





शक्ति तंत्र, शक्ति मत का जनसामान्य में जो अर्थ प्रचलित है, वह मारण, मोहन, उच्चाटन जैसी अभिचारिक क्रियाओं को लेकर ही है अथवा पंचमकारों से ही समझा जाता है, इसी से समाज में शाक्त मत के प्रति या तो दबी छुपी घृणा है या भय मिश्रित कौतूहल। समाज के लोग इसे अपने उपयोग की क्रिया न मानकर केवल किन्हीं फक्कड़ों या तांत्रिकों के उपयोग की ही क्रिया मानते हैं, लेकिन यह धारणा गलत है।
तंत्र तो एक पद्धति है जिसके अंतर्गत ईश्वरीय शक्ति को विधिवत् आत्मसात किया जाता है और निश्चित रूप से सफलता प्राप्त किया जाता है। चाहे वह आध्यात्मिक जगत का हो अथवा लौकिक जगत का, चाहे साधना सिद्धियों का क्षेत्र हो अथवा दैनिक जीवन के कामनाओं की पूर्ति की बात हो। यह तो विशिष्ट ऊर्जा को श्रेष्ठता के साथ धारण करने का विधान है। जिसका उपयोग करना ज्ञानी साधकों पर निर्भर होता है।
शक्ति तंत्र में साधना और सिद्धि पर विशेष जोर रहा, इसी से इस तंत्र के जो प्रयोग लौकिक पक्ष से सम्बन्धित थे, उनका समुचित प्रकाशन जनमानस में सामान्य रूप से रहा है। तंत्र शब्द तनु विस्तारे धातु एवं ष्ट्रन प्रत्यय से बना है, जिसका तात्पर्य कई विषयों को विस्तृत करना और इसी अनुरूप तंत्र का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक रहा। जीवन का कोई भी पक्ष तंत्र से अछूता नहीं है। तंत्र का विस्तार केवल शक्ति से सम्बन्धित न रहकर अन्य तंत्रों के रूप में भी विकसित हुआ है। गाणत्य तंत्र, वैष्णव तंत्र इत्यादि इसके उदाहरण हैं, फिर भी जिस रूप में तंत्र का सर्वाधिक विकास और प्रचार हुआ, वह शक्ति तंत्र ही है। देवी के दस महाविद्या स्वरूपों में मां भगवती जगदम्बा का प्रत्येक स्वरूप पूर्णता से जीवन के किसी एक पक्ष विशेष से सम्बन्धित है, चाहे वह जीवन में धन की बात हो, रोग नाश की बात हो, शत्रु संहार की बात हो, गृहस्थ सुख का विषय हो अथवा विद्या-विलास से सम्बन्धित पक्ष हो। जीवन विविध स्वरूपों से पूर्ण बनता है और इसी कारण प्रत्येक पक्ष पर विशिष्टतया ध्यान देने के लिये विशिष्ट स्वरूप एवं विशिष्ट साधना पद्धति की रचना की गई।
पूर्ण पुरूषार्थ की जब भी चर्चा होती है, तो सर्वप्रथम अर्थ का ही नाम लिया जाता है। आज के समय में अर्थ ही पूर्ण पौरूषता का परिचय है। अर्थ के बिना जीवन अभिशाप समान है। भौतिक जीवन में अर्थ से ही मनुष्य के सभी इच्छाओं की पूर्ति हो पाती है। आज अर्थ की अनिवार्यता इतनी अधिक बढ़ गई है कि छोटे से छोटे कार्य भी अर्थ के बिना पूर्ण नहीं हो पाते, मनुष्य के जन्म से लेकर समापन तक में अर्थ मूल रूप से समाहित है।
इसीलिये व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन धन को अर्जित करने में ही लगा रहता है। वह जीवन मुक्ति हेतु कोई भी क्रिया सम्पन्न ही नहीं कर पाता। क्योंकि अर्थ ही अर्जित करने में सारा जीवन समाप्त हो जाता है, फिर भी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। और यह भी सत्य है कि समय के अनुसार आवश्यकताओं में भी वृद्धि हुयी है। लेकिन आवश्यकताओं के वृद्धि अनुसार ही यदि आय में भी वृद्धि हो तो व्यक्ति पर अतिरिक्त दबाव नहीं बनता। यही कारण है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के बोझ से घिरा है। जिसे पूरा करना उसका दायित्व है और इसी दायित्व का निर्वहन करने हेतु वह दिन-रात परिश्रम, भाग-दौड़ करता रहता है। जिससे जीवन में निश्चिंतता नहीं आ पाती और बिना निश्चिंतता के साधक ध्यान में लीन नहीं हो पाता या गतिशील नहीं हो पाता। इससे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिक प्रगति के लिये भौतिक पूर्णता अनिवार्य है और भौतिक पूर्णता के लिये अर्थ रूपी महालक्ष्मी की नितांत आवश्यकता है।
