





नारायणोपनिषद् में कहा गया है कि जीवन की सृष्टि नारायण से हुयी है। नारायण ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के कारण हैं। नारायण से ही प्रेरित होकर सब अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं और नारायण में ही लीन हो जाते हैं, ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी। इन तत्वो की सूक्ष्म मात्राओं से सूक्ष्म और शरीर और सूक्ष्म शरीर से स्थूल शरीर की उत्पत्ति हुयी। मानव शरीर पंचतत्वों- आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी से बना है और अन्त में इन्हीं में विलीन हो जाता है। पंच तत्व का सार पृथ्वी है, पृथ्वी का सार जल और जल का सार अन्नादि औषधियां हैं, पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद ब्रह्म जीवात्मा एवं आत्मचिन्तन के रूप में अवतरित होते हैं, यही मनुष्य एवं प्राकृतिक संसार का सम्बन्ध है।
ये पंच तत्व पांच ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित हैं। क्योंकि पृथ्वी का स्वयं का गुण गन्ध है जिससे नासिका सम्बन्धित है। जीभ जल से सम्बन्धित है, क्योंकि जल का स्वयं का गुण रस है, आंखे अग्नि से, अग्नि का गुण रूप है, त्वचा वायु से सम्बन्धित है, वायु का अपना गुण स्पर्श है। कान आकाश से सम्बन्धित है क्योंकि आकाश का स्वयं का गुण शब्द है।
ये पांचो तत्व हमारे पर्यावरण के पर्याय एवं प्रतीक हैं पर्यावरण शुद्ध रखने का तात्पर्य है, इन्हीं पंचतत्वों को शुद्ध एवं नैसर्गिक अवस्था में रखना। पंचतत्वों से निर्मित जड़ एवं चेतन पदार्थ-वनस्पति और प्राणी हमारे पर्यावरण के अभिन्न अंग है। किसी भी एक तत्व के दूषित होने पर पूरा पर्यावरण असन्तुलित हो जाता है, जिसका सभी प्राणियों पर कुप्रभाव पड़ता है। प्रकृति का यह नियम है कि पर्यावरण में सजीव एवं निर्जीव तत्वों का सन्तुलन प्राकृतिक शक्तियों द्वारा बना रहे। जब यह सन्तुलन किसी कारणवश बाधित होता है, तो हमारा कर्तव्य है कि उस सन्तुलन को हम फिर स्थापित करें।
संसार में जितने भी प्राणी, जीव-जन्तु और निर्जीव पदार्थ हैं, वे पंच तत्वों के ही रूप हैं, हमारा जीवन इन्हीं से बना है और मृत्यु के उपरान्त इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है, अतः स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के लिये इन तत्वों को स्वच्छ, पवित्र, प्रदूषण मुक्त होना एवं उनका समुचित संतुलन बनाये रखना आवश्यक है। यदि एक भी तत्व प्रदूषित, क्षीण या नष्ट होते हैं, उसका कुप्रभाव हमारे शरीर पर पड़ेगा। प्रकृति का वातावरण में असंतुलित होना, विनाश और प्राकृतिक आपदा भूकम्प, बाढ़ आदि का कारण बनता है। पंच तत्वों का महत्व साधारण मनुष्य तक पहुंचाने के लिये, प्रकृति की सुरक्षा के लिये हमारे ऋषि- मुनियो ने प्रकृति को देवताओं का प्रतिरूप कहा है।
