





पूजन का तात्पर्य है उस शक्ति को प्रसन्न कर, उनकी कृपा प्राप्त करना है, कालरात्रि तो तंत्र दिवस है, जिस रात्रि को श्रेष्ठ मुहुर्त में तंत्र रूपी देह के गुंजरण के माध्यम से लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु साधना पूजन सम्पन्न किया जाता है।
दीपावली पूजन में ध्यान देने योग्य बातें-
1- साधक को दीपावली की रात्रि शुभ मुहूर्त, नक्षत्र इत्यादि में लक्ष्मी साधना सम्पन्न करनी चाहिये।
2- साधक अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठ कर लक्ष्मी पूजन करें, वह अपने दाहिनी ओर अपनी पत्नी को बिठाये।
3- पूजन में पति-पत्नी नूतन शुद्ध एवं पवित्र लाल या पीले वस्त्र धारण करें, पूर्ण श्रृंगार के साथ महालक्ष्मी पूजन में भाग लें।
4- पूजन करने से पूर्व पूजन-सामग्री एकत्र करके रख देनी चाहिये, पूजा स्थान में महालक्ष्मी चैतन्य यंत्र स्थापित करें, उसके सामने महालक्ष्मी पूजन में प्रयुक्त सभी सामग्री लकड़ी के पट्टे पर लाल वस्त्र के ऊपर स्थापित करें।
5- साधक के बायीं ओर तेल का दीपक लगाना चाहिये। इसमें किसी भी प्रकार का तेल प्रयोग में लिया जा सकता है, तथा दाहिनी ओर शुद्ध घृत का दीप प्रज्ज्वलित करना चाहिये, दोनों दीपकों के बीच में अगरबत्ती लगानी चाहिये।
6- घी के दीपक में कुछ इत्र की बूंदें भी डाली जा सकती हैं, जिससे सुगंध व्याप्त होती है।
7- लक्ष्मी पूजन में कमल के पुष्प या गुलाल के पुष्पों का विशेष महत्व है, पुष्प ताजे खिले हुये हों।
8- साधक पीले आसन का प्रयोग करें।
9- साधक का मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिये।
10- महालक्ष्मी पूजन से पूर्व गणपति स्थापन, गणपति पूजन तथा गुरु पूजन आवश्यक माना गया है।
11- साधक को चाहिये कि वह पूजन साधना से सम्बन्धित सभी मंत्रों का जप करें, महालक्ष्मी साधना के लिये शुभ-लाभ लक्ष्मी माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
कुंकुम, केशर, गुलाल, मौली, अक्षत, नारियल, लौंग, इलायची, सिन्दूर, अगरबत्ती, दीपक, रूई, माचिस, पंचामृत (शुद्ध घृत, दूध, दही, शहद, शक्कर) यज्ञोपवीत, पंचमेवा, फल, कलश, गंगाजल, श्वेत चन्दन, पान, कमल पुष्प, मिश्री, सरसों, कपूर, पीला वस्त्र, लक्ष्मी को पहनाने योग्य वस्त्र, इत्र, सुपारी, तुलसी- पत्र, काली मिर्च, गुग्गल, श्रृंगार प्रसाधन, दूध का प्रसाद इत्यादि।
प्राण प्रतिष्ठित महालक्ष्मी यंत्र, सिद्ध लक्ष्मी हकीक, वसुधा गोमती चक्र, दारिद्रय शमन हेरम्ब, कामदायिनी मुद्रिका, सौभाग्यवर्धन नारियल, लक्ष्मी सिद्धि फल, ऋद्धि-सिद्धि बीज, शुभ-लाभ लक्ष्मी माला कुल नौ सामग्री
दीपावली की रात्रि को स्नानादि कर शुभ मुहूर्त (वृषभ लग्न गोधूलि वेला में 07:36 से 09:32 या अर्धरात्रि सिंह लग्न में 02:04 से 04:21 तक है।) में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख कर पूजा स्थान में आसन पर बैठ जायें। सामने लाल या श्वेत वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर तांबे या स्टील की थाली रख कर उस पर कुंकुम से अष्ट दल का निर्माण करें। प्रत्येक दल पर एक-एक कर सिद्ध लक्ष्मी हकीक, वसुधा गोमती चक्र, दारिद्रय शमन हेरम्ब, कामदायिनी मुद्रिका, सौभाग्यवर्धक नारियल, सिद्धि फल, ऋिद्धि-सिद्धि चैतन्य बीज स्थापित करें।
इसके बाद अष्ट दल के मध्य में प्राणप्रतिष्ठा युक्त महालक्ष्मी यंत्र को स्थापित कर पूजन प्रारम्भ करें। पवित्रीकरण- दायें हाथ में जल लेकर मंत्रेच्चारण के साथ स्वयं पर छड़कें-
ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वाऽवस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।
आचमन- निम्न मंत्र बोलते हुये तीन बार आचमन करें-
ऊँ केशवाय नमः। ऊँ नारायणाय नमः। ऊँ माधवाय नमः।
फिर हाथ धो लीजिये।
संकल्प- दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ विष्णवे नमः। ऊँ विष्णवे नमः। ऊँ विष्णवे
नमः। हरिः ऊँ तत्सत् अद्य एतस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे
अष्टाविंशति कलियुगे जम्बूदीपे भरतखण्डे पुण्यक्षेत्रे