भगवती लक्ष्मी को अर्थ की अधिष्ठात्री कहा गया है। इनके द्वारा ही जीवन के सभी पुरूषार्थो की पूर्ति संभव हो पाती है। शास्त्रों में लक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप को कमला तंत्र कहा गया है। कमला महाविद्या जीवन की अनिवार्यता है। जिसे षड्-ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री भी कहा गया है। जो मां भगवती जगदम्बे का ही विशिष्ट स्वरूप है। धन प्राप्ति के अनेक उपाय हैं, लेकिन लक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप की बात हो तो मां भगवती जगदम्बे के इसी शक्तिमय कमला महाविद्या स्वरूप की स्तुति करना शास्त्रों में वर्णित है। आज प्रत्येक व्यक्ति के भाग-दौड़ का केन्द्र लक्ष्मी प्राप्ति ही होता है। इसीलिये भौतिक सम्पूर्णता हेतु भगवती लक्ष्मी की आराधना करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये अत्यन्त आवश्यक है। जिनकी स्तुति से स्वतः ही साधक के अन्दर नारायणत्व उदित हो जाता है। जहां नारायण तत्व है, वहां अनंत कृपा होना स्वभाविक है, क्योंकि नारायण ही समस्त जगत में अनंत स्वरूप में व्याप्त हैं। वास्तव में कहा जाये तो कमला महाविद्या नारायण लक्ष्मी की ही साधना है। जिनकी कृपा प्राप्त कर साधक अनन्त सुख भोग सकता है।
मां भगवती जगदम्बे के त्रिगुणात्मक स्वरूप का विस्तार उनकी दस महाविद्याओं में हुआ और उसमें से ही कमला महाविद्या उन्हीं के महालक्ष्मी स्वरूप की साधना है। जहां सामान्य रूप से महालक्ष्मी पूजन एवं साधना से सफलता प्राप्ति संदिग्ध हो, वहीं कमला महाविद्या की साधना से यह असंभव है कि व्यक्ति दरिद्र अथवा हीन रह जाये। जिस प्रकार पद्मगंध छुपाये नहीं छुपती और आसपास का समस्त वातावरण अपनी मधुर गंध श्रेष्ठता और दिव्यता से भर देती है, उसी प्रकार कमला महाविद्या की साधना भी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आलोकित एवं सुगंधित कर देती है।
कमला तंत्र में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जीवन में अतुलनीय धन-वैभव प्राप्त करने के लिये कमला साधना आवश्यक है। क्योंकि इसके द्वारा ही व्यक्ति वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है, जो उसकी इच्छा है। कमला महाविद्या एक तरफ जहां पूर्ण निश्चिंतता और सिद्धि प्रदान करती हैं। वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से अनेक धन स्रोत बनते है।
तंत्र क्षेत्र में रूचि रखने वाले साधक भलीभांति कमला महाविद्या के महत्व से परिचित हैं और उन्हें यह ज्ञान है कि यह विधान कितना महत्वपूर्ण और दुर्लभ है, जिसे धारण कर साधक जीवन में अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर लेता है।