ये प्राकृतिक तत्व जीवन शक्ति दायक हैं। ये जीवन की वृद्धि, सुरक्षा, उपचार एवं पुनरुत्थान करते हैं। यदि मनुष्य इनको सुरक्षित रखेंगे तो इन्हीं के द्वारा मनुष्य में ऊर्जा शक्ति का संचार निरन्तर होता रहेगा। इसी भावना से हिन्दू धर्म में अनेक विधि- विधान हैं, जिनके द्वारा वातावरण एवं पर्यावरण शुद्ध एवं स्वच्छ बनाया जा सकता है। हवन, यज्ञ, पूजा आदि का मूल लाभ तो आध्यात्मिक लाभ ही है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि इसके द्वारा पर्यावरण स्वतः ही शुद्ध होता है। पूजा में प्रयोग की जाने वाली सुगन्धित सामग्री पृथ्वी की, फूल आकाश का, जल और प्रकाश अग्नि का द्योतक है।
परमात्मा की कृपा से मनुष्य को अपार प्राकृतिक सम्पदा मिली है। मानव, पशु, पक्षी और वृक्षो का जीवन एक-दूसरे से जुड़ा है। परंतु मनुष्य स्वार्थ वश पशु, पक्षी एवं वृक्षो का जीवन नष्ट करने पर तुला है। आर्थिक विकास के लिये किया जाने वाला औद्योगिकीकरण प्राकृतिक पर्यावरण संतुलन को संकट ग्रस्त कर रहा है। इसका मूल्य मनुष्य को वायु, जल प्रदूषण, घटती हुयी वन सम्पदा और विषाक्त फल सब्जियो के विकिरण समस्या के रूप चुकाना पड़ रहा है। इसके परिणाम में मनुष्य का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। जिससे मान की आभ्युदायिक प्रगति अवरूद्ध हो रही है।
आकाश- यह तत्व शरीर के विशुद्ध चक्र में स्थित है। इसका स्थान कण्ठ है। मस्तिष्क का भाग आकाश तत्व का अंश है। जो छिद्र है, वही आकाश तत्व है। शरीर में इसके रहने एवं कार्य करने का स्थान मुख्य रूप से कान एवं मुख है। इसका स्वभाव ठण्डा है। इसका कार्य शान्तिदायक है।
जब शरीर के भीतरी अथवा बाहरी किसी भी अंग में अग्नि तत्व (गरमी) अथवा पित्त की वृद्धि होने पर सिर दर्द, ज्वर, वमन, हिचकी, प्रमेह, आंखो के रोग, खसरा, चेचक, अतिसार, मिरगी, हैजा, खूनी बवासीर, त्वचा रोग तथा मानसिक रोगों से जब मनुष्य पीडि़त होता है, तब यह तत्व लाभदायी है। यह खुश्की एवं प्यास को रोकने तथा शान्ति देने वाला तत्व है। परंतु इस तत्व की अधिकता से मल, मूत्र, जिह्ना, नेत्र तथा नाखून सफेद होने लगते हैं। शरीर में सुस्ती आती है। भूख, प्यास, पसीने की कमी होनी प्रारम्भ हो जाती है। मुंह का स्वाद मीठा हो जाता है। कान में बहरापन अथवा गूं-गूं शब्द उत्पन्न होने लगते हैं।
आकाश तत्व की पूर्ति उपवास द्वारा की जाती है। दोष पूर्ण भोजन, अत्यधिक श्रम आदि दोष उपवास से समाप्त हो जाते हैं। आकाश का गुण शब्द है। जिससे अधिक ध्वनि प्रदूषण होता है। इस तत्व का ध्यान करने से ध्वनि प्रदूषण से बचा जा सकता है। यह तत्व शरीर के विषयुक्त पदार्थों को हटाता है। इस तत्व के प्रभाव का ध्यान करके थायराईड, पैराथायराईड, टांसिल्स आदि पर नियन्त्रण सम्भव है। इस तत्व के प्रभाव से ही प्रेम, स्नेह, भावुकता, निःस्वार्थ मन का निर्माण होता है और पिटयुटीर ग्रन्थि सक्रिय रहती है, जिससे दृष्टि, श्रवण तथा स्मरण शक्ति सुदृढ़ होती है।
