्द कर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का जप करें, यह जीवन की आधार शक्ति का मूल मंत्र है। सभी देव-देवी श्री विष्णु की लीला के अधीन हैं और आज भी जब मन अशांत होता है, कार्य में बाधायें आती है कोई मार्ग नही मिलता तो मैं हाथ मुंह धोकर एक दीपक जला कर शांत भाव बैठ कर एक माला उपरोक्त मंत्र का जप करता हूं, अपने आप एक मार्ग दिखने लगता है।
अर्थात् जगत में भगवान विष्णु अपने सहस्त्र हाथों, सहस्त्र सिर के रूप में विराजमान हैं, भक्तों का कल्याण करने वाले हैं।
विष्णु साधना अनन्त साधना है, जो साधक के शरीर को ही नहीं, मन के ऊपर आये दोषों का भी निराकरण कर उसमें तेज, कर्मशीलता का उद्भव कर उसकी शक्ति को जागृत कर, शक्ति का विकास कर, साधक को अनन्त की ओर अर्थात् विशालता की ओर ले जाती है, सूक्ष्म से विराट की ओर, धरती से आकाश की ओर उठने की क्रिया विष्णु साधना है। जिस एक स्वरूप की साधना से अनन्त साधनाओं का, अनन्त देवों के कृपा प्राप्त होती है।
अनन्त चतुर्दशी का शास्त्रों में विशेष महत्व है और बताया गया है कि जीवन में हमें बाधायें या अड़चनें इसलिये आती हैं कि हम पूर्ण रूप से शुद्ध और पवित्र नहीं हैं। नित्य सांसारिक व्यवहार करने से हममें तीन प्रकार के दोष व्याप्त होते हैं।
वाणी दोष- हमें बोल-चाल में, बातचीत में और व्यवहार में असत्य उच्चारण करना पड़ता है, इस झूठ की वजह से वाणी दोष व्याप्त होता है।
मन दोष- हम चाहे अनचाहे किसी के प्रति घृणा, क्रोध या दुर्भावना व्याप्त करते हैं, उससे मन दोष व्याप्त होता है। मुख दोष- आज के युग में तो घर के बाहर कई स्थानों पर भोजन करना होता है, जहां शुद्धता पवित्रता का भान नहीं होता, ऐसी स्थिति में मुख दोष व्याप्त हो जाता है।
उपरोक्त तीनों दोषों को समाप्त करने के लिये शास्त्रों में एक मात्र अनन्त साधना का विधान ही बताया है और यह भी कहा है कि वर्ष में एक बार इस दिन अनन्त साधना सम्पन्न करने पर अब तक किये गये सभी दोष समाप्त हो जाते हैं।
जब दोष समाप्त हो जाते हैं, तो मन शुद्ध ओर चैतन्य हो जाता है, फलस्वरूप चेहरे पर तेजस्विता आ जाती है, उसकी वाणी में दृढ़ता एवं स्पष्टता आ जाती है और वह जीवन में सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है।
इसके साथ ही साथ अनुभव में यह आया है कि इस साधना को सम्पन्न करने पर तत्क्षण साधक की एक इच्छा पूरी होती ही है, वह इच्छा चाहे कितनी ही कठिन हो और पहले प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रही हो। कई बार तो साधना समाप्त होते-होते अपने कार्य की पूर्ति के समाचार प्राप्त हो जाते हैं।
साधक को चाहिये कि अनन्त चतुर्दशी के दिन सांय काल में स्नान कर आसन बिछा कर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जाये संक्षिप्त पूजा में यंत्र को पहले जल से स्नान करा लें और फिर दूध, दही, घृत, शहद और शक्कर से स्नान करा कर दूसरे पात्र में केसर से ऐं ह्रीं अन्नत लक्ष्मयै श्रीं लिख कर उस पर अनन्त लक्ष्मी नारायण यंत्र को स्थापित कर दें और यंत्र पर केसर का तिलक करें, अक्षत चढ़ायें ओर पुष्प समर्पित करें, इसके बाद साधक शुद्ध घृत का दीपक व अगरबत्ती लगायें।