भगवती कमला आद्या शक्ति का स्वरूप हैं, जिनकी कृपा दृष्टि से ही ब्रह्मा एवं अन्य देवता भी शक्ति प्राप्त करते हैं। जो भी साधक भगवती कमला की उपासना करता है, उसके जीवन में उन्नति के द्वार निश्चित तौर पर खुलते हैं और ऐसा साधक सिद्धि के क्षेत्र में भी पूर्णता प्राप्त करते हुये वैभव, धन-धान्य से युक्त सम्मान व कीर्ति प्राप्त करता है।
कमला महाविद्या तंत्र कोई प्रयोग नहीं, अपितु यह जीवन की सम्पूर्णता को स्वयं में समेटे हुये है। जीवन में धन सम्पत्ति की वृद्धि, कर्ज के भार से मुक्ति के लिये यह साधना जीवन का नवीन सृजन है।
जब साधना पद्धति तांत्रोक्त हो अथवा शक्ति साधनाओं से सम्बन्धित हो तब आवश्यक है कि साधक प्राणवान ऊर्जा के सानिध्य में ऐसी श्रेष्ठतम क्रियायें सम्पन्न करें। और यह कार्य केवल समर्थ गुरु के सानिध्य में ही संभव है।
कमला तंत्र में बताया गया है कि कमला यंत्र पूर्ण विधि-विधान से षट्कोण सहित अष्टदल युक्त हो-
यह यंत्र ताम्र पत्र पर अंकित हो, साथ ही साथ तंत्रोद्धार विधि द्वारा प्राण प्रतिष्ठत हो। कमला तंत्र के अनुसार बारह विशिष्ट क्रियाओं से युक्त यंत्र ही उपयोग करना चाहिये।
1- कमला यंत्र शुद्धता के साथ विजय काल में अंकित हो।
2- मांत्रोक्त विधान से सिद्ध हो।
3- यह वाग् बीज से सम्पुटित हो।
4- लज्जा बीज के द्वारा इसका अभिषेक हो।
5- श्रीं बीज के द्वारा यह यंत्र चैतन्य हो।
6- काम बीज के द्वारा यह वशीकरण युक्त हो।
7- पप्र बीज के द्वारा यह प्रभाव युक्त हो।
8- जगत बीज के द्वारा यह आकर्षण युक्त हो।
9- रूद्र बीज के द्वारा यह शौर्य वीर्य युक्त हो।
10- मनु बीज के द्वारा मन पर नियंत्रण प्रदान करने वाला हो।
11- ऐं बीज के द्वारा वैभव प्रदायक हो।
12- रमा बीज के द्वारा सिद्धि प्रदायक हो।
ऐसी विशिष्ट क्रियायें सम्पन्न होने के पश्चात् यंत्र प्राणवान चेतना से संस्पर्शित हो और श्रेष्ठ गुरु के निर्देशन में ऐसी साधनात्मक क्रियायें सम्पन्न की जाये तो जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति तो होगी। साथ ही जीवन में अर्थ का किसी भी रूप में अभाव नहीं होगा। साथ ही धनागमन निरन्तर स्थायी रूप से बना रहेगा।
मनुष्य अपने जीवन में श्रेष्ठ माता-पिता, श्रेष्ठ मित्र, सहयोगी और उससे भी अधिक ईश्वर से श्रेष्ठ सद्गुरुदेव की सानिध्यता प्राप्त कर पाता है। जो उसके जीवन के मार्गदर्शक व पथप्रदर्शक होते हैं। वे उसे बार-बार ज्ञान कराते हैं, कि यह मनुष्य जीवन अत्यन्त विलक्षण है, इसके प्रत्येक क्षण में एक माया एक रहस्य छुपा है। जैसे-जैसे, क्षण-क्षण इन रहस्यों का समाधान प्राप्त करते रहोगे तो जीवन आभा युक्त, श्री युक्त हो जायेगा और सही अर्थों में जीवन जीने का आनन्द प्राप्त कर सकोगे। यह ज्ञान केवल श्रेष्ठ गुरु के सानिध्य से सम्भव होता है।, क्योंकि गुरु का जीवन अपने मानस पुत्रों को सदैव कुछ देने के लिये तत्पर रहता है। दैनिक प्रार्थना में जब व्यक्ति कातर होकर प्रार्थना करता है, कि मैं मंत्रहीन, क्रियाहीन, भाग्यहीन हूं, मुझ पर कृपा करो तो उस पर ईश्वरीय कृपा कैसे हो सकती है? कर्महीन, मंत्रहीन और भाग्यहीन व्यक्ति तो पशुवत् ही है और सद्गुरुदेव उसे दीक्षा के माध्यम से मंत्रयुक्त, साधना के माध्यम से क्रिया युक्त और दिव्य चेतना से उसे सौभाग्य युक्त बना देते हैं। इन तीनों का योग निश्चित समय पर अर्थात् श्रेष्ठ मुहूर्त में ही सम्भव हो पाता है।