वायु- वायु तत्व के ध्यान से वायु अथवा प्राण की कार्य प्रणाली श्वास-प्रश्वास को नियन्त्रित करने की क्षमता विकसित की जाती है। हृदय से लेकर भौंहों के मध्य तक का क्षेत्र वायु तत्व का अंश है। इसका मुख्य स्थान अनाहत चक्र है। इसका गुण स्पर्श है।
वायु तत्व शक्ति शरीर प्रत्येक भाग का संचालन करता है। यह तत्व हृदय की स्पन्दन क्रिया का नियन्त्रण करने, शारीरिक सन्तुलन बनाने तथा मल-मूत्र की प्रक्रिया को सहज एवं स्वाभाविक बनाने में सहायक है।
वायु तत्व दस प्रकार के होते हैं- प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान, नाग, धनंजय, देवदत्त, कृकर, कूर्म इनमें पहली पांच प्रकार की वायु प्राण वायु तथा अन्तिम पांच प्रकार की वायु को उप-प्राण वायु कहते हैं।
वायु तत्व का स्वभाव सर्द, खुश्क एवं शान्तिदायक है। इस तत्व से स्मरण शक्ति एवं मानसिक बल की वृद्धि होती है। जब शरीर के किसी भी अंग में अग्नि तत्व तथा आकाश तत्व अर्थात् पित्त या कफ बढ़ जाये या कम हो जायें तो वायु तत्व उसे नियन्त्रित करने में सहायक होता है।
परंतु इस तत्व के बढ़ने से दर्द, मिरगी एवं हिस्टीरिया जैसे मानसिक रोग पैदा होने लगते हैं। घाव, जख्म आदि उत्पन्न होते हैं। मुंह का स्वाद कसैला हो जाता है। इस तत्व के घटने से स्वभाव शिथिल हो जाता है और उदासीनता घेर लेती है। प्राणायाम, योगासन आदि से वायु तत्व को नियन्त्रित किया जा सकता है। अग्नि- जो गर्म है, वह अग्नितत्व है, गुदा से हृदय तक का भाग अग्नि तत्व है। वास्तव में इसका वास सर्वत्र विद्युत् के समान है।
यह तत्व आहार को सही तरह से पचा कर शरीर को शक्ति प्रदान करता है। इसके प्रभाव से स्नायुओं की पुष्टि, सौन्दर्य-वृद्धि एवं विचार शक्ति में अभिवृद्धि एवं रोग-प्रतिरोधी-शक्ति का विकास होता है। पाचक रस, पित्त रस आदि को उत्पन्न करने में अग्नि तत्व की महत्वपूर्ण भूमिका है।
हमारे शरीर की हड्डियों में कैल्शियम, फॉसफोरस तथा विटामिन का विशेष स्थान है। सूर्य की किरणों में विटामिन का विशेष स्थान है। सूर्य की किरणों से हमें विटामिन डी प्राप्त होता है। धूप हमारे त्वचा द्वार से शरीर की गंदगी निकालती है। सूर्य-रश्मियां नेत्र ज्योति बढ़ाने में बहुत सहायक हैं।
अग्नि तत्व ऊपर की ओर चलता है। इसकी अधिकता से शरीर के नेत्र, नाखून, जिह्ना, मल, मूत्र आदि सुर्ख लाल, गुलाबी अथवा पीले हो जाते हैं। मुंह का स्वाद खट्टा, कड़वा चरपरा (तिक्त) मिश्रित हो जाता है और अधिकता से ज्वर भी होता है।
अग्नि तत्व की कमी से शरीर में सुस्ती, सर्दी, नींद की अधिकता, भूख की कमी आदि व्याधियां उत्पन्न होती हैं। जल- घुटने से गुदा मार्ग तक का भाग जल तत्त्व का अंश है।
जल तत्त्व का निवास स्थान स्वाधिष्ठान चक्र में रहता है। इसका गुण स्वाद ज्ञात करने की शक्ति है। इसका स्वभाव शान्तिप्रद है। यह फेफड़ों से बलगम तथा आंतो से कफ को निकालने वाला तत्व है।