इसके बाद साधक को चाहिये कि वह पहले से ही मंगा कर रखे गये शुद्ध यज्ञोपवीत या जनेऊ को यंत्र के सामने अर्पण दें। शास्त्रों में विधान है कि कुमारी कन्या द्वारा सूत कात कर और उसका बनाया हुआ यज्ञोपवीत प्रयोग करें। साधक यज्ञोपवीत बाजार से भी प्राप्त कर सकते हैं अथवा शुद्ध और प्रामाणिक यज्ञोपवीत निःशुल्क पत्रिका कार्यालय से मंगवा सकते हैं। इस यज्ञोपवीत को उस महायंत्र के सामने स्थापित कर दें और यज्ञोपवीत में आह्वान करें कि यज्ञोपवीत के प्रत्येक धागे में भगवान अनन्त आ कर स्थापित हों।
इसके बाद यज्ञोपवीत के सिर पर जो तीन गांठें होती हैं, उन तीन गांठों के मूल में ब्रह्मा को स्थापित करें, मध्य में विष्णु को तथा सबसे ऊपरी गांठ पर भगवान शिव का आह्वान करें और उन्हें स्थापित करें, फिर तीनों गांठों पर केसर लगावें तथा संक्षिप्त पूजन करें।
इसके बाद यज्ञोपवीत को खोल कर दोनों हाथों में लेकर उसे आकाश की ओर ऊपर उठायें और ऊँ सूर्याय नमः मंत्र द्वारा उस यज्ञोपवीत में सूर्य की तेजस्विता का आह्वान करें और मन में यह चिन्तन करें कि इस यज्ञोपवीत के प्रत्येक धागे में सूर्य स्थापित हो रहे हैं जो कि मुझे पूर्ण तेजस्विता प्रदान करने में समर्थ हैं, साथ ही साथ भगवान सूर्य मेरे पूर्व जीवन के और इस जन्म के सभी पापों को समाप्त कर रहे हैं और साथ ही साथ जो तीन प्रकार के दोष व्याप्त होते हैं, उन तीनों प्रकार के दोषों को भी भगवान सूर्य समाप्त कर मुझे पूर्ण चैतन्य और शुद्ध बना रहे हैं।
ऐसी भावना मन में रखते हुये यज्ञोपवीत को नीचे उतार लें और फिर उसे समेट कर अनन्त यंत्र के सामने स्थापित कर दें और उस यज्ञोपवीत को भगवान अनन्त का स्वरूप मान कर उसकी संक्षिप्त पूजा करें, उन्हें नैवेद्य समर्पित करें और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें कि भगवान अनन्त मेरे जीवन की समस्त कामनाओं को पूर्ण करें और अमुक इच्छा को शीघ्र ही पूर्ण करें।
इसके उपरान्त भगवान अनन्त का ध्यान करें-
अनन्त विष्णु वन्दे कर कमल कौमोद की चक्रपाणिम् अर्थात उगते हुये सैकड़ों सूर्य के समान तेजस्वी तपे हुये सोने के समान जिनकी अंग कांति है, पृथ्वी एवं लक्ष्मी जिनकी सेवा में हैं, रत्न जडि़त आभूषण एवं चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म शोभित हैं, ऐसे अनंत विष्णु का मैं ध्यान करता हूं। इसके बाद साधक अनन्त लक्ष्मी माला से निम्न मंत्र का एक माला मंत्र जप करें –
जब एक माला मंत्र जप पूरी हो जाये, तब भगवान नारायण और गुरुदेव की आरती करें। साधना पश्चात् माला को जल में विसर्जित करें और यंत्र को पूजा स्थान में स्थापित रहने दें।
इस साधना से लक्ष्मी का चिरस्थायित्व रूप से निवास होता है, साथ ही साधक के जीवन में अनन्त स्वरूप में अर्थ का आगमन की संभावना बनती है। गृहस्थ जीवन की अनन्त इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये यह साधना सर्वोपरि है। वास्तव में यह साधना अपने-आप में अनन्त तेजस्वी और प्रभावयुक्त है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,