मासानाम उत्तमे मासे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस्या
तिथौ गुरुवासरे अमुक गोत्रः (अपना गोत्र बोलें) अमुक
शर्माऽहं (नाम बोलें) श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ महालक्ष्मी
प्रीत्यर्थ सकल दुःख दारिद्रय नाश निमित्तं च महालक्ष्मी
पूजनं करिष्ये। (जल को भूमि पर छोड़ दें)
आसन- आसन के लिये एक पुष्प अर्पित करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि नमः ।।
पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं स्नानं च समर्पयामि ।।
गणपति पूजन- सुपारी पर मौली बांध कर गणपति के रूप में किसी पात्र में स्थापित करें। निम्न ध्यान मंत्र बोलकर गणपति को पुष्प चढ़ायें-
गजाननं भूत गणाधि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणं ।
उमासुतं विनाशककारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजं ।।
गुरु पूजन- अपने सामने गुरु चित्र स्थापित करें और लक्ष्मी पूजन दीपावली के शुभ अवसर पर उनके आशीर्वाद की कामना करें-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः ।
ऊँ मंगलमूर्ति निखिलेश्वराय नमः ।
पाद्यं, अर्घ्यं, स्नानं, धूपं, दीपं, पुष्पाणि,
नैवेद्यं निवेदयामि श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः।
कलश स्थापन- एक अलग बाजोट पर चावल से स्वस्तिक बनाकर उस पर कलश को स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल भर दें, उसके बाद उसमें चन्दन अक्षत, सुपारी डालें, गंगा जल मिलायें। कलश पर मौली बांधें और निम्न मंत्र का पाठ करें –
युवा सुवासा परिवीत आगात् स उश्रेयान, भवति जायमानः,
तं धीरासः कवयः उन्नयन्ति साध्यो मनसा देवयन्तः।
इसके बाद नारियल में मौली बांध लें और कुंकुम का तिलक करें, पांच आम या अशोक के पत्ते कलश में डालकर नारियल को कलश पर स्थापित कर दें। इसके बाद दाहिने हाथ से कलश का स्पर्श करते हुये निम्न मंत्र का पाठ करें-
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः,
मूले तस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ गणास्थिता ।
कुक्षौ तु सागरा सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा नमः।।
महालक्ष्मी पूजन विधान
महालक्ष्मी यंत्र पर दाहिनी हथेली रख कर निम्न मंत्र बोलकर यंत्र को अपने प्राणों से सम्बद्ध करने की क्रिया करें-
अस्मै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्मै प्राणा क्षरन्तु च ।
अस्मै देवत्वं अर्चायै मां अहैति च कश्चन ।।
1- सिद्ध लक्ष्मी हकीकः कुंकुम एवं अक्षत चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
।। ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै नमः ।।
2- वसुधा गोमती चक्रः कुंकुम एवं अक्षत चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
।। ऊँ ग्लौं श्रीं श्रीं ग्लौं ऊँ ।।
3- दारिद्रय शमन हेरम्बः कुंकुम एवं अक्षत अर्पित करते हुये निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
।। ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ ।।
4- कामदायिनी मुद्रिकाः कुंकुम, अक्षत अर्पित कर, 5 बार मंत्र उच्चारण करें।
।। ऊँ ह्रौं हूं अनंगाय फट् ।।
5- सौभाग्यवर्धक नारियलः कुंकुम, अक्षत अर्पित करते हुये 5 बार मंत्र उच्चारण करें।
।। ऐं श्रीं श्रीं क्लीं सौ जगत्प्रसूत्यै नमः ।।
6- अष्ट सिद्धि फलः थाली में कुंकुम से बनाये अष्टदल पर अष्ट सिद्धि फल स्थापित कर कुंकुम और अक्षत चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
।। ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं ।।
7- ऋिद्धि सिद्धि चैतन्य बीजः कुंकुम, अक्षत चढ़ाते हुये मंत्र का 5 बार उच्चारण करें।
।। ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं तिष्ठतिष्ठ स्वाहा ।।
यंत्र का पूर्ण पूजन प्रारम्भ करें।
पंचामृत स्नान (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) पंचामृत से भगवती महालक्ष्मी को स्नान करायें।
मध्वाज्यशर्करायुक्तं दधिक्षीरसमन्वितम् ।
