





कैलाश पर्वत पर नाना रत्नों से शोभित कल्पवृक्ष के नीचे पुष्पों से शोभित, मुनि, गन्धर्व इत्यादि से सेवित, मणियों से मण्डित मण्डप के मध्य सुखासन में बैठें जगद्गुरु भगवान कपाल और खड्वांग धारण किये चन्द्रमा के अर्ध भाग को शेखर के रूप में धारण किये, हाथ में त्रिशूल और डमरु लिये वृषभवाहन, जटाजूटधारी, कण्ठ में वासुकी नाग को लपेटे हुए, शरीर में विभूति लगाये हुए देव नीलकण्ठ त्रिलोचन गजचर्म पहने हुए, शुद्ध स्फटिक के समान, हजारों सूर्यों के समान, गिरिजा के अर्द्धांग भूषण, संसार के कारण विश्वरूपी शिव को अपने पूर्ण भक्ति भाव से प्रणाम करते हुए उनके पुत्र कार्तिकेय ने पूछा- हे देव! जगन्नाथ! सृष्टि, स्थिति, प्रलय के स्वामी! आप परमात्म हैं, सभी प्राणियों की गति हैं, आप ही सभी लोकों की गति हैं, जगत् के आधार हैं, विश्व के कारण हैं, सर्वपूज्य हैं, आपके बिना मेरी कोई गति नहीं है। संसार में परम गुह्य क्या वस्तु है?
ऐसी कौन सी क्रिया है, जो सभी सिद्धियों को देने वाली है? ऐसी कौन सी क्रिया है, जो परम श्रेष्ठ है? ऐसा कौन सा योग है, जो स्वर्ग और मोक्ष को देने वाला है? ऐसा कौन सा उपाय है, जिसके द्वारा साधारण मानव बिना तीर्थ, दान, यज्ञ और ध्यान के पूर्णता प्राप्त कर सकता है? इस सृष्टि का आधारभूत क्या है और किसमें इसका लय होता है? किस उपाय से यह सामान्य मानव इस संसार रूपी सागर में अपनी इच्छाओं को, कामनाओं को पूर्ण कर सकता है? केवल आप ही वह महाज्ञानी हैं, जो इस सम्बन्ध में मुझे पूर्ण ज्ञान दे सकते हैं।
इस पर भगवान शिव कहते हैं- कार्तिकेय! तुमने अत्यन्त रहस्य का प्रश्न पूछा है, सत, रज एवं तम, जो महदादी एवं अन्य भूत-प्रेत, प्राणी हैं, वे सब इस प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। वही पराशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी है, वही सारे चराचर संसार को उत्पन्न करती है, पालती है और नाश करती है, वही शक्ति इच्छा, ज्ञान, क्रिया शक्ति और ब्रह्मा, विष्णु, शिव रूप वाली है, वही त्रिशक्ति के रूप में सृष्टि, स्थिति और विनाशिनी है, ब्रह्मा रूप में वह इस चराचर जगत की सृष्टि करती है, विष्णु रूप में वह इस संसार का पालन करती है तथा वही शिव रूप में विनाश करती है, जिसके महाप्रलय में यह संसार लीन हो जाता है और जहां से पुनः उत्पन्न होता है, उसी महात्रिपुर सुन्दरी की आराधना कर मैंने भी इन तीनों लोकों में उत्तम स्थान पाया है, उसकी साधना ही जीवन में सर्वश्रेष्ठ साधना है।
उपरोक्त कथा केवल एक कथा ही नहीं है, जीवन का श्रेष्ठतम सत्य है, क्योंकि जिस व्यक्ति पर षोड़शी महात्रिपुर सुन्दरी की कृपा हो जाती है, वह व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण सिद्ध हो जाता है, क्योंकि यह शक्ति शिव की भी शक्ति है, यह शक्ति इच्छा, ज्ञान, क्रिया तीनों स्वरूपों को पूर्णता प्रदान करने वाली है।
पराशक्ति की शिव-शक्ति के विग्रह के रूप में प्रथम कल्पना काली के रूप में है, इसलिये इन्हें आद्या भी कहते हैं तारा द्वितीया और त्रिपुरा तृतीया हैं, ये ही महाविद्या त्रिपुरा, बाला, षोडशी, त्रिपुर सुन्दरी, श्रीविद्या आदि नामों से प्रसिद्ध हैं। श्री विद्या के नाम से सम्पूर्ण भारत में इनकी उपासना होती है।
त्रिपुरा शब्द की अनेक प्रकार से व्याख्या हुई है-