इस तत्व का ध्यान करने से जलीय विकारों से बचा जा सकता है। यह तत्त्व शरीर की रक्षा एवं जीवन के वेग को संरक्षित करता है। शरीर के तापमान को सन्तुलित रखने तथा रक्त की आपूर्ति को नियमित बनाये रखने में इस तत्व का महत्वपूर्ण योगदान है। जब शरीर के किसी भी अंग में किसी भी कारण से वायुतत्व, अग्नितत्व एवं पृथ्वी तत्व बढ़ जाते हैं तो जल तत्व का प्रयोग अत्यन्त लाभदायक है।
जल तत्व की अधिकता से शरीर में सुस्ती आ जाती है और नींद अधिक आती है। मुंह का स्वाद मीठा एवं कसैला मिश्रित साबुन जैसा प्रतीत होता है। जिह्ना कुछ मैली, सफेद हो जाती है तथा कब्जियत हो जाती है।
जल तत्व की कमी से मनुष्य स्वभाव क्रोधी एवं चंचल हो जाता है। जल तत्व की अधिकता पृथ्विी तत्व को दबा देता है।
अग्नि तत्व तथा वायु तत्व, जल तत्व के विपरीत तत्व हैं।
पृथ्वी- मनुष्य शरीर में पृथ्विी तत्व का निवास मूलाधार चक्र में है। हमारे शरीर में पैर से घुटने तक का भाग पृथ्वी तत्व का अंश है। पृथ्वी तत्व सम्बन्धी समस्या में भगवान् की मूर्ति अथवा किसी केन्द्र बिन्दु पर चित्त को केन्द्रित करके कष्टों से बचा जा सकता है। योग, स्वाध्याय, संकीर्तन, ध्यान आदि क्रियाओं से निराश, उदासीनता, मन का भटकना और स्नायु सम्बन्धी बीमारियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
मिट्टी के विभिन्न प्रयोग से अनेक रोगों की चिकित्सा की जा सकती है। मिट्टी का गुण अथवा तन्मात्र गन्ध जब शरीर के किसी भी अंग में जलतत्व अथवा आकाश तत्व की अधिकता या न्यूनता हो जाती है तो मिट्टी तत्व का प्रयोग अत्यधिक लाभदायक होता है।
मिट्टी तत्व की अधिकता से शरीर में प्यास तथा खुश्की बढ़ जाती है। नेत्र, नाखून, मल, मूत्र तथा जिह्ना का रंग सफेद, पीला हो जाता है। मुंह का स्वाद मीठा प्रतीत होता है।
पृथ्वी तत्व की न्यूनता से अपच, कब्ज, मन्दाग्नि तथा अरुचि आदि पैदा हो जाते हैं। शरीर में दर्द, नाक से दुर्गन्ध तथा रक्त-विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
पंचतत्वों का महत्व बताने के लिये शास्त्रों में पंचभूतो की आराधना, साधना बतायी गयी है। पूजा और स्तुति के माध्यम से मनुष्य को इन तत्वों को पवित्र रखने का प्रयास करना चाहिये, साथ ही इन तत्वों को नियन्त्रित रखने हेतु सतर्क रहना चाहिये। पुराणों में इन पंचभूतो के अधिदेवता भी निर्दिष्ट हैं। आकाश के विष्णु, अग्नि की देवी दुर्गा, वायु के सूर्य, जल के गणेश और पृथ्वी के महादेव शंकर बताये गये हैं-
ये पांचों तत्व साक्षात् परमात्मा के स्वरूप हैं। इसीलिये सतातन धर्म में पंच देवो की साधना व उपासना तथा पंच महायज्ञ सम्पन्न करने की अनिवार्यता बतायी गयी है।
यही कारण है कि पंचतत्वों को पवित्र और प्रदूषण रहित रखने पर न केवल पर्यावरण सुरक्षित होगा, अपितु व्यक्ति शरीर एवं मन से स्वस्थ और प्रसन्न रहेगा, साथ ही उसकी आध्यात्मिक सम्पदा में भी निरंतर वृद्धि होगी।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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