पंचामृतं गृहाणेदं पंचास्यप्राणवल्लभे ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि ।।
शुद्धोदक स्नान (शुद्ध जल)
इसके बाद उन्हें शुद्ध जल से स्नान करायें-
परमानन्दबोधाब्धिं निमग्न निजमूर्तये ।
शुद्धोदकैस्तव स्नानं कल्पयाभ्यम्ब शंकरि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।।
वस्त्र, आभूषण, गंध, अक्षत, पुष्प समर्पित करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः आभूषणं समर्पयामि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः गन्धं समर्पयामि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि ।।
श्री महालक्ष्म्यै नुमः पुष्पाणि समर्पयामि ।।
इसके बाद कुंकुम, अक्षत तथा पुष्प मिला कर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये यंत्र पर चढ़ायें।
ऊँ आद्य लक्ष्म्यै नमः, ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नमः
ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः, ऊँ अमृत लक्ष्म्यै नमः
ऊँ कमलाक्ष्यै नमः, ऊँ भोग लक्ष्म्यै नमः,
ऊँ योग लक्ष्म्यै नमः, ऊँ सहस्त्र लक्ष्मयै नमः
धूप- श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि ।।
दीप- श्री महालक्ष्म्यै नमः, दीपं दर्शयामि ।।
नैवेद्य- नाना विधानि भक्ष्याणि व्यंजनानि हरिप्रिये ।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि ।।
ताम्बूल- लौंग इलायची युक्त पान समर्पित करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।।
दक्षिणा- दक्षिणा द्रव्य समर्पित करें-
श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि ।।
इसके बाद महालक्ष्मी मंत्र का शुभ-लाभ माला से एक माला मंत्र जप सम्पन्न करें-
।। ऊँ ऐं श्रीं श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै सिद्धयै नमः ।।
इसके बाद लक्ष्मी आरती सम्पन्न करें। जल आरती- तीन बार आचमनी से जल लेकर दीपक के चारों ओर घुमायें तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें –
ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शान्तिः पृथिवी
शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः
शान्ति र्विश्वे देवाः शान्तिः ब्रह्म शान्तिः सर्व (गूं)
शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।
पुष्पांजलि- दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तथा यंत्र पर चढ़ा दें-
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण जगदम्बिके।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पांजलि समर्पयामि।।
प्रणामांजलि- दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये प्रार्थना करें-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।।
श्री महालक्ष्म्यै नमः नमस्करोमि ।।
समर्पण- इसके बाद समर्पण मंत्र का उच्चारण करें, जिससे भगवती लक्ष्मी युक्त फल आपको प्राप्त हो सके-
ऊँ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु, अनेन कृतेन पूजाराधन कर्मणा।
श्री महालक्ष्मी देवता परासंवित् स्वरूपपिणी प्रीयन्ताम्।।
एक आचमनी जल लेकर पूजन की पूर्णता हेतु भूमि पर छोड़ दें। इसके बाद वहां उपस्थित परिवार के सभी सदस्यों एवं स्वजनों को प्रसाद वितरित करें।
इस प्रकार यह सम्पूर्ण पूजन व साधना सम्पन्न होती है। साधना समाप्ति के पश्चात् माला व यंत्र को पूजा स्थान में ही स्थापित रहने दें और शेष सामग्री को कार्तिक शुक्ल षष्ठी (छठ पूजा) के दिन जल में समर्पित कर दें।
महालक्ष्मी की कृपा से आप आरोग्यमय दीर्घायु जीवन प्राप्त करें
अक्टूबर माह (कार्तिक मास) पूर्ण रूपेण गृहस्थ शक्ति लक्ष्मी मास होता है, अतः इसका प्रत्येक दिवस हर तरह की सुलक्ष्मियों को आत्मसात करने का मुहूर्त है, इसीलिये इस कार्तिक मास में परिवार के प्रत्येक सदस्य को लघु स्वरूप में मंत्र जाप, साधना व दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करना चाहिये, जिससे आने वाला नूतन वर्ष सुसंस्कारों व सुमंगलमय निर्मित हो सके।
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