अर्थात् ‘पराशक्ति से प्रकट होकर त्रिमूर्ति की सृष्टि करने के कारण, परादेवी के त्रयीमय होने के कारण, प्रलय के बाद तीनों लोकों को पूर्ण कर देने के कारण, प्रायः जिनका मंत्र भी तीन अक्षरों का है, जिनके तीन रूप हैं, जो तीन प्रकार की कुण्डलिनी शक्ति और तीन देवताओं की सृष्टि करती हैं और जिनका सब कुछ तीन-तीन हैं, इसलिये यह त्रिपुरा हैं। तीनों मूर्तियों से पुरातन होने के कारण अम्बिका का नाम त्रिपुरा है, सुषुम्ना इड़ा और पिंगला ये तीन नाडि़यां त्रिपुर हैं, मन, बुद्धि और चित्त को भी त्रिपुर कहा गया है, इन स्थानों में निवास होने के कारण ये त्रिपुरा हैं। तीन स्थानों ‘भूः’, ‘भुवः’ और ‘स्वः’ में रहने वाली देवी सरस्वती क्रिया शक्ति रूप, तीन लोक, तीन देव, तीनों लोक के तीनों पावक, तीन ज्योति, तीन वर्ग, तीन गुण, तीन शब्द, तीन दोष, तीन आश्रम, तीन काल, तीन अवस्था आदि इनके रूप हैं।
‘वामकेश्वर तंत्र’ में त्रिपुरा का स्वरूप इस प्रकार कहा गया है- ‘ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र ईशरूपिणी श्रीविद्या के ही ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति और इच्छा शक्ति के तीन स्वरूप हैं। इच्छा शक्ति उनका शिरोभाग है, ज्ञान शक्ति मध्यभाग तथा क्रिया शक्ति अधोभाग है। शक्ति त्रयात्मक उनका रूप होने के कारण ही वह त्रिपुरा कही जाती हैं।’
शक्ति की उपासना की परम्परा में त्रिपुरा आदि शक्ति के रूप में पूजित हैं। तांत्रिक और वैदिक दोनों ही मार्गों से त्रिपुरा की आराधना की जाती है। यह भारतीय संस्कृति की सर्वमन्य देवी हैं। श्री चक्रराज में भी इन की अर्चना की जाती है।
त्रिपुरा राज-राजेश्वरी सांसारिक जीवन के लिए सर्वाधिक तेजस्वी, जाज्वल्यमान और जीवन में सम्पूर्णता को देने वाली महाशक्ति है। इसके साथ ही साथ इसकी विशेषता यह है कि यह भौतिक सुखो की पूर्ति में सर्वथा समर्थ है। हमारे जीवन में चाहे किसी भी प्रकार का अभाव हो, कष्ट हो, पीड़ा हो, बाधा हो, दुःख हो, दैन्य हो, न्यूनता हो, दरिद्रता, अभाव इन सबको एक ही झटके में समाप्त करने की अगर कोई शक्ति है, तो वह त्रिपुरा ही है।
इस शक्ति की एक और विशेषता यह है कि यह शक्ति मनुष्य का मानसिक कायाकल्प कर उसे नवजीवन प्रदान करती है, अन्तः और बाह्य दोनों प्रकार के सौन्दर्य को प्रदान करने वाली शक्ति है त्रिपुरा। जिसकी उपासना से साधक के जीवन में चाहे जिस प्रकार की न्यूनता हो, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक उसकी पूर्ति होती है और वह अपने आप में पूर्ण सौन्दर्यमय और सम्मोहक बन जाता है।
साधक अपने आप में तेजस्वी, अद्वितीय दमक से युक्त ललाट, सिंह के समान दर्पोन्नत वक्षस्थल बन जाता है। इस महाशक्ति की चौथी विशेषता है कि इसके माध्यम से जीवन में निरन्तर धन प्राप्त होता ही रहता है और आय के सैकड़ो स्त्रोत खुल जाते हैं, चाहे वह व्यापार करता हो, चाहे वह नौकरी करता हो, इस प्रकार की सुविधाएं, इस प्रकार के रास्ते अपने-आप बन जाते हैं, जिसकी साधक कल्पना भी नहीं करता कि इस प्रकार से भी धन अर्जित हो सकता है।
शिव-शक्ति के चैतन्यता से आपूरित श्रावण माह की दिव्यता में प्रत्येक साधक-साधिका को अपने सांसारिक गृहस्थ जीवन को सर्व सुखमय, आनन्ददायक व सम्पन्न सौभाग्य शक्ति युक्त बनाने हेतु राज-राजेश्वरी त्रिपुरा दीक्षा अवश्य ही आत्मसात करना चाहिए।
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