दीपावली केवल घी-तेल के दीपक जलाकर मिठाई खाकर उत्सव सम्पन्न करने का एक पर्व मात्र नहीं है। यह तो कालरात्रि है, यह काल खण्ड जो कि धनत्रयोदशी से प्रारम्भ होकर द्वितीया तक पूर्ण फलदायी मुहूर्त है। यह मुहूर्त जीवन को कर्मशील, भाग्यशील मंत्रयुक्त करने का पर्व है, काल का कोई भी खण्ड अपनी पुनरावृत्ति नहीं करता, जहां जिस क्षण का उपयोग आपने कर लिया, वह क्षण आपके जीवन को श्रेष्ठ दिशा में ले जाने में समर्थ हो जाता है। कहते हैं, कि चूके तो चौरासी अर्थात् यदि निकल गया, तो पुनः चौरासी लाख योनियों का भ्रमण है और यदि समय का सही उपयोग कर लिया तो इसी जीवन में पूर्णता है। सिद्धाश्रम प्राप्ति है।
इस महारात्रि के आगमन का क्षण समीप हैं, किन्तु अब जीवन में और कालरात्रियां न हो, जीवन काल के चक्र में आबद्व न रह सके। इसीलिये परम पूज्य सद्गुरुदेव ने यह मानस बनाया है कि दीपोत्सव पर्व पर भौतिक जीवन की अधिष्ठात्री कमला महाविद्या की साधनात्मक क्रियायें जोधपुर की चैतन्य भूमि पर सभी साधक सम्पन्न करें। यूं तो दीपावली पर्व अपने घर पर भी परम्परागत ढंग से सम्पन्न की जा सकती है। किन्तु जब सद्गुरुदेव स्वयं किसी विशिष्ट विधान को सम्पन्न कराने का मानस बनाते हैं तो उसके पीछे गूढ़ अर्थवत्ता छिपी होती है।
शिष्यों के जीवन का सौभाग्य ही है कि ऐसी श्रेष्ठतम साधनात्मक क्रियायें परम पूज्य सद्गुरुदेव व वन्दनीय माता जी के सानिध्य में नारायण स्वरूप सद्गुरुदेव निखिल की तपोभूमि पर क्रियात्मक रूप से सम्पन्न करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। क्योंकि ऐसे दुर्लभ क्षण तो जीवन में एक ही बार आता है।
सर्वथा प्रथम बार दीपोत्सव पर्व पर लक्ष्मी के पूर्ण स्वरूप कमला महाविद्या की साधना महोत्सव में भाग लेने का अवसर शिष्यों को प्राप्त हो रहा है। साथ ही शिष्य के जीवन का कर्तव्य है कि वर्ष में एक बार अपने शिष्यता का परिचय देते हुये धन त्रयोदशी, रूप चतुर्दशी और दीपावली पर्व पर देवत्व चेतना से आपूरित गुरुधाम की चेतना और पावनता को आत्मसात करें।
क्योंकि यही वह अवसर होता जब सद्गुरु अपने मानस पुत्र-पुत्रियों को महालक्ष्मी की पूर्णता प्रदान करने के लिये विशिष्ट क्रियायें सम्पन्न करते हैं और गुरु गृह में ही ऐसी श्रेष्ठतम क्रिया सम्पन्न हो सकती है, क्योंकि शास्त्रों ने गुरु निवास स्थल को ही पूर्ण चैतन्य, देव शक्तियों से युक्त् और फलदायी बताया है। गुरुधाम जोधपुर कई विशिष्ट साधनात्मक आयोजन से गौरव युक्त, मंत्र युक्त के साथ-साथ सद्गुरुदेव निखिल की चेतना से चेतनावान है।
इस भूमि के कण-कण में सद्गुरुदेव निखिल की चेतना व्याप्त है। जिसकी चैतन्यता को आत्मसात कर साधक निश्चित ही जीवन में चहुंमुखी विकास कर सकेगा। साथ ही चिर स्थायित्व रूप से धनागमन बना रहेगा और षड्-ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि, कीर्ति, यश, पद-प्रतिष्ठा की वृद्धि होती ही है। दिव्य कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में आप सभी का सपरिवार हृदय भाव से स्वागत है——–!
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